RBSE Class 10 Hindi Chapter 13: Manviya Karuna Ki Divya Chamak (Father Bulke) Summary 2026

📅 Tuesday, 6 January 2026 📖 3-5 min read
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✨ Marwari Mission 100 ✨

मानवीय करुणा की दिव्य चमक

संस्मरण: सर्वेश्वर दयाल सक्सेना

"नम आँखों को गिनना स्याही फैलाना है..."

विधा: संस्मरण (Memoir)
मुख्य पात्र: फादर कामिल बुल्के (बेल्जियम निवासी)
"फादर को याद करना एक उदास शांत संगीत को सुनने जैसा है... उनको देखना करुणा के निर्मल जल में स्नान करने जैसा था।"
1. फादर बुल्के का व्यक्तित्व (Personality) ✝️

लेखक और फादर का संबंध 35 वर्षों का था। फादर का व्यक्तित्व एक देवदारु के वृक्ष जैसा विशाल और छायादार था।

  • दिखावट: गोरा रंग, सफेद झाईं मारती भूरी दाढ़ी, नीली आँखें और सफेद चोगा (Gown)। उनकी बाहें हमेशा गले लगाने को आतुर रहती थीं।
  • स्वभाव: वे एक सन्यासी थे, लेकिन पारंपरिक सन्यासी नहीं। वे जिससे रिश्ता बनाते थे, उसे कभी तोड़ते नहीं थे। वे सबके घरों में उत्सवों और संस्कारों में 'बड़े भाई' और 'पुरोहित' की तरह शामिल होते थे।
  • लेखक को याद है कि जब उनका बच्चा हुआ, तो फादर ने ही उसके मुख में पहली बार अन्न (अन्नप्राशन) डाला था।
2. बेल्जियम से भारत का सफर 🌍

फादर का जन्म रेम्सचैपल (बेल्जियम) में हुआ था। वह इंजीनियरिंग के अंतिम वर्ष में थे जब उन्होंने अचानक सन्यास लेने का फैसला किया।

जब उनसे पूछा गया कि "आप भारत क्यों आए?" तो उन्होंने सरलता से कहा— "प्रभु की इच्छा थी।"

  • उन्होंने भारत आकर 'जिसेट संघ' में 2 साल पादरियों के बीच धर्माचार की पढ़ाई की।
  • कलकत्ता (कोलकाता) से बी.ए. और इलाहाबाद से एम.ए. किया।
  • उन्होंने "रामकथा : उत्पत्ति और विकास" विषय पर अपना शोध-प्रबंध (Ph.D) पूरा किया।
3. हिंदी के प्रति अटूट प्रेम 🇮🇳

एक विदेशी होते हुए भी फादर बुल्के हिंदी को भारत की 'राष्ट्रभाषा' के रूप में देखना चाहते थे।

  • वे हर मंच से हिंदी की वकालत करते थे।
  • उन्हें सबसे ज्यादा दुख तब होता था जब वे "हिंदी वालों को ही हिंदी की उपेक्षा करते हुए" देखते थे।
  • उन्होंने प्रसिद्ध 'अंग्रेजी-हिंदी शब्दकोश' (Dictionary) तैयार किया और बाइबिल का हिंदी अनुवाद भी किया।
4. अंतिम विदाई (The Sad Demise) 🕯️

फादर की मृत्यु दिल्ली में जहरबाद (Gangrene) नामक फोड़े से हुई। यह बहुत कष्टदायक था। लेखक को दुख था कि जिसके शरीर में दूसरों के लिए केवल मिठास (अमृत) भरा था, उसे ऐसी जहरीली मौत क्यों मिली?

18 अगस्त 1982 को दिल्ली के कश्मीरी गेट के निकलसन कब्रगाह में उन्हें दफनाया गया। वहां हिंदी साहित्य के कई दिग्गज (जैसे जैनेंद्र कुमार, विजेंद्र स्नातक) मौजूद थे।

मसीही विधि से अंतिम संस्कार हुआ और रांची के फादर पासकल ने श्रद्धांजलि देते हुए कहा— "फादर बुल्के धरती में जा रहे हैं। इस धरती से ऐसे और रत्न पैदा हों।"

निष्कर्ष: लेखक कहते हैं— "मैं नहीं जानता कि उस सन्यासी ने कभी सोचा था या नहीं कि उसकी मौत पर कोई रोएगा। लेकिन उस दिन रोने वालों की कमी नहीं थी। (नम आँखों को गिनना स्याही फैलाना है)।"

📝 महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर (Exam Special)

प्रश्न 1: फादर बुल्के को 'भारतीय संस्कृति का अभिन्न अंग' क्यों कहा गया है?
उत्तर: भले ही फादर का जन्म बेल्जियम में हुआ, लेकिन उन्होंने भारत को अपनी कर्मभूमि बनाया। उन्होंने भारतीय संस्कृति की आत्मा 'रामकथा' पर शोध किया। वे भारतीय उत्सवों और संस्कारों में शामिल होते थे। हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने के लिए उनका प्रयास किसी भी भारतीय से कम नहीं था। इसलिए वे भारतीय संस्कृति के अभिन्न अंग हैं।

प्रश्न 2: "नम आँखों को गिनना स्याही फैलाना है" - इसका क्या आशय है?
उत्तर: इसका अर्थ है कि फादर बुल्के की मृत्यु पर रोने वाले लोगों की संख्या इतनी अधिक थी कि उन्हें गिना नहीं जा सकता था। अगर उनके नामों की सूची बनाई जाए, तो कागज पर स्याही फैलाने जैसा (अंतहीन) होगा। यह पंक्ति फादर की लोकप्रियता और लोगों के प्यार को दर्शाती है।

प्रश्न 3: लेखक ने फादर बुल्के को 'मानवीय करुणा की दिव्य चमक' क्यों कहा?
उत्तर: फादर का हृदय करुणा, ममता और वात्सल्य से भरा था। उनकी आँखों में हमेशा दूसरों के लिए प्यार और अपनापन तैरता रहता था। वे हर किसी के दुख में सांत्वना बनकर खड़े होते थे। उनके व्यक्तित्व में एक ऐसी पवित्रता और शांति थी जो 'दिव्य' (Divine) लगती थी।

पाठ 13 समाप्त! 🙏

एक सच्चा इंसान वह है जो सरहदों से परे प्यार बांट सके।

अगला पाठ: "एक कहानी यह भी" (मन्नू भंडारी)

एक साधारण लड़की के असाधारण बनने की कहानी। ✍️

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