RBSE Class 10 Hindi Chapter 1: Surdas Ke Pad (सूरदास) Explanation & QA 2026 | Kshitij Part 2

📅 Monday, 5 January 2026 📖 3-5 min read
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पाठ 1: सूरदास के पद

क्षितिज भाग-2 (पद्य खंड) | व्याख्या एवं प्रश्नोत्तर

कवि: महाकवि सूरदास (वात्सल्य रस सम्राट)

पाठ परिचय: यह पाठ 'भ्रमरगीत' (सूरसागर) से लिया गया है। जब श्रीकृष्ण मथुरा चले गए, तो उन्होंने स्वयं न लौटकर उद्धव के माध्यम से गोपियों के लिए 'योग' (Yoga/Knowledge) का संदेश भेजा। उद्धव निर्गुण ब्रह्म के उपासक थे, जबकि गोपियाँ सगुण प्रेम (कृष्ण प्रेम) में डूबी थीं। तभी वहाँ एक भौंरा (Bhramara) आ गया। गोपियों ने भौंरे को माध्यम बनाकर उद्धव पर जो व्यंग्य बाण छोड़े, वही इस पाठ का सार है।


पद 1: उधौ, तुम हौ अति बड़भागी... V. Imp for Vyakhya
"उधौ, तुम हौ अति बड़भागी।
अपरस रहत सनेह तगा तैं, नाहिन मन अनुरागी।
पुरइनि पात रहत जल भीतर, ता रस देह न दागी।
ज्यों जल माहँ तेल की गागरि, बूँद न ताकौं लागी।
प्रीति-नदी मैं पाउँ न बोरियौ, दृष्टि न रूप परागी।
'सूरदास' अबला हम भोरी, गुर चाँटी ज्यों पागी।।"
📝 कठिन शब्दार्थ
बड़भागी = भाग्यवान अपरस = अछूता/दूर तगा = धागा/बंधन पुरइनि पात = कमल का पत्ता दागी = धब्बा भोरी = भोली गुर = गुड़

भावार्थ (Explanation)

गोपियाँ उद्धव पर व्यंग्य (Sarcasm) करते हुए कहती हैं: "हे उद्धव! तुम सचमुच बड़े भाग्यवान हो (अर्थात अभागे हो), जो कृष्ण के पास रहकर भी उनके प्रेम के धागे से नहीं बंधे। तुम्हारे मन में उनके लिए कोई अनुराग पैदा नहीं हुआ।"

गोपियाँ दो उदाहरण देती हैं:

  1. जिस प्रकार कमल का पत्ता पानी में रहकर भी पानी से अछूता रहता है (उस पर दाग नहीं लगता)।
  2. जिस प्रकार तेल की गगरी (मटकी) को पानी में डुबोने पर उस पर पानी की एक बूँद भी नहीं टिकती।

अंत में सूरदास कहते हैं कि गोपियाँ स्वीकार करती हैं कि वे तो भोली अबलाएँ हैं, जो कृष्ण प्रेम में वैसे ही चिपक गई हैं जैसे गुड़ (Gur) से चींटियाँ (Ants) चिपक जाती हैं।

💎 काव्य-सौंदर्य (Exam Booster):
  • अलंकार: 'पुरइनि पात...' और 'ज्यों जल माहँ...' में दृष्टांत और उपमा अलंकार है। 'प्रीति-नदी' में रूपक अलंकार है।
  • भाषा: मधुर ब्रजभाषा।
  • शैली: व्यंग्यात्मक (Sarcastic)।
पद 2: मन की मन ही माँझ रही...
"मन की मन ही माँझ रही।
कहिए जाइ कौन पै उधौ, नाहीं परत कही।
अवधि अधार आस आवन की, तन मन बिथा सही।
अब इन जोग-संदेसनि सुनि-सुनि, बिरहिनि बिरह दही।
चाहति हुतीं गुहारि जितहिं तैं, उत तैं धार बही।
'सूरदास' अब धीर धरहिं क्यौं, मरजादा न लही।।"

भावार्थ (Explanation)

गोपियाँ अपने विरह (Separation pain) को व्यक्त करते हुए कहती हैं: "हे उद्धव! हमारे मन की बात मन में ही रह गई। हम कृष्ण से अपने प्रेम की बात कहना चाहती थीं, पर अब किससे कहें? हम तो उनके आने की आशा (Hope) के सहारे ही तन-मन की व्यथा (Pain) सह रही थीं।"

लेकिन अब तुम्हारे इस योग-संदेश को सुन-सुनकर हमारी विरह की आग और धधक उठी है। हम जिधर से रक्षा की गुहार (Pukar) लगाना चाहती थीं (कृष्ण से), उधर से ही योग की प्रबल धारा बह निकली है।

सूरदास कहते हैं कि गोपियाँ पूछती हैं—अब हम धैर्य (Patience) क्यों धरें? जब कृष्ण ने ही प्रेम की 'मर्यादा' (Return of love) नहीं रखी।

🔍 मुख्य बिंदु: यहाँ 'मरजादा न लही' का अर्थ है कि प्रेम के बदले प्रेम मिलना चाहिए था, लेकिन कृष्ण ने योग संदेश भेजकर प्रेम की मर्यादा तोड़ दी।
पद 3: हमारैं हरि हारिल की लकरी...

सार (Summary): गोपियाँ कहती हैं कि हमारे लिए श्रीकृष्ण 'हारिल पक्षी की लकड़ी' के समान हैं। (हारिल पक्षी हमेशा अपने पंजों में एक लकड़ी दबाए रखता है, उसे छोड़ता नहीं है)।

हमने मन, वचन और कर्म से नंद-नंदन (कृष्ण) को हृदय में बसा रखा है। हमें तुम्हारा यह 'योग' (Yoga) कड़वी ककड़ी (Bitter Cucumber) जैसा लगता है। तुम यह बीमारी (योग) उन्हें जाकर सौंपो जिनका मन 'चकरी' की तरह चंचल है (घूमता रहता है)। हमारा मन तो कृष्ण में स्थिर है।

पद 4: हरि हैं राजनीति पढ़ि आए...

सार (Summary): गोपियाँ व्यंग्य करती हैं कि कृष्ण पहले ही चतुर थे, अब तो उन्होंने गुरु से राजनीति (Politics) भी पढ़ ली है। वे बुद्धिमान हो गए हैं, इसलिए प्रेम संदेश के बजाय योग संदेश भेज रहे हैं।

राजधर्म (King's Duty): अंत में गोपियाँ उद्धव को राजधर्म याद दिलाती हैं— "राजा का धर्म है कि वह प्रजा को न सताए और उनके सुख-दुख का ध्यान रखे।" (कृष्ण प्रजा को सता रहे हैं)।

📝 बोर्ड परीक्षा हेतु महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर (Imp Q&A)

प्रश्न 1: गोपियों द्वारा उद्धव को 'भाग्यवान' कहने में क्या व्यंग्य निहित है?
उत्तर: गोपियाँ ऊपर से उद्धव को भाग्यवान (बड़भागी) कहती हैं, लेकिन असल में वे उन्हें 'अभागा' कह रही हैं। व्यंग्य यह है कि प्रेम के सागर (कृष्ण) के पास रहकर भी उद्धव के हृदय में प्रेम की एक बूँद भी उत्पन्न नहीं हुई। वे प्रेम के आनंद से वंचित हैं।

प्रश्न 2: उद्धव के व्यवहार की तुलना किस-किससे की गई है?
उत्तर: गोपियों ने उद्धव की तुलना दो चीजों से की है:
1. कमल के पत्ते से (जो पानी में रहकर भी नहीं भीगता)।
2. तेल की गगरी से (जिस पर पानी की बूँद नहीं टिकती)।

प्रश्न 3: गोपियों ने किन-किन उदाहरणों के माध्यम से उद्धव को उलाहने (शिकायत) दिए हैं?
उत्तर:
1. उन्होंने कहा कि हमारा मन हारिल की लकड़ी की तरह कृष्ण में बंधा है।
2. तुम्हारा योग हमें 'कड़वी ककड़ी' जैसा लगता है।
3. योग उस बीमारी की तरह है जिसे हमने कभी नहीं देखा।
4. कृष्ण ने अब 'राजनीति' पढ़ ली है।

प्रश्न 4: "मरजादा न लही" के माध्यम से कौनसी मर्यादा न रहने की बात की जा रही है?
उत्तर: प्रेम की मर्यादा (Prestige of Love) यह है कि प्रेम के बदले प्रेम दिया जाए। गोपियों ने अपना सर्वस्व कृष्ण पर न्योछावर कर दिया, लेकिन कृष्ण ने बदले में खुद आने की बजाय नीरस 'योग संदेश' भेज दिया। इस प्रकार उन्होंने प्रेम की मर्यादा तोड़ दी।

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