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प्रत्यावर्ती धारा (Alternating Current)
विद्युत-चुम्बकीय प्रेरण के अध्ययन से यह स्पष्ट हो चुका है कि चुम्बकीय फ्लक्स में निरंतर परिवर्तन परिपथ में विद्युत प्रभाव उत्पन्न करता है। जब यह परिवर्तन आवर्ती (periodic) होता है, तो उत्पन्न विद्युत प्रभाव भी नियत समयांतराल पर अपनी दिशा और परिमाण बदलता है। इसी प्रकार की विद्युत अवस्था प्रत्यावर्ती धारा कहलाती है।
प्रत्यावर्ती धारा आधुनिक विद्युत आपूर्ति प्रणाली का आधार है। घरों, उद्योगों और संचार प्रणालियों में उपलब्ध विद्युत ऊर्जा इसी रूप में प्रयुक्त होती है। इसका कारण केवल तकनीकी सुविधा नहीं, बल्कि इसके भौतिक गुण हैं, जो ऊर्जा के दीर्घ दूरी तक सुरक्षित और किफायती संचरण को संभव बनाते हैं।
प्रत्यावर्ती और दिष्ट धारा का भेद
दिष्ट धारा में आवेशों का प्रवाह सदैव एक ही दिशा में होता है। इसके विपरीत, प्रत्यावर्ती धारा में आवेशों की औसत गति आगे–पीछे दोलन करती है। यह दोलन नियत समय अंतराल में पुनरावृत्त होता है।
यद्यपि प्रत्यावर्ती धारा में आवेश किसी एक दिशा में स्थायी रूप से नहीं बहते, फिर भी ऊर्जा का संचार प्रभावी ढंग से होता है। यह तथ्य प्रत्यावर्ती प्रणालियों की विशिष्टता को दर्शाता है।
प्रत्यावर्ती विद्युत वाहक बल का उद्गम
जब किसी कुंडली को समान चुम्बकीय क्षेत्र में समान कोणीय वेग से घुमाया जाता है, तो कुंडली से संबद्ध चुम्बकीय फ्लक्स समय के साथ साइनात्मक रूप से बदलता है। इस परिवर्तन के कारण कुंडली में प्रत्यावर्ती विद्युत वाहक बल उत्पन्न होता है।
यह वाहक बल कभी धनात्मक, कभी ऋणात्मक मान ग्रहण करता है। फलस्वरूप, परिपथ में प्रवाहित धारा भी उसी आवृत्ति से अपनी दिशा बदलती रहती है।
इस तरंगाकार निरूपण में विद्युत धारा या विभव समय के साथ धनात्मक और ऋणात्मक मानों के बीच दोलन करता हुआ दिखाई देता है। यही प्रत्यावर्ती धारा का मौलिक स्वरूप है।
आवर्तकाल और आवृत्ति
प्रत्यावर्ती धारा की एक पूर्ण अवस्था धनात्मक अधिकतम मान से ऋणात्मक अधिकतम मान तक जाकर पुनः उसी अवस्था में लौट आती है। इस पूर्ण प्रक्रिया में लगने वाला समय आवर्तकाल कहलाता है।
एक सेकंड में जितनी बार यह प्रक्रिया पूर्ण होती है, उसे आवृत्ति कहा जाता है। विद्युत आपूर्ति प्रणालियों में प्रयुक्त प्रत्यावर्ती धारा की आवृत्ति स्थिर और मानकीकृत होती है, जिससे उपकरणों का समान रूप से संचालन संभव हो पाता है।
तत्क्षणिक मान की अवधारणा
प्रत्यावर्ती धारा का कोई स्थायी मान नहीं होता। किसी भी क्षण धारा या विभव का जो मान होता है, वह तत्क्षणिक मान कहलाता है। यह मान समय के साथ निरंतर बदलता रहता है।
इस कारण, प्रत्यावर्ती प्रणालियों के अध्ययन में औसत मान, प्रभावी मान और अधिकतम मान जैसी अवधारणाओं का विकास किया गया, ताकि व्यावहारिक गणनाएँ सुविधाजनक हो सकें।
औसत और प्रभावी मान की आवश्यकता
प्रत्यावर्ती धारा का तत्क्षणिक मान समय के साथ निरंतर बदलता रहता है। इस परिवर्तनशीलता के कारण व्यावहारिक गणनाओं में केवल तत्क्षणिक मान का प्रयोग उपयुक्त नहीं होता। इसी समस्या के समाधान के लिए औसत मान और प्रभावी मान जैसी अवधारणाएँ विकसित की गईं।
औसत मान प्रत्यावर्ती धारा या विभव के एक अर्द्ध-चक्र के दौरान उसके तत्क्षणिक मानों का साधारण औसत होता है। यह मान धारा की दिशा की उपेक्षा करता है और उसके परिमाण का एक प्रतिनिधि मान प्रदान करता है।
प्रभावी मान प्रत्यावर्ती धारा का सबसे महत्वपूर्ण व्यावहारिक मान है। इसे इस प्रकार परिभाषित किया जाता है कि यह वही ऊष्मीय प्रभाव उत्पन्न करे जो समान परिमाण की दिष्ट धारा उसी प्रतिरोध में उत्पन्न करती है।
प्रभावी मान का भौतिक अर्थ
जब किसी प्रतिरोध में प्रत्यावर्ती धारा प्रवाहित होती है, तो उसमें उत्पन्न ऊष्मा धारा के वर्ग के समानुपाती होती है। इस कारण, प्रभावी मान को ऊर्जा की दृष्टि से प्रत्यावर्ती धारा का वास्तविक मान माना जाता है।
यही कारण है कि विद्युत उपकरणों पर दर्शाया गया वोल्टेज या करंट मान प्रभावी मान होता है, न कि अधिकतम या तत्क्षणिक मान। इससे उपकरणों का सुरक्षित और मानकीकृत संचालन सुनिश्चित होता है।
इस चित्र में प्रत्यावर्ती तरंग के साथ एक क्षैतिज रेखा द्वारा प्रभावी मान को दर्शाया गया है। यह रेखा उस दिष्ट मान का प्रतिनिधित्व करती है जो समान ऊष्मीय प्रभाव उत्पन्न करता है।
शुद्ध प्रतिरोध में प्रत्यावर्ती धारा
जब प्रत्यावर्ती विद्युत वाहक बल केवल प्रतिरोध वाले परिपथ में लगाया जाता है, तो धारा का मान विभव के साथ सीधे अनुपात में बदलता है। इस स्थिति में धारा और विभव एक ही चरण (phase) में होते हैं।
इसका अर्थ यह है कि जब विभव अधिकतम होता है, तो धारा भी अधिकतम होती है, और जब विभव शून्य होता है, तो धारा भी शून्य होती है। कोई चरणांतर उत्पन्न नहीं होता।
यह व्यवहार दिष्ट धारा के समान प्रतीत होता है, अंतर केवल इतना है कि यह परिवर्तनशील रूप में घटित होता है।
चरण (Phase) की अवधारणा
प्रत्यावर्ती प्रणालियों में चरण एक अत्यंत महत्वपूर्ण अवधारणा है। यह किसी दोलनशील राशि की क्षणिक स्थिति को उसके पूर्ण चक्र के सापेक्ष निर्धारित करता है।
यदि दो राशियाँ एक ही समय पर अपने अधिकतम और न्यूनतम मान प्राप्त करती हैं, तो वे एक ही चरण में कही जाती हैं। यदि उनके अधिकतम मान भिन्न समय पर प्राप्त हों, तो उनके बीच चरणांतर होता है।
चरण की यह अवधारणा प्रेरकत्व और धारिता युक्त परिपथों में और अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है, जहाँ धारा और विभव एक-दूसरे से सदैव एक ही चरण में नहीं रहते।
प्रेरकत्व युक्त परिपथ में प्रत्यावर्ती धारा
जब किसी प्रत्यावर्ती विद्युत स्रोत को केवल प्रेरकत्व वाली कुंडली से जोड़ा जाता है, तो परिपथ का व्यवहार शुद्ध प्रतिरोध से भिन्न हो जाता है। यहाँ धारा का परिवर्तन कुंडली में उत्पन्न चुम्बकीय प्रभाव से सीधे प्रभावित होता है।
प्रत्यावर्ती विभव के बढ़ने पर कुंडली में धारा बढ़ने का प्रयास करती है, परंतु आत्म-प्रेरण के कारण उस वृद्धि का विरोध होता है। इसी प्रकार, विभव घटने पर धारा घटने का विरोध किया जाता है। इस कारण, धारा का परिवर्तन विभव के परिवर्तन से पीछे रह जाता है।
इस स्थिति में धारा और विभव के बीच एक निश्चित चरणांतर उत्पन्न होता है, जहाँ धारा विभव से पीछे (lag) रहती है। यह चरणांतर प्रत्यावर्ती प्रणालियों की मूलभूत विशेषताओं में से एक है।
चित्र में विभव और धारा की तरंगें स्पष्ट रूप से चरणांतर के साथ प्रदर्शित हैं। धारा की तरंग विभव की तुलना में देर से अधिकतम मान प्राप्त करती है।
धारिता युक्त परिपथ में प्रत्यावर्ती धारा
जब प्रत्यावर्ती विद्युत स्रोत केवल धारिता से जुड़े परिपथ पर लगाया जाता है, तो धारा का व्यवहार प्रेरकत्व युक्त परिपथ के उलट स्वरूप में दिखाई देता है।
धारिता में विभव परिवर्तन होते ही आवेशों का संचय या विसर्जन तत्काल आरंभ हो जाता है। इस कारण, धारा का मान विभव के अधिकतम होने से पहले अधिकतम हो जाता है।
इस स्थिति में धारा, विभव से आगे (lead) रहती है। यह अग्रता धारिता युक्त परिपथ की विशिष्ट पहचान है।
इस निरूपण में धारा की तरंग विभव की तुलना में पहले अधिकतम मान प्राप्त करती है। यह अग्रता धारिता के भौतिक गुणों से उत्पन्न होती है।
प्रेरकत्व और धारिता की तुलनात्मक भूमिका
प्रेरकत्व और धारिता प्रत्यावर्ती परिपथों में धारा के परिवर्तन के प्रति विपरीत प्रतिक्रिया प्रस्तुत करते हैं। जहाँ प्रेरकत्व धारा के परिवर्तन का विरोध करता है, वहीं धारिता विभव परिवर्तन पर तत्काल प्रतिक्रिया देती है।
इसी कारण, इन दोनों तत्वों की उपस्थिति प्रत्यावर्ती परिपथों को समृद्ध और नियंत्रित व्यवहार प्रदान करती है। यही व्यवहार आधुनिक विद्युत और इलेक्ट्रॉनिक प्रणालियों की आधारशिला है।
संयुक्त R–L–C परिपथ में प्रत्यावर्ती धारा
वास्तविक विद्युत परिपथ अक्सर केवल प्रतिरोध, केवल प्रेरकत्व या केवल धारिता तक सीमित नहीं होते। अधिकांश स्थितियों में ये तीनों तत्व एक ही परिपथ में किसी न किसी अनुपात में उपस्थित रहते हैं। ऐसे परिपथ को संयुक्त R–L–C परिपथ कहा जाता है।
इस परिपथ में धारा का व्यवहार तीनों तत्वों के संयुक्त प्रभाव से निर्धारित होता है। प्रतिरोध ऊर्जा को ऊष्मा के रूप में नष्ट करता है, प्रेरकत्व धारा परिवर्तन का विरोध करता है, और धारिता विभव परिवर्तन पर त्वरित प्रतिक्रिया देती है। इन तीनों की पारस्परिक क्रिया धारा के परिमाण और चरण को निर्धारित करती है।
इम्पीडेन्स की अवधारणा
संयुक्त परिपथ में केवल प्रतिरोध की अवधारणा पर्याप्त नहीं होती। यहाँ एक ऐसी राशि की आवश्यकता होती है जो धारा के प्रति परिपथ के कुल विरोध को दर्शा सके। इस राशि को इम्पीडेन्स कहा जाता है।
इम्पीडेन्स प्रतिरोध, प्रेरक प्रतिक्रियात्मकता और धारिता प्रतिक्रियात्मकता तीनों के संयुक्त प्रभाव का परिणाम है। यह परिमाण प्रत्यावर्ती धारा के परिपथों में ओम के नियम के सामान्यीकृत रूप को लागू करने की अनुमति देता है।
इम्पीडेन्स की उपस्थिति में धारा का मान केवल विभव पर निर्भर नहीं करता, बल्कि आवृत्ति पर भी निर्भर करता है। इसी कारण, प्रत्यावर्ती परिपथों का व्यवहार आवृत्ति के साथ बदलता रहता है।
अनुनाद की अवस्था
संयुक्त R–L–C परिपथ में एक विशेष स्थिति तब उत्पन्न होती है जब प्रेरक प्रतिक्रियात्मकता और धारिता प्रतिक्रियात्मकता परिमाण में समान हो जाती हैं। इस अवस्था को अनुनाद कहा जाता है।
अनुनाद की स्थिति में प्रेरकत्व और धारिता के प्रभाव एक-दूसरे को संतुलित कर देते हैं। फलस्वरूप, परिपथ का कुल विरोध केवल प्रतिरोध के बराबर रह जाता है। इस स्थिति में धारा का मान अधिकतम हो जाता है।
अनुनाद का यह गुण प्रत्यावर्ती प्रणालियों में अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह आवृत्ति चयन, संकेत संवर्धन और ऊर्जा संचरण जैसे अनेक अनुप्रयोगों का आधार बनता है।
इस ग्राफ़ में धारा का परिमाण आवृत्ति के साथ बदलता हुआ दिखाया गया है। अनुनाद आवृत्ति पर धारा अधिकतम होती है, जो इस अवस्था की विशेष पहचान है।
प्रत्यावर्ती धारा में शक्ति
प्रत्यावर्ती परिपथों में शक्ति की अवधारणा दिष्ट धारा से भिन्न होती है। यहाँ विभव और धारा हमेशा एक ही चरण में नहीं होते, इस कारण तत्क्षणिक शक्ति समय के साथ बदलती रहती है।
औसत शक्ति विभव और धारा के प्रभावी मानों और उनके बीच के चरणांतर पर निर्भर करती है। यही कारण है कि सभी प्रत्यावर्ती परिपथ समान ऊर्जा उपभोग नहीं करते, भले ही उनमें धारा का परिमाण समान हो।
पावर फैक्टर का महत्व
पावर फैक्टर प्रत्यावर्ती परिपथ की दक्षता का एक महत्वपूर्ण माप है। यह दर्शाता है कि परिपथ में प्रवाहित शक्ति का कितना भाग वास्तव में उपयोगी कार्य में परिवर्तित हो रहा है।
यदि धारा और विभव एक ही चरण में हों, तो पावर फैक्टर अधिकतम होता है। चरणांतर बढ़ने पर पावर फैक्टर घटता जाता है, जिससे ऊर्जा की प्रभावी उपयोगिता कम हो जाती है।
इसी कारण, औद्योगिक प्रणालियों में पावर फैक्टर सुधार एक आवश्यक प्रक्रिया मानी जाती है। यह ऊर्जा हानि को कम करता है और विद्युत प्रणालियों की कुल दक्षता को बढ़ाता है।
दैनिक जीवन एवं परिवेश में प्रत्यावर्ती धारा
प्रत्यावर्ती धारा का प्रभाव दैनिक जीवन के लगभग हर विद्युत अनुभव में विद्यमान है। घरों में प्रयुक्त विद्युत आपूर्ति, पंखे, रेफ्रिजरेटर, एयर-कंडीशनर, वॉशिंग मशीन और प्रकाश उपकरण सभी प्रत्यावर्ती प्रणालियों पर आधारित हैं। इन उपकरणों में ऊर्जा का रूपांतरण और नियंत्रण प्रत्यावर्ती धारा के गुणों के कारण सुरक्षित और कुशल रूप से संभव हो पाता है।
लंबी दूरी तक विद्युत ऊर्जा के संचरण में प्रत्यावर्ती धारा का उपयोग विशेष रूप से लाभकारी है। उच्च वोल्टता पर ऊर्जा को कम धारा के साथ भेजा जा सकता है, जिससे संचरण हानि न्यूनतम होती है। यह सुविधा ट्रांसफॉर्मर के माध्यम से केवल प्रत्यावर्ती प्रणालियों में ही संभव है।
इलेक्ट्रॉनिक संचार प्रणालियों में संकेतों का वहन, रेडियो तरंगों का प्रसारण, और आधुनिक डिजिटल प्रणालियाँ प्रत्यावर्ती सिद्धांतों पर आधारित तरंगात्मक व्यवहार का ही विस्तार हैं। इस प्रकार, प्रत्यावर्ती धारा आधुनिक तकनीकी सभ्यता का एक अनिवार्य आधार बन चुकी है।
समेकित बोध
प्रत्यावर्ती धारा का अध्ययन यह स्पष्ट करता है कि विद्युत परिपथों का व्यवहार केवल प्रतिरोध तक सीमित नहीं, बल्कि प्रेरकत्व और धारिता जैसे तत्वों से गहराई से प्रभावित होता है। औसत और प्रभावी मान, चरणांतर, इम्पीडेन्स, अनुनाद और पावर फैक्टर इन प्रणालियों की समग्र समझ प्रदान करते हैं।
संयुक्त R–L–C परिपथों में धारा का व्यवहार आवृत्ति पर निर्भर हो जाता है, जिससे प्रत्यावर्ती प्रणालियाँ नियंत्रण और चयन की दृष्टि से अत्यंत समृद्ध बनती हैं। इसी कारण, प्रत्यावर्ती धारा केवल ऊर्जा आपूर्ति का माध्यम नहीं, बल्कि आधुनिक विद्युत विज्ञान की एक केंद्रीय अवधारणा है।
संक्षिप्त नोट्स
- प्रत्यावर्ती धारा समय के साथ दिशा और परिमाण बदलती है।
- आवृत्ति एक सेकंड में पूर्ण चक्रों की संख्या दर्शाती है।
- प्रभावी मान वही ऊष्मीय प्रभाव देता है जो दिष्ट धारा देती है।
- प्रेरकत्व में धारा विभव से पीछे रहती है, धारिता में आगे रहती है।
- संयुक्त R–L–C परिपथ में कुल विरोध को इम्पीडेन्स कहते हैं।
- अनुनाद पर धारा अधिकतम और इम्पीडेन्स न्यूनतम होती है।
- पावर फैक्टर परिपथ की ऊर्जा दक्षता दर्शाता है।
संबंधित प्रयोग (संक्षेप में)
- प्रत्यावर्ती स्रोत–प्रतिरोध प्रयोग: प्रतिरोध में AC प्रवाहित कर धारा और विभव की समान चरण स्थिति का अध्ययन।
- प्रेरकत्व युक्त परिपथ प्रयोग: AC स्रोत के साथ कुंडली जोड़कर धारा के पीछे रहने का अवलोकन।
- R–L–C परिपथ प्रयोग: आवृत्ति बदलकर अनुनाद अवस्था में धारा के अधिकतम मान का अध्ययन।
प्रसिद्ध वैज्ञानिक और उनका योगदान
- निकोल टेस्ला: प्रत्यावर्ती धारा प्रणालियों का व्यावहारिक विकास, बहु-चरणीय AC प्रणाली की स्थापना।
- जॉर्ज वेस्टिंगहाउस: प्रत्यावर्ती धारा के औद्योगिक और व्यावसायिक उपयोग को बढ़ावा दिया।
- जेम्स क्लर्क मैक्सवेल: विद्युत-चुम्बकीय तरंग सिद्धांत, जिससे प्रत्यावर्ती घटनाओं की गहरी सैद्धांतिक समझ संभव हुई।
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शैक्षणिक मार्गदर्शन
इस अध्याय की अवधारणात्मक संरचना स्व-अध्ययन को केंद्र में रखते हुए शैक्षणिक स्पष्टता और परीक्षा-दृष्टि के संतुलन के साथ विकसित की गई है।
- सुरेंद्र सिंह चौहान
- कार्तिकेय खत्री
अस्वीकरण
यह अध्ययन सामग्री शैक्षणिक उद्देश्य से तैयार की गई है। परीक्षा में अंतिम उत्तर लेखन हेतु राजस्थान माध्यमिक शिक्षा बोर्ड द्वारा निर्धारित पाठ्यपुस्तक एवं आधिकारिक पाठ्यक्रम निर्देशों का अध्ययन अनिवार्य है।
संदर्भ
- राजस्थान माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (RBSE) – भौतिक विज्ञान पाठ्यक्रम
- राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (NCERT) – कक्षा 12 भौतिक विज्ञान
- National Digital Library of India (NDLI)
- National Repository of Open Educational Resources (NROER)


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