पाठ परिचय: यह पाठ बच्चे और माता-पिता के स्नेह का एक अनूठा दस्तावेज है। इसमें दिखाया गया है कि बच्चा दिनभर भले ही पिता के साथ खेलता रहे, लेकिन जब उस पर मुसीबत आती है, तो उसे केवल माँ का आँचल (गोद) ही याद आता है।
भोलानाथ का असली नाम तारकेश्वर नाथ था। पिता प्यार से उसे 'भोलानाथ' कहते थे क्योंकि वह भभूत लगाकर 'बम-भोले' जैसा दिखता था।
- सुबह: पिता उसे सुबह उठाते, नहलाते और पूजा में अपने पास बैठाते। माथे पर भभूत का तिलक लगाते।
- रामनामा बही: पूजा के बाद पिता 'रामनामा बही' पर हजार बार राम-राम लिखते। फिर आटे की गोलियों में कागज की पर्चियां लपेटकर मछलियों को खिलाने गंगा जाते।
- कंधे की सवारी: लौटते समय पिता उसे पेड़ों की डालों पर झुलाते थे।
- कुश्ती: घर आकर पिता उसके साथ कुश्ती लड़ते और जानबूझकर हार जाते ताकि भोलानाथ खुश हो जाए।
लेखक ने बताया है कि उस समय बच्चों के पास प्लास्टिक के खिलौने नहीं होते थे। वे टूटी-फूटी चीजों से ही खेल बनाते थे।
🎲 खेलों की सूची:
- मिठाई की दुकान: ढेले के लड्डू, पत्तों की पूड़ी-कचौरी, गीली मिट्टी की जलेबी।
- घरौंदा (Playhouse): दियासलाई की डिब्बियों के किवाड़, टूटे घड़े के खपरों के चूल्हे।
- बरात (Wedding): कनस्तर का तंबूरा बजता, आम के उग आए पौधों की शहनाई बजती और समधी बनकर बरात निकालते।
- खेती (Farming): चबूतरे को खेत बनाते, कंकड़ को बीज और पानी को सिंचाई मानकर खेती करते।
मजे की बात: जैसे ही पिताजी खेल में शामिल होने आते, बच्चे शरमाकर खेल बिगाड़कर भाग जाते थे।
📖 देसी शब्दकोश (Rural Dictionary)
इस पाठ में कई आंचलिक (क्षेत्रीय) शब्द हैं, जिनका अर्थ जानना जरूरी है:
| देसी शब्द | हिंदी अर्थ |
|---|---|
| महतारी (Mehtari) | माता / माँ |
| ठौर (Thaur) | स्थान / जगह |
| मृदंग (Mridang) | एक प्रकार का ढोलक (वाद्य यंत्र) |
| ओसार (Osaar) | बरामदा (Veranda) |
| अमनिया (Amaniya) | शुद्ध / पवित्र करना |
| चिरौरी (Chirouri) | विनती / प्रार्थना |
एक दिन बच्चे मकई के खेत में चिड़िया पकड़ने गए। वहां उन्हें एक चूहे का बिल दिखा। शरारत में उन्होंने बिल में पानी डालना शुरू किया।
भयानक दृश्य: पानी डालने पर चूहा तो नहीं निकला, लेकिन एक भयंकर काला साँप (Black Cobra) फुफकारता हुआ बाहर निकला।
बच्चे डरकर बेतहाशा भागे। भोलानाथ गिरता-पड़ता, कांटों से छिलता हुआ घर पहुँचा।
- पिताजी ओसार (बरामदे) में बैठे हुक्का गुड़गुड़ा रहे थे। उन्होंने भोलानाथ को पुकारा।
- लेकिन भोलानाथ पिता के पास नहीं रुका। वह सीधे घर के अंदर माँ के पास दौड़ा।
- माँ चावल साफ कर रही थी। भोलानाथ उसकी गोद में जाकर छिप गया और कांपने लगा।
निष्कर्ष: माँ ने अपना काम छोड़कर उसे गले लगा लिया, हल्दी पीसकर घावों पर लगाई। पिता बुलाते रहे, लेकिन भोलानाथ ने माँ के आँचल (सुरक्षा) को नहीं छोड़ा।
📝 विस्तृत प्रश्नोत्तरी (Mega Question Bank)
प्रश्न 1: 'माता का अँचल' शीर्षक की सार्थकता स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: पूरे पाठ में भोलानाथ अपने पिता के साथ ही रहता है, खेलता है और खाता है। लेकिन कहानी के अंत में जब उस पर 'साँप' की विपत्ति आती है, तो उसे पिता की बाहें नहीं, बल्कि माँ का 'आँचल' ही सबसे सुरक्षित जगह लगती है। माँ का आँचल प्रेम, शांति और सुरक्षा का प्रतीक है। इसलिए यह शीर्षक पूर्णतः सार्थक है।
प्रश्न 2: भोलानाथ और उसके साथियों के खेल और खेलने की सामग्री आपके खेल और खेलने की सामग्री से किस प्रकार भिन्न है?
उत्तर: भोलानाथ के समय (1930) बच्चे प्रकृति के बीच खेलते थे। उनकी सामग्री मुफ्त और प्राकृतिक थी—मिट्टी, धूल, पत्थर, पत्ते, टूटे घड़े आदि।
जबकि आज (2025-26) हमारे खेल प्लास्टिक के खिलौनों, वीडियो गेम्स, मोबाइल और इंटरनेट तक सीमित हैं। हमारे खेलों में वह शारीरिक सक्रियता और कल्पनाशीलता कम हो गई है जो भोलानाथ के खेलों में थी।
प्रश्न 3 (HOTS): बच्चे का माँ से अधिक जुड़ाव विपदा के समय ही क्यों दिखाई देता है? (मनोवैज्ञानिक विश्लेषण)
उत्तर: मनोविज्ञान के अनुसार, पिता 'बाहरी दुनिया' और 'अनुशासन' का प्रतीक होता है, जबकि माँ 'आंतरिक सुरक्षा' और 'ममता' का। सामान्य दिनों में बच्चा पिता के साथ दुनिया देखना चाहता है (मनोरंजन), लेकिन जब वह डरता है, तो उसे दुनिया नहीं, बल्कि 'शरण' चाहिए होती है, जो केवल माँ के पास मिलती है।
प्रश्न 4: माँ बच्चे को खाना कैसे खिलाती थी? (पक्षी वाला खेल)
उत्तर: जब पिता बच्चे को खाना खिला चुके होते, तब माँ कहती— "मर्द क्या जानें बच्चों को खिलाना?" वह दही-भात के बड़े-बड़े कौर बनाती और कहती— "खा ले, नहीं तो चिड़िया उड़ जाएगी।" वह तोता, मैना, कबूतर, हंस के नाम लेकर उसे खिलाती जाती थी।
कृतिका पाठ 1 समाप्त! 🤱
बचपन की यादें हमेशा मीठी होती हैं।
अगला पाठ: "साना-साना हाथ जोड़ि" (मधु कांकरिया)
सिक्किम की बर्फीली पहाड़ियों और मेहनतकश औरतों की कहानी। 🏔️


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