RBSE Class 12 Physics – Semiconductor Electronics | अर्धचालक इलेक्ट्रॉनिक्स Complete Guide 2026

📅 Tuesday, 13 January 2026 📖 3-5 min read

नाभिक
Nuclei

परमाणु के अध्ययन के बाद स्वाभाविक रूप से ध्यान उसके केंद्रीय भाग की ओर जाता है, जहाँ लगभग समस्त द्रव्यमान और धन आवेश केंद्रित होता है। यह केंद्रीय भाग नाभिक कहलाता है। नाभिक का अध्ययन केवल संरचनात्मक जिज्ञासा नहीं, बल्कि ऊर्जा, स्थिरता और रूपांतरण जैसे मूलभूत प्रश्नों से जुड़ा हुआ है। यहीं से नाभिकीय ऊर्जा, रेडियोधर्मिता और तत्त्वों के परिवर्तन की अवधारणाएँ जन्म लेती हैं।

नाभिकीय भौतिकी सूक्ष्म स्तर पर प्रकृति की शक्तियों को समझने का प्रयास है। यह अध्याय यह स्पष्ट करता है कि कैसे अत्यंत छोटे आयतन में अत्यधिक ऊर्जा निहित रहती है, और किन परिस्थितियों में यह ऊर्जा मुक्त हो सकती है।

नाभिक की संरचना

नाभिक मुख्यतः दो प्रकार के कणों से बना होता है— प्रोटॉन और न्यूट्रॉन। इन कणों को सामूहिक रूप से न्यूक्लियॉन कहा जाता है। प्रोटॉन धन आवेशित होता है, जबकि न्यूट्रॉन विद्युत रूप से तटस्थ होता है। इन दोनों के बीच अत्यंत प्रबल आकर्षण बल कार्य करता है, जिसे नाभिकीय बल कहा जाता है।

नाभिकीय बल अल्प दूरी पर विद्युत प्रतिकर्षण पर प्रधानता प्राप्त करता है। यही कारण है कि समान धन आवेश वाले प्रोटॉन एक-दूसरे से दूर न भागकर नाभिक में बंधे रहते हैं। यह बल केवल न्यूक्लियॉनों के बीच कार्य करता है और इसकी सीमा अत्यंत सीमित होती है।

नाभिकीय आकार और त्रिज्या

प्रयोगों से यह ज्ञात हुआ है कि नाभिक का आकार परमाणु की तुलना में अत्यंत छोटा होता है। नाभिक की त्रिज्या द्रव्यमान संख्या पर निर्भर करती है, जो यह संकेत देती है कि नाभिकीय पदार्थ लगभग स्थिर घनत्व वाला होता है। यह तथ्य नाभिक की सामूहिक प्रकृति को स्पष्ट रूप से दर्शाता है।

जैसे-जैसे नाभिक में न्यूक्लियॉनों की संख्या बढ़ती है, नाभिक का आयतन बढ़ता है, किन्तु घनत्व लगभग अपरिवर्तित रहता है। यह व्यवहार नाभिकीय बलों की विशिष्ट प्रकृति को प्रतिबिंबित करता है।

द्रव्यमान दोष

नाभिकीय संरचना के अध्ययन में एक महत्त्वपूर्ण तथ्य यह सामने आता है कि नाभिक का वास्तविक द्रव्यमान उसमें उपस्थित स्वतंत्र प्रोटॉनों और न्यूट्रॉनों के द्रव्यमानों के योग से थोड़ा कम होता है। इस अंतर को द्रव्यमान दोष कहा जाता है।

यह द्रव्यमान दोष नाभिक के निर्माण के समय ऊर्जा के उत्सर्जन का संकेत देता है। द्रव्यमान और ऊर्जा के समतुल्यता सिद्धांत के अनुसार यह द्रव्यमान अंतर ऊर्जा के रूप में प्रकट होता है। यही ऊर्जा नाभिक की स्थिरता का मूल कारण है।

बंधन ऊर्जा

नाभिक को उसके घटक न्यूक्लियॉनों में विभाजित करने के लिए जिस ऊर्जा की आवश्यकता होती है, उसे बंधन ऊर्जा कहा जाता है। यह ऊर्जा नाभिकीय बलों की मज़बूती का प्रत्यक्ष माप है।

बंधन ऊर्जा प्रति न्यूक्लियॉन नाभिक की स्थिरता का एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण संकेतक है। जिन नाभिकों में यह मान अधिक होता है, वे अधिक स्थिर होते हैं। इसी अवधारणा से नाभिकीय विखंडन और संलयन जैसी प्रक्रियाओं की ऊर्जा-उपज को समझा जा सकता है।

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बंधन ऊर्जा प्रति न्यूक्लियॉन और स्थिरता

नाभिक की स्थिरता को मात्र कुल बंधन ऊर्जा से नहीं, बल्कि बंधन ऊर्जा प्रति न्यूक्लियॉन से अधिक सटीक रूप में समझा जाता है। यह राशि यह दर्शाती है कि नाभिक के प्रत्येक न्यूक्लियॉन को नाभिक से अलग करने के लिए औसतन कितनी ऊर्जा की आवश्यकता होगी। यह अवधारणा विभिन्न नाभिकों की तुलना करने में अत्यंत उपयोगी सिद्ध होती है।

यदि विभिन्न द्रव्यमान संख्याओं वाले नाभिकों के लिए बंधन ऊर्जा प्रति न्यूक्लियॉन को निरूपित किया जाए, तो एक विशिष्ट वक्र प्राप्त होता है। इस वक्र का अधिकतम मान मध्यम द्रव्यमान वाले नाभिकों के लिए पाया जाता है, जो यह संकेत देता है कि ऐसे नाभिक सर्वाधिक स्थिर होते हैं।

बंधन ऊर्जा वक्र का अर्थ

बंधन ऊर्जा प्रति न्यूक्लियॉन वक्र नाभिकीय प्रक्रियाओं की ऊर्जा-उत्पत्ति को समझने की कुंजी है। हल्के नाभिकों के लिए, जहाँ यह मान अपेक्षाकृत कम होता है, दो नाभिकों के संलयन से अधिक स्थिर नाभिक बनता है और ऊर्जा मुक्त होती है। इसी सिद्धांत पर नाभिकीय संलयन आधारित है।

इसके विपरीत, अत्यधिक भारी नाभिकों में बंधन ऊर्जा प्रति न्यूक्लियॉन पुनः घटने लगती है। ऐसे नाभिकों के विखंडन से दो अपेक्षाकृत स्थिर नाभिक बनते हैं और ऊर्जा उत्सर्जित होती है। यह प्रक्रिया नाभिकीय विखंडन कहलाती है। इस प्रकार, एक ही वक्र संलयन और विखंडन— दोनों प्रक्रियाओं को एकीकृत रूप में स्पष्ट करता है।

रेडियोधर्मिता की अवधारणा

कुछ नाभिक प्राकृतिक रूप से अस्थिर होते हैं और समय के साथ स्वतः रूपांतरण की प्रवृत्ति दिखाते हैं। इस स्वतः होने वाली प्रक्रिया को रेडियोधर्मिता कहा जाता है। रेडियोधर्मिता नाभिक की आंतरिक संरचना से जुड़ी होती है और बाह्य परिस्थितियों से प्रायः अप्रभावित रहती है।

रेडियोधर्मी क्षय के दौरान नाभिक से विभिन्न प्रकार के कण या विकिरण उत्सर्जित हो सकते हैं। इन उत्सर्जनों के गुण नाभिक की अस्थिरता की प्रकृति को प्रतिबिंबित करते हैं।

रेडियोधर्मी क्षय के प्रकार

रेडियोधर्मी क्षय को मुख्यतः तीन श्रेणियों में वर्गीकृत किया जाता है। इनमें प्रत्येक का नाभिकीय संरचना पर भिन्न प्रभाव पड़ता है।

  • अल्फा क्षय: इस प्रक्रिया में नाभिक से दो प्रोटॉन और दो न्यूट्रॉन एक साथ उत्सर्जित होते हैं, जिससे नाभिक की द्रव्यमान संख्या और परमाणु क्रमांक दोनों घट जाते हैं।
  • बीटा क्षय: इसमें नाभिक के भीतर न्यूट्रॉन और प्रोटॉन के परस्पर रूपांतरण के साथ इलेक्ट्रॉन या पॉज़िट्रॉन का उत्सर्जन होता है, जबकि द्रव्यमान संख्या अपरिवर्तित रहती है।
  • गामा क्षय: यह नाभिक के ऊर्जा स्तरों के पुनर्विन्यास से संबंधित है, जिसमें उच्च ऊर्जा की विद्युतचुम्बकीय तरंगें उत्सर्जित होती हैं और नाभिक अधिक स्थिर अवस्था में पहुँचता है।

रेडियोधर्मी क्षय का नियम

रेडियोधर्मी क्षय एक सांख्यिकीय प्रक्रिया है। यह इस तथ्य को दर्शाता है कि किसी नाभिक के क्षय का समय पूर्वनिर्धारित नहीं किया जा सकता, किन्तु बड़ी संख्या में नाभिकों के लिए क्षय की दर एक निश्चित नियम का पालन करती है।

इस नियम के अनुसार किसी समय पर क्षय की दर उस समय उपस्थित अविघटित नाभिकों की संख्या के अनुपाती होती है। इसी से अर्ध-आयु की अवधारणा जन्म लेती है, जो यह बताती है कि किसी रेडियोधर्मी पदार्थ की आधी मात्रा के क्षय में औसतन कितना समय लगता है।

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अर्ध-आयु और औसत आयु

रेडियोधर्मी क्षय की प्रक्रिया को समझने के लिए अर्ध-आयु की अवधारणा अत्यंत महत्वपूर्ण है। किसी रेडियोधर्मी पदार्थ की अर्ध-आयु वह समय है जिसमें उसकी प्रारंभिक मात्रा का आधा भाग क्षय हो जाता है। यह मात्रा पदार्थ की रासायनिक अवस्था, ताप या दाब पर निर्भर नहीं करती, बल्कि केवल नाभिकीय संरचना पर निर्भर करती है।

अर्ध-आयु के साथ-साथ औसत आयु की अवधारणा भी रेडियोधर्मिता के सांख्यिकीय स्वरूप को स्पष्ट करती है। औसत आयु यह दर्शाती है कि किसी नाभिक का औसतन कितने समय तक अस्तित्व रहता है इससे पहले कि वह क्षय हो। इन दोनों अवधारणाओं का प्रयोग रेडियोधर्मी तिथांकन, चिकित्सीय उपयोगों और नाभिकीय अनुसंधान में व्यापक रूप से किया जाता है।

नाभिकीय ऊर्जा

बंधन ऊर्जा की अवधारणा यह संकेत देती है कि नाभिक के भीतर अत्यधिक ऊर्जा निहित रहती है। जब नाभिकीय संरचना में परिवर्तन होता है, तो इस ऊर्जा का कुछ भाग मुक्त हो सकता है। इसी सिद्धांत पर नाभिकीय ऊर्जा आधारित है।

नाभिकीय ऊर्जा का स्रोत रासायनिक ऊर्जा की तुलना में कई गुना अधिक शक्तिशाली होता है, क्योंकि इसमें द्रव्यमान-ऊर्जा समतुल्यता सीधे रूप में कार्य करती है। यही कारण है कि बहुत कम द्रव्यमान परिवर्तन से अत्यधिक ऊर्जा प्राप्त की जा सकती है।

नाभिकीय विखंडन

नाभिकीय विखंडन वह प्रक्रिया है जिसमें एक भारी नाभिक दो या अधिक हल्के नाभिकों में विभाजित हो जाता है, और साथ ही ऊर्जा का उत्सर्जन होता है। यह प्रक्रिया आमतौर पर न्यूट्रॉन के अवशोषण से आरंभ होती है।

विखंडन के दौरान नए न्यूट्रॉन भी उत्पन्न होते हैं, जो अन्य नाभिकों में विखंडन की प्रक्रिया को प्रेरित कर सकते हैं। इस प्रकार एक श्रृंखला अभिक्रिया संभव हो जाती है। नाभिकीय रिएक्टरों में इसी श्रृंखला अभिक्रिया को नियंत्रित रूप में संचालित किया जाता है।

नाभिकीय संलयन

नाभिकीय संलयन में दो या अधिक हल्के नाभिक संयोजित होकर एक अधिक स्थिर नाभिक बनाते हैं। इस प्रक्रिया में भी ऊर्जा का उत्सर्जन होता है, जो बंधन ऊर्जा प्रति न्यूक्लियॉन के वृद्धि से संबंधित होता है।

संलयन वह प्रक्रिया है जो सूर्य और तारों में ऊर्जा का मुख्य स्रोत है। हालाँकि पृथ्वी पर संलयन को नियंत्रित रूप में साधना तकनीकी रूप से कठिन है, फिर भी यह भविष्य की ऊर्जा आवश्यकताओं के लिए एक महत्वपूर्ण संभावना प्रस्तुत करता है।

नाभिकीय भौतिकी का समेकित महत्व

नाभिकीय भौतिकी केवल ऊर्जा उत्पादन तक सीमित नहीं है। रेडियोधर्मिता के सिद्धांत चिकित्सा में निदान और उपचार, पुरातात्विक अवशेषों की आयु निर्धारण, और ब्रह्मांडीय प्रक्रियाओं के अध्ययन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

यह अध्याय यह स्पष्ट करता है कि नाभिक का अध्ययन पदार्थ की स्थिरता, ऊर्जा के स्रोतों, और प्रकृति के मूल नियमों को समझने की दिशा में एक अनिवार्य कदम है।

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समेकित दृष्टिकोण

नाभिक का अध्ययन यह स्पष्ट करता है कि पदार्थ की स्थिरता, ऊर्जा का अस्तित्व और रूपांतरण सूक्ष्म स्तर पर नाभिकीय बलों और ऊर्जा विविक्तता द्वारा नियंत्रित होते हैं। द्रव्यमान दोष, बंधन ऊर्जा, और रेडियोधर्मिता जैसी अवधारणाएँ एक-दूसरे से पृथक नहीं, बल्कि एक सुसंगत वैज्ञानिक संरचना का भाग हैं।

बंधन ऊर्जा प्रति न्यूक्लियॉन वक्र हल्के और भारी नाभिकों के व्यवहार को एक ही दृष्टि से समझने की सुविधा प्रदान करता है। इसी वक्र से नाभिकीय विखंडन और संलयन दोनों की ऊर्जा-उपज स्वाभाविक रूप से स्पष्ट हो जाती है। यह अध्याय प्रकृति में निहित अत्यंत शक्तिशाली ऊर्जा स्रोतों की वैज्ञानिक व्याख्या प्रस्तुत करता है।

संक्षिप्त नोट्स

  • नाभिक प्रोटॉन और न्यूट्रॉन से मिलकर बना होता है।
  • नाभिकीय बल अल्प दूरी का अत्यंत प्रबल बल है।
  • द्रव्यमान दोष नाभिकीय बंधन का संकेत है।
  • बंधन ऊर्जा प्रति न्यूक्लियॉन नाभिक की स्थिरता दर्शाती है।
  • मध्यम द्रव्यमान वाले नाभिक सर्वाधिक स्थिर होते हैं।
  • रेडियोधर्मिता एक स्वतः होने वाली नाभिकीय प्रक्रिया है।
  • अर्ध-आयु रेडियोधर्मी क्षय की सांख्यिकीय प्रकृति दर्शाती है।
  • नाभिकीय विखंडन और संलयन ऊर्जा के प्रमुख स्रोत हैं।

इस अध्याय से संबंधित प्रमुख प्रयोग

  • रदरफोर्ड प्रकीर्णन प्रयोग: नाभिकीय संरचना और परमाणु के रिक्त स्वरूप की पुष्टि।
  • द्रव्यमान दोष का निर्धारण: नाभिकीय द्रव्यमान और न्यूक्लियॉनों के योग की तुलना।
  • रेडियोधर्मी क्षय का अध्ययन: समय के साथ सक्रियता में परिवर्तन का प्रायोगिक अवलोकन।

वैज्ञानिक योगदान

  • एर्नेस्ट रदरफोर्ड: नाभिकीय मॉडल द्वारा परमाणु की केन्द्रीय संरचना स्पष्ट की।
  • जेम्स चैडविक: न्यूट्रॉन की खोज कर नाभिक की संरचना को पूर्ण किया।
  • अल्बर्ट आइंस्टीन: द्रव्यमान–ऊर्जा समतुल्यता द्वारा नाभिकीय ऊर्जा का सिद्धांत प्रदान किया।

दैनिक जीवन एवं प्रौद्योगिकी में उपयोग

नाभिकीय भौतिकी के सिद्धांत चिकित्सा में कैंसर उपचार, औद्योगिक रेडियोग्राफी, पुरातात्विक तिथांकन, और विद्युत उत्पादन में व्यापक रूप से प्रयुक्त होते हैं। नाभिकीय ऊर्जा संयंत्र और चिकित्सीय रेडियोआइसोटोप इस अध्याय की अवधारणाओं के प्रत्यक्ष अनुप्रयोग हैं।

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अस्वीकरण

यह अध्ययन सामग्री राजस्थान माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (RBSE) के निर्धारित पाठ्यक्रम के अनुरूप शैक्षणिक उद्देश्य से तैयार की गई है। परीक्षा में उत्तर लेखन हेतु आधिकारिक पाठ्यपुस्तकों का अध्ययन आवश्यक है।

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