RBSE Class 12 Physics – विद्युत-चुम्बकीय प्रेरण (Electromagnetic Induction) | Complete Concept Guide 2026

📅 Monday, 12 January 2026 📖 3-5 min read

विद्युत-चुम्बकीय प्रेरण (Electromagnetic Induction)

भौतिक विज्ञान में विद्युत और चुम्बकत्व का संबंध केवल संयोग नहीं है, बल्कि यह प्रकृति की एक गहन और सार्वभौमिक व्यवस्था का परिणाम है। स्थिर आवेशों से उत्पन्न विद्युत प्रभाव, और गतिमान आवेशों से उत्पन्न चुम्बकीय प्रभाव, दोनों एक ही भौतिक वास्तविकता के विभिन्न रूप हैं। इसी निरंतरता को आगे बढ़ाते हुए विद्युत-चुम्बकीय प्रेरण का सिद्धांत सामने आता है, जहाँ परिवर्तित चुम्बकीय परिस्थितियाँ विद्युत प्रभावों को जन्म देती हैं।

यह अध्याय उस अवस्था का अध्ययन करता है जहाँ चुम्बकीय क्षेत्र केवल एक परिणाम नहीं रहता, बल्कि विद्युत ऊर्जा का स्रोत बन जाता है। आधुनिक विद्युत उत्पादन, विद्युत जनित्र, परिवर्तक (transformers) और ऊर्जा संचरण प्रणालियाँ इसी सिद्धांत पर आधारित हैं। इस कारण, विद्युत-चुम्बकीय प्रेरण सैद्धांतिक भौतिकी के साथ-साथ व्यावहारिक विज्ञान का भी आधार स्तंभ है।

चुम्बकीय परिवर्तन और विद्युत प्रभाव

यदि किसी चालक या कुंडली के आसपास चुम्बकीय क्षेत्र पूर्णतः स्थिर बना रहे, तो उसमें कोई विद्युत प्रभाव उत्पन्न नहीं होता। परंतु जैसे ही चुम्बकीय क्षेत्र की तीव्रता, दिशा या उस क्षेत्र से जुड़ी भौमिति में परिवर्तन होता है, वैसे ही चालक में विद्युत प्रभाव प्रकट होने लगते हैं।

यह परिवर्तन विभिन्न प्रकार से संभव है— चुम्बक को कुंडली के समीप लाने या दूर ले जाने से, कुंडली को चुम्बकीय क्षेत्र में घुमाने से, या उस धारा को बदलने से जो चुम्बकीय क्षेत्र उत्पन्न कर रही है। इन सभी परिस्थितियों में एक समान तथ्य उभरकर सामने आता है: परिवर्तन ही प्रेरण का मूल कारण है।

इसी परिवर्तन के परिणामस्वरूप चालक में एक ऐसी विद्युत अवस्था उत्पन्न होती है जो पहले वहाँ विद्यमान नहीं थी। इस अवस्था को प्रेरित विद्युत प्रभाव के रूप में समझा जाता है।

चुम्बकीय फ्लक्स की अवधारणा

चुम्बकीय प्रभावों को मात्र गुणात्मक रूप में समझना पर्याप्त नहीं है। इसके लिए एक ऐसी राशि की आवश्यकता होती है जो यह दर्शा सके कि किसी निश्चित क्षेत्रफल से कितना चुम्बकीय क्षेत्र गुजर रहा है। इसी आवश्यकता से चुम्बकीय फ्लक्स की अवधारणा जन्म लेती है।

किसी सतह से होकर गुजरने वाले चुम्बकीय क्षेत्र का समग्र माप चुम्बकीय फ्लक्स कहलाता है। यह न केवल क्षेत्र की तीव्रता पर निर्भर करता है, बल्कि उस सतह की अभिविन्यास (orientation) पर भी निर्भर करता है।

जब सतह चुम्बकीय क्षेत्र के लंबवत रखी जाती है, तो अधिकतम फ्लक्स प्राप्त होता है, और जब सतह क्षेत्र के समानांतर होती है, तो फ्लक्स शून्य हो जाता है। इस प्रकार, चुम्बकीय फ्लक्स क्षेत्र और ज्यामिति के संयुक्त प्रभाव का परिणाम है।

चुम्बकीय क्षेत्र रेखाएँ

इस दृश्य निरूपण में चुम्बकीय क्षेत्र रेखाएँ एक समतल सतह को भेदती हुई दिखाई देती हैं। यही स्थिति चुम्बकीय फ्लक्स की अधिकतम अवस्था को दर्शाती है। यदि यही सतह घुमाकर क्षेत्र के समानांतर कर दी जाए, तो इन रेखाओं का प्रभाव सतह पर समाप्त हो जाएगा।

इसी प्रकार के विश्लेषण से यह स्पष्ट होता है कि विद्युत-चुम्बकीय प्रेरण केवल क्षेत्र की उपस्थिति पर निर्भर नहीं करता, बल्कि क्षेत्र और सतह के आपसी संबंध पर निर्भर करता है।

प्रेरित विद्युत वाहक बल का स्वरूप

जब किसी परिपथ से जुड़ा चुम्बकीय फ्लक्स समय के साथ बदलता है, तो उस परिपथ में एक विद्युत प्रभाव उत्पन्न होता है। यह प्रभाव किसी बाहरी स्रोत से प्रदान नहीं किया जाता, बल्कि स्वयं चुम्बकीय परिवर्तन का परिणाम होता है। इस अवस्था में परिपथ के सिरों के बीच एक विशेष प्रकार का विद्युत वाहक बल उत्पन्न होता है, जिसे प्रेरित विद्युत वाहक बल कहा जाता है।

यह प्रेरित वाहक बल स्थिर विद्युत स्रोतों से भिन्न होता है। यह न तो रासायनिक क्रियाओं से उत्पन्न होता है और न ही किसी बाह्य बैटरी की आवश्यकता रखता है। इसका अस्तित्व पूरी तरह चुम्बकीय स्थिति में हो रहे परिवर्तन पर आधारित होता है।

यदि चुम्बकीय परिवर्तन को रोक दिया जाए, तो प्रेरित विद्युत प्रभाव भी समाप्त हो जाता है। इस तथ्य से यह स्पष्ट होता है कि विद्युत-चुम्बकीय प्रेरण एक गतिशील प्रक्रिया है, जो समय के साथ घटित होती है।

फैराडे के प्रायोगिक निष्कर्ष

चुम्बकीय परिवर्तन और विद्युत प्रभाव के बीच संबंध कई प्रयोगों के माध्यम से स्थापित किया गया। इन प्रयोगों में यह देखा गया कि जब भी किसी कुंडली से संबद्ध चुम्बकीय फ्लक्स में परिवर्तन होता है, तो उस कुंडली में विद्युत प्रभाव उत्पन्न होता है।

यह परिवर्तन चुम्बक को कुंडली के भीतर लाने या बाहर ले जाने से, कुंडली को चुम्बकीय क्षेत्र में घुमाने से, या क्षेत्र उत्पन्न करने वाली धारा को बदलने से समान रूप से संभव होता है। सभी परिस्थितियों में परिणाम एक ही रहा— परिवर्तन के साथ विद्युत प्रभाव उत्पन्न हुआ।

इन प्रायोगिक अवलोकनों से यह स्थापित हुआ कि प्रेरित विद्युत प्रभाव चुम्बकीय फ्लक्स के परिवर्तन से अटूट रूप से जुड़ा हुआ है।

फैराडे के नियमों का विकास

प्रयोगों के निष्कर्षों को सैद्धांतिक रूप देने के लिए फैराडे के नियम प्रतिपादित किए गए। ये नियम विद्युत-चुम्बकीय प्रेरण की मौलिक आधारशिला हैं।

पहला नियम यह स्पष्ट करता है कि जब भी किसी परिपथ से संबद्ध चुम्बकीय फ्लक्स में परिवर्तन होता है, तो उस परिपथ में प्रेरित विद्युत वाहक बल उत्पन्न होता है। यह नियम प्रेरण की अनिवार्यता को दर्शाता है।

दूसरा नियम यह बताता है कि उत्पन्न प्रेरित विद्युत वाहक बल का परिमाण चुम्बकीय फ्लक्स के परिवर्तन की दर पर निर्भर करता है। अर्थात्, जितनी तेजी से फ्लक्स बदलता है, उतना ही अधिक प्रेरित प्रभाव उत्पन्न होता है।

इस प्रकार, फैराडे के नियम गुणात्मक और परिमाणात्मक, दोनों स्तरों पर विद्युत-चुम्बकीय प्रेरण को स्पष्ट रूप में परिभाषित करते हैं।

कुंडली चुम्बक गति

इस निरूपण में एक चुम्बक को कुंडली की ओर बढ़ते हुए दिखाया गया है। जैसे-जैसे चुम्बक और कुंडली के बीच सापेक्ष स्थिति बदलती है, कुंडली से संबद्ध चुम्बकीय फ्लक्स बदलता है। यही परिवर्तन प्रेरित विद्युत प्रभाव का कारण बनता है।

यदि चुम्बक को स्थिर कर दिया जाए, तो कुंडली में कोई प्रेरित प्रभाव नहीं पाया जाता। यह तथ्य फैराडे के नियमों की मूल भावना को स्पष्ट करता है— परिवर्तन के बिना प्रेरण संभव नहीं।

प्रेरण की दिशा का प्रश्न

अब तक यह स्पष्ट हो चुका है कि चुम्बकीय फ्लक्स में परिवर्तन प्रेरित विद्युत प्रभाव उत्पन्न करता है। परंतु एक महत्वपूर्ण प्रश्न अभी शेष रहता है— इस प्रेरित प्रभाव की दिशा क्या होगी।

यह दिशा मनमानी नहीं होती, बल्कि एक निश्चित भौतिक सिद्धांत के अनुसार निर्धारित होती है। इस सिद्धांत की समझ विद्युत-चुम्बकीय प्रेरण को पूर्णता प्रदान करती है और उसे व्यावहारिक अनुप्रयोगों के योग्य बनाती है।

इसी प्रश्न का समाधान आगे चलकर लेन्ज के नियम के रूप में सामने आता है, जो प्रेरित धारा की दिशा को स्पष्ट रूप से परिभाषित करता है।

लेन्ज का नियम और दिशा का निर्धारण

प्रेरित विद्युत प्रभाव की दिशा किसी आकस्मिक या मनमाने नियम से निर्धारित नहीं होती। इसके पीछे एक गहन भौतिक तर्क निहित है, जो ऊर्जा संरक्षण के सिद्धांत से जुड़ा हुआ है। इसी तर्क को औपचारिक रूप देने वाला नियम लेन्ज का नियम कहलाता है।

लेन्ज का नियम यह प्रतिपादित करता है कि किसी परिपथ में उत्पन्न प्रेरित धारा की दिशा ऐसी होती है कि उसके द्वारा उत्पन्न चुम्बकीय प्रभाव उस परिवर्तन का विरोध करता है जिसके कारण वह प्रेरित हुई है। इस प्रकार, प्रेरण की प्रक्रिया स्वयं में परिवर्तन के प्रति एक प्रतिरोध उत्पन्न करती है।

यह विरोध किसी अवरोध के रूप में नहीं, बल्कि संतुलन स्थापित करने की प्रवृत्ति के रूप में प्रकट होता है। यदि यह विरोध उपस्थित न हो, तो ऊर्जा संरक्षण का सिद्धांत भंग हो जाएगा। अतः लेन्ज का नियम केवल दिशा-निर्धारण का साधन नहीं, बल्कि ऊर्जा संरक्षण की पुष्टि भी है।

कुंडली चुम्बक आगमन

इस निरूपण में चुम्बक के कुंडली की ओर बढ़ने से चुम्बकीय फ्लक्स बढ़ता हुआ दिखाया गया है। इस वृद्धि का विरोध करने के लिए कुंडली में ऐसी प्रेरित धारा उत्पन्न होती है जो अपने चुम्बकीय प्रभाव से आगमन का प्रतिरोध करती है।

यदि चुम्बक को कुंडली से दूर ले जाया जाए, तो फ्लक्स में कमी होती है और प्रेरित धारा की दिशा उस कमी का विरोध करने के लिए बदल जाती है। इस प्रकार, धारा की दिशा सदैव परिवर्तन के विपरीत होती है।

ऊर्जा संरक्षण के साथ सामंजस्य

लेन्ज के नियम का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष ऊर्जा संरक्षण के सिद्धांत के साथ उसका सामंजस्य है। जब किसी चुम्बक को कुंडली की ओर ले जाया जाता है, तो कुंडली में प्रेरित धारा चुम्बकीय प्रतिरोध उत्पन्न करती है। इस प्रतिरोध के विरुद्ध कार्य करना पड़ता है।

यही किया गया कार्य विद्युत ऊर्जा के रूप में परिपथ में प्रकट होता है। यदि प्रेरित धारा परिवर्तन का विरोध न करती, तो बिना किसी कार्य के ऊर्जा उत्पन्न हो जाती, जो भौतिकी के मूल सिद्धांतों के विपरीत है।

इस दृष्टि से, लेन्ज का नियम विद्युत-चुम्बकीय प्रेरण को ऊर्जा के सार्वभौमिक नियमों से अभिन्न रूप से जोड़ता है।

फैराडे के नियमों का गणितीय रूप

प्रायोगिक निष्कर्षों और दिशात्मक सिद्धांतों को गणितीय रूप प्रदान करने पर विद्युत-चुम्बकीय प्रेरण का एक सुस्पष्ट समीकरण प्राप्त होता है। प्रेरित विद्युत वाहक बल चुम्बकीय फ्लक्स के परिवर्तन की दर के समानुपाती होता है।

यदि किसी कुंडली में N चक्कर हों, तो प्रेरित विद्युत वाहक बल प्रत्येक चक्कर में उत्पन्न प्रभावों के समष्टि परिणाम के रूप में प्रकट होता है। इससे स्पष्ट होता है कि कुंडली के चक्करों की संख्या बढ़ाने से प्रेरित प्रभाव को बढ़ाया जा सकता है।

इस गणितीय निरूपण में ऋण चिह्न लेन्ज के नियम का प्रतीक है, जो यह दर्शाता है कि प्रेरित प्रभाव की दिशा फ्लक्स परिवर्तन के विरुद्ध होती है।

प्रेरण की भौतिक व्याख्या

विद्युत-चुम्बकीय प्रेरण को केवल समीकरणों के माध्यम से समझना पर्याप्त नहीं। इसकी वास्तविक भौतिक व्याख्या क्षेत्रों की अवधारणा से जुड़ी है। जब चुम्बकीय क्षेत्र बदलता है, तो वह आसपास के अंतरिक्ष में एक विद्युत क्षेत्र उत्पन्न करता है।

यही विद्युत क्षेत्र चालक में मुक्त आवेशों को गति प्रदान करता है, जिसके परिणामस्वरूप प्रेरित धारा उत्पन्न होती है। इस प्रकार, प्रेरण की जड़ में क्षेत्रों की पारस्परिक क्रिया निहित है, न कि केवल चालक या चुम्बक की गति।

यह दृष्टिकोण आधुनिक भौतिकी में क्षेत्रों की केंद्रीय भूमिका को और अधिक स्पष्ट करता है।

आत्म-प्रेरण की अवधारणा

अब तक यह स्पष्ट हो चुका है कि चुम्बकीय फ्लक्स में परिवर्तन किसी परिपथ में विद्युत प्रभाव उत्पन्न कर सकता है। यह परिवर्तन किसी बाहरी चुम्बक या पड़ोसी परिपथ के कारण हो सकता है। परंतु एक महत्वपूर्ण स्थिति तब उत्पन्न होती है जब चुम्बकीय परिवर्तन स्वयं उसी परिपथ में धारा के परिवर्तन के कारण हो।

जब किसी कुंडली में प्रवाहित धारा का मान बदलता है, तो उससे संबद्ध चुम्बकीय क्षेत्र भी बदलता है। यह परिवर्तित चुम्बकीय क्षेत्र उसी कुंडली से जुड़ा हुआ होता है, और परिणामस्वरूप उसी कुंडली में एक प्रेरित विद्युत प्रभाव उत्पन्न हो जाता है। इसी प्रक्रिया को आत्म-प्रेरण कहा जाता है।

इस स्थिति में परिपथ स्वयं अपने भीतर उत्पन्न परिवर्तन का प्रतिकार करता है। धारा के बढ़ने पर प्रेरित प्रभाव उस वृद्धि का विरोध करता है, और धारा के घटने पर उस कमी का विरोध करता है। यह व्यवहार लेन्ज के नियम के अनुरूप होता है।

कुंडली

इस दृश्य में धारा के परिवर्तन से कुंडली के भीतर उत्पन्न चुम्बकीय प्रभाव को दर्शाया गया है। यह प्रभाव उसी कुंडली में प्रेरित विद्युत वाहक बल उत्पन्न करता है, जो परिवर्तन का विरोध करता है।

आत्म-प्रेरण का भौतिक महत्व

आत्म-प्रेरण की उपस्थिति परिपथों के व्यवहार को गहराई से प्रभावित करती है। जब किसी परिपथ में धारा को अचानक चालू या बंद किया जाता है, तो आत्म-प्रेरण उस परिवर्तन को तात्कालिक होने से रोकता है।

इसी कारण धारा का मान तुरंत अपने अधिकतम या शून्य मान पर नहीं पहुँचता, बल्कि एक क्रमिक परिवर्तन से गुजरता है। यह गुण विद्युत परिपथों की स्थिरता और सुरक्षा के लिए अत्यंत आवश्यक है।

यदि आत्म-प्रेरण न होती, तो परिपथों में अचानक उत्पन्न होने वाले अत्यधिक विद्युत प्रभाव उपकरणों को क्षति पहुँचा सकते थे। इस प्रकार, आत्म-प्रेरण परिपथों की स्वाभाविक सुरक्षा व्यवस्था के रूप में कार्य करती है।

परस्पर प्रेरण की अवधारणा

जब दो कुंडलियाँ एक-दूसरे के समीप रखी जाती हैं और एक कुंडली में धारा बदली जाती है, तो उससे उत्पन्न चुम्बकीय परिवर्तन दूसरी कुंडली को भी प्रभावित करता है। इस स्थिति में दूसरी कुंडली में प्रेरित विद्युत प्रभाव उत्पन्न होता है।

इस प्रक्रिया को परस्पर प्रेरण कहा जाता है। यहाँ प्रेरण एक परिपथ से दूसरे परिपथ में स्थानांतरित होती है, जबकि दोनों परिपथ विद्युत रूप से जुड़े नहीं होते।

परस्पर प्रेरण ऊर्जा के स्थानांतरण का एक अत्यंत प्रभावी माध्यम है। इसी सिद्धांत पर आधारित होकर विद्युत ऊर्जा को एक परिपथ से दूसरे परिपथ में सुरक्षित और नियंत्रित रूप से स्थानांतरित किया जाता है।

कुंडली A कुंडली B

इस निरूपण में कुंडली A में धारा परिवर्तन से उत्पन्न चुम्बकीय प्रभाव कुंडली B तक पहुँचता है और वहाँ प्रेरित विद्युत प्रभाव उत्पन्न करता है। यह प्रक्रिया ट्रांसफॉर्मर जैसी प्रणालियों की मूलभूत आधारशिला है।

प्रेरकत्व की भौतिक संकल्पना

आत्म-प्रेरण और परस्पर प्रेरण की घटनाएँ केवल गुणात्मक विचार नहीं हैं, बल्कि इन्हें एक मापनीय भौतिक राशि द्वारा व्यक्त किया जा सकता है। इस राशि को प्रेरकत्व कहा जाता है। प्रेरकत्व यह दर्शाता है कि कोई परिपथ धारा में परिवर्तन के प्रति कितना अधिक या कम प्रतिरोध प्रस्तुत करता है।

किसी कुंडली का प्रेरकत्व उसकी आकृति, चक्करों की संख्या, क्षेत्रफल और उसमें प्रयुक्त माध्यम पर निर्भर करता है। अधिक चक्कर, बड़ा क्षेत्रफल और उपयुक्त माध्यम प्रेरकत्व को बढ़ा देते हैं।

प्रेरकत्व की अवधारणा परिपथों के व्यवहार को पूर्वानुमेय बनाती है। इसके माध्यम से यह समझा जा सकता है कि किसी परिपथ में धारा कितनी शीघ्र बदल सकती है और उस परिवर्तन के दौरान कितनी ऊर्जा संग्रहीत होती है।

प्रेरकत्व और ऊर्जा संचयन

जब किसी कुंडली में धारा प्रवाहित होती है, तो उससे संबद्ध चुम्बकीय क्षेत्र में ऊर्जा संचित हो जाती है। यह ऊर्जा किसी बाहरी स्रोत द्वारा प्रदान किए गए कार्य का परिणाम होती है, जो धारा को स्थापित करने में किया जाता है।

धारा के बढ़ने के समय आत्म-प्रेरण उस वृद्धि का विरोध करती है, और इसी विरोध के विरुद्ध किया गया कार्य चुम्बकीय क्षेत्र में ऊर्जा के रूप में संचित हो जाता है। जब धारा घटती है, तो यही संचित ऊर्जा परिपथ में वापस लौट आती है।

इस प्रकार, कुंडली को ऊर्जा संग्रहीत करने वाले एक भौतिक तंत्र के रूप में देखा जा सकता है। यह दृष्टिकोण विद्युत परिपथों को केवल चालक तत्वों का समूह न मानकर ऊर्जा विनिमय की प्रणालियों के रूप में समझने में सहायक है।

कुंडली ऊर्जा संचयन

इस निरूपण में कुंडली के भीतर प्रदर्शित क्षेत्र चुम्बकीय ऊर्जा के संचयन को सूचित करता है। यह ऊर्जा धारा के स्थापन और परिवर्तन से प्रत्यक्ष रूप से जुड़ी हुई है।

प्रेरण और समय पर निर्भर व्यवहार

विद्युत-चुम्बकीय प्रेरण परिपथों को समय पर निर्भर प्रणालियों के रूप में प्रस्तुत करता है। धारा का मान किसी भी क्षण केवल उस क्षण की स्थिति पर नहीं, बल्कि उसके पूर्ववर्ती इतिहास पर भी निर्भर करता है।

जब किसी परिपथ में धारा को आरंभ किया जाता है, तो प्रेरकत्व उस आरंभ को तात्कालिक नहीं होने देता। इसी प्रकार, धारा को बंद करने पर भी वह तुरंत समाप्त नहीं होती। यह विलंब परिपथों के वास्तविक व्यवहार को आदर्श गणनाओं से अलग बनाता है।

यही समय-निर्भरता ए.सी. प्रणालियों, संकेत प्रसंस्करण और आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की समझ के लिए अनिवार्य है।

व्यावहारिक प्रणालियों में प्रेरण का स्थान

विद्युत-चुम्बकीय प्रेरण केवल प्रयोगशाला की अवधारणा नहीं है। यह आधुनिक जीवन की लगभग हर विद्युत प्रणाली में किसी न किसी रूप में विद्यमान है।

विद्युत जनित्रों में यांत्रिक ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में रूपांतरित करने की प्रक्रिया इसी सिद्धांत पर आधारित होती है। ट्रांसफॉर्मरों में परस्पर प्रेरण के माध्यम से विभिन्न वोल्टताओं पर ऊर्जा का स्थानांतरण किया जाता है।

इलेक्ट्रॉनिक परिपथों में प्रेरक तत्व धारा के उतार-चढ़ाव को नियंत्रित करते हैं, संकेतों को स्थिर बनाते हैं और उपकरणों को अनावश्यक क्षति से बचाते हैं।

इस प्रकार, विद्युत-चुम्बकीय प्रेरण भौतिक सिद्धांत से आगे बढ़कर मानव सभ्यता के ऊर्जा ढाँचे का एक अनिवार्य अंग बन चुका है।

विद्युत जनित्र का सिद्धांत

विद्युत-चुम्बकीय प्रेरण का सबसे प्रत्यक्ष और प्रभावशाली अनुप्रयोग विद्युत जनित्र के रूप में दिखाई देता है। जनित्र का उद्देश्य यांत्रिक ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में रूपांतरित करना है। यह रूपांतरण किसी रासायनिक प्रक्रिया पर निर्भर नहीं करता, बल्कि चुम्बकीय फ्लक्स में नियंत्रित परिवर्तन के माध्यम से संपन्न होता है।

जब किसी कुंडली को चुम्बकीय क्षेत्र में घुमाया जाता है, तो कुंडली से संबद्ध चुम्बकीय फ्लक्स समय के साथ बदलता रहता है। यह परिवर्तन कुंडली में प्रेरित विद्युत वाहक बल उत्पन्न करता है। इसी प्रेरित प्रभाव के कारण परिपथ में विद्युत धारा प्रवाहित होने लगती है।

इस प्रक्रिया में धारा की दिशा कुंडली की स्थिति और घूर्णन की दिशा पर निर्भर करती है। फ्लक्स के क्रमिक परिवर्तन से विद्युत प्रभाव भी निरंतर बदलता रहता है, जो आगे चलकर प्रत्यावर्ती धारा (A.C.) के रूप में प्रकट होता है।

घूर्णनशील कुंडली N S घूर्णन दिशा

इस निरूपण में चुम्बकीय ध्रुवों के बीच स्थित कुंडली को घूर्णन करते हुए दिखाया गया है। घूर्णन के साथ कुंडली की सतह से होकर गुजरने वाला चुम्बकीय फ्लक्स बदलता है, और यही परिवर्तन प्रेरित विद्युत वाहक बल का मूल कारण बनता है।

प्रत्यावर्ती विद्युत प्रभाव का उद्भव

जनित्र में उत्पन्न विद्युत प्रभाव स्थिर नहीं होता। कुंडली के आधे घूर्णन के बाद फ्लक्स परिवर्तन की दिशा बदल जाती है, जिसके परिणामस्वरूप प्रेरित धारा की दिशा भी बदल जाती है।

इस प्रकार, परिपथ में प्रवाहित धारा नियत अंतराल पर अपनी दिशा परिवर्तित करती है। इसी कारण इस प्रकार की धारा को प्रत्यावर्ती धारा कहा जाता है।

यह गुण ऊर्जा के दूरस्थ स्थानांतरण के लिए अत्यंत उपयुक्त सिद्ध होता है, क्योंकि प्रत्यावर्ती प्रणालियों में ऊर्जा का नियंत्रण और रूपांतरण अधिक कुशलता से किया जा सकता है।

दैनिक जीवन और परिवेश में विद्युत-चुम्बकीय प्रेरण

विद्युत-चुम्बकीय प्रेरण के सिद्धांत मानव जीवन के अनेक साधारण अनुभवों में निहित हैं। जब किसी साइकिल की डायनेमो घूमती है, तो पहिए की यांत्रिक गति प्रकाश ऊर्जा में बदल जाती है। यह परिवर्तन जनित्र के उसी सिद्धांत का सरल रूप है।

विद्युत ट्रांसफॉर्मर, जो विद्युत आपूर्ति प्रणालियों में सर्वत्र प्रयुक्त होते हैं, परस्पर प्रेरण के माध्यम से वोल्टता को घटाने या बढ़ाने का कार्य करते हैं। इसी कारण दूर-दराज़ क्षेत्रों तक ऊर्जा का संचार सुरक्षित और किफायती रूप से संभव हो पाता है।

इलेक्ट्रिक इंडक्शन कुकर, वायरलेस चार्जिंग प्रणालियाँ, और धातु पहचान उपकरण भी प्रेरण के सिद्धांत पर आधारित हैं। इन उपकरणों में प्रत्यक्ष संपर्क के बिना ऊर्जा का स्थानांतरण संभव हो पाता है।

परिवेशीय दृष्टि से महत्व

ऊर्जा उत्पादन के आधुनिक साधनों में विद्युत-चुम्बकीय प्रेरण केंद्रीय भूमिका निभाता है। जल विद्युत संयंत्रों, पवन ऊर्जा प्रणालियों और ताप विद्युत संयंत्रों में यांत्रिक ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में बदलने की प्रक्रिया इसी सिद्धांत पर आधारित होती है।

इस रूपांतरण की दक्षता सीधे-सीधे ऊर्जा संसाधनों के सतत उपयोग से जुड़ी है। इस प्रकार, विद्युत-चुम्बकीय प्रेरण केवल एक भौतिक सिद्धांत नहीं, बल्कि पर्यावरणीय संतुलन और ऊर्जा संरक्षण की एक आधारशिला भी है।

समेकित बोध

विद्युत-चुम्बकीय प्रेरण का संपूर्ण अध्ययन यह स्पष्ट करता है कि विद्युत और चुम्बकत्व प्रकृति के पृथक नियम नहीं, बल्कि एक ही भौतिक संरचना के परस्पर पूरक पक्ष हैं। चुम्बकीय फ्लक्स में परिवर्तन, प्रेरित विद्युत वाहक बल, धारा की दिशा का निर्धारण, और ऊर्जा का संचयन— ये सभी घटनाएँ एक ही सैद्धांतिक सूत्र में एकीकृत रूप से जुड़ी हुई हैं।

फैराडे के नियम प्रेरण की अनिवार्यता और परिमाण को स्थापित करते हैं, जबकि लेन्ज का नियम उस प्रक्रिया को ऊर्जा संरक्षण के सार्वभौमिक सिद्धांत से जोड़ता है। आत्म-प्रेरण और परस्पर प्रेरण इस सिद्धांत के विस्तार हैं, जो परिपथों को गतिशील और स्थिर दोनों रूपों में समझने का अवसर प्रदान करते हैं।

जनित्र, ट्रांसफॉर्मर और आधुनिक ऊर्जा प्रणालियाँ इसी समेकित ढाँचे की व्यावहारिक अभिव्यक्तियाँ हैं। इस प्रकार, विद्युत-चुम्बकीय प्रेरण सैद्धांतिक अध्ययन से आगे बढ़कर ऊर्जा-आधारित सभ्यता की रीढ़ बन जाता है।

संक्षिप्त नोट्स

  • चुम्बकीय फ्लक्स में परिवर्तन से प्रेरित विद्युत प्रभाव उत्पन्न होता है।
  • प्रेरित विद्युत वाहक बल का अस्तित्व परिवर्तन पर निर्भर करता है, न कि स्थिर क्षेत्र पर।
  • फैराडे के नियम प्रेरण की अनिवार्यता और परिमाण निर्धारित करते हैं।
  • लेन्ज का नियम प्रेरित धारा की दिशा को परिभाषित करता है और ऊर्जा संरक्षण से जुड़ा है।
  • आत्म-प्रेरण परिपथ में धारा परिवर्तन का विरोध करती है।
  • परस्पर प्रेरण के माध्यम से ऊर्जा एक परिपथ से दूसरे में स्थानांतरित होती है।
  • कुंडली में ऊर्जा चुम्बकीय क्षेत्र के रूप में संचित होती है।
  • विद्युत जनित्र यांत्रिक ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में परिवर्तित करता है।

संबंधित प्रयोग (संक्षेप में)

  • चुम्बक–कुंडली प्रयोग: चुम्बक को कुंडली के भीतर लाने और बाहर ले जाने पर गैल्वेनोमीटर में विक्षेप का अवलोकन, जिससे प्रेरित धारा की उपस्थिति सिद्ध होती है।
  • दो कुंडलियों का प्रयोग: एक कुंडली में धारा परिवर्तन से दूसरी कुंडली में प्रेरित धारा का अवलोकन, जिससे परस्पर प्रेरण सिद्ध होती है।
  • घूर्णन कुंडली प्रयोग: चुम्बकीय क्षेत्र में कुंडली को घुमाकर प्रेरित विद्युत वाहक बल का अध्ययन।

प्रसिद्ध वैज्ञानिक और उनका योगदान

  • माइकल फैराडे: विद्युत-चुम्बकीय प्रेरण की खोज और इसके प्रायोगिक नियमों का प्रतिपादन।
  • हेनरिक लेन्ज: प्रेरित धारा की दिशा निर्धारित करने वाला नियम, जो ऊर्जा संरक्षण के सिद्धांत को सुनिश्चित करता है।
  • जेम्स क्लर्क मैक्सवेल: विद्युत और चुम्बकत्व को एकीकृत गणितीय सिद्धांत में रूपांतरित किया, जिससे प्रेरण की गहरी सैद्धांतिक व्याख्या संभव हुई।

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शैक्षणिक मार्गदर्शन

इस अध्याय की अवधारणात्मक संरचना और शैक्षणिक प्रवाह अनुभवी शिक्षाविदों के मार्गदर्शन में विकसित किए गए हैं, ताकि विद्यार्थी स्व-अध्ययन द्वारा पूर्ण वैचारिक स्पष्टता प्राप्त कर सके।

  • सुरेंद्र सिंह चौहान
  • कार्तिकेय खत्री

अस्वीकरण

यह अध्ययन सामग्री शैक्षणिक उद्देश्य से तैयार की गई है। परीक्षा में अंतिम उत्तर लेखन हेतु राजस्थान माध्यमिक शिक्षा बोर्ड द्वारा निर्धारित पाठ्यपुस्तक एवं आधिकारिक पाठ्यक्रम निर्देशों का अध्ययन अनिवार्य है।

संदर्भ

  • राजस्थान माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (RBSE) – भौतिक विज्ञान पाठ्यक्रम
  • राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (NCERT) – कक्षा 12 भौतिक विज्ञान
  • National Digital Library of India (NDLI)
  • National Repository of Open Educational Resources (NROER)
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