RBSE Class 10 Hindi Chapter 14: Ek Kahani Yeh Bhi (Mannu Bhandari) Summary & Analysis 2026

📅 Tuesday, 6 January 2026 📖 3-5 min read
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✨ Marwari Mission 100 ✨

एक कहानी यह भी

लेखिका: मन्नू भंडारी (नई कहानी आंदोलन)

"पिता के अंतर्विरोध और बेटी का विद्रोह"

विधा: आत्मकथा (Autobiography)
संदर्भ: 1945-1947 का अजमेर (राजस्थान)

प्रस्तावना: यह पाठ लेखिका मन्नू भंडारी के जीवन का वह हिस्सा है जब वे अपनी किशोरावस्था से युवावस्था में कदम रख रही थीं। यह कहानी सिर्फ उनकी नहीं, बल्कि उस दौर की हर उस लड़की की है जो पितृसत्तात्मक सोच (Patriarchy) और आजादी के सपनों के बीच संघर्ष कर रही थी।

1. पिता का व्यक्तित्व और हीन भावना (Complex) 👤

लेखिका की यादें अजमेर के ब्रह्मपुरी मोहल्ले के दो मंजिला मकान से शुरू होती हैं।

पिताजी के दो रूप:

  • सकारात्मक: वे शिक्षा के प्रति बहुत जागरूक थे। वे चाहते थे कि उनकी बेटी घर में होने वाली राजनीतिक बहसों में बैठे और जाने कि देश में क्या हो रहा है।
  • नकारात्मक: वे बेहद क्रोधी, अहंकारी और शक्की थे। आर्थिक बरबादी और अपनों के धोखे ने उन्हें तोड़ दिया था।
💔 हीन भावना की जड़: लेखिका बचपन में काली, दुबली और मरियल-सी थी। जबकि उनकी बड़ी बहन सुशीला गोरी और स्वस्थ थी। पिता हमेशा सुशीला की तारीफ करते और मन्नू की उपेक्षा। इस भेदभाव ने मन्नू के अंदर गहरे तक 'हीन भावना' (Inferiority Complex) भर दी। उन्हें अपनी किसी भी उपलब्धि पर भरोसा नहीं होता था।
2. शीला अग्रवाल: जीवन की दिशा बदलने वाली 📚

सावित्री गर्ल्स हाई स्कूल में 1944 में हिंदी प्राध्यापिका शीला अग्रवाल आईं। उन्होंने मन्नू के जीवन को दो तरह से बदला:

  1. साहित्यिक दिशा: उन्होंने मन्नू को 'कचरा साहित्य' पढ़ने से रोका और यशपाल, जैनेंद्र, अज्ञेय जैसे गंभीर लेखकों की किताबें दीं। इससे मन्नू की वैचारिक समझ बढ़ी।
  2. राजनीतिक दिशा: शीला अग्रवाल ने मन्नू को बताया कि "देश की आजादी केवल लड़कों का काम नहीं है।" उन्होंने मन्नू के अंदर ऐसा जोश भरा कि पिता का डर काफूर हो गया।

⚔️ पिता बनाम पुत्री: वैचारिक युद्ध

यह टेबल पूरे पाठ का निचोड़ है। इसे जरूर याद करें:

पिताजी की विचारधारा (Old School) मन्नू भंडारी की विचारधारा (New Age)
लड़कियों की आजादी केवल घर की चारदीवारी तक होनी चाहिए। आजादी का मतलब है खुली हवा में सांस लेना और सड़क पर उतरना।
वे चाहते थे बेटी 'जागरूक' बने, पर 'सक्रिय' (Active) न हो। वे केवल सुनना नहीं, बल्कि नारे लगाना और हड़ताल करना चाहती थीं।
रसोई को 'भटियारखाना' कहते थे (जहाँ प्रतिभा जलती है), फिर भी बेटी को घर में ही रखना चाहते थे। वे रसोई और घर दोनों की सीमाओं को तोड़ना चाहती थीं।
समाज में अपनी 'प्रतिष्ठा' (Reputation) के प्रति बहुत संवेदनशील थे। उन्हें दकियानूसी प्रतिष्ठा की कोई परवाह नहीं थी।
3. 1947 का ज्वार और पिता का गर्व 🇮🇳

1946-47 में आजादी की आंधी चल रही थी। मन्नू भंडारी लड़कों के साथ सड़कों पर हाथ उठाकर नारे लगाती थीं।

कॉलेज से निष्कासन: मन्नू और उनकी सहेलियों के हुड़दंग के कारण कॉलेज प्रशासन ने उन्हें थर्ड ईयर में प्रवेश देने से मना कर दिया। लेकिन मन्नू ने बाहर इतना हंगामा (हड़ताल) करवाया कि कॉलेज को झुकना पड़ा और उन्हें वापस लेना पड़ा। यह उनकी पहली बड़ी जीत थी।

चौपड़ पर भाषण: एक बार मन्नू ने अजमेर के मुख्य चौराहे (चौपड़) पर धुआंधार भाषण दिया। पिता के एक दकियानूसी मित्र ने शिकायत की, जिससे पिता नाराज हुए। लेकिन शहर के प्रतिष्ठित डॉ. अंबालाल ने आकर बधाई दी— "भंडारी जी! क्या बेटी पाई है आपने। मैंने तो कार रोककर उसका भाषण सुना। गर्व होना चाहिए आपको।"

यह सुनकर पिता का चेहरा (जो गुस्से में था) गर्व से खिल उठा।

📝 विस्तृत प्रश्नोत्तरी (Mega Question Bank)

प्रश्न 1: लेखिका के पिता ने रसोई को 'भटियारखाना' कहकर क्यों संबोधित किया?
उत्तर: 'भटियारखाना' का अर्थ है वह जगह जहाँ हमेशा भट्ठी जलती रहती है। लेखिका के पिता का मानना था कि रसोई में काम करने से औरतों की योग्यता, प्रतिभा और क्षमता चूल्हे-चौके के धुएं में जलकर नष्ट हो जाती है। वे चाहते थे कि उनकी बेटी देश-दुनिया की खबरों से जुड़ी रहे, न कि केवल रोटियां सेंकने में जीवन बिता दे।

प्रश्न 2: वह कौन सी घटना थी जिसके कारण लेखिका को अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हुआ?
उत्तर: जब कॉलेज प्रशासन ने अनुशासनहीनता का आरोप लगाकर लेखिका और उनकी सहेलियों को कॉलेज से निकाल दिया, तो उन्होंने बाहर हुड़दंग मचाकर कॉलेज बंद करवा दिया। अंततः कॉलेज प्रशासन को झुकना पड़ा और उन्हें वापस प्रवेश देना पड़ा। यह जीत इतनी बड़ी और अप्रत्याशित थी कि लेखिका को अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हुआ कि उन्होंने यह कर दिखाया है।

प्रश्न 3 (HOTS): लेखिका के व्यक्तित्व पर किन-किन व्यक्तियों का प्रभाव पड़ा?
उत्तर: मुख्य रूप से दो व्यक्तियों का:
1. पिता का प्रभाव: नकारात्मक (हीन भावना, शक्की स्वभाव) और सकारात्मक (शिक्षा के प्रति जागरूकता, देशप्रेम)।
2. शीला अग्रवाल का प्रभाव: उन्होंने लेखिका को साहित्यिक समझ दी और सक्रिय राजनीति में उतारा। उन्होंने लेखिका को आत्मविश्वास से भर दिया।

प्रश्न 4: "पिताजी के अंतरविरोधों को उकेरिए।"
उत्तर: पिताजी एक तरफ तो स्त्री-शिक्षा के समर्थक थे और चाहते थे बेटी जागरूक बने, लेकिन दूसरी तरफ वे नहीं चाहते थे कि बेटी घर की दहलीज लांघकर लड़कों के साथ नारे लगाए। वे आधुनिकता और परंपरा के बीच झूल रहे थे। वे अपनी 'सामाजिक प्रतिष्ठा' को लेकर बहुत डरे हुए थे।

पाठ 14: मिशन पूरा हुआ! 🚩

यह केवल मन्नू भंडारी की कहानी नहीं, हर उस लड़की की कहानी है जो उड़ना चाहती है।

अगला पाठ: "नौबतखाने में इबादत" (यतीन्द्र मिश्र)

काशी, गंगा और शहनाई... तैयार रहें एक सुरीले सफर के लिए! 🎺

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