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औद्योगीकरण का युग
The Age of Industrialisation — RBSE Class 10 History Chapter 4
औद्योगीकरण का युग (The Age of Industrialisation) वह काल है जब हस्तनिर्मित वस्तुओं का निर्माण कम हुआ और फैक्ट्री, मशीन एवं तकनीक का विकास हुआ। इस अध्याय में हम ब्रिटेन में औद्योगिक क्रांति और भारत पर इसके प्रभाव का अध्ययन करते हैं।
औद्योगिक क्रांति (Industrial Revolution) का अर्थ है खेतिहर समाज का औद्योगिक समाज में परिवर्तन। 1760 से 1840 के काल को औद्योगीकरण का युग कहा जाता है।
1. आदि-औद्योगीकरण (Proto-Industrialisation)
आदि-औद्योगीकरण का अर्थ है फैक्ट्रियों की स्थापना से पहले का औद्योगिक उत्पादन। इंग्लैंड और यूरोप में कारखाने खुलने से पहले भी अंतर्राष्ट्रीय बाजार के लिए बड़े पैमाने पर औद्योगिक उत्पादन होता था, लेकिन यह उत्पादन फैक्ट्रियों में नहीं बल्कि घरों में होता था।
1.1 आदि-औद्योगीकरण की विशेषताएं
| विशेषता | विवरण |
|---|---|
| उत्पादन स्थल | घरों में (Cottage Industry) |
| व्यापारी की भूमिका | कच्चा माल देना, तैयार माल खरीदना |
| श्रमिक | किसान परिवार (खाली समय में) |
| गिल्ड्स | कारीगरों के संगठन जो उत्पादन नियंत्रित करते थे |
2. कारखानों का उदय
इंग्लैंड में सबसे पहले 1730 के दशक में कारखाने खुले। कपास (Cotton) नए युग का पहला प्रतीक थी।
2.1 कारखाना प्रणाली के लाभ
- सभी प्रक्रियाएं एक छत के नीचे
- उत्पादन पर बेहतर निगरानी
- गुणवत्ता में सुधार
- उत्पादन में वृद्धि
3. प्रमुख आविष्कार
औद्योगिक क्रांति के दौरान कई महत्वपूर्ण आविष्कार हुए जिन्होंने उत्पादन प्रक्रिया को बदल दिया।
3.1 प्रमुख आविष्कारों की सूची
| वर्ष | आविष्कार | आविष्कारक | महत्व |
|---|---|---|---|
| 1733 | फ्लाइंग शटल (Flying Shuttle) | जॉन के (John Kay) | बुनाई की गति में वृद्धि |
| 1764 | स्पिनिंग जेनी (Spinning Jenny) | जेम्स हारग्रीव्ज | एक साथ 8 तकलियों पर कताई |
| 1769 | वाटर फ्रेम (Water Frame) | रिचर्ड आर्कराइट | पानी की शक्ति से कताई |
| 1769 | भाप इंजन (Steam Engine) | जेम्स वाट | मशीनों को चलाने की शक्ति |
| 1779 | स्पिनिंग म्यूल | सैमुअल क्रॉम्पटन | बेहतर गुणवत्ता का धागा |
| 1785 | पावर लूम (Power Loom) | एडमंड कार्टराइट | भाप से चलने वाला करघा |
4. औद्योगिक परिवर्तन की गति
आम धारणा के विपरीत, औद्योगिक परिवर्तन की गति बहुत तेज नहीं थी। उन्नीसवीं सदी के अंत तक भी ब्रिटेन की अधिकांश श्रम-शक्ति पारंपरिक क्षेत्रों में काम करती थी।
4.1 प्रमुख उद्योग
| चरण | अग्रणी उद्योग | समय |
|---|---|---|
| पहला चरण | सूती कपड़ा उद्योग (Cotton) | 1840 के दशक तक |
| दूसरा चरण | लोहा और इस्पात (Iron & Steel) | 1840 के बाद (रेलवे विस्तार) |
4.2 हाथ का श्रम क्यों बना रहा?
- सस्ता श्रम: ब्रिटेन में मानव श्रम की कमी नहीं थी
- मौसमी मांग: कई उद्योगों में श्रमिकों की मांग मौसम के अनुसार बदलती थी
- विशेष कौशल: बारीक डिजाइन वाली वस्तुओं के लिए मानवीय निपुणता जरूरी थी
- महंगी मशीनें: नई तकनीक में निवेश महंगा था
5. श्रमिकों की जिंदगी
औद्योगीकरण से श्रमिकों का जीवन कठिन हो गया। गरीब किसान और बेरोजगार लोग काम की तलाश में शहरों में आते थे।
5.1 श्रमिकों की समस्याएं
- बेरोजगारी: काम की कोई गारंटी नहीं
- लंबे कार्य घंटे: दिन में 15-18 घंटे काम
- कम वेतन: बहुत कम मजदूरी
- खराब स्थितियां: अस्वास्थ्यकर कारखाने
- बाल श्रम: छोटे बच्चों से भी काम करवाया जाता था
6. भारत में औद्योगीकरण
भारत में औद्योगीकरण का इतिहास ब्रिटेन से अलग था क्योंकि भारत एक उपनिवेश (Colony) था।
6.1 भारत में कारखानों की शुरुआत
| वर्ष | घटना |
|---|---|
| 1854 | पहली सूती मिल - बंबई (मुंबई) |
| 1855 | पहली जूट मिल - बंगाल (रिशरा) |
| 1907 | टाटा आयरन एंड स्टील कंपनी (TISCO) - जमशेदपुर |
7. भारतीय कपड़ा उद्योग
मशीन उद्योगों के युग से पहले अंतर्राष्ट्रीय कपड़ा बाजार में भारत के रेशमी और सूती उत्पादों का दबदबा था।
7.1 भारतीय कपड़े की विशेषताएं
- मसलिन (Muslin): ढाका का प्रसिद्ध महीन कपड़ा
- पटोला: गुजरात का बहुरंगी रेशमी कपड़ा
- जामदानी: बारीक बुनाई वाला कपड़ा
- चिंट्ज़ (Chintz): छपाई वाला सूती कपड़ा
7.2 बुनकरों की समस्याएं (ईस्ट इंडिया कंपनी के बाद)
- गोमास्ता: कंपनी के एजेंट जो बुनकरों पर दबाव डालते थे
- अग्रिम राशि: पेशगी लेने के बाद बुनकर बंधुआ हो जाते थे
- कम कीमत: कंपनी कम कीमत पर माल खरीदती थी
- प्रतिबंध: अन्य व्यापारियों को बेचने पर रोक
8. भारत में मैनचेस्टर का आगमन
19वीं सदी में ब्रिटिश मैनचेस्टर के मिल-निर्मित कपड़े भारत में आने लगे। इससे भारतीय हथकरघा उद्योग को भारी नुकसान हुआ।
8.1 भारतीय उद्योग पर प्रभाव
| प्रभाव | विवरण |
|---|---|
| निर्यात में गिरावट | भारतीय कपड़े का निर्यात घटा |
| स्थानीय बाजार | ब्रिटिश कपड़े से प्रतिस्पर्धा |
| बेरोजगारी | लाखों बुनकर बेरोजगार हुए |
| अकाल | बुनकरों के परिवारों में भुखमरी |
8.2 स्वदेशी आंदोलन का प्रभाव
1905 के स्वदेशी आंदोलन से भारतीय मिलों को बढ़ावा मिला। लोगों ने विदेशी कपड़ों का बहिष्कार किया और खादी पहनना शुरू किया।
9. महत्वपूर्ण तिथियां
10. वस्तुनिष्ठ प्रश्न (MCQ)
11. प्रश्नोत्तर
11.1 लघु उत्तरीय प्रश्न (2-3 अंक)
11.2 दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (4-5 अंक)
1. प्राकृतिक संसाधन: कोयला और लोहे की खानों की प्रचुरता।
2. पूंजी: व्यापार से अर्जित धन निवेश के लिए उपलब्ध था।
3. उपनिवेश: कच्चे माल का स्रोत और तैयार माल का बाजार।
4. नए आविष्कार: स्पिनिंग जेनी, भाप इंजन जैसे आविष्कार।
5. श्रम की उपलब्धता: गांवों से शहरों में आने वाले मजदूर।
1. गोमास्ता नियुक्ति: वेतनभोगी एजेंट जो बुनकरों की निगरानी करते थे।
2. अग्रिम राशि: पेशगी देकर बुनकरों को बंधुआ बनाया।
3. व्यापार प्रतिबंध: अन्य व्यापारियों को बेचने पर रोक लगाई।
4. कम कीमत: बाजार दर से कम कीमत पर माल खरीदा।
5. दंड: नियम तोड़ने पर सजा दी जाती थी।


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