RBSE Class 12 Chemistry d and f Block Elements Notes 2026 | d एवं f ब्लॉक तत्व

📅 Tuesday, 13 January 2026 📖 3-5 min read

d- एवं f-ब्लॉक के तत्व
(The d- and f-Block Elements)

आधुनिक आवर्त सारणी में d- एवं f-ब्लॉक के तत्व रासायनिक विज्ञान के सबसे अधिक विविध, समृद्ध एवं औद्योगिक दृष्टि से महत्वपूर्ण तत्वों का समूह प्रस्तुत करते हैं। इन तत्वों की विशिष्टता इनके अपूर्ण d एवं f कक्षकों से उत्पन्न होती है, जो इन्हें असामान्य भौतिक, रासायनिक तथा चुंबकीय गुण प्रदान करती है।

संक्रमण तत्वों, लैन्थेनॉयडों एवं ऐक्टिनॉयडों का अध्ययन केवल सैद्धांतिक रसायन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह धातुकर्म, उत्प्रेरण, नाभिकीय विज्ञान, इलेक्ट्रॉनिक्स, रंग उद्योग एवं आधुनिक प्रौद्योगिकी की आधारशिला भी है।


आवर्त सारणी में स्थिति
(Position in the Periodic Table)

आधुनिक दीर्घ आवर्त सारणी में तत्वों को उनके परमाणु क्रमांक एवं इलेक्ट्रॉनिक विन्यास के आधार पर चार मुख्य ब्लॉकों — s, p, d तथा f में विभाजित किया गया है।

d-ब्लॉक के तत्व आवर्त सारणी के मध्य भाग में स्थित होते हैं तथा समूह 3 से समूह 12 तक फैले होते हैं। इन तत्वों में (n−1)d कक्षक आंशिक रूप से भरे होते हैं।

f-ब्लॉक के तत्व आवर्त सारणी के निचले भाग में अलग पंक्तियों में रखे जाते हैं ताकि सारणी की चौड़ाई व्यवहारिक सीमा में रहे। इनमें (n−2)f कक्षक क्रमशः भरते हैं।


d-ब्लॉक तत्वों का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास
(Electronic Configuration of d-Block Elements)

d-ब्लॉक तत्वों का सामान्य इलेक्ट्रॉनिक विन्यास निम्न रूप में व्यक्त किया जाता है:

(n − 1)d1–10 ns1–2

यहाँ (n − 1)d कक्षक आंशिक रूप से भरा होता है, जिसके कारण संक्रमण तत्वों में अनेक विशिष्ट गुण विकसित होते हैं।

कुछ तत्वों में आधी भरी या पूरी भरी d-उपकक्षाओं की स्थिरता के कारण अपवादात्मक विन्यास भी देखे जाते हैं, जैसे:

  • क्रोमियम (Cr): [Ar] 3d5 4s1
  • तांबा (Cu): [Ar] 3d10 4s1

ये अपवाद इलेक्ट्रॉन-इलेक्ट्रॉन प्रतिकर्षण, विनिमय ऊर्जा तथा कक्षक स्थिरता के परिणामस्वरूप उत्पन्न होते हैं।


संक्रमण तत्व (d-ब्लॉक) – सामान्य अभिलक्षण
(General Characteristics of Transition Elements)

संक्रमण तत्वों में आंशिक रूप से भरी d-कक्षाओं की उपस्थिति उन्हें साधारण धातुओं से भिन्न बनाती है। इनके सामान्य अभिलक्षणों में भौतिक, रासायनिक, चुंबकीय तथा उत्प्रेरकीय गुण सम्मिलित हैं।

भौतिक गुण
(Physical Properties)

संक्रमण धातुएँ सामान्यतः कठोर, उच्च गलनांक वाली, उच्च घनत्व वाली तथा उत्तम चालक होती हैं। इनकी दृढ़ धात्विक बंधन क्षमता इनके उच्च यांत्रिक बल का कारण है।

इन धातुओं का गलनांक एवं क्वथनांक आमतौर पर उच्च होता है, जो मजबूत धात्विक बंधन तथा d-इलेक्ट्रॉनों की सहभागिता का प्रत्यक्ष परिणाम है।


संक्रमण धातुओं के परमाण्विक एवं आयनिक आकारों में परिवर्तन
(Variation in Atomic and Ionic Sizes of Transition Metals)

संक्रमण धातुओं में परमाण्विक तथा आयनिक आकारों का अध्ययन इनके रासायनिक एवं भौतिक गुणों को समझने के लिए अत्यंत आवश्यक है। सामान्यतः, एक ही आवर्त में बाएँ से दाएँ बढ़ने पर परमाण्विक आकार में धीरे-धीरे कमी देखी जाती है।

यह कमी नाभिकीय आवेश में वृद्धि के कारण होती है, जबकि अतिरिक्त d-इलेक्ट्रॉन नाभिकीय आवेश को प्रभावी रूप से परिरक्षित नहीं कर पाते।

परिणामस्वरूप, संक्रमण धातुओं में परमाण्विक त्रिज्या का परिवर्तन s- तथा p-ब्लॉक तत्वों की तुलना में कम तीव्र होता है।

आयनिक आकार
(Ionic Radii)

संक्रमण धातुओं के आयनिक आकार उनकी ऑक्सीकरण अवस्था पर निर्भर करते हैं। उच्च ऑक्सीकरण अवस्था में आयनिक आकार कम होता है, क्योंकि नाभिकीय आवेश इलेक्ट्रॉनों को अधिक मजबूती से आकर्षित करता है।

उदाहरणस्वरूप, Fe2+ का आयनिक आकार Fe3+ से अधिक होता है।


आयनन एन्थैल्पी
(Ionisation Enthalpies)

संक्रमण तत्वों की आयनन एन्थैल्पी उनकी इलेक्ट्रॉनिक संरचना और परमाण्विक आकार दोनों पर निर्भर करती है।

सामान्यतः, प्रथम आयनन एन्थैल्पी आवर्त में धीरे-धीरे बढ़ती है, किन्तु यह वृद्धि नियमित नहीं होती।

इस अनियमितता का कारण d-इलेक्ट्रॉनों द्वारा नाभिकीय आवेश का अपूर्ण परिरक्षण है। इसके अतिरिक्त, आधी भरी एवं पूरी भरी d-कक्षाओं की स्थिरता कुछ अपवाद उत्पन्न करती है।


ऑक्सीकरण अवस्थाएँ
(Oxidation States)

संक्रमण धातुओं की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता इनकी बहुविध ऑक्सीकरण अवस्थाएँ हैं। यह गुण ns तथा (n−1)d इलेक्ट्रॉनों की समान ऊर्जा के कारण उत्पन्न होता है।

सामान्यतः, संक्रमण धातुएँ +2 एवं +3 ऑक्सीकरण अवस्थाएँ दिखाती हैं, किन्तु कुछ तत्व उच्च ऑक्सीकरण अवस्थाएँ भी प्रदर्शित करते हैं।

उदाहरण:

  • मैंगनीज: +2 से +7
  • क्रोमियम: +2 से +6
  • लोहा: +2, +3

आवर्त में बाएँ से दाएँ बढ़ने पर उच्च ऑक्सीकरण अवस्थाओं की स्थिरता प्रथम बढ़ती है और फिर घटने लगती है।


मानक इलेक्ट्रोड विभवों में प्रवृत्तियाँ
(Trends in Standard Electrode Potentials)

संक्रमण धातुओं के मानक इलेक्ट्रोड विभव उनकी रासायनिक अभिक्रियाशीलता का महत्वपूर्ण संकेतक हैं।

M2+/M मानक इलेक्ट्रोड विभव यह दर्शाता है कि धातु कितनी सरलता से ऑक्सीकरण होकर आयन में परिवर्तित हो सकती है।

इसी प्रकार, M3+/M2+ विभव आयनिक अवस्थाओं की आपसी स्थिरता का मापक होता है।

सामान्यतः, अधिक ऋणात्मक मान उच्च अपचायक प्रवृत्ति को दर्शाते हैं।


रासायनिक अभिक्रियाशीलता एवं ES मान
(Chemical Reactivity and ES Values)

संक्रमण धातुओं की रासायनिक अभिक्रियाशीलता उनकी इलेक्ट्रॉनिक संरचना, ऑक्सीकरण अवस्था तथा मानक इलेक्ट्रोड विभव पर निर्भर करती है।

ES मान धातु की ऑक्सीकरण-अपचयन प्रवृत्ति का संख्यात्मक मापक होता है।

इन गुणों के कारण संक्रमण धातुएँ अनेक औद्योगिक प्रक्रियाओं में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।


चुंबकीय गुण
(Magnetic Properties)

संक्रमण धातुओं के चुंबकीय गुण उनके अयुग्मित d-इलेक्ट्रॉनों की संख्या पर निर्भर करते हैं। इन धातुओं में पैरामैग्नेटिक तथा डायमैग्नेटिक व्यवहार देखा जाता है।

जिन आयनों या परमाणुओं में एक या अधिक अयुग्मित इलेक्ट्रॉन होते हैं, वे पैरामैग्नेटिक होते हैं, जबकि सभी इलेक्ट्रॉन युग्मित होने पर पदार्थ डायमैग्नेटिक होता है।

संक्रमण धातुओं के चुंबकीय आघूर्ण (Magnetic Moment) का मान अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की संख्या से निर्धारित किया जा सकता है, जिससे उनकी इलेक्ट्रॉनिक संरचना का अनुमान लगाया जाता है।


रंगीन आयनों का निर्माण
(Formation of Coloured Ions)

संक्रमण धातुओं के अधिकांश यौगिक रंगीन होते हैं। यह गुण d–d संक्रमण के कारण उत्पन्न होता है।

जब किसी संक्रमण धातु आयन में d-कक्षाएँ आंशिक रूप से भरी होती हैं, तो आने वाली दृश्य प्रकाश ऊर्जा इलेक्ट्रॉनों को एक ऊर्जा स्तर से दूसरे स्तर में उत्साहित कर देती है।

इस ऊर्जा अवशोषण के कारण शेष प्रकाश का रंग देखने में आता है, जो आयन को विशिष्ट रंग प्रदान करता है।

उदाहरणस्वरूप:

  • Cu2+ – नीला
  • Fe3+ – पीला/भूरा
  • Cr3+ – हरा
  • Mn2+ – हल्का गुलाबी

संकुल यौगिकों का निर्माण
(Formation of Complex Compounds)

संक्रमण धातुएँ संकुल यौगिक आसानी से बनाती हैं। इसका कारण इन धातुओं के छोटे आयनिक आकार, उच्च आवेश तथा रिक्त d-कक्षाओं की उपलब्धता है।

संकुल यौगिकों में केंद्रीय धातु आयन अपने चारों ओर लिगैंडों से समन्वय बंध बनाता है।

उदाहरण:

  • [Fe(CN)6]3−
  • [Cu(NH3)4]2+
  • [Co(NH3)6]3+

इन यौगिकों का अध्ययन विश्लेषणात्मक रसायन, जैव-अकार्बनिक रसायन तथा उद्योगों में अत्यंत महत्वपूर्ण है।


उत्प्रेरकीय गुण
(Catalytic Properties)

संक्रमण धातुएँ उत्कृष्ट उत्प्रेरक के रूप में कार्य करती हैं। इसका कारण इनकी परिवर्ती ऑक्सीकरण अवस्थाएँ तथा रिक्त एवं अर्धभरी d-कक्षाओं की उपलब्धता है।

ये धातुएँ अभिक्रिया के दौरान अस्थायी मध्यवर्ती यौगिक बनाकर सक्रियण ऊर्जा को कम कर देती हैं।

उदाहरण:

  • Fe – हैबर प्रक्रिया
  • V2O5 – संपर्क प्रक्रिया
  • Ni – हाइड्रोजनीकरण

अंतराकाशी यौगिकों एवं मिश्रातुओं का निर्माण
(Interstitial Compounds and Alloys)

संक्रमण धातुएँ अंतराकाशी यौगिक जैसे हाइड्राइड, कार्बाइड तथा नाइट्राइड बनाती हैं। इन यौगिकों में छोटे परमाणु धातु के क्रिस्टल जाल के रिक्त स्थानों में स्थित होते हैं।

ये यौगिक अत्यंत कठोर, उच्च गलनांक वाले तथा रासायनिक रूप से स्थिर होते हैं।

इसके अतिरिक्त, संक्रमण धातुएँ मिश्रातु बनाने में भी अत्यंत सक्षम होती हैं। मिश्रातुओं के माध्यम से धातुओं के यांत्रिक, विद्युत तथा रासायनिक गुणों को नियंत्रित किया जाता है।

उदाहरण:

  • स्टील (Fe + C)
  • पीतल (Cu + Zn)
  • कांसा (Cu + Sn)

पोटैशियम डाइक्रोमेट (K2Cr2O7)
(Preparation and Properties of Potassium Dichromate)

पोटैशियम डाइक्रोमेट संक्रमण तत्वों के क्रोमियम का एक महत्वपूर्ण यौगिक है, जिसमें क्रोमियम +6 ऑक्सीकरण अवस्था में उपस्थित रहता है। यह यौगिक अकार्बनिक रसायन तथा औद्योगिक रसायन दोनों दृष्टियों से अत्यंत महत्वपूर्ण है।

विरचन

K2Cr2O7 का निर्माण मुख्यतः क्रोमाइट अयस्क (FeCr2O4) से किया जाता है। क्रोमाइट अयस्क को सोडियम कार्बोनेट और वायु के साथ उच्च ताप पर गरम करने पर सोडियम क्रोमेट बनता है।

इसके पश्चात सोडियम क्रोमेट को अम्लीकरण करने पर सोडियम डाइक्रोमेट प्राप्त होता है, जिसे पोटैशियम क्लोराइड से अभिक्रिया कराकर पोटैशियम डाइक्रोमेट प्राप्त किया जाता है।

गुणधर्म

  • यह नारंगी रंग का स्फटिकीय ठोस होता है।
  • जल में घुलनशील होता है।
  • यह एक शक्तिशाली ऑक्सीकारक है।
  • अम्लीय माध्यम में इसकी ऑक्सीकरण क्षमता अधिक होती है।

K2Cr2O7 का उपयोग प्रयोगशालाओं में ऑक्सीकारक के रूप में, चमड़ा उद्योग, रंजक निर्माण तथा विश्लेषणात्मक रसायन में व्यापक रूप से किया जाता है।


पोटैशियम परमैंगनेट (KMnO4)
(Preparation and Properties of Potassium Permanganate)

पोटैशियम परमैंगनेट मैंगनीज का एक अत्यंत महत्वपूर्ण यौगिक है, जिसमें मैंगनीज +7 ऑक्सीकरण अवस्था में पाया जाता है। यह यौगिक अपनी तीव्र ऑक्सीकरण क्षमता के लिए प्रसिद्ध है।

विरचन

KMnO4 का निर्माण मैंगनीज डाइऑक्साइड (MnO2) से किया जाता है। MnO2 को पोटैशियम हाइड्रॉक्साइड और वायु या किसी ऑक्सीकारक के साथ गर्म करने पर पोटैशियम मैंगनेट बनता है।

इसके पश्चात पोटैशियम मैंगनेट का ऑक्सीकरण या असंतुलन (disproportionation) करके पोटैशियम परमैंगनेट प्राप्त किया जाता है।

गुणधर्म

  • यह गहरे बैंगनी रंग का ठोस होता है।
  • जल में घुलकर बैंगनी विलयन बनाता है।
  • अम्लीय, क्षारीय एवं उदासीन – तीनों माध्यमों में ऑक्सीकारक का कार्य करता है।
  • अम्लीय माध्यम में इसकी ऑक्सीकरण क्षमता सर्वाधिक होती है।

KMnO4 का उपयोग जल शोधन, चिकित्सा, प्रयोगशालाओं में ऑक्सीकारक तथा रासायनिक उद्योग में व्यापक रूप से किया जाता है।


लैन्थेनॉयड
(The Lanthanoids)

लैन्थेनॉयड तत्व आवर्त सारणी के f-ब्लॉक में स्थित होते हैं। ये तत्व परमाणु क्रमांक 57 (La) से 71 (Lu) तक फैले हुए होते हैं।

इन तत्वों में 4f कक्षाओं का क्रमिक पूरण होता है, जिसके कारण इनके गुणों में विशिष्ट समानताएँ पाई जाती हैं।

इलेक्ट्रॉनिक विन्यास

लैन्थेनॉयडों का सामान्य इलेक्ट्रॉनिक विन्यास इस प्रकार व्यक्त किया जा सकता है:

[Xe] 4f1–14 5d0–1 6s2

लैन्थेनॉयड आकुंचन

लैन्थेनॉयड श्रेणी में परमाण्विक तथा आयनिक आकारों में क्रमिक कमी देखी जाती है। इस घटना को लैन्थेनॉयड आकुंचन कहा जाता है।

इसका मुख्य कारण 4f इलेक्ट्रॉनों की अपर्याप्त परिरक्षण क्षमता है, जिसके कारण नाभिकीय आकर्षण बढ़ता जाता है।

लैन्थेनॉयड आकुंचन के कारण संक्रमण तत्वों के गुणों में समानता, जैसे Zr–Hf की समानता, देखने को मिलती है।


लैन्थेनॉयड : ऑक्सीकरण अवस्थाएँ, सामान्य अभिलक्षण एवं रासायनिक अभिक्रियाशीलता
(Oxidation States, General Characteristics and Chemical Reactivity of Lanthanoids)

लैन्थेनॉयड तत्वों में सबसे सामान्य एवं स्थायी ऑक्सीकरण अवस्था +3 पाई जाती है। यह अवस्था 4f इलेक्ट्रॉनों की प्रकृति के कारण अत्यधिक स्थिर होती है।

कुछ लैन्थेनॉयड तत्व +2 अथवा +4 ऑक्सीकरण अवस्थाएँ भी प्रदर्शित करते हैं, किन्तु ये अवस्थाएँ सीमित एवं विशिष्ट परिस्थितियों में ही स्थिर रहती हैं।

  • Ce → +4 अवस्था में अपेक्षाकृत स्थिर
  • Eu, Yb → +2 अवस्था में अपेक्षाकृत स्थिर

सामान्य अभिलक्षण

  • ये सभी धातुएँ चाँदी के समान चमकीली होती हैं।
  • इनकी कठोरता अपेक्षाकृत कम होती है।
  • अधिकांश यौगिक रंगहीन होते हैं क्योंकि f–f संक्रमण कम प्रभावी होते हैं।
  • ये प्रबल अपचायक होते हैं।

रासायनिक अभिक्रियाशीलता

लैन्थेनॉयड तत्व वायु में धीरे-धीरे ऑक्सीकरण होकर ऑक्साइड बनाते हैं। जल के साथ इनकी अभिक्रिया क्षारीय धातुओं की अपेक्षा कम तीव्र होती है, परंतु हाइड्रोजन का उत्सर्जन अवश्य होता है।


ऐक्टिनॉयड
(The Actinoids)

ऐक्टिनॉयड तत्व आवर्त सारणी के f-ब्लॉक में थोरियम (90) से लेकर लॉरेंसियम (103) तक फैले होते हैं। इन तत्वों में 5f कक्षाओं का क्रमिक पूरण होता है।

इलेक्ट्रॉनिक विन्यास

ऐक्टिनॉयडों का सामान्य इलेक्ट्रॉनिक विन्यास:

[Rn] 5f1–14 6d0–1 7s2

ऑक्सीकरण अवस्थाएँ

ऐक्टिनॉयड तत्व लैन्थेनॉयडों की तुलना में अधिक संख्या में ऑक्सीकरण अवस्थाएँ प्रदर्शित करते हैं। +3 अवस्था के अतिरिक्त +4, +5, +6 यहाँ तक कि +7 अवस्था भी कुछ तत्वों में देखी जाती है।

इसका कारण 5f, 6d और 7s कक्षाओं की ऊर्जा का आपस में समीप होना है।

लैन्थेनॉयडों से तुलना

बिंदु लैन्थेनॉयड ऐक्टिनॉयड
कक्षा पूरण 4f 5f
ऑक्सीकरण अवस्थाएँ मुख्यतः +3 विविध (+3 से +7)
रेडियोधर्मिता नगण्य प्रायः सभी रेडियोधर्मी

d- एवं f-ब्लॉक तत्वों के अनुप्रयोग
(Applications of d- and f-Block Elements)

  • संक्रमण धातुओं का उपयोग उत्प्रेरक के रूप में (Fe, Ni, V₂O₅)।
  • स्टेनलेस स्टील एवं मिश्रधातुओं का निर्माण।
  • KMnO₄ एवं K₂Cr₂O₇ का उपयोग ऑक्सीकारक के रूप में।
  • लैन्थेनॉयडों का उपयोग काँच उद्योग एवं लेज़र तकनीक में।
  • ऐक्टिनॉयडों का उपयोग नाभिकीय ऊर्जा उत्पादन में।

दृश्य निरूपण : d- एवं f-ब्लॉक तत्व (SVG आधारित)
(Visual Representation with Conceptual Analysis)

नीचे दिए गए आरेख संक्रमण धातुओं, लैन्थेनॉयड एवं ऐक्टिनॉयड तत्वों की संरचना, प्रवृत्तियों तथा गुणों को दृश्य रूप में स्पष्ट करते हैं।

d-Block Elements • Variable oxidation states • Coloured ions • Catalytic activity Lanthanoids (4f) • +3 oxidation state • Lanthanoid contraction Actinoids (5f) • Multiple oxidation states • Radioactivity

यह आरेख स्पष्ट करता है कि d-ब्लॉक तत्वों में आंशिक भरे d-कक्ष रासायनिक विविधता उत्पन्न करते हैं, जबकि f-ब्लॉक तत्वों में f-कक्षाओं का आंतरिक स्वभाव विशिष्ट गुणों का कारण बनता है।


बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQ) – 25

  1. संक्रमण धातुओं में रंगीन आयन बनने का मुख्य कारण क्या है?
    उत्तर: d–d संक्रमण
  2. लैन्थेनॉयड संकुचन का कारण क्या है?
    उत्तर: 4f इलेक्ट्रॉनों की कमजोर परिरक्षण क्षमता
  3. KMnO₄ में Mn की ऑक्सीकरण अवस्था क्या है?
    उत्तर: +7
  4. सबसे अधिक ऑक्सीकरण अवस्थाएँ कौन प्रदर्शित करता है?
    उत्तर: ऐक्टिनॉयड
  5. d-ब्लॉक तत्वों का सामान्य इलेक्ट्रॉनिक विन्यास क्या है?
    उत्तर: (n−1)d¹–¹⁰ ns¹–²

अति लघु उत्तरीय प्रश्न – 50 (उत्तर सहित)

  • संक्रमण तत्व किसे कहते हैं? उत्तर: वे तत्व जिनके परमाणु या आयन में अपूर्ण d-कक्ष हो।
  • लैन्थेनॉयडों की सामान्य ऑक्सीकरण अवस्था? उत्तर: +3
  • रंगीन यौगिक बनने का कारण? उत्तर: इलेक्ट्रॉनिक संक्रमण
  • सबसे शक्तिशाली ऑक्सीकारक d-ब्लॉक यौगिक? उत्तर: KMnO₄
  • ऐक्टिनॉयडों की प्रमुख विशेषता? उत्तर: रेडियोधर्मिता

लघु उत्तरीय प्रश्न – 25

प्रश्न: संक्रमण धातुएँ उत्प्रेरक क्यों होती हैं?
उत्तर: क्योंकि ये वैकल्पिक ऑक्सीकरण अवस्थाओं के कारण अस्थायी मध्यवर्ती यौगिक बना सकती हैं।

प्रश्न: लैन्थेनॉयड संकुचन का औद्योगिक महत्व बताइए।
उत्तर: यह Zr एवं Hf जैसे तत्वों के गुणों में समानता उत्पन्न करता है।


दीर्घ उत्तरीय प्रश्न – 5

प्रश्न: d-ब्लॉक तत्वों के सामान्य गुणों की विवेचना कीजिए।
उत्तर: संक्रमण धातुएँ उच्च गलनांक, अच्छी चालकता, विविध ऑक्सीकरण अवस्थाएँ, चुंबकीय गुण, उत्प्रेरकीय सक्रियता तथा मिश्रधातु निर्माण की क्षमता प्रदर्शित करती हैं।


सरकारी एवं प्रामाणिक संदर्भ

  • NCERT Chemistry Class XII – Part I
  • CBSE Curriculum & Laboratory Manual
  • Raj. Board Textbook Bureau (RBSE)
  • https://ncert.nic.in
ncertclasses.com
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