परिचय: यह कहानी हमें बताती है कि देशभक्ति केवल फौजियों की जागीर नहीं है। एक गरीब, दिव्यांग और बूढ़ा व्यक्ति भी अपने सीमित संसाधनों से देश के महानायकों का सम्मान कर सकता है।
हालदार साहब हर 15वें दिन कंपनी के काम से एक छोटे से कस्बे से गुजरते थे। उस कस्बे के चौराहे पर नगरपालिका ने नेताजी सुभाष चंद्र बोस की एक संगमरमर की मूर्ति लगवाई थी।
मूर्ति बहुत सुंदर थी, 'फौजी वर्दी' में। लेकिन उसमें एक कमी थी— "नेताजी की आँखों पर चश्मा नहीं था।"
मूर्तिकार (मास्टर मोतीलाल) शायद चश्मा बनाना भूल गया या पत्थर का चश्मा टूट गया। लेकिन हैरानी की बात यह थी कि मूर्ति पर सचमुच का (Real) चश्मा लगा हुआ था। कभी चौकोर फ्रेम, कभी गोल फ्रेम।
हालदार साहब की जिज्ञासा बढ़ने पर उन्होंने चौराहे पर बैठे पानवाले से पूछा। पानवाले ने हँसते हुए बताया— "यह काम कैप्टन चश्मेवाला करता है।"
👤 कैप्टन का चरित्र चित्रण (Character Sketch)
- शारीरिक रूप: बेहद बूढ़ा, मरियल-सा लँगड़ा आदमी। सिर पर गांधी टोपी और आँखों पर काला चश्मा।
- व्यवसाय: वह एक फेरीवाला था जो एक बांस पर चश्मे टांगकर बेचता था।
- देशभक्ति: उसे नेताजी की 'बिना चश्मे वाली' मूर्ति आहत करती थी। इसलिए वह अपनी दुकान से एक चश्मा नेताजी को पहना देता था। जब कोई ग्राहक वह चश्मा मांगता, तो वह उसे बेचकर नेताजी को दूसरा पहना देता था।
पानवाला उसका मजाक उड़ाता था— "वह लँगड़ा क्या जाएगा फौज में? पागल है पागल!" लेकिन हालदार साहब को एक देशभक्त का ऐसा मजाक उड़ाना अच्छा नहीं लगा।
दो साल तक हालदार साहब यह सिलसिला देखते रहे। फिर एक दिन चौराहे से गुजरते वक्त उन्होंने देखा कि मूर्ति पर कोई चश्मा नहीं था। पानवाले ने उदास होकर बताया— "साहब! कैप्टन मर गया।"
हालदार साहब को बहुत दुख हुआ। उन्हें लगा कि अब कस्बे में देशभक्ति खत्म हो गई। उन्होंने सोचा कि अब वे चौराहे पर नहीं रुकेंगे।
क्लाइमेक्स (Climax): 15 दिन बाद जब वे फिर गुजरे, तो आदत से मजबूर उनकी नजरें मूर्ति पर गईं। वे जीप से कूदकर मूर्ति के सामने अटेंशन (Attention) में खड़े हो गए।
यह देखकर हालदार साहब की आँखें भर आईं।
निष्कर्ष: कैप्टन मर गया, लेकिन देशभक्ति जिंदा है। बच्चों ने खेल-खेल में सरकंडे का चश्मा बनाकर यह साबित कर दिया कि भारत का भविष्य सुरक्षित हाथों में है।
📝 महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर (Exam Special)
प्रश्न 1: "सेनानी न होते हुए भी चश्मे वाले को लोग कैप्टन क्यों कहते थे?"
उत्तर: चश्मे वाला शारीरिक रूप से अपंग था और फौज में नहीं था। लेकिन उसके मन में देश और नेताजी के प्रति फौजियों जैसा ही सम्मान और समर्पण था। वह नेताजी की मूर्ति को बिना चश्मे के नहीं देख सकता था। उसकी इसी 'त्याग और देशभक्ति' की भावना को देखकर लोग उसे सम्मान (या कभी-कभी व्यंग्य) से 'कैप्टन' कहते थे।
प्रश्न 2: पानवाले का एक रेखाचित्र (Sketch) प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर: पानवाला एक खुशमिजाज, काला और मोटा आदमी था। उसकी तोंद निकली हुई थी। वह हर वक्त पान चबाता रहता था, जिससे उसके दाँत लाल-काले हो गए थे। वह व्यंग्य करने में माहिर था लेकिन अंदर से भावुक भी था (कैप्टन की मौत पर वह रोया था)।
प्रश्न 3 (HOTS): सरकंडे का चश्मा क्या उम्मीद जगाता है?
उत्तर: सरकंडे का चश्मा यह उम्मीद जगाता है कि देशभक्ति केवल बड़ों तक सीमित नहीं है, बल्कि बच्चों (आने वाली पीढ़ी) के मन में भी देश के शहीदों के प्रति सम्मान है। यह बताता है कि अभावों (गरीबी) के बीच भी देशभक्ति पनप सकती है।
पाठ 10 समाप्त! 🇮🇳
एक छोटी सी कहानी, लेकिन संदेश बहुत बड़ा।
अगला पाठ: "बालगोबिन भगत" (रामवृक्ष बेनीपुरी)
एक ऐसे 'साधु' की कहानी जो गृहस्थ होकर भी सन्यासी था। 🎶


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