लेखक (यशपाल) को कहीं पास ही जाना था। उन्होंने पैसे बचाने की बजाय भीड़ से बचने और एकांत में 'नई कहानी' (New Story) के बारे में सोचने के लिए 'सेकंड क्लास' का महंगा टिकट खरीद लिया।
गाड़ी छूट रही थी। लेखक दौड़कर एक डिब्बे में चढ़ गए। उन्होंने सोचा था कि डिब्बा खाली होगा, लेकिन वहां पहले से एक सज्जन विराजमान थे।
सफेदपोश सज्जन, पालथी मारे बैठे थे। उनके सामने तौलिए पर दो चिकने-ताजे खीरे (Cucumbers) रखे थे।
लेखक के आने से उनके चेहरे पर 'असंतोष' दिखाई दिया, मानो उनके एकांत में विघ्न पड़ गया हो। उन्होंने लेखक से कोई बात नहीं की (संगति के लिए उत्साह नहीं दिखाया)।
काफी देर खिड़की से बाहर देखने के बाद, नवाब साहब ने अचानक लेखक को संबोधित किया: "आदाब अर्ज़! जनाब, खीरे का शौक फरमाएंगे?"
लेखक ने उनके अचानक भाव-परिवर्तन को भांप लिया और मना कर दिया: "शुक्रिया, किबला शौक फरमाएं।" (Thanks, you proceed).
इसके बाद नवाब साहब ने खीरे के साथ जो किया, वह एक अनुष्ठान (Ritual) से कम नहीं था:
अवलोकन: इस प्रक्रिया के दौरान नवाब साहब के मुँह में पानी आ रहा था (पनियाती आँखें)। लेखक कनखियों से देख रहे थे और सोच रहे थे— "बनते तो रईस हैं, लेकिन लोगों की नजरों से बचकर खीरा खा रहे हैं।"
नवाब साहब ने फिर लेखक से पूछा। लेखक का मन तो ललचा रहा था, लेकिन पहले मना कर चुके थे, इसलिए आत्मसम्मान (Self-respect) बचाने के लिए बहाना बनाया— "मैदा (Stomach) जरा कमजोर है।"
नवाब साहब का अनोखा तरीका:
- उन्होंने खीरे की एक फाँक उठाई।
- उसे होठों तक ले गए।
- फाँक को सूंघा (Smelled)। स्वाद के आनंद में उनकी पलकें मुंद गईं।
- मुँह में आए पानी को गले से नीचे उतारा।
- और... फाँक को खिड़की के बाहर फेंक दिया!
उन्होंने एक-एक करके सारी फाँकें सूंघीं और फेंक दीं। फिर तौलिए से हाथ-मुँह पोंछकर गर्व से लेखक की ओर देखा, मानो कह रहे हों—
नवाब साहब लेट गए। तभी उनके पेट से 'डकार' (Burp) की आवाज आई। उन्होंने लेखक की ओर देखकर कहा— "खीरा लजीज होता है, लेकिन होता है सकील (पचने में भारी), नामुराद मेदे पर बोझ डाल देता है।"
लेखक के ज्ञान-चक्षु खुल गए (The Realization):
मूल संदेश: यह कहानी उस सामंती वर्ग (Feudal Class) पर कटाक्ष है जो अपनी झूठी शान (False Prestige) बनाए रखने के लिए बनावटी जीवन जीते हैं, भले ही वास्तविकता कुछ और हो।
📚 शब्द-संपदा (Urdu Vocabulary)
📝 महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर (Exam Special)
प्रश्न 1: नवाब साहब ने खीरे की फाँकों को खिड़की के बाहर क्यों फेंक दिया?
उत्तर: नवाब साहब लेखक के सामने अपनी 'खानदानी रईसी' और 'नफासत' का प्रदर्शन करना चाहते थे। वे जताना चाहते थे कि नवाब लोग खीरे जैसी तुच्छ वस्तु को खाते नहीं, बल्कि उसकी सुगंध (Smell) से ही तृप्त हो जाते हैं। खाना उन्हें अपनी शान के खिलाफ लगा, इसलिए सूंघकर फेंक दिया।
प्रश्न 2: "बिना विचार, घटना और पात्रों के भी क्या कहानी लिखी जा सकती है?" - यशपाल के इस कथन का क्या अभिप्राय है?
उत्तर: लेखक ने यह बात व्यंग्य (Sarcasm) में कही है। वे 'नई कहानी' आंदोलन के उन लेखकों पर चोट कर रहे हैं जो कथानक (Plot) और पात्रों के बिना ही आधुनिकता के नाम पर कहानियाँ लिख रहे थे। लेखक का मानना है कि जैसे बिना खाए पेट नहीं भर सकता, वैसे ही बिना पात्रों और घटना के कहानी नहीं बन सकती।
प्रश्न 3: लेखक ने नवाब साहब के लिए 'सफेदपोश' शब्द का प्रयोग क्यों किया है?
उत्तर: 'सफेदपोश' का अर्थ है भद्र पुरुष। यहाँ यह व्यंग्य है क्योंकि नवाब साहब ऊपर से तो बहुत सभ्य और अमीर दिख रहे थे, लेकिन असल में वे अकेले में खीरा खाकर वक्त गुजारने वाले साधारण इंसान थे। उनकी वास्तविकता और दिखावे में अंतर था।
पाठ 12 समाप्त! 🚂
दिखावे की दुनिया से दूर रहें, और असली स्वाद का आनंद लें।
अगला पाठ: "मानवीय करुणा की दिव्य चमक" (सर्वेश्वर दयाल सक्सेना)
फादर बुल्के की यादों में एक भावनात्मक सफर। ✝️🕯️


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