अर्धचालक इलेक्ट्रॉनिक्स
Semiconductor Electronics
विद्युत और चुम्बकत्व के नियम जहाँ आवेशों और धाराओं के व्यवहार को स्पष्ट करते हैं, वहीं अर्धचालक इलेक्ट्रॉनिक्स उन ठोस पदार्थों की भौतिकी है जिनमें विद्युत चालकता न तो पूर्ण रूप से मुक्त होती है और न ही पूर्ण रूप से बाधित। यही मध्यवर्ती व्यवहार आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक तकनीक की नींव बनता है।
सूक्ष्म स्तर पर अर्धचालकों का अध्ययन इलेक्ट्रॉनों की ऊर्जा अवस्थाओं, उनके वितरण और बाह्य प्रभावों के प्रति प्रतिक्रिया को समझने का प्रयास है। यहीं से डायोड, ट्रांजिस्टर, और डिजिटल परिपथ जैसी संरचनाएँ भौतिकी के सिद्धांतों से इंजीनियरिंग अनुप्रयोगों में परिवर्तित होती हैं।
ठोसों में ऊर्जा अवस्थाएँ
एकाकी परमाणुओं में इलेक्ट्रॉन विविक्त ऊर्जा स्तरों में पाए जाते हैं, किन्तु जब बहुत से परमाणु निकटता में व्यवस्थित होकर ठोस का निर्माण करते हैं, तो इन विविक्त स्तरों का विस्तार होकर ऊर्जा बैंड का निर्माण होता है। यही ऊर्जा बैंड किसी पदार्थ के विद्युत गुणों का निर्धारण करते हैं।
ऊर्जा बैंडों के बीच स्थित वह क्षेत्र जहाँ इलेक्ट्रॉनों के लिए कोई अनुमत अवस्था नहीं होती, वर्जित ऊर्जा अंतराल कहलाता है। इस अंतराल की चौड़ाई यह निर्धारित करती है कि कोई पदार्थ चालक, अर्धचालक या कुचालक के रूप में व्यवहार करेगा।
चालक, अर्धचालक और कुचालक
चालकों में ऊर्जा बैंड इस प्रकार व्यवस्थित होते हैं कि इलेक्ट्रॉनों को आवेश वहन के लिए अत्यल्प ऊर्जा की आवश्यकता होती है। इसके विपरीत, कुचालकों में वर्जित ऊर्जा अंतराल इतना बड़ा होता है कि सामान्य परिस्थितियों में इलेक्ट्रॉन चालक अवस्था तक नहीं पहुँच पाते।
अर्धचालक इन दोनों के बीच स्थित होते हैं। इनमें वर्जित ऊर्जा अंतराल मध्यम होता है, जिसके कारण ताप, प्रकाश या अशुद्धियों के प्रभाव से इनकी चालकता को नियंत्रित किया जा सकता है। यही गुण अर्धचालकों को इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के लिए अत्यंत उपयोगी बनाता है।
शुद्ध अर्धचालक
शुद्ध अर्धचालक, जैसे सिलिकॉन और जर्मेनियम, सामान्य ताप पर सीमित संख्या में मुक्त आवेश वाहक रखते हैं। इनमें चालकता मुख्यतः तापमान पर निर्भर करती है। ताप बढ़ने पर अधिक इलेक्ट्रॉन बंधन से मुक्त होकर चालक अवस्था में पहुँचते हैं।
शुद्ध अर्धचालक में इलेक्ट्रॉन और रिक्त स्थान समान संख्या में उपस्थित रहते हैं। ये रिक्त स्थान, जिन्हें होल कहा जाता है, धनात्मक आवेश वाहक के रूप में व्यवहार करते हैं।
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अशुद्ध अर्धचालक
शुद्ध अर्धचालकों की चालकता यद्यपि ताप के साथ बढ़ती है, किन्तु व्यावहारिक इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के लिए यह चालकता पर्याप्त नहीं होती। इस सीमा को पार करने के लिए अर्धचालकों में नियंत्रित मात्रा में विशिष्ट अशुद्धियाँ मिलाई जाती हैं। इस प्रक्रिया को डोपिंग कहा जाता है, और इससे प्राप्त पदार्थ अशुद्ध अर्धचालक कहलाता है।
डोपिंग का उद्देश्य नए ऊर्जा स्तर बनाना नहीं, बल्कि उपलब्ध ऊर्जा बैंड संरचना के भीतर आवेश वाहकों की संख्या को नियंत्रित करना होता है। इस प्रकार, अर्धचालक की चालकता पदार्थ की मूल संरचना बदले बिना कई गुना बढ़ाई जा सकती है।
n-प्रकार अर्धचालक
जब चतुर्वैलेंट अर्धचालक जैसे सिलिकॉन में पंचवैलेंट अशुद्धि जैसे फॉस्फोरस या आर्सेनिक मिलाई जाती है, तो प्रत्येक अशुद्धि परमाणु एक अतिरिक्त इलेक्ट्रॉन प्रदान करता है। यह इलेक्ट्रॉन अत्यल्प ऊर्जा प्राप्त कर चालक अवस्था में पहुँच सकता है।
ऐसे अर्धचालक में इलेक्ट्रॉन प्रमुख आवेश वाहक होते हैं, जबकि होल अल्पसंख्यक वाहक के रूप में रहते हैं। इसी कारण इसे n-प्रकार अर्धचालक कहा जाता है। यहाँ चालकता का नियंत्रण मुख्यतः मुक्त इलेक्ट्रॉनों द्वारा होता है।
p-प्रकार अर्धचालक
यदि चतुर्वैलेंट अर्धचालक में त्रिवैलेंट अशुद्धि जैसे बोरॉन या गैलियम मिलाई जाए, तो एक इलेक्ट्रॉन की कमी उत्पन्न होती है। यह कमी एक रिक्त स्थान के रूप में प्रकट होती है, जिसे होल कहा जाता है।
p-प्रकार अर्धचालक में होल प्रमुख आवेश वाहक होते हैं, जबकि इलेक्ट्रॉन अल्पसंख्यक वाहक होते हैं। यहाँ चालकता होल के संचलन द्वारा होती है, यद्यपि वास्तविक गति इलेक्ट्रॉनों की ही होती है।
ऊर्जा बैंड दृष्टि से डोपिंग
ऊर्जा बैंड आरेख के माध्यम से डोपिंग की प्रक्रिया और अधिक स्पष्ट हो जाती है। n-प्रकार अर्धचालक में अशुद्धि स्तर चालक बैंड के बहुत समीप स्थित होता है, जिससे इलेक्ट्रॉनों को चालक अवस्था में पहुँचने के लिए अत्यल्प ऊर्जा चाहिए।
इसके विपरीत, p-प्रकार अर्धचालक में अशुद्धि स्तर वैलेंस बैंड के निकट स्थित होता है, जिससे होल का निर्माण सरल हो जाता है। इस प्रकार, ऊर्जा बैंड संरचना में सूक्ष्म परिवर्तन द्वारा चालकता का सटीक नियंत्रण संभव होता है।
आवेश वाहक और चालकता
अर्धचालक की चालकता केवल वाहकों की संख्या पर ही नहीं, बल्कि उनकी गतिशीलता पर भी निर्भर करती है। ताप, विद्युत क्षेत्र और अशुद्धि सांद्रता इन सभी का प्रभाव वाहकों की गति पर पड़ता है।
यही कारण है कि अर्धचालक इलेक्ट्रॉनिक्स में सिर्फ पदार्थ का चयन ही नहीं, बल्कि उसकी शुद्धता, डोपिंग स्तर और संरचनात्मक गुणवत्ता भी अत्यंत महत्वपूर्ण होती है।
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p–n जंक्शन का निर्माण
जब p-प्रकार और n-प्रकार अर्धचालकों को भौतिक रूप से जोड़ दिया जाता है, तो उनके संपर्क क्षेत्र में एक विशिष्ट संरचना बनती है, जिसे p–n जंक्शन कहा जाता है। यह संरचना अर्धचालक इलेक्ट्रॉनिक्स की आधारशिला है, क्योंकि अधिकांश इलेक्ट्रॉनिक उपकरण इसी सिद्धांत पर कार्य करते हैं।
जंक्शन के बनते ही n-क्षेत्र के इलेक्ट्रॉन और p-क्षेत्र के होल सांद्रता के अंतर के कारण एक-दूसरे की ओर विसरित होते हैं। इस विसरण के परिणामस्वरूप जंक्शन के पास आवेश पुनर्संयोजन होता है, जिससे मुक्त आवेश वाहकों की संख्या कम हो जाती है।
अपक्षय परत और आंतरिक विद्युत क्षेत्र
p–n जंक्शन के समीप जिस क्षेत्र में मुक्त आवेश वाहक लगभग अनुपस्थित हो जाते हैं, उसे अपक्षय परत कहा जाता है। इस क्षेत्र में स्थिर आवेशित आयन शेष रह जाते हैं, जो एक आंतरिक विद्युत क्षेत्र उत्पन्न करते हैं।
यह आंतरिक विद्युत क्षेत्र आगे के विसरण का विरोध करता है। एक संतुलन अवस्था तब प्राप्त होती है जब विसरण प्रवृत्ति और विद्युत क्षेत्र द्वारा उत्पन्न प्रतिकर्षण बल एक-दूसरे को संतुलित कर देते हैं। यही संतुलन p–n जंक्शन के स्थिर व्यवहार को परिभाषित करता है।
अवरोध विभव
अपक्षय परत के पार उत्पन्न विभवांतर को अवरोध विभव कहा जाता है। यह विभव जंक्शन के माध्यम से आवेश वाहकों के मुक्त प्रवाह को रोकने का कार्य करता है। अवरोध विभव का मान अर्धचालक पदार्थ और तापमान पर निर्भर करता है।
सिलिकॉन और जर्मेनियम जैसे भिन्न अर्धचालकों में अवरोध विभव का मान अलग-अलग होता है, जो यह दर्शाता है कि p–n जंक्शन का व्यवहार सिर्फ संरचना ही नहीं, पदार्थ की प्रकृति से भी निर्धारित होता है।
p–n जंक्शन का ऊर्जा बैंड दृष्टिकोण
ऊर्जा बैंड आरेख के माध्यम से p–n जंक्शन को देखने पर अपक्षय परत की भौतिक व्याख्या और अधिक स्पष्ट हो जाती है। जंक्शन बनने से पहले p और n क्षेत्रों के ऊर्जा बैंड अलग-अलग होते हैं, किन्तु संपर्क के बाद फर्मी स्तर संतुलन अवस्था में एक ही स्तर पर आ जाता है।
इस समायोजन के दौरान ऊर्जा बैंडों में वक्रता उत्पन्न होती है, जो आंतरिक विद्युत क्षेत्र और अवरोध विभव को दर्शाती है। यह बैंड वक्रता p–n जंक्शन के विद्युत गुणों की मूल व्याख्या प्रस्तुत करती है।
जंक्शन की दिशा-संवेदनशीलता
p–n जंक्शन की सबसे महत्त्वपूर्ण विशेषता उसका दिशा-संवेदनशील व्यवहार है। यह गुण इसे एकतरफा चालक बनाता है, जिसका अर्थ है कि धारा का प्रवाह एक दिशा में सरल और दूसरी दिशा में कठिन होता है।
यही दिशा-संवेदनशीलता डायोड के व्यवहार का आधार बनती है। p–n जंक्शन के इस गुण के बिना आधुनिक रेक्टिफिकेशन और सिग्नल प्रोसेसिंग संभव नहीं होती।
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p–n जंक्शन का बाह्य बायस
p–n जंक्शन का व्यवहार तब और स्पष्ट हो जाता है जब उस पर बाह्य विभव लगाया जाता है। इस बाह्य विभव को बायस कहा जाता है। बायस का उद्देश्य जंक्शन के भीतर आंतरिक विद्युत क्षेत्र को या तो कम करना या अधिक करना होता है। इसी के आधार पर p–n जंक्शन का विद्युत गुण नियंत्रित किया जाता है।
फॉरवर्ड बायस
जब p-क्षेत्र को बैटरी के धनात्मक सिरे से और n-क्षेत्र को ऋणात्मक सिरे से जोड़ा जाता है, तो जंक्शन फॉरवर्ड बायस में होता है। इस स्थिति में बाह्य विभव आंतरिक अवरोध विभव का विरोध करता है।
अवरोध विभव के घटने से अपक्षय परत की चौड़ाई कम हो जाती है। परिणामस्वरूप बहुसंख्यक आवेश वाहक जंक्शन को पार कर सकते हैं, और जंक्शन से धारा प्रवाहित होने लगती है। यही अवस्था डायोड के चालक व्यवहार को स्पष्ट करती है।
रिवर्स बायस
जब p-क्षेत्र को बैटरी के ऋणात्मक सिरे से और n-क्षेत्र को धनात्मक सिरे से जोड़ा जाता है, तो जंक्शन रिवर्स बायस में होता है। इस स्थिति में बाह्य विभव आंतरिक अवरोध विभव को और अधिक बढ़ा देता है।
अपक्षय परत की चौड़ाई बढ़ जाती है, जिससे बहुसंख्यक वाहकों का प्रवाह रुक जाता है। हालाँकि अल्पसंख्यक वाहकों के कारण अत्यल्प धारा अब भी प्रवाहित होती है, जिसे रिवर्स सैचुरेशन करंट कहा जाता है।
डायोड का कार्य सिद्धांत
p–n जंक्शन का दिशा-संवेदनशील व्यवहार डायोड के रूप में प्रयोग किया जाता है। डायोड फॉरवर्ड बायस में धारा को सरलता से प्रवाहित होने देता है, जबकि रिवर्स बायस में धारा का प्रवाह लगभग रोक देता है।
इस प्रकार, डायोड एक विद्युत एक-दिशीय वाल्व की तरह कार्य करता है। यही गुण डायोड को रेक्टिफिकेशन, सिग्नल प्रोसेसिंग और सुरक्षा परिपथों में अत्यंत उपयोगी बनाता है।
डायोड की V–I विशेषताएँ
डायोड की विद्युत विशेषताओं को V–I ग्राफ द्वारा समझा जाता है। फॉरवर्ड बायस में एक निश्चित विभव के बाद धारा तीव्रता से बढ़ती है, जबकि रिवर्स बायस में धारा लगभग स्थिर रहती है।
यह ग्राफ डायोड के व्यावहारिक व्यवहार को स्पष्ट रूप से दर्शाता है और यह समझने में सहायता करता है कि किस स्थिति में डायोड चालक या अवरोधक के रूप में कार्य करेगा।
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ज़ेनर डायोड
डायोड का एक विशेष रूप ज़ेनर डायोड है, जिसे इस प्रकार निर्मित किया जाता है कि वह रिवर्स बायस में एक निश्चित विभव पर स्थिर रूप से कार्य करे। इस विभव को ज़ेनर विभव कहा जाता है। इस बिंदु पर डायोड में धारा तीव्रता से बढ़ती है, किन्तु डायोड के सिरों के बीच विभव लगभग स्थिर रहता है।
ज़ेनर डायोड का यह व्यवहार इसे विभव नियमन के लिए अत्यंत उपयोगी बनाता है। जब बाह्य स्रोत से विभव में उतार–चढ़ाव होता है, तब भी ज़ेनर डायोड के पार विभव लगभग अपरिवर्तित रहता है। यह गुण संवेदनशील इलेक्ट्रॉनिक परिपथों की सुरक्षा के लिए आवश्यक है।
ज़ेनर ब्रेकडाउन का भौतिक कारण
ज़ेनर ब्रेकडाउन केवल उच्च धारा का परिणाम नहीं, बल्कि नाभिकीय दूरी पर उत्पन्न तीव्र विद्युत क्षेत्र का परिणाम है। अल्प अपक्षय परत में उच्च क्षेत्र इलेक्ट्रॉनों को बंधन से मुक्त कर देता है, जिससे धारा में अचानक वृद्धि होती है।
यह प्रक्रिया डायोड को क्षति नहीं पहुँचाती, यदि धारा को उपयुक्त सीमा में रखा जाए। यही कारण है कि ज़ेनर डायोड नियंत्रित ब्रेकडाउन के लिए डिज़ाइन किया जाता है।
ट्रांजिस्टर की संरचना
डायोड के बाद अर्धचालक इलेक्ट्रॉनिक्स का अगला प्रमुख घटक ट्रांजिस्टर है। ट्रांजिस्टर दो p–n जंक्शनों से मिलकर बना होता है और इसे p–n–p या n–p–n संरचना में व्यवस्थित किया जाता है।
ट्रांजिस्टर के तीन भाग होते हैं— एमिटर, बेस और कलेक्टर। इन भागों की डोपिंग और ज्यामिति अलग-अलग रखी जाती है, जिससे ट्रांजिस्टर धारा नियंत्रण और प्रवर्धन जैसे कार्य कर सके।
ट्रांजिस्टर का कार्य सिद्धांत
ट्रांजिस्टर का मूल कार्य एक छोटे संकेत द्वारा एक बड़े धारा प्रवाह को नियंत्रित करना है। एमिटर–बेस जंक्शन को फॉरवर्ड बायस में और कलेक्टर–बेस जंक्शन को रिवर्स बायस में रखा जाता है।
इस विन्यास में एमिटर से निकले आवेश वाहक बेस क्षेत्र से होकर कलेक्टर तक पहुँचते हैं। बेस में प्रवाहित अत्यल्प धारा कलेक्टर धारा को नियंत्रित करती है। यही सिद्धांत प्रवर्धन का आधार बनता है।
प्रवर्धन का भौतिक अर्थ
प्रवर्धन सिर्फ धारा बढ़ाने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि ऊर्जा के बाह्य स्रोत से संकेत को सशक्त बनाने की एक व्यवस्थित विधि है। ट्रांजिस्टर में इनपुट संकेत बेस पर लगाया जाता है, जबकि आउटपुट कलेक्टर से प्राप्त होता है।
इस प्रक्रिया में संकेत की आकृति बनी रहती है, किन्तु उसकी शक्ति बढ़ जाती है। यही गुण ट्रांजिस्टर को ऑडियो, रेडियो और डिजिटल प्रणालियों में अपरिहार्य बनाता है।
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ट्रांजिस्टर की विन्यास विधियाँ
ट्रांजिस्टर को परिपथ में विभिन्न प्रकार से जोड़ा जा सकता है, जिससे उसके व्यवहार और उपयोग में महत्वपूर्ण परिवर्तन आता है। इन विन्यासों का उद्देश्य इनपुट और आउटपुट के बीच उपयुक्त संबंध स्थापित करना होता है। प्रत्येक विन्यास विशिष्ट परिस्थितियों में अलग-अलग लाभ प्रदान करता है।
सामान्यतः तीन प्रमुख विन्यास प्रयोग में लाए जाते हैं— कॉमन एमिटर, कॉमन बेस और कॉमन कलेक्टर। इनमें से कॉमन एमिटर विन्यास सबसे अधिक प्रचलित है, क्योंकि इसमें धारा और विभव दोनों का उल्लेखनीय प्रवर्धन प्राप्त होता है।
कॉमन एमिटर विन्यास का व्यवहार
कॉमन एमिटर विन्यास में एमिटर को इनपुट और आउटपुट दोनों के लिए सामान्य संदर्भ बिंदु बनाया जाता है। इनपुट संकेत बेस–एमिटर जंक्शन पर लगाया जाता है, जबकि आउटपुट कलेक्टर–एमिटर के बीच प्राप्त होता है।
इस विन्यास की विशेषता यह है कि इनपुट संकेत में अल्प परिवर्तन आउटपुट धारा में बड़े परिवर्तन का कारण बनता है। इसी कारण यह विन्यास प्रवर्धक परिपथों में व्यापक रूप से प्रयुक्त होता है।
डिजिटल इलेक्ट्रॉनिक्स का आधार
अर्धचालक इलेक्ट्रॉनिक्स के विकास के साथ डिजिटल प्रणालियों का विस्तार संभव हुआ। डिजिटल इलेक्ट्रॉनिक्स में सूचना को निरंतर मानों के स्थान पर विविक्त अवस्थाओं में प्रतिनिधित्व किया जाता है। सामान्यतः इन अवस्थाओं को 0 और 1 के रूप में व्यक्त किया जाता है।
इन विविक्त अवस्थाओं को व्यवहार में लागू करने के लिए लॉजिक गेट्स का प्रयोग किया जाता है। लॉजिक गेट्स ऐसे परिपथ होते हैं जो इनपुट संकेतों पर तार्किक नियम लागू कर आउटपुट उत्पन्न करते हैं।
प्रमुख लॉजिक गेट्स
सबसे मूलभूत लॉजिक गेट्स— AND, OR और NOT— डिजिटल परिपथों की नींव बनाते हैं। इन गेट्स का व्यवहार स्पष्ट तार्किक नियमों द्वारा परिभाषित किया जाता है, जिन्हें सत्य सारणी के रूप में प्रस्तुत किया जाता है।
इनके अतिरिक्त NAND, NOR, XOR और XNOR जैसे गेट्स अधिक जटिल तार्किक क्रियाओं को संभव बनाते हैं। विशेष रूप से NAND और NOR गेट्स सार्वभौमिक गेट कहलाते हैं, क्योंकि केवल इन्हीं का उपयोग करके कोई भी डिजिटल परिपथ निर्मित किया जा सकता है।
समेकित परिपथ
लॉजिक गेट्स और ट्रांजिस्टरों को एक ही अर्धचालक चिप पर एकीकृत करने से समेकित परिपथ का विकास हुआ। समेकित परिपथों ने इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों को छोटा, तेज़ और अधिक विश्वसनीय बनाया।
आज के कंप्यूटर, मोबाइल फोन और स्वचालित प्रणालियाँ इन्हीं समेकित परिपथों पर आधारित हैं। इस प्रकार, अर्धचालक इलेक्ट्रॉनिक्स आधुनिक डिजिटल युग की रीढ़ के रूप में स्थापित होती है।
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चित्र, डायग्राम एवं सारणी (SVG)
ऊर्जा बैंड आरेख (Energy Band Diagram)
यह ऊर्जा बैंड आरेख यह दर्शाता है कि ठोस अर्धचालकों में इलेक्ट्रॉन विविक्त स्तरों में नहीं, बल्कि ऊर्जा बैंडों में पाए जाते हैं। वैलेंस बैंड और कंडक्शन बैंड के बीच का वर्जित अंतराल अर्धचालक के व्यवहार को निर्धारित करता है। यही अंतराल चालक, अर्धचालक और कुचालक के बीच मूल भेद उत्पन्न करता है।
p–n जंक्शन एवं अपक्षय परत
p–n जंक्शन पर दो भिन्न डोप किए गए क्षेत्रों के मिलने से अपक्षय परत बनती है। इस क्षेत्र में मुक्त आवेश वाहक लगभग नहीं होते, जिससे आंतरिक विद्युत क्षेत्र उत्पन्न होता है। यही क्षेत्र डायोड की दिशा-संवेदनशीलता का भौतिक कारण है।
डायोड की V–I विशेषताएँ
डायोड की V–I विशेषता वक्र यह स्पष्ट करती है कि फॉरवर्ड बायस में अवरोध विभव पार होते ही धारा तीव्रता से बढ़ती है, जबकि रिवर्स बायस में धारा लगभग स्थिर रहती है। यही व्यवहार रेक्टिफिकेशन का आधार है।
ट्रांजिस्टर की संरचना
ट्रांजिस्टर में एमिटर, बेस और कलेक्टर तीन स्पष्ट भाग होते हैं। बेस पर लगाया गया अत्यल्प संकेत कलेक्टर धारा को नियंत्रित करता है। इसी गुण के कारण ट्रांजिस्टर प्रवर्धन एवं स्विचिंग दोनों में सक्षम होता है।
समेकित दृष्टिकोण
अर्धचालक इलेक्ट्रॉनिक्स का अध्ययन यह स्पष्ट करता है कि सूक्ष्म स्तर पर इलेक्ट्रॉनों की ऊर्जा अवस्थाएँ कैसे नियंत्रित रूप में व्यावहारिक उपकरणों में परिवर्तित की जा सकती हैं। ऊर्जा बैंड संरचना, डोपिंग, p–n जंक्शन और बायसिंग— ये सभी अवधारणाएँ अलग-अलग नहीं, बल्कि एक ही वैज्ञानिक निरंतरता का भाग हैं।
डायोड की दिशा-संवेदनशीलता, ज़ेनर डायोड का विभव नियमन, और ट्रांजिस्टर का प्रवर्धन गुण यह दर्शाते हैं कि भौतिक सिद्धांत कैसे प्रत्यक्ष तकनीकी क्षमता में परिवर्तित होते हैं। डिजिटल लॉजिक और समेकित परिपथ इसी यात्रा का आधुनिक विस्तार हैं।
संक्षिप्त नोट्स
- अर्धचालकों में चालकता को नियंत्रित किया जा सकता है।
- ऊर्जा बैंड संरचना पदार्थ के विद्युत गुण निर्धारित करती है।
- डोपिंग से वाहक सांद्रता बढ़ाई जाती है।
- p–n जंक्शन डायोड का आधार है।
- फॉरवर्ड बायस में धारा सरलता से प्रवाहित होती है।
- ज़ेनर डायोड विभव नियमन में प्रयुक्त होता है।
- ट्रांजिस्टर प्रवर्धन और स्विचिंग दोनों करता है।
- लॉजिक गेट्स डिजिटल इलेक्ट्रॉनिक्स की नींव हैं।
प्रमुख प्रयोग एवं अवलोकन
- डायोड की V–I विशेषताओं का प्रायोगिक अध्ययन
- ज़ेनर ब्रेकडाउन का अवलोकन
- कॉमन एमिटर ट्रांजिस्टर का प्रवर्धन परीक्षण
दैनिक जीवन एवं तकनीकी उपयोग
अर्धचालक इलेक्ट्रॉनिक्स के सिद्धांत मोबाइल फोन, कंप्यूटर, टीवी, सौर सेल, स्वचालित नियंत्रण प्रणालियों और चिकित्सा उपकरणों में प्रत्यक्ष रूप से प्रयुक्त होते हैं। डिजिटल युग की लगभग हर तकनीक इसी अध्याय में वर्णित सिद्धांतों पर आधारित है।
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अस्वीकरण
यह अध्ययन सामग्री राजस्थान माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (RBSE) के निर्धारित पाठ्यक्रम के अनुरूप शैक्षणिक उद्देश्य से तैयार की गई है। परीक्षा में उत्तर लेखन हेतु आधिकारिक पाठ्यपुस्तकों का अध्ययन आवश्यक है।
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कक्षा-अनुभव व्याख्यान
अब इस अध्याय को एक क्रम में देखें तो सबसे पहले यह स्पष्ट होता है कि अर्धचालक इलेक्ट्रॉनिक्स किसी एक उपकरण का अध्ययन नहीं, बल्कि इलेक्ट्रॉनों के व्यवहार को स्थितियों के अनुसार नियंत्रित करने की एक संगठित प्रक्रिया है।
ऊर्जा बैंड की चर्चा यह आधार देती है कि इलेक्ट्रॉन कब बंधित रहते हैं और कब चालक अवस्था में पहुँचते हैं। डोपिंग इस आधार को व्यावहारिक रूप देती है, जहाँ वाहकों की संख्या और प्रकृति मानव द्वारा नियंत्रित की जा सकती है।
p–n जंक्शन पर पहुँचते-पहुँचते यह अनुभव बनता है कि केवल पदार्थ की प्रकृति ही नहीं, बल्कि आंतरिक विद्युत क्षेत्र धारा के प्रवाह की दिशा तय करता है। इसी कारण डायोड एक दिशा में धारा को सरलता से स्वीकार करता है और दूसरी दिशा में नहीं।
ज़ेनर डायोड यह दिखाता है कि जिस ब्रेकडाउन को सामान्यतः अवांछनीय माना जाता है, वही नियंत्रित होने पर विभव नियमन का विश्वसनीय साधन बन सकता है। ट्रांजिस्टर पर आते-आते यह बात स्पष्ट हो जाती है कि अत्यल्प संकेत द्वारा ऊर्जा प्रवाह को नियंत्रित करना संभव है।
जब यही सिद्धांत लॉजिक गेट्स और समेकित परिपथों में एकीकृत होते हैं, तो यह अध्याय सीधे आधुनिक डिजिटल दुनिया से जुड़ जाता है। यदि इस पूरे क्रम को मन में स्पष्ट रखा जाए, तो अर्धचालक इलेक्ट्रॉनिक्स न तो बिखरा हुआ लगता है और न ही कठिन।
इस अध्याय का सार यही है कि सूक्ष्म स्तर पर भौतिक नियमों की गहरी समझ कैसे विश्व स्तर की तकनीकी प्रणालियों में परिवर्तित होती है।
विद्यार्थियों के काल्पनिक प्रश्न एवं गंभीर उत्तर
प्रश्न 1: ऊर्जा बैंड की अवधारणा समझ में आती है, लेकिन यह वास्तविक इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों से कैसे जुड़ती है?
उत्तर: ऊर्जा बैंड यह निर्धारित करता है कि इलेक्ट्रॉन किस परिस्थिति में बंधन से मुक्त होकर धारा के रूप में प्रवाहित हो सकता है। डायोड, ट्रांजिस्टर और लॉजिक गेट्स सभी का व्यवहार इसी बात पर निर्भर करता है कि इलेक्ट्रॉन को वैलेंस बैंड से कंडक्शन बैंड तक पहुँचने में कितनी ऊर्जा चाहिए। इस प्रकार, ऊर्जा बैंड की समझ के बिना किसी भी इलेक्ट्रॉनिक उपकरण का भौतिक अर्थ स्पष्ट नहीं हो सकता।
प्रश्न 2: डोपिंग से वास्तव में क्या बदलता है— पदार्थ या केवल उसकी चालकता?
उत्तर: डोपिंग पदार्थ की मूल क्रिस्टल संरचना को नहीं बदलती, बल्कि उसमें उपलब्ध आवेश वाहकों की संख्या और प्रकार को नियंत्रित करती है। यही कारण है कि एक ही सिलिकॉन क्रिस्टल डोपिंग के अनुसार n-प्रकार या p-प्रकार दोनों के रूप में व्यवहार कर सकता है। अर्थात, डोपिंग चालकता को नियंत्रित करने का साधन है, पदार्थ को बदलने का नहीं।
प्रश्न 3: p–n जंक्शन बनते ही धारा क्यों नहीं बहने लगती?
उत्तर: p–n जंक्शन के निर्माण के समय विसरण के कारण अपक्षय परत बनती है, जिससे आंतरिक विद्युत क्षेत्र उत्पन्न होता है। यह क्षेत्र अवरोध विभव के रूप में कार्य करता है और बहुसंख्यक वाहकों के मुक्त प्रवाह को रोक देता है। धारा तभी बहती है जब बाह्य बायस द्वारा इस अवरोध विभव को कम या समाप्त किया जाए।
प्रश्न 4: डायोड में धारा अचानक क्यों बढ़ जाती है, धीरे–धीरे क्यों नहीं?
उत्तर: फॉरवर्ड बायस में जैसे ही बाह्य विभव अवरोध विभव के तुल्य हो जाता है, अपक्षय परत अत्यंत पतली हो जाती है। इसके बाद बहुसंख्यक वाहकों को लगभग कोई बाधा नहीं मिलती, जिससे धारा में तीव्र वृद्धि दिखाई देती है। यह अचानक वृद्धि डायोड की V–I विशेषता का स्वाभाविक परिणाम है।
प्रश्न 5: ज़ेनर डायोड में ब्रेकडाउन हानिकारक क्यों नहीं होता, जबकि सामान्य डायोड में होता है?
उत्तर: ज़ेनर डायोड को जानबूझकर इस प्रकार डिज़ाइन किया जाता है कि ब्रेकडाउन एक नियंत्रित और स्थिर प्रक्रिया हो। इस अवस्था में विभव लगभग स्थिर रहता है और यदि धारा को अनुमत सीमा में रखा जाए, तो डायोड को कोई क्षति नहीं होती। सामान्य डायोड इस प्रकार के नियंत्रित ब्रेकडाउन के लिए निर्मित नहीं होते, इसी कारण वहाँ यह हानिकारक बन जाता है।
प्रश्न 6: ट्रांजिस्टर में इतनी छोटी बेस धारा इतनी बड़ी कलेक्टर धारा को कैसे नियंत्रित कर लेती है?
उत्तर: ट्रांजिस्टर में एमिटर से निकलने वाले अधिकांश आवेश वाहक बेस में न रुककर कलेक्टर तक पहुँच जाते हैं। बेस धारा का कार्य नई धारा उत्पन्न करना नहीं, बल्कि इस प्रवाह को नियंत्रित करना होता है। यही कारण है कि अल्प इनपुट संकेत ऊर्जा स्रोत की सहायता से बड़े आउटपुट में परिवर्तित हो जाता है।
प्रश्न 7: लॉजिक गेट्स को भौतिकी से जोड़कर कैसे समझा जाए?
उत्तर: लॉजिक गेट्स कोई अमूर्त गणितीय रचना नहीं, बल्कि डायोड और ट्रांजिस्टर जैसे भौतिक उपकरणों के संयोजन से बने परिपथ हैं। इनमें 0 और 1 वास्तव में निम्न और उच्च विभव अवस्थाओं का प्रतिनिधित्व करते हैं। इस दृष्टि से, डिजिटल इलेक्ट्रॉनिक्स अर्धचालक भौतिकी का सीधा अनुप्रयोग है।
प्रश्न 8: परीक्षा में इस अध्याय को सबसे अच्छे तरीके से कैसे प्रस्तुत किया जाए?
उत्तर: इस अध्याय में स्पष्ट आरेख, सही शब्दावली और क्रमबद्ध व्याख्या सबसे अधिक अंक दिलाती है। जहाँ संभव हो, भौतिक कारण पहले और निष्कर्ष बाद में लिखना चाहिए। यदि उत्तर में ऊर्जा बैंड, बायसिंग और वाहक प्रवाह का स्पष्ट संबंध दिखता है, तो उत्तर स्वतः प्रभावशाली बन जाता है।
सबसे मुश्किल प्रश्न एवं उनके कारण सहित उत्तर
प्रश्न 1: यदि शुद्ध अर्धचालक में ताप बढ़ाया जाए, तो चालकता बढ़ती है, जबकि चालक में ताप बढ़ाने पर चालकता घटती है— इस भिन्न व्यवहार का मूल कारण क्या है?
उत्तर: शुद्ध अर्धचालक में ताप बढ़ाने से अधिक इलेक्ट्रॉन वैलेंस बैंड से कंडक्शन बैंड में पहुँचते हैं, जिससे आवेश वाहकों की संख्या बढ़ती है। इसके विपरीत, चालकों में आवेश वाहक पहले से ही प्रचुर मात्रा में होते हैं, और ताप बढ़ने पर जालिका कंपन बढ़ जाते हैं, जिससे इलेक्ट्रॉनों का प्रकीर्णन बढ़ता है। अतः अर्धचालक में वाहकों की संख्या प्रमुख भूमिका निभाती है, जबकि चालक में वाहकों की गतिशीलता प्रमुख होती है।
कारण: यह प्रश्न कठिन इसलिए होता है क्योंकि दोनों स्थितियों में ताप का प्रभाव अलग-अलग भौतिक तंत्रों द्वारा नियंत्रित होता है।
प्रश्न 2: p–n जंक्शन बनने के बाद, बिना किसी बाह्य बायस के भी, अपक्षय परत स्थिर क्यों रहती है?
उत्तर: जंक्शन बनने के समय विसरण के कारण आवेश पुनर्संयोजन होता है, जिससे आंतरिक विद्युत क्षेत्र उत्पन्न होता है। यह क्षेत्र आगे के विसरण का विरोध करता है। जब विसरण प्रवृत्ति और विद्युत क्षेत्र द्वारा उत्पन्न बल संतुलन में आ जाते हैं, तो अपक्षय परत की चौड़ाई स्थिर हो जाती है।
कारण: यह प्रश्न इसलिए कठिन लगता है क्योंकि यह स्थिर अवस्था गतिकीय संतुलन का परिणाम होती है, न कि किसी स्थिर अवरोध का।
प्रश्न 3: डायोड की V–I विशेषता में ‘कट-इन वोल्टेज’ का भौतिक अर्थ क्या है?
उत्तर: कट-इन वोल्टेज वह न्यूनतम फॉरवर्ड विभव है जिस पर बाह्य विद्युत क्षेत्र आंतरिक अवरोध विभव को प्रभावी रूप से संतुलित कर देता है। इसके बाद अपक्षय परत अत्यंत पतली हो जाती है और बहुसंख्यक वाहक जंक्शन पार कर सकते हैं।
कारण: यह प्रश्न कठिन इसलिए होता है क्योंकि अधिकांश विद्यार्थी कट-इन वोल्टेज को केवल एक संख्यात्मक मान समझते हैं, जबकि यह वास्तव में आंतरिक विद्युत क्षेत्र के संतुलन से जुड़ा होता है।
प्रश्न 4: ज़ेनर डायोड में ब्रेकडाउन को स्थिर विभव नियमन के लिए कैसे उपयोग किया जा सकता है?
उत्तर: ज़ेनर ब्रेकडाउन के बाद डायोड के सिरों के बीच विभव लगभग स्थिर रहता है, भले ही धारा में परिवर्तन हो। यदि परिपथ में श्रृंखला प्रतिरोध द्वारा धारा को नियंत्रित रखा जाए, तो ज़ेनर डायोड एक विश्वसनीय विभव नियामक के रूप में कार्य करता है।
कारण: यह प्रश्न कठिन इसलिए होता है क्योंकि ब्रेकडाउन को सामान्यतः क्षतिकारक प्रक्रिया माना जाता है, जबकि यहाँ वही प्रक्रिया नियंत्रित उपयोग में लाई जाती है।
प्रश्न 5: ट्रांजिस्टर में प्रवर्धन को ऊर्जा संरक्षण के सिद्धांत से कैसे जोड़ा जा सकता है?
उत्तर: ट्रांजिस्टर में प्रवर्धन का अर्थ ऊर्जा का निर्माण नहीं, बल्कि बाह्य ऊर्जा स्रोत से ऊर्जा को इनपुट संकेत के अनुरूप नियंत्रित करना है। बेस धारा केवल नियंत्रण संकेत का कार्य करती है, जबकि वास्तविक ऊर्जा कलेक्टर परिपथ से प्राप्त होती है। इस प्रकार ऊर्जा संरक्षण का सिद्धांत पूरी तरह संतुष्ट रहता है।
कारण: यह प्रश्न कठिन इसलिए होता है क्योंकि प्रवर्धन को गलत रूप से ऊर्जा वृद्धि समझ लिया जाता है, जबकि यह ऊर्जा नियंत्रण की प्रक्रिया है।
प्रश्न 6: लॉजिक गेट्स में 0 और 1 वास्तविक रूप में क्या दर्शाते हैं?
उत्तर: डिजिटल इलेक्ट्रॉनिक्स में 0 और 1 कोई अमूर्त गणितीय चिन्ह नहीं, बल्कि निम्न और उच्च विभव अवस्थाओं का भौतिक प्रतिनिधित्व हैं। इन अवस्थाओं को ट्रांजिस्टर जैसे उपकरणों द्वारा स्थिर और विश्वसनीय रूप में प्राप्त किया जाता है।
कारण: यह प्रश्न कठिन इसलिए होता है क्योंकि डिजिटल संकेतों को अक्सर भौतिकी से अलग मान लिया जाता है, जबकि वे अर्धचालक भौतिकी पर ही आधारित होते हैं।
वैज्ञानिकों के अथक प्रयास एवं भविष्य की चुनौतियाँ
अर्धचालक इलेक्ट्रॉनिक्स आज जितनी परिपक्व दिखाई देती है, उसके पीछे दशकों नहीं, बल्कि एक शताब्दी से अधिक समय का वैज्ञानिक संघर्ष और प्रयोग निहित है। ऊर्जा बैंड सिद्धांत, डोपिंग की अवधारणा, और p–n जंक्शन का विकास एक साथ नहीं हुआ, बल्कि अलग-अलग वैज्ञानिकों के निरंतर प्रयासों से धीरे-धीरे स्पष्ट होता गया।
प्रारंभिक वैज्ञानिकों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि ठोस पदार्थों में इलेक्ट्रॉनों का व्यवहार न तो पूर्णतः शास्त्रीय था और न ही सरल क्वांटम। इसी जटिलता ने ऊर्जा बैंड सिद्धांत को जन्म दिया, जिसके बिना आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक्स की कल्पना असंभव होती।
डायोड और ट्रांजिस्टर के विकास ने यह सिद्ध कर दिया कि भौतिकी के सिद्धांत केवल प्रयोगशाला तक सीमित नहीं, बल्कि समाज और सभ्यता को प्रत्यक्ष रूप से रूपांतरित कर सकते हैं। इसी परिवर्तन ने डिजिटल युग की नींव रखी।
भविष्य की ओर देखें तो अर्धचालक इलेक्ट्रॉनिक्स के सामने नई चुनौतियाँ स्पष्ट दिखाई देती हैं। जैसे-जैसे उपकरणों का आकार नैनो स्तर तक पहुँच रहा है, वैसे-वैसे ऊष्मा अपव्यय, क्वांटम प्रभाव और ऊर्जा दक्षता जैसी समस्याएँ और अधिक जटिल होती जा रही हैं।
इन चुनौतियों के समाधान के लिए नए पदार्थ, नए संरचनात्मक सिद्धांत और वैकल्पिक तकनीकों पर अनुसंधान जारी है। इस दृष्टि से अर्धचालक इलेक्ट्रॉनिक्स एक पूर्ण विषय नहीं, बल्कि निरंतर विकसित होती वैज्ञानिक यात्रा है, जिसमें आगे भी महत्वपूर्ण अध्याय जुड़ते रहेंगे।
हल्की मुस्कान के लिए 🙂
यदि इलेक्ट्रॉन सोचने लगें, तो शायद कहें —
“हमें डायोड पसंद है,
क्योंकि वहाँ कम से कम यह तय रहता है
कि जाना किस दिशा में है।”


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