RBSE Class 10 Hindi Chapter 11: Balgobin Bhagat (Ramvriksha Benipuri) Summary & QA 2026

📅 Tuesday, 6 January 2026 📖 3-5 min read
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✨ Marwari Mission 100 ✨

बालगोबिन भगत

लेखक: रामवृक्ष बेनीपुरी (कलम के जादूगर)

"साधु न होते हुए भी साधु"

विधा: रेखाचित्र (Sketch)
मुख्य चरित्र: बालगोबिन भगत

पाठ परिचय: यह पाठ एक ऐसे विलक्षण चरित्र का रेखाचित्र है जो गृहस्थ (परिवार वाला) होते हुए भी मन से सन्यासी था। वह सामाजिक रूढ़ियों (Social Customs) को नहीं मानता था और कबीर को अपना 'साहब' (ईश्वर) मानता था।

1. बालगोबिन भगत का व्यक्तित्व (Character) 🧔
  • रूप-रंग: 60 वर्ष से ऊपर के मंझोले कद के गोरे-चिट्टे आदमी। चेहरे पर सफेद बाल और माथे पर रामानंदी चंदन का टीका।
  • वेशभूषा: वे केवल एक लंगोटी पहनते थे और सर्दी में काली कमली (कंबल) ओढ़ते थे। सिर पर कबीरपंथियों वाली 'कनफटी टोपी' पहनते थे।
  • व्यवसाय: वे खेतीबाड़ी करते थे और उनका एक साफ-सुथरा मकान भी था।
  • कबीरपंथी: वे कबीर को 'साहब' मानते थे। खेत में जो भी अनाज पैदा होता, उसे सिर पर लादकर कबीर मठ ले जाते और वहां से जो 'प्रसाद' रूप में मिलता, उसी से गुजारा करते थे।
2. संगीत साधना और दिनचर्या 🎵

बालगोबिन भगत का संगीत जादू जैसा था।

  • आषाढ़ (वर्षा ऋतु): जब पूरा गाँव खेतों में धान रोप रहा होता, तब भगत जी कीचड़ में लथपथ होकर ऐसे मधुर गीत गाते कि बच्चे झूम उठते और औरतें गुनगुनाने लगतीं।
  • भादों (अंधेरी रात): मूसलाधार बारिश में भी उनकी 'खंजड़ी' (एक वाद्य यंत्र) बजती रहती थी। वे गाते— "गोदी में पियवा, चमक उठे बिजुरिया..."
  • माघ (कड़ाके की सर्दी): वे भोर (सुबह) में उठकर नदी स्नान करते और टेकरी पर बैठकर भजन गाते। सर्दी से लोग कांपते, लेकिन उनके माथे पर पसीना चमकता था।
3. सामाजिक क्रांति (Social Reforms) 🔥

भगत जी ने समाज की सड़ी-गली परंपराओं को तोड़ा:

(क) बेटे की मृत्यु पर: उनका इकलौता बेटा बीमार और सुस्त था। जब वह मरा, तो उन्होंने रोने के बजाय उत्सव मनाया। उन्होंने कहा— "आत्मा परमात्मा के पास चली गई, विरहनी अपने प्रेमी से जा मिली। यह तो आनंद की बात है।"
(ख) पतोहू (बहू) से मुखाग्नि: समाज में नियम था कि चिता को आग पुरुष देगा, लेकिन भगत ने अपनी पतोहू (Daughter-in-law) से बेटे की चिता को आग दिलवाई।
(ग) विधवा विवाह: बेटे के श्राद्ध के बाद उन्होंने पतोहू के भाई को बुलाया और आदेश दिया कि "इसकी दूसरी शादी कर देना।" वे नहीं चाहते थे कि बहू जवानी में विधवा होकर अपना जीवन बर्बाद करे।
4. अंतिम समय (The End) 🕊️

भगत जी की मृत्यु भी उनके स्वभाव के अनुरूप ही हुई। वे हर वर्ष गंगा स्नान को पैदल जाते थे (30 कोस दूर)। घर से खाकर चलते और घर लौटकर ही खाते।

इस बार लौटे तो तबीयत सुस्त थी, लेकिन नेम-धरम नहीं छोड़ा। एक दिन भोर में लोगों ने उनका गीत नहीं सुना। जाकर देखा तो— "बालगोबिन भगत नहीं रहे, सिर्फ उनका पंजर (शरीर) पड़ा है।"

📝 महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर (Board Exam)

प्रश्न 1: खेतीबाड़ी से जुड़े गृहस्थ बालगोबिन भगत अपनी किन चारित्रिक विशेषताओं के कारण 'साधु' कहलाते थे?
उत्तर: 1. वे कबीर के आदर्शों पर चलते थे।
2. वे कभी झूठ नहीं बोलते थे और सबसे खरा व्यवहार करते थे।
3. वे किसी की चीज बिना पूछे नहीं छूते थे।
4. वे अपनी फसल को पहले कबीर मठ में भेंट करते थे, फिर प्रसाद रूप में घर लाते थे। इसी त्याग और सदाचार के कारण वे साधु कहलाते थे।

प्रश्न 2: भगत ने अपने बेटे की मृत्यु पर अपनी भावनाएं कैसे व्यक्त कीं?
उत्तर: उन्होंने बेटे के शव को सफेद कपड़े से ढका, उस पर फूल और तुलसीदल बिखेरे और सिरहाने एक चिराग जलाया। वे उसके पास बैठकर कबीर के पद गाने लगे और पतोहू से भी कहा कि "रो मत, उत्सव मना। आत्मा परमात्मा से मिल गई है।"

प्रश्न 3: बालगोबिन भगत की दिनचर्या लोगों के अचरज (Surprise) का कारण क्यों थी?
उत्तर: वे बूढ़े होने के बावजूद नियमों का कठोरता से पालन करते थे। कड़ाके की ठंड में भी सुबह जल्दी उठकर नदी स्नान करना और भजन गाना उनकी आदत थी। दांत किटकिटाने वाली सर्दी में भी उनके माथे पर पसीना आ जाता था। उनकी यह दृढ़ता देखकर लोग हैरान रह जाते थे।

पाठ 11 समाप्त! 🙏

एक सच्चा संत वही है जिसके विचार शुद्ध हों, न कि केवल वेशभूषा।

अगला पाठ: "लखनवी अंदाज़" (यशपाल)

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