RBSE Class 12 Chemistry – Electrochemistry
राजस्थान माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (RBSE) | कक्षा 12 | रसायन विज्ञान
Electrochemistry भौतिक रसायन का वह महत्वपूर्ण अध्याय है जो रासायनिक ऊर्जा और विद्युत ऊर्जा के पारस्परिक रूपांतरण का अध्ययन करता है। यह अध्याय केवल प्रयोगशाला तक सीमित नहीं है, बल्कि आधुनिक उद्योग, ऊर्जा उत्पादन, बैटरियों, इलेक्ट्रोप्लेटिंग तथा जैव-रासायनिक प्रक्रियाओं का आधार भी है।
यह इकाई विलयन, आयन, विद्युत प्रवाह और ऊर्जा परिवर्तन के बीच के गहरे संबंधों को स्पष्ट करती है। इस अध्याय की अवधारणाएँ समझ लेने पर विद्यार्थी रसायन विज्ञान के अनेक जटिल अनुप्रयोगों को सरलता से समझ सकता है।
अध्ययन का उद्देश्य एवं महत्व
इलेक्ट्रोरसायन का अध्ययन इस बात को स्पष्ट करता है कि किस प्रकार रासायनिक अभिक्रियाएँ विद्युत धारा उत्पन्न कर सकती हैं और किस प्रकार विद्युत धारा द्वारा रासायनिक परिवर्तन कराए जा सकते हैं।
यह अध्याय विशेष रूप से निम्न कारणों से महत्वपूर्ण है:
- बैटरियों और ईंधन कोशिकाओं की कार्यप्रणाली को समझने के लिए
- संक्षारण (corrosion) जैसी समस्याओं के समाधान हेतु
- इलेक्ट्रोलाइसिस और विद्युत अपघटन की अवधारणा के लिए
- ऊर्जा संरक्षण एवं वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों की समझ के लिए
परीक्षा परिप्रेक्ष्य (RBSE Exam Context)
RBSE बोर्ड परीक्षा में यह अध्याय अत्यंत महत्वपूर्ण एवं स्कोरिंग माना जाता है। इससे सामान्यतः संख्यात्मक प्रश्न, अवधारणा आधारित प्रश्न तथा अनुप्रयोगात्मक प्रश्न पूछे जाते हैं।
यह अध्याय विशेष रूप से उन विद्यार्थियों के लिए निर्णायक होता है जो भौतिक रसायन में उच्च अंक प्राप्त करना चाहते हैं।
अध्ययन की प्रकृति
इलेक्ट्रोरसायन को सामान्यतः मध्यम से कठिन श्रेणी का अध्याय माना जाता है, क्योंकि इसमें अवधारणाओं के साथ-साथ सूत्रों और गणनाओं का संतुलित प्रयोग आवश्यक होता है।
इस अध्याय में सफलता के लिए सूत्रों को रटने के बजाय उनके पीछे के सिद्धांतों को समझना अधिक आवश्यक है।
इस अध्याय में सम्मिलित प्रमुख विषय
- विद्युत चालकता और प्रतिरोध
- इलेक्ट्रोलाइटिक एवं धात्विक चालकता
- कोशिका विभव एवं इलेक्ट्रोड विभव
- गैल्वैनिक एवं इलेक्ट्रोलाइटिक कोशिकाएँ
- नर्न्स्ट समीकरण
- बैटरियाँ और ईंधन कोशिकाएँ
- संक्षारण और उसका नियंत्रण
इन विषयों का अध्ययन क्रमिक रूप से किया जाएगा, जिससे अवधारणाओं के बीच स्वाभाविक निरंतरता बनी रहे और गणनात्मक पक्ष भी स्पष्ट होता जाए।
विद्युत चालकता (Electrical Conductance)
जब किसी पदार्थ से होकर विद्युत धारा प्रवाहित होती है, तो उस पदार्थ की यह क्षमता विद्युत चालकता कहलाती है। इलेक्ट्रोरसायन में चालकता का अध्ययन इलेक्ट्रोलाइटिक विलयनों के व्यवहार को समझने का मूल आधार प्रदान करता है।
विद्युत चालकता का मान विलेय की प्रकृति, सांद्रता, तापमान तथा विलायक के गुणों पर निर्भर करता है।
प्रतिरोध और चालकता का संबंध
किसी चालक द्वारा विद्युत धारा के प्रवाह में उत्पन्न अवरोध को प्रतिरोध कहा जाता है। प्रतिरोध का व्युत्क्रम चालकता कहलाता है।
G = 1 / R
यहाँ G चालकता तथा R प्रतिरोध को दर्शाता है।
विशिष्ट चालकता (Specific Conductance / Conductivity)
किसी विलयन की वह चालकता जो 1 सेमी लंबाई और 1 सेमी² अनुप्रस्थ क्षेत्रफल वाले घन के लिए परिभाषित की जाती है, विशिष्ट चालकता कहलाती है।
इसे सामान्यतः κ (कप्पा) द्वारा दर्शाया जाता है।
κ = (1 / R) × (l / A)
जहाँ l चालक की लंबाई और A उसका अनुप्रस्थ क्षेत्रफल है।
विशिष्ट चालकता की SI इकाई S m−1 होती है।
मोलर चालकता (Molar Conductance)
किसी विलयन की वह चालकता जो एक मोल इलेक्ट्रोलाइट द्वारा उत्पन्न की जाती है, मोलर चालकता कहलाती है।
इसे Λm द्वारा दर्शाया जाता है।
Λm = κ × (1000 / C)
जहाँ C विलयन की मोलरता है।
मोलर चालकता का मान विलयन के पतला होने पर बढ़ता जाता है।
समतुल्य चालकता (Equivalent Conductance)
समतुल्य चालकता उस चालकता को कहते हैं जो एक ग्राम-समतुल्य इलेक्ट्रोलाइट द्वारा उत्पन्न की जाती है।
यद्यपि आधुनिक पाठ्यक्रम में मोलर चालकता को अधिक प्राथमिकता दी जाती है, फिर भी समतुल्य चालकता की अवधारणा ऐतिहासिक और वैचारिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है।
पतलीकरण का प्रभाव
जब किसी इलेक्ट्रोलाइटिक विलयन को पतला किया जाता है, तो उसमें आयनों की गतिशीलता बढ़ जाती है, जिसके कारण मोलर चालकता में वृद्धि होती है।
मजबूत इलेक्ट्रोलाइटों में यह वृद्धि धीरे-धीरे होती है, जबकि कमजोर इलेक्ट्रोलाइटों में विघटन की मात्रा बढ़ने के कारण मोलर चालकता में तीव्र वृद्धि देखी जाती है।
विशिष्ट चालकता पतलीकरण पर घटती है, जबकि मोलर चालकता बढ़ती है। यह अंतर परीक्षा में अक्सर भ्रम का कारण बनता है।
मजबूत एवं कमजोर इलेक्ट्रोलाइट
वे इलेक्ट्रोलाइट जो जलीय विलयन में लगभग पूर्णतः आयनित हो जाते हैं, मजबूत इलेक्ट्रोलाइट कहलाते हैं, जबकि जो आंशिक रूप से आयनित होते हैं, कमजोर इलेक्ट्रोलाइट कहलाते हैं।
- मजबूत इलेक्ट्रोलाइट: HCl, NaCl, KOH
- कमजोर इलेक्ट्रोलाइट: CH3COOH, NH4OH
मजबूत इलेक्ट्रोलाइटों में आयनों की संख्या पहले से अधिक होने के कारण पतलीकरण पर चालकता में परिवर्तन अपेक्षाकृत कम होता है, जबकि कमजोर इलेक्ट्रोलाइटों में पतलीकरण से आयनीकरण बढ़ने के कारण मोलर चालकता में तीव्र वृद्धि होती है।
सीमांत मोलर चालकता (Limiting Molar Conductance)
अत्यधिक पतले विलयन में जब इलेक्ट्रोलाइट का आयनीकरण लगभग पूर्ण हो जाता है, तो प्राप्त मोलर चालकता को सीमांत मोलर चालकता कहा जाता है।
इसे Λm0 द्वारा दर्शाया जाता है।
इस अवस्था में आयनों के बीच पारस्परिक प्रभाव नगण्य हो जाते हैं और प्रत्येक आयन स्वतंत्र रूप से गति करता है।
कोहलरॉश का नियम (Kohlrausch’s Law)
कोहलरॉश के नियम के अनुसार, किसी इलेक्ट्रोलाइट की सीमांत मोलर चालकता उसके घटक आयनों की सीमांत चालकताओं के योग के बराबर होती है।
Λm0 = λ0+ + λ0−
यह नियम कमजोर इलेक्ट्रोलाइटों की सीमांत मोलर चालकता ज्ञात करने में विशेष रूप से उपयोगी है, जहाँ प्रत्यक्ष मापन संभव नहीं होता।
कोहलरॉश के नियम का प्रयोग कमजोर अम्लों और क्षारों के विघटन स्थिरांक निर्धारण में किया जाता है।
इलेक्ट्रोकेमिकल कोशिका (Electrochemical Cell)
ऐसी प्रणाली जिसमें रासायनिक अभिक्रिया द्वारा विद्युत ऊर्जा उत्पन्न होती है, इलेक्ट्रोकेमिकल कोशिका कहलाती है।
इन कोशिकाओं में ऑक्सीकरण और अपचयन दोनों अभिक्रियाएँ अलग-अलग इलेक्ट्रोडों पर घटित होती हैं।
- गैल्वैनिक (या वोल्टाइक) कोशिका: रासायनिक ऊर्जा → विद्युत ऊर्जा
- इलेक्ट्रोलाइटिक कोशिका: विद्युत ऊर्जा → रासायनिक परिवर्तन
इलेक्ट्रोड विभव (Electrode Potential)
किसी इलेक्ट्रोड की वह प्रवृत्ति जिससे वह इलेक्ट्रॉनों को ग्रहण या त्याग करता है, इलेक्ट्रोड विभव कहलाती है।
इलेक्ट्रोड विभव को किसी एक मानक इलेक्ट्रोड के सापेक्ष मापा जाता है, जिसे मानक हाइड्रोजन इलेक्ट्रोड (SHE) कहा जाता है।
मानक परिस्थितियों में हाइड्रोजन इलेक्ट्रोड का विभव शून्य माना जाता है।
इलेक्ट्रोड विभव को कभी भी पृथक रूप से नहीं मापा जाता, बल्कि हमेशा किसी संदर्भ इलेक्ट्रोड के सापेक्ष ही मापा जाता है।
गैल्वैनिक कोशिका (Galvanic Cell)
गैल्वैनिक कोशिका वह इलेक्ट्रोकेमिकल कोशिका है जिसमें स्वस्फूर्त (spontaneous) रासायनिक अभिक्रिया द्वारा विद्युत ऊर्जा उत्पन्न होती है। इस प्रकार की कोशिका रासायनिक ऊर्जा को सीधे विद्युत ऊर्जा में रूपांतरित करती है।
गैल्वैनिक कोशिकाओं का अध्ययन बैटरियों, ऊर्जा भंडारण प्रणालियों तथा औद्योगिक विद्युत स्रोतों की मौलिक समझ प्रदान करता है।
डैनियल कोशिका (Daniell Cell)
डैनियल कोशिका गैल्वैनिक कोशिका का एक क्लासिक उदाहरण है, जिसमें जस्ता और ताँबा इलेक्ट्रोड के रूप में प्रयुक्त होते हैं।
इस कोशिका में जस्ता इलेक्ट्रोड का ऑक्सीकरण तथा ताँबा इलेक्ट्रोड पर अपचयन घटित होता है।
- एनोड (Anode): Zn → Zn2+ + 2e−
- कैथोड (Cathode): Cu2+ + 2e− → Cu
इलेक्ट्रॉनों का प्रवाह बाह्य परिपथ में जस्ता से ताँबा की ओर होता है, जिससे विद्युत धारा उत्पन्न होती है।
कोशिका विभव (Cell Potential)
गैल्वैनिक कोशिका द्वारा उत्पन्न विद्युत ऊर्जा की माप कोशिका विभव द्वारा की जाती है। इसे एनोड और कैथोड के इलेक्ट्रोड विभवों के अंतर के रूप में परिभाषित किया जाता है।
E0cell = E0cathode − E0anode
यदि कोशिका विभव का मान धनात्मक हो, तो अभिक्रिया स्वस्फूर्त मानी जाती है।
नर्न्स्ट समीकरण (Nernst Equation)
मानक परिस्थितियों के अतिरिक्त अन्य परिस्थितियों में कोशिका विभव ज्ञात करने के लिए नर्न्स्ट समीकरण का प्रयोग किया जाता है।
यह समीकरण यह दर्शाता है कि तापमान और सांद्रता में परिवर्तन कोशिका विभव को किस प्रकार प्रभावित करता है।
E = E0 − (0.0591 / n) log Q
यहाँ n स्थानांतरित इलेक्ट्रॉनों की संख्या तथा Q अभिक्रिया भागफल को दर्शाता है।
गिब्स मुक्त ऊर्जा और कोशिका विभव
गैल्वैनिक कोशिका की स्वस्फूर्तता को गिब्स मुक्त ऊर्जा से भी जोड़ा जा सकता है। कोशिका विभव और मुक्त ऊर्जा परिवर्तन के बीच निम्न संबंध होता है:
ΔG = −nFE
ऋणात्मक ΔG अभिक्रिया की स्वस्फूर्तता का संकेत देता है।
नर्न्स्ट समीकरण, कोशिका विभव और गिब्स मुक्त ऊर्जा तीनों मिलकर यह स्पष्ट करते हैं कि कौन-सी रासायनिक अभिक्रिया विद्युत ऊर्जा उत्पन्न कर सकती है और किन परिस्थितियों में।
इलेक्ट्रोलाइटिक कोशिका (Electrolytic Cell)
इलेक्ट्रोलाइटिक कोशिका वह प्रणाली है जिसमें बाह्य विद्युत ऊर्जा की सहायता से गैर-स्वस्फूर्त (non-spontaneous) रासायनिक अभिक्रिया कराई जाती है। इसमें विद्युत ऊर्जा को रासायनिक ऊर्जा में परिवर्तित किया जाता है।
इलेक्ट्रोलाइटिक कोशिकाएँ धातु परिष्करण, विद्युत लेपन, तथा रासायनिक उद्योगों में व्यापक रूप से प्रयुक्त होती हैं।
- एनोड: ऑक्सीकरण होता है
- कैथोड: अपचयन होता है
- ऊर्जा स्रोत: बाह्य बैटरी या विद्युत स्रोत
गैल्वैनिक एवं इलेक्ट्रोलाइटिक कोशिकाओं का तुलनात्मक अध्ययन
| गैल्वैनिक कोशिका | इलेक्ट्रोलाइटिक कोशिका |
|---|---|
| स्वस्फूर्त अभिक्रिया | अस्वस्फूर्त अभिक्रिया |
| रासायनिक ऊर्जा → विद्युत ऊर्जा | विद्युत ऊर्जा → रासायनिक ऊर्जा |
| बाह्य स्रोत की आवश्यकता नहीं | बाह्य विद्युत स्रोत आवश्यक |
| बैटरियों का आधार | इलेक्ट्रोप्लेटिंग का आधार |
फैराडे के विद्युत अपघटन के नियम
माइकल फैराडे ने विद्युत अपघटन के दौरान इलेक्ट्रोड पर निक्षेपित या मुक्त पदार्थ और प्रवाहित विद्युत आवेश के बीच मात्रात्मक संबंध स्थापित किया।
प्रथम नियम
इलेक्ट्रोड पर मुक्त या निक्षेपित पदार्थ का द्रव्यमान प्रवाहित विद्युत आवेश के समानुपाती होता है।
m ∝ Q ⇒ m = ZQ
द्वितीय नियम
यदि समान विद्युत आवेश विभिन्न इलेक्ट्रोलाइटों से प्रवाहित किया जाए, तो मुक्त पदार्थों के द्रव्यमान उनके रासायनिक तुल्यांकों के समानुपाती होते हैं।
बैटरियाँ (Batteries)
बैटरियाँ अनेक गैल्वैनिक कोशिकाओं का व्यावहारिक रूप हैं जो विद्युत ऊर्जा का सतत स्रोत प्रदान करती हैं।
- प्राथमिक बैटरी: पुनः चार्ज नहीं की जा सकती (ड्राई सेल)
- द्वितीयक बैटरी: पुनः चार्ज योग्य (लेड-एसिड, लिथियम-आयन)
लेड-एसिड बैटरी ऑटोमोबाइल उद्योग की आधारशिला मानी जाती है।
ईंधन कोशिका (Fuel Cell)
ईंधन कोशिका ऐसी विद्युत-रासायनिक प्रणाली है जिसमें ईंधन और ऑक्सीकारक निरंतर आपूर्ति के साथ विद्युत ऊर्जा उत्पन्न करते हैं।
हाइड्रोजन-ऑक्सीजन ईंधन कोशिका पर्यावरण-अनुकूल ऊर्जा स्रोत के रूप में विशेष महत्व रखती है।
2H2 + O2 → 2H2O + ऊर्जा
संक्षारण (Corrosion)
संक्षारण वह प्रक्रिया है जिसमें धातु वातावरण के प्रभाव से धीरे-धीरे नष्ट होती है। यह भी एक इलेक्ट्रोकेमिकल प्रक्रिया है।
- लोहा → जंग (Rusting)
- विद्युत रासायनिक अपघटन
- भारी आर्थिक हानि
संक्षारण की रोकथाम विद्युत लेपन, कैथोडिक संरक्षण तथा मिश्रधातुओं द्वारा की जाती है।
इलेक्ट्रोकेमिस्ट्री ऊर्जा उत्पादन, उद्योग, पर्यावरण संरक्षण और आधुनिक तकनीक के बीच सेतु का कार्य करती है।
दैनिक जीवन एवं उद्योग में इलेक्ट्रोकेमिस्ट्री
इलेक्ट्रोकेमिस्ट्री केवल प्रयोगशाला तक सीमित नहीं है। आधुनिक जीवन के अनेक उपकरण और औद्योगिक प्रक्रियाएँ इसी सिद्धांत पर आधारित हैं।
- मोबाइल फोन, लैपटॉप एवं इलेक्ट्रिक वाहन — बैटरियों पर आधारित
- धातु शुद्धिकरण — विद्युत अपघटन द्वारा
- इलेक्ट्रोप्लेटिंग — आभूषण, ऑटोमोबाइल एवं मशीन उद्योग
- संक्षारण नियंत्रण — पुल, पाइपलाइन, जहाज
इस प्रकार इलेक्ट्रोकेमिस्ट्री ऊर्जा, सुरक्षा एवं स्थायित्व से सीधे जुड़ा हुआ विषय है।
दृश्य समेकन (Visual Consolidation)
यह दृश्य तीन प्रमुख विद्युत-रासायनिक प्रणालियों को एक ही फ्रेम में जोड़ता है — जहाँ ऊर्जा रूपांतरण के भिन्न-भिन्न तरीके स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं।
काल्पनिक प्रश्न–उत्तर ⭐
प्रश्न: क्या सभी बैटरियाँ रिचार्ज की जा सकती हैं?
उत्तर: नहीं। केवल वे बैटरियाँ जिनमें अभिक्रिया प्रत्यावर्ती होती है द्वितीयक बैटरी कहलाती हैं और पुनः चार्ज की जा सकती हैं।
प्रश्न: जंग लगना क्यों एक विद्युत-रासायनिक प्रक्रिया है?
उत्तर: क्योंकि इसमें ऑक्सीकरण एवं अपचयन सूक्ष्म कोशिकाओं के रूप में एक साथ होते हैं।
उच्च स्तरीय प्रश्न (UPSC / बोर्ड दृष्टिकोण)
- ईंधन कोशिकाओं को भविष्य की ऊर्जा क्यों कहा जाता है?
- संक्षारण की इलेक्ट्रोकेमिकल व्याख्या दीजिए
- फैराडे के नियमों का औद्योगिक महत्व समझाइए
वैज्ञानिक योगदान एवं भविष्य की दिशा
फैराडे, वोल्टा एवं नर्न्स्ट ने इलेक्ट्रोकेमिस्ट्री को मात्रात्मक विज्ञान का स्वरूप दिया। आज यही सिद्धांत ग्रीन एनर्जी, हाइड्रोजन अर्थव्यवस्था और उन्नत बैटरी तकनीक का आधार हैं।
भविष्य की चुनौती अधिक दक्ष, सुरक्षित एवं पर्यावरण-अनुकूल ऊर्जा भंडारण प्रणालियाँ विकसित करना है।
संक्षिप्त पुनरावलोकन (Quick Notes)
- ऑक्सीकरण हमेशा एनोड पर
- अपचयन हमेशा कैथोड पर
- Faraday = विद्युत अपघटन का आधार
- बैटरियाँ = व्यावहारिक गैल्वैनिक कोशिकाएँ
- संक्षारण = अवांछित इलेक्ट्रोकेमिकल प्रक्रिया
RBSE Class 12 Physics – NCERT Classes
Marwari Mission 100™


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