संसाधन एवं विकास (Resources and Development)
| अध्याय सूचना | |
| भारत में प्रमुख संसाधनों का वितरण | |
| विषय | भूगोल (समकालीन भारत-II) |
| कक्षा | 10वीं (RBSE/CBSE) |
| अध्याय | 1 |
| बोर्ड परीक्षा भार | 5-7 अंक |
| महत्वपूर्ण विषय | मृदा के प्रकार, भूमि उपयोग, संसाधन नियोजन |
संसाधन एवं विकास कक्षा 10 भूगोल का प्रथम एवं अत्यंत महत्वपूर्ण अध्याय है। इस अध्याय में हम संसाधनों के प्रकार, भूमि उपयोग प्रारूप, मृदा के प्रकार और मृदा संरक्षण का विस्तृत अध्ययन करेंगे।
हमारे पर्यावरण में उपलब्ध वे सभी वस्तुएं जो हमारी आवश्यकताओं को पूरा करने में सक्षम हैं, संसाधन कहलाती हैं। संसाधन तकनीकी रूप से सुलभ, आर्थिक रूप से व्यवहार्य और सांस्कृतिक रूप से स्वीकार्य होते हैं।
इस अध्याय से 5-7 अंकों के प्रश्न आते हैं। मृदा के प्रकार, भूमि उपयोग आंकड़े और संसाधन नियोजन पर विशेष ध्यान दें।
परिचय - संसाधन क्या है?
प्रकृति में उपलब्ध प्रत्येक वस्तु संसाधन नहीं होती। कोई वस्तु तभी संसाधन बनती है जब:
- वह मानवीय आवश्यकताओं को पूर्ण करने में सक्षम हो
- उसका उपयोग करने की तकनीक उपलब्ध हो
- उसका उपयोग आर्थिक रूप से लाभदायक हो
- वह सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से स्वीकार्य हो
मनुष्य स्वयं भी संसाधन है। मानव अपनी बुद्धि, ज्ञान और तकनीक से प्रकृति की वस्तुओं को संसाधनों में परिवर्तित करता है।
संसाधनों के प्रकार
1. उत्पत्ति के आधार पर
| प्रकार | परिभाषा | उदाहरण |
|---|---|---|
| जैव संसाधन | जीवित जीवों से प्राप्त | वन, पशु, मछलियां |
| अजैव संसाधन | निर्जीव वस्तुओं से | खनिज, धातुएं, मिट्टी |
2. समाप्यता के आधार पर
| प्रकार | परिभाषा | उदाहरण |
|---|---|---|
| नवीकरणीय | पुनः प्राप्त हो सकते हैं | सौर ऊर्जा, जल, वन |
| अनवीकरणीय | समाप्त होने पर पुनः नहीं बनते | कोयला, पेट्रोलियम, खनिज |
3. स्वामित्व के आधार पर
| प्रकार | विवरण | उदाहरण |
|---|---|---|
| व्यक्तिगत | निजी स्वामित्व में | भूखंड, मकान, बगीचा |
| सामुदायिक | सभी के लिए सुलभ | चरागाह, तालाब, पार्क |
| राष्ट्रीय | देश की सीमा में सरकार के अधीन | खनिज, वन, जल संसाधन |
| अंतर्राष्ट्रीय | 200 समुद्री मील (EEZ) के बाद | महासागरीय संसाधन |
4. विकास की स्थिति के आधार पर
| प्रकार | परिभाषा | उदाहरण |
|---|---|---|
| संभाव्य | पाए जाते हैं पर उपयोग नहीं | राजस्थान में सौर/पवन ऊर्जा |
| विकसित | सर्वेक्षण हो चुका, उपयोग में | कार्यरत खदानें |
| भंडार | वर्तमान तकनीक से उपयोग असंभव | जल से हाइड्रोजन |
| आरक्षित | भविष्य हेतु रखे गए | अप्रयुक्त जलविद्युत क्षमता |
संसाधन नियोजन
संसाधन नियोजन का अर्थ है संसाधनों का इस प्रकार प्रबंधन करना कि वे वर्तमान और भविष्य दोनों की आवश्यकताओं को पूरा कर सकें।
संसाधन नियोजन के चरण
संसाधनों की पहचान
तकनीक और कौशल विकास
राष्ट्रीय योजनाओं से समन्वय
1992 - रियो डी जनेरियो पृथ्वी सम्मेलन: ब्राज़ील में आयोजित इस सम्मेलन में 'सतत् विकास' की अवधारणा को वैश्विक मान्यता मिली।
भूमि उपयोग प्रारूप
भारत का कुल भौगोलिक क्षेत्रफल 32.8 लाख वर्ग किमी है।
बाकी 20% = परती (8%) + अन्य (6%) + चरागाह (4%) + बंजर (2%)
| भूमि उपयोग श्रेणी | प्रतिशत | विवरण |
|---|---|---|
| शुद्ध बोया गया क्षेत्र | 43% | जहां फसल बोई गई |
| वन | 23% | राष्ट्रीय नीति में 33% लक्ष्य |
| कृषि अनुपलब्ध | 14% | बंजर, पर्वतीय, शहरी |
| परती भूमि | 8% | उपजाऊ पर वर्तमान में खेती नहीं |
| अन्य अकृषित | 6% | घास भूमि |
| चरागाह | 4% | पशुओं हेतु |
| कृषि योग्य बंजर | 2% | 5 वर्षों से अधिक परती |
भारत में मृदा के प्रकार
1. जलोढ़ मृदा (Alluvial Soil)
| जलोढ़ मृदा - सबसे महत्वपूर्ण | |
|---|---|
| विस्तार | उत्तरी मैदान, तटीय मैदान (40% भूभाग) |
| प्रकार | खादर: नई, उपजाऊ | बांगर: पुरानी, कंकड़युक्त |
| गुण | पोटाश समृद्ध, फॉस्फोरस की कमी |
| फसलें | गेहूं, चावल, गन्ना, दलहन |
| राज्य | पंजाब, UP, बिहार, पश्चिम बंगाल |
2. काली मृदा (Black Soil / Regur)
| काली मृदा - कपास की मृदा | |
|---|---|
| अन्य नाम | रेगुर, कपास मृदा, स्वयं जुताई मृदा |
| विस्तार | दक्कन पठार - महाराष्ट्र, गुजरात, MP |
| विशेषता | सूखने पर दरारें पड़ती हैं (स्वयं जुताई) |
| फसलें | कपास, गन्ना, सोयाबीन, मूंगफली |
3. लाल एवं पीली मृदा
| लाल मृदा | |
|---|---|
| विस्तार | ओडिशा, छत्तीसगढ़, तमिलनाडु, दक्षिणी गंगा मैदान |
| रंग का कारण | लौह ऑक्साइड (Fe2O3) की उपस्थिति |
| फसलें | चावल, गेहूं, दलहन, मोटे अनाज |
4. लैटेराइट मृदा
| लैटेराइट मृदा | |
|---|---|
| विस्तार | कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु, ओडिशा |
| विशेषता | सूखने पर ईंट जैसी कठोर हो जाती है |
| फसलें | चाय, कॉफी, काजू, रबड़ (बागवानी) |
5. मरुस्थलीय मृदा
| मरुस्थलीय मृदा | |
|---|---|
| विस्तार | पश्चिमी राजस्थान, गुजरात का कच्छ |
| विशेषता | कंकड़ (Kankar) की परत - कैल्शियम कार्बोनेट |
| फसलें | बाजरा, ज्वार, मूंगफली |
6. वनीय/पर्वतीय मृदा
| वनीय मृदा | |
|---|---|
| विस्तार | हिमालय, पश्चिमी और पूर्वी घाट |
| गुण | अम्लीय प्रकृति, कम ह्यूमस |
| फसलें | चाय, कॉफी, फल, मसाले |
मृदा अपरदन (Soil Erosion)
मृदा अपरदन = मृदा की ऊपरी उपजाऊ परत का जल, पवन या मानवीय गतिविधियों द्वारा हटना।
| प्रकार | कारक | परिणाम | क्षेत्र |
|---|---|---|---|
| चादर अपरदन (Sheet) | जल की पतली परत | ऊपरी परत का समान रूप से हटना | ढालू भूमि |
| अवनालिका अपरदन (Gully) | तेज बहता जल | खड्ड/बीहड़ (Badlands) | चंबल, यमुना घाटी |
| पवन अपरदन (Wind) | तेज हवाएं | बालू के टीले, मरुस्थलीकरण | राजस्थान, गुजरात |
मृदा अपरदन के कारण
- प्राकृतिक: भारी वर्षा, तेज हवाएं, ढालू भूमि
- मानवीय: वनों की कटाई, अति चराई, खनन, निर्माण कार्य
मृदा संरक्षण (Soil Conservation)
| विधि | विवरण | उपयुक्त क्षेत्र |
|---|---|---|
| समोच्च जुताई (Contour Ploughing) | समोच्च रेखाओं के अनुसार जुताई | पहाड़ी/ढालू क्षेत्र |
| सीढ़ीदार खेती (Terrace Farming) | ढालों पर सीढ़ीनुमा खेत | पर्वतीय क्षेत्र |
| पट्टी कृषि (Strip Cropping) | फसलों के बीच घास की पट्टियां | मैदानी क्षेत्र |
| रक्षक मेखला (Shelter Belts) | खेतों के किनारे पेड़ों की कतारें | शुष्क क्षेत्र (पवन अपरदन रोकने) |
| वनारोपण (Afforestation) | वृक्षारोपण, वन क्षेत्र बढ़ाना | सभी क्षेत्रों में उपयोगी |
अभ्यास प्रश्न (MCQs)
अध्याय 2: वन एवं वन्यजीव संसाधन | अध्याय 3: जल संसाधन | अध्याय 4: कृषि | अध्याय 5: खनिज एवं ऊर्जा संसाधन


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