मुरझा कर गिर रहीं पत्तियाँ देखो कितनी आज घनी।
इस गंभीर अनंत-नीलिमा में असंख्य जीवन-इतिहास,
यह लो, करते ही रहते हैं अपना व्यंग्य-मलिन उपहास।"
🔍 भावार्थ एवं विश्लेषण
कवि अपने मन को एक भौंरे (मधुप) का रूप देते हैं जो गुनगुना कर पूछ रहा है कि "मैं अपने जीवन की कौन सी कहानी सुनाऊं?"
कवि कहते हैं कि जीवन नश्वर है। जैसे पेड़ की पत्तियाँ पीली पड़कर (मुरझाकर) गिर जाती हैं, वैसे ही मेरे जीवन की खुशियाँ भी एक-एक करके मुरझा गई हैं। इस अंतहीन नीले आकाश (संसार) में अनगिनत लोगों ने अपने जीवन का इतिहास (आत्मकथा) लिखा है। लेकिन उसे पढ़कर ऐसा लगता है मानो वे एक-दूसरे का मजाक (उपहास) उड़ा रहे हों कि "देखो, जीवन कितना दुखभरा है।"
| शब्द/प्रतीक (Symbol) | गहरा अर्थ (Deep Meaning) |
|---|---|
| कवि का मन (Mind/Soul) | |
| नष्ट होती खुशियाँ / जीवन की नश्वरता | |
| विशाल संसार / आकाश |
तुम सुनकर सुख पाओगे, देखोगे- यह गागर रीति।
किंतु कहीं ऐसा न हो कि तुम ही खाली करने वाले-
अपने को समझो, मेरा रस ले अपनी भरने वाले।"
🔍 भावार्थ एवं विश्लेषण
कवि अपने मित्रों से कहते हैं: "इतने दुख देखने के बाद भी तुम चाहते हो कि मैं अपनी कमजोरियां (दुर्बलता) सबको बता दूँ?"
शायद तुम्हें यह जानकर सुख मिलेगा कि मेरा जीवन रूपी घड़ा एकदम खाली है (गागर रीति)। अर्थात मेरे पास उपलब्धियों के नाम पर कुछ नहीं है।
गहरा व्यंग्य: कवि कहते हैं कि कहीं ऐसा न हो कि मेरी खाली जिंदगी देखकर तुम्हें लगे कि मेरे हिस्से का सुख तुम्हीं ने छीन लिया है (मेरा रस लेकर अपनी गगरी भर ली है)। अर्थात मेरे दुखों का कारण कहीं तुम ही तो नहीं हो?
अरे खिल-खिला कर हँसने वाली उन बातों की।
मिला कहाँ वह सुख जिसका मैं स्वप्न देखकर जाग गया?
आलिंगन में आते-आते मुसक्या कर जो भाग गया।"
🔍 भावार्थ एवं विश्लेषण (Most Important)
यहाँ कवि अपने निजी प्रेम (प्रेमिका/पत्नी) को याद करते हैं। वे कहते हैं कि उन चाँदनी रातों की उज्ज्वल प्रेम-कथा को मैं दुनिया के सामने कैसे गाऊँ? वे पल बहुत निजी और पवित्र थे।
दुखद अंत: कवि कहते हैं कि सुख तो मेरे लिए एक 'सपने' जैसा था। जैसे ही मैंने उसे बांहों में भरना चाहा (आलिंगन), वह मुस्कुराकर दूर भाग गया। अर्थात सुख मेरे जीवन में आया तो सही, पर मुझे मिला नहीं।
अनुरागिनी उषा लेती थी निज सुहाग मधुमाया में।
उसकी स्मृति पाथेय बनी है थके पथिक की पंथा की।
सीवन को उधेड़ कर देखोगे क्यों मेरी कंथा की?
छोटे से जीवन की कैसे बड़ी कथाएँ आज कहूँ?
क्या यह अच्छा नहीं कि औरों की सुनता मैं मौन रहूँ?"
🔍 भावार्थ एवं विश्लेषण
कवि अपनी प्रेमिका की सुंदरता का वर्णन करते हैं: उसके लाल गाल (अरुण-कपोल) इतने सुंदर थे कि भोर की लाली (उषा) भी अपनी सुंदरता उन्हीं से उधार लेती थी।
आज मैं जीवन रूपी रास्ते का थका हुआ यात्री (पथिक) हूँ और वही यादें मेरा सहारा (पाथेय) हैं।
अंतिम प्रश्न: कवि कहते हैं- "क्या तुम मेरी गुदड़ी (कंथा - अंतर्मन) की सिलाई उधेड़कर (Seams) मेरे पुराने जख्म देखना चाहते हो?" मेरा जीवन बहुत साधारण है, इसकी कोई बड़ी कहानी नहीं है। इसलिए अच्छा यही है कि मैं चुप रहूँ और दूसरों की सुनूँ।
| शब्द/प्रतीक (Symbol) | गहरा अर्थ (Deep Meaning) |
|---|---|
| लाल गाल (Rosy Cheeks) | |
| रास्ते का भोजन / सहारा (Memories) | |
| गुदड़ी / अंतर्मन (Inner Soul) | |
| पुराने जख्म कुरेदना / छिपी बातें जानना |
💎 काव्य-सौंदर्य और प्रश्न (Topper's Corner)
भाषा-शैली (Language)
- साहित्यिक खड़ी बोली हिंदी।
- छायावादी शैली (प्रतीकात्मकता)।
- तत्सम शब्दों की प्रधानता (मधुप, अनंत-नीलिमा)।
प्रमुख अलंकार (Alankar)
- मानवीकरण: 'अरी सरलते तेरी हँसी उड़ाऊँ मैं'।
- अनुप्रास: 'कहानी यह अपनी', 'किसका मैं'।
- रूपक: 'थके पथिक की पंथा'।
प्रश्न 1: 'स्मृति को पाथेय' बनाने से कवि का क्या आशय है?
उत्तर: जिस प्रकार यात्री को यात्रा में 'पाथेय' (भोजन/सहारा) की जरूरत होती है, उसी प्रकार कवि अपने थके हुए जीवन की यात्रा में अपनी प्रेमिका की मीठी यादों (स्मृतियों) के सहारे जी रहे हैं।
प्रश्न 2: कवि ने "उज्ज्वल गाथा" किसे कहा है और क्यों?
उत्तर: कवि ने अपनी प्रेमिका के साथ बिताए निजी प्रेम के पलों को "उज्ज्वल गाथा" कहा है। वे इसे दुनिया के सामने इसलिए नहीं गाना चाहते क्योंकि वह उनका व्यक्तिगत सुख है और अब वह केवल एक सपना बनकर रह गया है।
पाठ 3 पूर्ण! 🌙
अगला अध्याय: उत्साह / अट नहीं रही है (सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला')
निराला जी की ओजस्वी वाणी के लिए तैयार रहें।


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