RBSE Class 12 Physics – Wave Optics | तरंग प्रकाशिकी Complete Guide 2026

📅 Tuesday, 13 January 2026 📖 3-5 min read

किरण प्रकाशिकी एवं प्रकाशीय उपकरण
Ray Optics and Optical Instruments

प्रकाश का अध्ययन भौतिकी की उन आधारभूत शाखाओं में से है जिसने मानव सभ्यता के वैज्ञानिक विकास को गहराई से प्रभावित किया है। प्रकाश की प्रकृति को समझने के प्रारंभिक प्रयासों में यह पाया गया कि कुछ परिस्थितियों में प्रकाश का व्यवहार तरंगों की अपेक्षा सरल रेखाओं में गमन करने वाली किरणों के रूप में अधिक उपयुक्त रूप से व्यक्त किया जा सकता है। इसी दृष्टिकोण से विकसित अध्ययन क्षेत्र को किरण प्रकाशिकी कहा जाता है।

किरण प्रकाशिकी उस सीमा में लागू होती है जहाँ प्रकाश की तरंगदैर्घ्य, अध्ययन की जा रही वस्तुओं के आयामों की तुलना में अत्यंत छोटी होती है। इस स्थिति में प्रकाश के प्रसार को ज्यामितीय नियमों द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है, जिससे परावर्तन, अपवर्तन और प्रतिबिंब निर्माण जैसे प्रभावों का विश्लेषण संभव होता है।

प्रकाशीय माध्यम एवं प्रकाश की चाल

प्रकाश का गमन निर्वात में सर्वाधिक सरल रूप में समझा जाता है, जहाँ उसकी चाल एक निश्चित भौतिक स्थिरांक के रूप में स्थापित है। किसी भौतिक माध्यम में प्रवेश करने पर प्रकाश की चाल परिवर्तित हो जाती है। यह परिवर्तन माध्यम के आंतरिक गुणों पर निर्भर करता है और आगे चलकर अपवर्तन तथा पूर्ण आंतरिक परावर्तन जैसे प्रभावों को जन्म देता है।

प्रत्येक माध्यम को उसकी प्रकाशीय सघनता द्वारा निरूपित किया जाता है। यह सघनता द्रव्यमान घनत्व से भिन्न अवधारणा है और यह दर्शाती है कि कोई माध्यम प्रकाश के गमन को किस सीमा तक प्रभावित करता है।

प्रकाश का परावर्तन

जब प्रकाश किसी सतह से टकराकर उसी माध्यम में वापस लौट आता है, तो इस प्रक्रिया को परावर्तन कहा जाता है। परावर्तन की घटना दैनिक जीवन से लेकर खगोलीय प्रेक्षणों तक अत्यंत व्यापक रूप से देखी जाती है।

परावर्तन के नियम प्रकाशीय विश्लेषण की आधारशिला हैं। किसी भी परावर्तन प्रक्रिया में आपतित किरण, परावर्तित किरण तथा अभिलंब सदैव एक ही तल में स्थित रहते हैं। इसके अतिरिक्त, आपतन कोण और परावर्तन कोण परस्पर समान होते हैं।

इन नियमों की सार्वभौमिकता का प्रमाण समतल दर्पण से लेकर विशाल खगोलीय दर्पणों तक प्रत्येक प्रकाशीय प्रणाली में देखा जा सकता है।

गोलाकार दर्पण

जब परावर्तक सतह समतल न होकर वक्र होती है, तब प्रकाश का व्यवहार और अधिक रोचक हो जाता है। ऐसी सतहें जिनका आकार किसी गोले के भाग के रूप में हो, गोलाकार दर्पण कहलाती हैं। गोलाकार दर्पण दो प्रकार के होते हैं—अवतल और उत्तल।

अवतल दर्पण प्रकाश किरणों को अभिसरित करने की क्षमता रखता है, जबकि उत्तल दर्पण प्रकाश किरणों को अपसारित करता है। इन्हीं गुणों के कारण अवतल दर्पण का उपयोग प्रकाशीय उपकरणों में तथा उत्तल दर्पण का उपयोग वाहनों में किया जाता है।

गोलाकार दर्पणों के लिए विकसित दर्पण सूत्र और आवर्धन की अवधारणा आगे चलकर लेंसों तथा प्रकाशीय उपकरणों के विश्लेषण का आधार बनती है।

प्रकाश का अपवर्तन

जब प्रकाश एक माध्यम से दूसरे माध्यम में प्रवेश करता है और उसकी चाल परिवर्तित होती है, तो उसकी दिशा में भी परिवर्तन होता है। इस घटना को अपवर्तन कहा जाता है। अपवर्तन की प्रक्रिया प्रकाशीय घटनाओं की एक नई श्रेणी को जन्म देती है, जिसमें लेंस क्रिया और दृष्टि तंत्र सम्मिलित हैं।

अपवर्तन के नियम यह स्पष्ट करते हैं कि आपतित किरण, अपवर्तित किरण तथा अभिलंब एक ही तल में स्थित रहते हैं तथा आपतन कोण और अपवर्तन कोण के बीच एक निश्चित गणितीय संबंध होता है।

पूर्ण आंतरिक परावर्तन

कुछ विशिष्ट परिस्थितियों में अपवर्तन के स्थान पर प्रकाश का पूर्ण परावर्तन हो जाता है। इस घटना को पूर्ण आंतरिक परावर्तन कहा जाता है। यह घटना तब घटित होती है जब प्रकाश सघन माध्यम से विरल माध्यम की ओर गमन करता है और आपतन कोण एक विशिष्ट सीमा से अधिक हो जाता है।

पूर्ण आंतरिक परावर्तन का उपयोग प्रकाशीय रेशों, दूरसंचार तकनीक और आधुनिक चिकित्सा उपकरणों में व्यापक रूप से किया जाता है।

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लेंसों की अवधारणा

अपवर्तन की प्रक्रिया का व्यवस्थित उपयोग तब संभव हुआ जब पारदर्शी माध्यमों को विशिष्ट वक्र सतहों के साथ ढाला गया। ऐसे पारदर्शी पिंड जिनकी कम से कम एक सतह वक्र होती है और जो अपवर्तन द्वारा प्रकाश किरणों की दिशा बदलते हैं, लेंस कहलाते हैं। लेंसों का अध्ययन किरण प्रकाशिकी का एक केंद्रीय भाग है, क्योंकि मानव दृष्टि से लेकर आधुनिक वैज्ञानिक उपकरणों तक इनकी भूमिका सर्वव्यापी है।

लेंस मुख्यतः दो प्रकार के होते हैं—उत्तल लेंस और अवतल लेंस। इन दोनों के प्रकाशीय व्यवहार में मूलभूत अंतर पाया जाता है, जिसका कारण उनकी वक्रता की प्रकृति और माध्यम की प्रकाशीय सघनता है।

उत्तल लेंस

उत्तल लेंस वह लेंस होता है जिसकी मध्य मोटाई किनारों की तुलना में अधिक होती है। जब मुख्य अक्ष के समांतर प्रकाश किरणें उत्तल लेंस पर आपतित होती हैं, तो अपवर्तन के पश्चात वे एक बिंदु पर एकत्रित हो जाती हैं। इस कारण उत्तल लेंस को अभिसारी लेंस भी कहा जाता है।

उत्तल लेंस वास्तविक तथा आभासी दोनों प्रकार के प्रतिबिंब बना सकता है। प्रतिबिंब की प्रकृति वस्तु की स्थिति पर निर्भर करती है। निकट स्थित वस्तुओं के लिए आभासी और आवर्धित प्रतिबिंब प्राप्त होता है, जबकि अपेक्षाकृत दूर स्थित वस्तुओं के लिए वास्तविक और उल्टा प्रतिबिंब बनता है।

अवतल लेंस

अवतल लेंस की मध्य मोटाई किनारों की तुलना में कम होती है। यह लेंस प्रकाश किरणों को अपवर्तन के पश्चात फैला देता है, अतः इसे अपसारी लेंस कहा जाता है। अवतल लेंस सदैव आभासी, सीधा और लघु प्रतिबिंब बनाता है।

इस गुण के कारण अवतल लेंस का उपयोग निकट दृष्टि दोष के सुधार में किया जाता है, जहाँ यह नेत्र में प्रवेश करने वाली किरणों को इस प्रकार समायोजित करता है कि वे रेटिना पर सही ढंग से केंद्रित हो सकें।

लेंस से संबंधित प्रमुख पद

लेंसों के अध्ययन में कुछ ज्यामितीय पद अत्यंत महत्त्वपूर्ण होते हैं। इन पदों की स्पष्ट समझ के बिना लेंस द्वारा प्रतिबिंब निर्माण का सही विश्लेषण संभव नहीं है।

  • ऑप्टिकल केंद्र: लेंस का वह बिंदु जिससे होकर गुजरने वाली किरण बिना विचलन के निकल जाती है।
  • मुख्य अक्ष: लेंस की दोनों वक्र सतहों के केंद्रों को जोड़ने वाली रेखा।
  • मुख्य फोकस: वह बिंदु जहाँ मुख्य अक्ष के समांतर आपतित किरणें अपवर्तन के बाद मिलती हैं या मिलती हुई प्रतीत होती हैं।
  • फोकस दूरी: ऑप्टिकल केंद्र और मुख्य फोकस के बीच की दूरी।

लेंस सूत्र और आवर्धन

लेंस द्वारा बनने वाले प्रतिबिंब की स्थिति और आकार का निर्धारण एक सामान्य गणितीय संबंध द्वारा किया जाता है, जिसे लेंस सूत्र कहा जाता है। यह सूत्र वस्तु दूरी, प्रतिबिंब दूरी और फोकस दूरी के बीच स्पष्ट संबंध स्थापित करता है।

इसी प्रकार आवर्धन की अवधारणा प्रतिबिंब के आकार और वस्तु के आकार के अनुपात को व्यक्त करती है। आवर्धन का चिह्न प्रतिबिंब की प्रकृति— सीधा या उल्टा—की सूचना देता है, जबकि उसका परिमाण यह दर्शाता है कि प्रतिबिंब वस्तु की तुलना में कितना बड़ा या छोटा है।

लेंसों का व्यावहारिक महत्व

लेंसों का उपयोग केवल सैद्धांतिक अध्ययन तक सीमित नहीं है। दैनिक जीवन में प्रयुक्त चश्मों से लेकर कैमरा, प्रोजेक्टर, सूक्ष्मदर्शी और दूरबीन जैसे उपकरणों तक लेंसों की भूमिका निर्णायक है। इन सभी उपकरणों की कार्यप्रणाली किरण प्रकाशिकी के उन्हीं नियमों पर आधारित है जिनका अध्ययन इस अध्याय में किया जाता है।

लेंसों के सिद्धांतों की यही सार्वभौमिकता किरण प्रकाशिकी को भौतिकी की एक अत्यंत व्यावहारिक और प्रभावशाली शाखा बनाती है।

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प्रकाशीय उपकरणों का विकास

किरण प्रकाशिकी के सिद्धांतों का सबसे सशक्त प्रयोग प्रकाशीय उपकरणों के रूप में दिखाई देता है। इन उपकरणों का उद्देश्य मानव नेत्र की सीमाओं को विस्तारित करना है— या तो अत्यंत सूक्ष्म वस्तुओं को स्पष्ट बनाना, या बहुत दूर स्थित वस्तुओं को निकट एवं विस्तृत रूप में प्रस्तुत करना।

प्रकाशीय उपकरणों की संरचना दर्पणों और लेंसों के संयोजन पर आधारित होती है। इन संयोजनों का चयन वांछित आवर्धन, स्पष्टता और उपयोगिता के अनुसार किया जाता है। इसी क्रम में सूक्ष्मदर्शी और दूरबीन किरण प्रकाशिकी के सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण अनुप्रयोग बनकर उभरे हैं।

सरल सूक्ष्मदर्शी

सरल सूक्ष्मदर्शी मूलतः एक उत्तल लेंस होता है, जो वस्तु को उसके फोकस के भीतर रखकर एक आभासी, सीधा तथा आवर्धित प्रतिबिंब बनाता है। इस प्रकार का उपकरण छोटे अक्षरों या सूक्ष्म संरचनाओं को देखने के लिए दैनिक जीवन में प्रयुक्त होता है।

सरल सूक्ष्मदर्शी का सिद्धांत मानव नेत्र की न्यूनतम स्पष्ट दृष्टि दूरी पर आधारित है। लेंस का उचित चयन आवर्धन को अधिकतम करने में सहायक होता है, जिससे वस्तु का सूक्ष्म विवरण भी स्पष्ट दिखाई देता है।

संयोजित सूक्ष्मदर्शी

संयोजित सूक्ष्मदर्शी दो उत्तल लेंसों— उद्देश्य लेंस और नेत्र लेंस— के संयोजन से निर्मित होता है। उद्देश्य लेंस वस्तु का वास्तविक, उल्टा और आवर्धित प्रतिबिंब बनाता है, जिसे नेत्र लेंस और अधिक बड़ा करके नेत्र के लिए उपयुक्त बनाता है।

इस दो-स्तरीय आवर्धन प्रक्रिया के कारण संयोजित सूक्ष्मदर्शी अत्यंत सूक्ष्म संरचनाओं के अध्ययन में सक्षम होता है। जैव विज्ञान, चिकित्सा और पदार्थ विज्ञान में इस उपकरण का योगदान अत्यंत महत्त्वपूर्ण रहा है।

दूरबीन

दूरबीन का उपयोग दूर स्थित वस्तुओं को देखने के लिए किया जाता है। खगोलीय दूरबीन दो उत्तल लेंसों— उद्देश्य और नेत्र— पर आधारित होती है। उद्देश्य लेंस दूर स्थित वस्तु का वास्तविक और उल्टा प्रतिबिंब बनाता है, जिसे नेत्र लेंस आभासी और आवर्धित बनाकर नेत्र तक पहुँचाता है।

दूरबीन का सिद्धांत आकाशीय पिंडों के अध्ययन में अत्यंत क्रांतिकारी सिद्ध हुआ। इसने मानव को ब्रह्मांड के विस्तार, तारों की संरचना और ग्रहों की गति को समझने में नई दृष्टि प्रदान की।

प्रकाशीय उपकरणों की सीमाएँ

यद्यपि किरण प्रकाशिकी पर आधारित उपकरण अत्यंत प्रभावशाली हैं, फिर भी इनकी कुछ सीमाएँ होती हैं। प्रकाश के तरंगीय गुणों के कारण विवर्तन और व्यतिकरण जैसे प्रभाव उपकरणों की स्पष्टता को सीमित कर देते हैं।

इन्हीं सीमाओं को समझने के लिए प्रकाश की तरंग प्रकृति का अध्ययन आवश्यक हो जाता है, जो आगे चलकर तरंग प्रकाशिकी के विकास की ओर ले जाता है।

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किरण प्रकाशिकी का समेकित दृष्टिकोण

किरण प्रकाशिकी में प्रकाश को सीधी रेखाओं में गमन करने वाली किरणों के रूप में वर्णित किया जाता है। इस दृष्टिकोण से परावर्तन और अपवर्तन के नियम, दर्पणों तथा लेंसों द्वारा प्रतिबिंब निर्माण, और प्रकाशीय उपकरणों की कार्यप्रणाली एक सुसंगत वैज्ञानिक ढाँचे में जुड़ जाती है। यह अध्याय यह स्पष्ट करता है कि ज्यामितीय सिद्धांतों के माध्यम से प्रकाश जैसी जटिल प्राकृतिक घटना को सरल और प्रभावी रूप में समझा जा सकता है।

दर्पणों और लेंसों का व्यवहार, मानव नेत्र की संरचना, दृष्टि दोषों का सुधार, और सूक्ष्मदर्शी व दूरबीन जैसे उपकरण— ये सभी किरण प्रकाशिकी के व्यावहारिक अनुप्रयोग हैं। इन्हीं सिद्धांतों ने आधुनिक प्रकाश विज्ञान और प्रौद्योगिकी के विकास का मार्ग प्रशस्त किया।

संक्षिप्त नोट्स

  • किरण प्रकाशिकी प्रकाश को सीधी रेखाओं में गमन करता मानती है।
  • परावर्तन में आपतन कोण और परावर्तन कोण सदैव समान होते हैं।
  • अवतल दर्पण अभिसारी तथा उत्तल दर्पण अपसारी होता है।
  • अपवर्तन माध्यम की प्रकाशीय सघनता पर निर्भर करता है।
  • उत्तल लेंस अभिसारी और अवतल लेंस अपसारी होता है।
  • पूर्ण आंतरिक परावर्तन प्रकाशीय रेशों का आधार है।
  • मानव नेत्र अपवर्तन के सिद्धांत पर कार्य करता है।
  • दृष्टि दोषों का सुधार उपयुक्त लेंसों द्वारा किया जाता है।

इस अध्याय से संबंधित प्रयोग

  • गोलीय दर्पण द्वारा प्रतिबिंब निर्माण: विभिन्न वस्तु स्थितियों पर प्रतिबिंब की स्थिति, आकार और प्रकृति का अध्ययन।
  • लेंस सूत्र का सत्यापन: उत्तल लेंस द्वारा बने प्रतिबिंबों से लेंस सूत्र और आवर्धन का प्रायोगिक सत्यापन।
  • पूर्ण आंतरिक परावर्तन: काँच के प्रिज्म द्वारा पूर्ण आंतरिक परावर्तन की पुष्टि।
  • दृष्टि दोषों का अध्ययन: मॉडल की सहायता से निकट दृष्टि, दूर दृष्टि और वृद्धावस्था दृष्टि दोषों की व्याख्या।

वैज्ञानिक योगदान

  • इब्न अल-हैथम (Alhazen): प्रकाश के परावर्तन और दृष्टि के वैज्ञानिक अध्ययन द्वारा प्रकाशिकी को स्वतंत्र विज्ञान के रूप में स्थापित किया।
  • रेने देकार्त: अपवर्तन के नियमों के विकास में योगदान, जिससे आधुनिक प्रकाशिकी का मार्ग प्रशस्त हुआ।
  • आइज़ैक न्यूटन: प्रकाश के व्यवहार और प्रकाशीय उपकरणों के विकास में मौलिक योगदान।

दैनिक जीवन एवं प्रौद्योगिकी में उपयोग

किरण प्रकाशिकी के सिद्धांत दैनिक जीवन में सर्वत्र उपस्थित हैं। चश्मा, कैमरा, प्रोजेक्टर, वाहन दर्पण, दूरबीन, सूक्ष्मदर्शी और प्रकाशीय रेशे— ये सभी उपकरण इसी अध्याय में वर्णित सिद्धांतों पर आधारित हैं। चिकित्सा, संचार, खगोल विज्ञान और औद्योगिक निरीक्षण जैसे क्षेत्रों में इनका उपयोग निरंतर बढ़ रहा है।

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अस्वीकरण

यह अध्ययन सामग्री राजस्थान माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (RBSE) के निर्धारित पाठ्यक्रम के अनुरूप शैक्षणिक उद्देश्य से तैयार की गई है। परीक्षा में अंतिम उत्तर लेखन हेतु आधिकारिक पाठ्यपुस्तकों का अध्ययन आवश्यक है।

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तरंग प्रकाशिकी
Wave Optics

किरण प्रकाशिकी में प्रकाश को सीधी रेखाओं में गमन करने वाली किरणों के रूप में विवेचित किया गया था, जिससे परावर्तन और अपवर्तन जैसी घटनाओं की स्पष्ट व्याख्या संभव हुई। किन्तु कुछ प्रकाशीय घटनाएँ ऐसी हैं जिन्हें केवल किरण मॉडल से समझाया नहीं जा सकता। इन घटनाओं की व्याख्या के लिए प्रकाश की तरंग प्रकृति को स्वीकार करना अनिवार्य हो जाता है। प्रकाश के इसी तरंगीय व्यवहार का अध्ययन तरंग प्रकाशिकी कहलाता है।

तरंग प्रकाशिकी में प्रकाश को विद्युतचुम्बकीय तरंग के रूप में माना जाता है, जिसमें विद्युत तथा चुम्बकीय क्षेत्र परस्पर और तरंग के गमन की दिशा के लंबवत दोलन करते हैं। इस दृष्टिकोण से व्यतिकरण, विवर्तन तथा ध्रुवण जैसी घटनाओं की व्याख्या संभव होती है।

ह्यूजेंस का तरंग सिद्धांत

प्रकाश के तरंगीय व्यवहार को समझाने के लिए ह्यूजेंस ने एक सरल किंतु प्रभावशाली सिद्धांत प्रस्तुत किया। इस सिद्धांत के अनुसार, किसी तरंग अग्र के प्रत्येक बिंदु को द्वितीयक तरंगों का स्रोत माना जा सकता है। इन द्वितीयक तरंगों के अग्रभागों का स्पर्शी पृष्ठ अगले क्षण का नया तरंग अग्र बनाता है।

ह्यूजेंस का सिद्धांत परावर्तन और अपवर्तन के नियमों को तरंग दृष्टिकोण से व्युत्पन्न करने में सक्षम है। यद्यपि यह सिद्धांत प्रकाश की तीव्रता की पूर्ण व्याख्या नहीं करता, फिर भी यह तरंग प्रकाशिकी की आधारशिला के रूप में अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।

प्रकाश का व्यतिकरण

जब दो या दो से अधिक सुसंगत प्रकाश तरंगें किसी बिंदु पर पहुँचती हैं, तो उनके अध्यारोपण के कारण प्रकाश की तीव्रता में वृद्धि या ह्रास होता है। इस घटना को व्यतिकरण कहा जाता है। व्यतिकरण प्रकाश की तरंग प्रकृति का प्रत्यक्ष प्रमाण प्रदान करता है।

यदि तरंगें समान चरण में मिलती हैं, तो प्रबल व्यतिकरण उत्पन्न होता है और तीव्रता अधिकतम होती है। इसके विपरीत, विपरीत चरण में मिलने पर दुर्बल व्यतिकरण होता है और तीव्रता न्यूनतम हो जाती है।

यंग का द्वि-छिद्र प्रयोग

प्रकाश के व्यतिकरण का सर्वप्रसिद्ध प्रायोगिक प्रमाण यंग का द्वि-छिद्र प्रयोग है। इस प्रयोग में एक एकरंगी प्रकाश स्रोत से निकली तरंगें दो निकटवर्ती छिद्रों से होकर गुजरती हैं और पर्दे पर उज्ज्वल तथा अंधकारमय धारियों का क्रमिक विन्यास उत्पन्न करती हैं।

यह धारियाँ प्रबल और दुर्बल व्यतिकरण के प्रत्यक्ष परिणाम होती हैं। इस प्रयोग ने निर्णायक रूप से सिद्ध किया कि प्रकाश का व्यवहार तरंगीय है।

प्रकाश का विवर्तन

जब प्रकाश किसी अत्यंत संकीर्ण छिद्र से होकर गुजरता है या किसी अवरोध के किनारे से मुड़ता है, तो उसका सीधी रेखा में गमन बाधित हो जाता है। इस घटना को विवर्तन कहा जाता है। विवर्तन तब स्पष्ट होता है जब अवरोध का आयाम प्रकाश की तरंगदैर्घ्य के तुल्य हो।

विवर्तन की उपस्थिति यह दर्शाती है कि प्रकाश केवल किरणों का समूह नहीं, बल्कि एक तरंगीय घटना है, जिसमें तरंगें अपनी ऊर्जा को स्थान में फैलाती हैं।

प्रकाश का ध्रुवण

प्रकाश तरंगों में विद्युत क्षेत्र के दोलन सभी दिशाओं में हो सकते हैं। जब इन दोलनों को किसी एक निश्चित तल तक सीमित कर दिया जाता है, तो इस प्रक्रिया को ध्रुवण कहा जाता है।

ध्रुवण केवल अनुप्रस्थ तरंगों में संभव होता है। इस कारण, ध्रुवण की घटना प्रकाश के अनुप्रस्थ तरंग होने का सशक्त प्रमाण प्रस्तुत करती है। ध्रुवण का उपयोग सनग्लास, फोटोग्राफी और प्रदर्शन तकनीक में व्यापक रूप से किया जाता है।

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यंग के द्वि-छिद्र प्रयोग का विश्लेषण

यंग के द्वि-छिद्र प्रयोग में दो सुसंगत प्रकाश स्रोतों से उत्पन्न तरंगें पर्दे के किसी बिंदु पर पहुँचकर अध्यारोपित होती हैं। पथांतर के मान पर निर्भर करते हुए कभी प्रबल और कभी दुर्बल व्यतिकरण उत्पन्न होता है। यही कारण है कि पर्दे पर उज्ज्वल तथा अंधकारमय धारियाँ क्रमिक रूप से दिखाई देती हैं।

जब किसी बिंदु पर दोनों तरंगों के बीच पथांतर पूर्णांक गुणज के बराबर होता है, तो वहाँ प्रबल व्यतिकरण होता है और उज्ज्वल धारी बनती है। इसके विपरीत, अर्ध-पूर्णांक गुणज के पथांतर पर दुर्बल व्यतिकरण होता है और अंधकारमय धारी प्राप्त होती है।

धारी चौड़ाई (Fringe Width)

लगातार दो उज्ज्वल या दो अंधकारमय धारियों के बीच की दूरी धारी चौड़ाई कहलाती है। धारी चौड़ाई प्रयोग की ज्यामिति और प्रयुक्त प्रकाश की तरंगदैर्घ्य पर निर्भर करती है।

यदि प्रकाश की तरंगदैर्घ्य बढ़ाई जाए या पर्दे की दूरी बढ़ाई जाए, तो धारी चौड़ाई बढ़ जाती है। इसके विपरीत, छिद्रों के बीच की दूरी बढ़ाने पर धारियाँ सघन हो जाती हैं। यह संबंध प्रकाश की तरंगीय प्रकृति को स्पष्ट रूप से प्रदर्शित करता है।

विवर्तन का विस्तृत अध्ययन

विवर्तन की घटना उस समय विशेष रूप से स्पष्ट हो जाती है जब प्रकाश किसी संकीर्ण छिद्र से होकर गुजरता है। ऐसी स्थिति में पर्दे पर प्राप्त तीव्रता वितरण समान नहीं होता, बल्कि केंद्रीय उज्ज्वल अधिकतम और उसके दोनों ओर क्रमिक न्यूनतम और अधिकतम दिखाई देते हैं।

विवर्तन यह दर्शाता है कि प्रकाश तरंगें ऊर्जा को स्थान में फैलाती हैं और केवल ज्यामितीय किरणों तक सीमित नहीं रहतीं। यही कारण है कि किरण प्रकाशिकी कुछ सीमाओं के भीतर ही सटीक परिणाम प्रदान करती है।

ध्रुवण के प्रकार

प्रकाश का ध्रुवण विभिन्न विधियों द्वारा किया जा सकता है। इन विधियों में परावर्तन द्वारा ध्रुवण, अपवर्तन द्वारा ध्रुवण और चयनात्मक अवशोषण द्वारा ध्रुवण प्रमुख हैं।

कुछ विशिष्ट कोणों पर परावर्तन के समय परावर्तित प्रकाश पूर्णतः ध्रुवित हो जाता है। इसी सिद्धांत का उपयोग धूप के चश्मों और प्रकाशीय फिल्टरों में किया जाता है, जहाँ अवांछित परावर्तित प्रकाश को कम किया जाता है।

तरंग प्रकाशिकी का समेकित महत्व

तरंग प्रकाशिकी प्रकाश की उन घटनाओं की व्याख्या प्रस्तुत करती है जिन्हें किरण मॉडल द्वारा समझाया नहीं जा सकता। व्यतिकरण, विवर्तन और ध्रुवण प्रकाश के तरंगीय स्वरूप के निर्णायक प्रमाण हैं।

इन सिद्धांतों ने आधुनिक प्रकाश विज्ञान, लेजर तकनीक, संचार प्रणालियों और उन्नत प्रकाशीय उपकरणों के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

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संक्षिप्त नोट्स

  • तरंग प्रकाशिकी प्रकाश की तरंग प्रकृति का अध्ययन करती है।
  • ह्यूजेंस का सिद्धांत तरंग अग्र की अवधारणा प्रस्तुत करता है।
  • व्यतिकरण सुसंगत तरंगों के अध्यारोपण का परिणाम है।
  • यंग का द्वि-छिद्र प्रयोग प्रकाश की तरंग प्रकृति का निर्णायक प्रमाण है।
  • धारी चौड़ाई तरंगदैर्घ्य और प्रयोग की ज्यामिति पर निर्भर करती है।
  • विवर्तन प्रकाश का अवरोधों के चारों ओर मुड़ना है।
  • ध्रुवण केवल अनुप्रस्थ तरंगों का गुण है।

इस अध्याय से संबंधित प्रयोग

  • यंग का द्वि-छिद्र प्रयोग: प्रकाश के व्यतिकरण का प्रायोगिक अध्ययन।
  • एकल छिद्र विवर्तन: केंद्रीय अधिकतम और न्यूनतम का निरीक्षण।
  • ध्रुवण का अध्ययन: ध्रुवण फिल्टर की सहायता से प्रकाश की अनुप्रस्थ प्रकृति का सत्यापन।

वैज्ञानिक योगदान

  • क्रिस्टियान ह्यूजेंस: प्रकाश के तरंग सिद्धांत का प्रतिपादन।
  • थॉमस यंग: द्वि-छिद्र प्रयोग द्वारा प्रकाश की तरंग प्रकृति का प्रमाण।
  • ऑगस्टिन फ्रेस्नेल: विवर्तन और व्यतिकरण सिद्धांत का विकास।

दैनिक जीवन एवं तकनीकी उपयोग

तरंग प्रकाशिकी के सिद्धांत लेजर तकनीक, फाइबर ऑप्टिक संचार, होलोग्राफी, एंटी-ग्लेयर चश्मे और उच्च-रिज़ॉल्यूशन प्रकाशीय उपकरणों में व्यापक रूप से प्रयुक्त होते हैं। आधुनिक संचार और चिकित्सा प्रणालियों की नींव इन्हीं तरंगीय अवधारणाओं पर आधारित है।

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यह अध्ययन सामग्री राजस्थान माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (RBSE) के निर्धारित पाठ्यक्रम के अनुरूप केवल शैक्षणिक उद्देश्य से तैयार की गई है। परीक्षा में उत्तर लेखन हेतु आधिकारिक पाठ्यपुस्तकों का अध्ययन आवश्यक है।

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