RBSE कक्षा 9 विज्ञान 2026–27: सम्पूर्ण अध्ययन सामग्री
सरल हिन्दी में विज्ञान की अवधारणाएँ, सचित्र व्याख्या, वैज्ञानिक प्रयोग, उदाहरण, सूत्र और परीक्षा उपयोगी अभ्यास।
विज्ञान: प्रकृति को समझने का माध्यम
हम जिस संसार में रहते हैं, वह अनेक प्रकार की वस्तुओं, जीवों, पदार्थों और प्राकृतिक घटनाओं से मिलकर बना है। पानी का बर्फ में बदलना, पौधों का बढ़ना, आकाश में बादलों का बनना, वस्तुओं का नीचे गिरना, ध्वनि का सुनाई देना और भोजन का उत्पादन होना—ये सभी विज्ञान के अध्ययन से जुड़ी घटनाएँ हैं।
विज्ञान केवल तथ्यों और परिभाषाओं को याद करने का विषय नहीं है। यह प्रश्न पूछने, निरीक्षण करने, प्रयोग करने, प्रमाण जुटाने और तर्क के आधार पर निष्कर्ष निकालने की व्यवस्थित प्रक्रिया है। विज्ञान हमें यह समझने में सहायता करता है कि कोई घटना क्यों और कैसे घटित होती है।
RBSE कक्षा 9 विज्ञान पाठ्यक्रम 2026–27
माध्यमिक शिक्षा बोर्ड, राजस्थान, अजमेर द्वारा जारी सत्र 2026–27 के आधिकारिक पाठ्यक्रम के अनुसार कक्षा 9 विज्ञान में 12 अध्याय निर्धारित हैं। इस विषय का कोड 07 है और निर्धारित पुस्तक NCERT विज्ञान है।
| क्रम | अध्याय का नाम | अंकभार |
|---|---|---|
| 1 | हमारे आस-पास के पदार्थ | 7 |
| 2 | हमारे आस-पास के पदार्थों की शुद्धता | 6 |
| 3 | परमाणु एवं अणु | 9 |
| 4 | परमाणु की संरचना | 8 |
| 5 | जीवन की मौलिक इकाई | 12 |
| 6 | ऊतक | 14 |
| 7 | गति | 9 |
| 8 | बल तथा गति के नियम | 7 |
| 9 | गुरुत्वाकर्षण | 6 |
| 10 | कार्य तथा ऊर्जा | 6 |
| 11 | ध्वनि | 8 |
| 12 | खाद्य संसाधनों में सुधार | 8 |
| कुल | 100 | |
अंकभार बोर्ड के आधिकारिक पाठ्यक्रम में दिए गए अध्यायवार अंकों पर आधारित है। परीक्षा से पहले किसी नवीनतम संशोधन की सूचना भी जाँचें।
परीक्षा योजना और विषय का परिचय
विषय
विज्ञान
कक्षा
9
विषय कोड
07
कुल अंक
100
सैद्धांतिक परीक्षा
100 अंक
समय
3 घंटे 15 मिनट
हमारे आस-पास के पदार्थ (Matter in Our Surroundings)
1.1 पदार्थ क्या है?
हमारे चारों ओर उपस्थित प्रत्येक वस्तु को ध्यान से देखें। मेज, कुर्सी, पुस्तक, पानी, हवा, मिट्टी, दूध और पत्थर—ये सभी पदार्थ के उदाहरण हैं। इनका आकार, रंग, कठोरता और उपयोग अलग-अलग हो सकता है, लेकिन इनमें एक समानता है: ये द्रव्यमान रखते हैं और स्थान घेरते हैं।
पदार्थ अत्यंत सूक्ष्म कणों से मिलकर बना होता है। ये कण इतने छोटे हो सकते हैं कि उन्हें सामान्य आँखों से नहीं देखा जा सकता। पदार्थ के गुणों को समझने के लिए उसके कणों की प्रकृति और उनके व्यवहार का अध्ययन किया जाता है।
1.2 पदार्थ की भौतिक प्रकृति
पदार्थ की भौतिक प्रकृति से आशय यह समझना है कि पदार्थ किससे बना है और उसके सूक्ष्म कण किस प्रकार व्यवहार करते हैं। वैज्ञानिक प्रयोगों से पता चलता है कि पदार्थ निरंतर दिखाई देने वाला एक ठोस ढाँचा नहीं है, बल्कि सूक्ष्म कणों का समूह है।
पदार्थ के कणों का आकार
पदार्थ के कण अत्यंत छोटे होते हैं। नमक या चीनी का एक छोटा-सा कण भी बहुत बड़ी संख्या में सूक्ष्म कणों से मिलकर बना होता है। पानी में थोड़ी-सी स्याही या पोटैशियम परमैंगनेट मिलाने पर उसका रंग काफी मात्रा में पानी में फैल सकता है। इससे कणों के अत्यंत छोटे होने का संकेत मिलता है।
1.3 पदार्थ के कणों की विशेषताएँ
पदार्थ के कणों के व्यवहार को समझने के लिए तीन प्रमुख विशेषताओं का अध्ययन किया जाता है।
(क) कणों के बीच रिक्त स्थान होता है
पदार्थ के कणों के बीच कुछ खाली स्थान होता है। अलग-अलग पदार्थों में यह स्थान अलग-अलग मात्रा में हो सकता है। जब किसी पदार्थ को दूसरे पदार्थ में मिलाया जाता है, तो एक पदार्थ के कण दूसरे पदार्थ के कणों के बीच उपलब्ध स्थान में प्रवेश कर सकते हैं।
(ख) पदार्थ के कण निरंतर गतिशील रहते हैं
पदार्थ के कण स्थिर नहीं रहते। उनमें गति होती है। तापमान बढ़ने पर सामान्यतः कणों की गतिज ऊर्जा बढ़ती है और वे अधिक तेजी से गति करने लगते हैं।
कणों की इस गति के कारण एक पदार्थ के कण दूसरे पदार्थ के कणों के बीच फैल सकते हैं। इस प्रक्रिया को विसरण (Diffusion) कहते हैं।
(ग) पदार्थ के कणों के बीच आकर्षण बल होता है
पदार्थ के कण एक-दूसरे को आकर्षित करते हैं। इस आकर्षण बल का प्रभाव पदार्थ की अवस्था और उसके गुणों पर पड़ता है। सामान्यतः ठोस पदार्थों में कणों के बीच आकर्षण अधिक प्रभावी होता है, जबकि गैसों में कण एक-दूसरे से काफी दूर होते हैं और उनके बीच आकर्षण का प्रभाव बहुत कम होता है।
कणों के बीच आकर्षण के कारण ही किसी ठोस वस्तु को अलग-अलग कणों में तोड़ना आसान नहीं होता। अलग-अलग पदार्थों में यह आकर्षण बल अलग-अलग हो सकता है।
1.4 पदार्थ की अवस्थाएँ
हमारे दैनिक जीवन में पदार्थ मुख्य रूप से तीन सामान्य अवस्थाओं में दिखाई देते हैं—ठोस, द्रव और गैस। इन अवस्थाओं में कणों की व्यवस्था, उनके बीच की दूरी, गति और आकर्षण बल अलग-अलग होते हैं।
ठोस (Solid)
ठोस का निश्चित आकार और निश्चित आयतन होता है। इसके कण सामान्यतः पास-पास व्यवस्थित रहते हैं और अपनी निश्चित स्थिति के आसपास कंपन करते हैं।
उदाहरण: बर्फ, पत्थर, लकड़ी, लोहा।
द्रव (Liquid)
द्रव का निश्चित आयतन होता है, लेकिन निश्चित आकार नहीं। यह जिस बर्तन में रखा जाता है, उसका आकार ग्रहण कर लेता है। इसके कण एक-दूसरे के पास रहते हुए एक-दूसरे के ऊपर फिसल सकते हैं।
उदाहरण: पानी, दूध, तेल।
गैस (Gas)
गैस का न तो निश्चित आकार होता है और न ही निश्चित आयतन। गैस उपलब्ध स्थान में फैल जाती है। इसके कणों के बीच दूरी अधिक होती है और वे स्वतंत्र रूप से गति करते हैं।
उदाहरण: वायु, ऑक्सीजन, कार्बन डाइऑक्साइड।
तीनों अवस्थाओं की तुलना
| गुण | ठोस | द्रव | गैस |
|---|---|---|---|
| आकार | निश्चित | अनिश्चित | अनिश्चित |
| आयतन | निश्चित | निश्चित | अनिश्चित |
| कणों के बीच दूरी | सामान्यतः बहुत कम | ठोस से अधिक | बहुत अधिक |
| कणों की गति | मुख्यतः कंपन | एक-दूसरे के ऊपर गति | स्वतंत्र और तीव्र गति |
| संपीड्यता | बहुत कम | बहुत कम | अधिक |
| प्रवाह | सामान्यतः नहीं | हाँ | हाँ |
1.5 पदार्थ की अवस्था में परिवर्तन
पदार्थ एक अवस्था से दूसरी अवस्था में बदल सकता है। तापमान और दाब जैसे कारक इस परिवर्तन को प्रभावित करते हैं। उदाहरण के लिए, बर्फ को गर्म करने पर वह पानी में बदलती है और पानी को पर्याप्त गर्म करने पर जलवाष्प बनती है।
गलन (Melting)
जब कोई ठोस पदार्थ गर्म करने पर द्रव में बदलता है, तो इस प्रक्रिया को गलन कहते हैं। उदाहरण के लिए, बर्फ गर्म होने पर पानी बन जाती है। जिस निश्चित तापमान पर किसी शुद्ध ठोस का ठोस से द्रव में परिवर्तन होता है, उसे उसका गलनांक कहते हैं। सामान्य वायुमंडलीय दाब पर शुद्ध बर्फ का गलनांक 0°C होता है।
हिमकरण (Freezing)
जब कोई द्रव ठंडा होकर ठोस में बदलता है, तो इस प्रक्रिया को हिमकरण कहते हैं। पानी का बर्फ में बदलना इसका सामान्य उदाहरण है। सामान्य वायुमंडलीय दाब पर शुद्ध पानी का हिमांक 0°C होता है।
वाष्पीकरण (Evaporation)
द्रव की सतह से उसके कणों का किसी भी तापमान पर गैस में बदलकर बाहर निकलना वाष्पीकरण कहलाता है। यह केवल द्रव की सतह पर होता है और क्वथन की तुलना में धीरे-धीरे हो सकता है।
गीले कपड़ों का सूखना, खुले बर्तन में पानी का धीरे-धीरे कम होना और पसीने का सूखना वाष्पीकरण के उदाहरण हैं।
क्वथन (Boiling)
जब द्रव को गर्म करने पर उसका वाष्प-दाब बाहरी दाब के बराबर हो जाता है, तब द्रव के भीतर भी वाष्प के बुलबुले बनने लगते हैं। इस अवस्था में द्रव तेजी से गैस में बदलता है। इस प्रक्रिया को क्वथन कहते हैं। जिस तापमान पर यह होता है, उसे क्वथनांक कहते हैं। सामान्य वायुमंडलीय दाब पर शुद्ध पानी का क्वथनांक 100°C होता है।
संघनन (Condensation)
गैस या वाष्प के ठंडा होकर द्रव में बदलने की प्रक्रिया संघनन कहलाती है। ठंडे गिलास की बाहरी सतह पर पानी की छोटी-छोटी बूँदें बनना वायु में उपस्थित जलवाष्प के संघनन का उदाहरण है।
1.6 तापमान और दाब का प्रभाव
पदार्थ की अवस्था बदलने में तापमान और दाब दोनों की भूमिका होती है। तापमान बढ़ने पर सामान्यतः कणों की गतिज ऊर्जा बढ़ती है। इससे कणों की गति बढ़ती है और वे एक-दूसरे से अधिक दूर जा सकते हैं।
दाब बढ़ाने पर गैस के कणों को कम स्थान में लाया जा सकता है। उचित तापमान और दाब पर गैस को द्रव में बदला जा सकता है। इसी सिद्धान्त का उपयोग गैसों के भंडारण और कुछ औद्योगिक प्रक्रियाओं में किया जाता है।
1.7 वाष्पीकरण को प्रभावित करने वाले कारक
वाष्पीकरण की दर सभी परिस्थितियों में समान नहीं होती। यह कई कारकों पर निर्भर करती है।
(क) सतह का क्षेत्रफल
सतह का क्षेत्रफल बढ़ने पर अधिक कण सतह पर उपलब्ध होते हैं। इसलिए अन्य परिस्थितियाँ समान रहने पर वाष्पीकरण की दर बढ़ जाती है।
उदाहरण: पानी को चौड़ी प्लेट में रखने पर वह संकरे गिलास की तुलना में सामान्यतः जल्दी वाष्पित होगा।
(ख) तापमान
तापमान बढ़ने पर द्रव के कणों की औसत गतिज ऊर्जा बढ़ती है। अधिक कण पर्याप्त ऊर्जा प्राप्त करके सतह से बाहर निकल पाते हैं। इसलिए वाष्पीकरण की दर बढ़ती है।
(ग) वायु की गति
द्रव की सतह के ऊपर हवा तेज चलने पर वहाँ जमा वाष्प हटती रहती है। इससे और अधिक कण सतह से बाहर निकल सकते हैं। इसलिए वायु की गति बढ़ने पर वाष्पीकरण सामान्यतः तेज होता है।
(घ) आर्द्रता
वायु में पहले से उपस्थित जलवाष्प की मात्रा को आर्द्रता से व्यक्त किया जाता है। वायु में आर्द्रता अधिक होने पर वाष्पीकरण की दर सामान्यतः कम हो जाती है, क्योंकि हवा में और जलवाष्प ग्रहण करने की क्षमता अपेक्षाकृत कम रह जाती है।
| कारक | बढ़ने पर वाष्पीकरण की दर |
|---|---|
| सतह का क्षेत्रफल | बढ़ती है |
| तापमान | बढ़ती है |
| वायु की गति | बढ़ती है |
| आर्द्रता | सामान्यतः घटती है |
1.8 वाष्पीकरण के कारण शीतलता
वाष्पीकरण के दौरान द्रव की सतह से वे कण बाहर निकलते हैं जिनके पास अपेक्षाकृत अधिक गतिज ऊर्जा होती है। शेष द्रव की औसत गतिज ऊर्जा कम हो सकती है, जिससे उसका तापमान घटता है। इसी कारण वाष्पीकरण से शीतलता उत्पन्न होती है।
1.9 अध्याय के महत्त्वपूर्ण वैज्ञानिक शब्द
| शब्द | सरल अर्थ |
|---|---|
| पदार्थ (Matter) | जिसका द्रव्यमान हो और जो स्थान घेरे। |
| कण (Particles) | पदार्थ के अत्यंत छोटे घटक। |
| विसरण (Diffusion) | कणों का स्वतः एक-दूसरे में फैलना। |
| गलन (Melting) | ठोस का द्रव में बदलना। |
| हिमकरण (Freezing) | द्रव का ठोस में बदलना। |
| वाष्पीकरण (Evaporation) | द्रव की सतह से कणों का वाष्प बनकर निकलना। |
| क्वथन (Boiling) | द्रव का उसके क्वथनांक पर तेजी से वाष्प में बदलना। |
| संघनन (Condensation) | वाष्प का द्रव में बदलना। |
| आर्द्रता (Humidity) | वायु में उपस्थित जलवाष्प की मात्रा का माप। |
1.10 अध्याय का सारांश
- पदार्थ का द्रव्यमान होता है और वह स्थान घेरता है।
- पदार्थ अत्यंत सूक्ष्म कणों से मिलकर बना होता है।
- कणों के बीच रिक्त स्थान होता है और वे निरंतर गतिशील रहते हैं।
- कणों के बीच आकर्षण बल पाया जाता है।
- पदार्थ की तीन सामान्य अवस्थाएँ ठोस, द्रव और गैस हैं।
- तापमान और दाब में परिवर्तन से पदार्थ की अवस्था बदल सकती है।
- वाष्पीकरण की दर सतह क्षेत्रफल, तापमान, वायु की गति और आर्द्रता से प्रभावित होती है।
- वाष्पीकरण के कारण शीतलता उत्पन्न होती है।
1.11 अभ्यास प्रश्न
1.12 वस्तुनिष्ठ प्रश्न (MCQ)
1. पदार्थ के कणों के बीच क्या पाया जाता है?
- केवल हवा
- रिक्त स्थान
- केवल पानी
- कोई स्थान नहीं
2. इत्र की सुगंध का कमरे में फैलना किसका उदाहरण है?
- गलन
- हिमकरण
- विसरण
- संघनन
3. सामान्य वायुमंडलीय दाब पर पानी का क्वथनांक कितना होता है?
- 0°C
- 50°C
- 100°C
- 150°C
4. निम्न में से कौन वाष्पीकरण की दर बढ़ाता है?
- आर्द्रता बढ़ना
- तापमान बढ़ना
- सतह क्षेत्रफल घटना
- वायु की गति घटना
5. किस अवस्था का निश्चित आकार और निश्चित आयतन होता है?
- गैस
- द्रव
- ठोस
- वाष्प
1.13 गतिविधि आधारित सीख
सामग्री: एक पारदर्शी गिलास, साफ पानी और स्याही की एक बूँद।
विधि: गिलास में साफ पानी भरें। उसमें स्याही की एक बूँद डालें और बिना हिलाए कुछ समय तक ध्यान से देखें।
अवलोकन: स्याही धीरे-धीरे पानी में फैलती दिखाई देगी।
निष्कर्ष: पदार्थ के कण गतिशील होते हैं और एक-दूसरे के बीच फैल सकते हैं। यह विसरण का उदाहरण है।
सुरक्षा: किसी भी रसायन या अज्ञात पदार्थ का स्वाद न लें। गतिविधि शिक्षक या अभिभावक की देखरेख में करें।
इस भाग की स्थिति: परिचय, आधिकारिक पाठ्यक्रम, परीक्षा योजना और अध्याय 1। अगले भाग में अध्याय 2 — हमारे आस-पास के पदार्थों की शुद्धता का विस्तृत अध्ययन प्रस्तुत किया जाएगा।
शैक्षिक सामग्री: NCERTClasses.com | RBSE कक्षा 9 विज्ञान | सत्र 2026–27
हमारे आस-पास के पदार्थों की शुद्धता (Is Matter Around Us Pure?)
2.1 क्या हमारे आस-पास के सभी पदार्थ शुद्ध हैं?
हम अपने दैनिक जीवन में अनेक पदार्थों का उपयोग करते हैं। पीने का पानी, दूध, हवा, मिट्टी, नमक, चीनी, तेल और भोजन—ये सभी देखने में सामान्य पदार्थ लगते हैं। लेकिन क्या ये सभी वैज्ञानिक अर्थ में शुद्ध पदार्थ हैं?
सामान्य बोलचाल में हम किसी ऐसी वस्तु को शुद्ध कह सकते हैं जिसमें मिलावट न हो। लेकिन विज्ञान में शुद्धता का अर्थ अधिक निश्चित है। वैज्ञानिक दृष्टि से यह जानना आवश्यक है कि किसी पदार्थ में किस प्रकार के कण उपस्थित हैं और उसकी संरचना कैसी है।
उदाहरण के लिए, शुद्ध जल में जल के अणु होते हैं। शुद्ध सोडियम क्लोराइड में सोडियम क्लोराइड के घटक उपस्थित होते हैं। इसके विपरीत, सामान्य हवा में नाइट्रोजन, ऑक्सीजन, कार्बन डाइऑक्साइड तथा अन्य गैसें होती हैं। इसलिए हवा एक मिश्रण है।
2.2 पदार्थों का वर्गीकरण
पदार्थों को उनकी संरचना के आधार पर मुख्य रूप से दो वर्गों में बाँटा जाता है—शुद्ध पदार्थ और मिश्रण। शुद्ध पदार्थों में तत्व और यौगिक आते हैं, जबकि मिश्रण समांगी तथा विषमांगी हो सकते हैं।
2.3 मिश्रण (Mixture)
मिश्रण में उपस्थित पदार्थों को उसके घटक कहते हैं। मिश्रण के घटक अपने-अपने मूल गुण सामान्यतः बनाए रखते हैं। मिश्रण में घटकों का अनुपात निश्चित होना आवश्यक नहीं है।
मिश्रण के उदाहरण
- हवा: अनेक गैसों का मिश्रण।
- नमक का पानी: पानी और नमक का मिश्रण।
- पीतल: मुख्यतः ताँबे और जस्ते की मिश्रधातु।
- मिट्टी: विभिन्न खनिजों, कार्बनिक पदार्थों और अन्य घटकों का मिश्रण।
- दूध: जल, वसा, प्रोटीन और अन्य पदार्थों का जटिल कोलॉइडी तंत्र।
मिश्रण की प्रमुख विशेषताएँ
- मिश्रण में दो या अधिक पदार्थ उपस्थित होते हैं।
- घटक किसी भी अनुपात में मिल सकते हैं।
- घटकों के अपने मूल गुण सामान्यतः बने रहते हैं।
- मिश्रण के निर्माण में सामान्यतः नया रासायनिक पदार्थ नहीं बनता।
- मिश्रण के घटकों को उपयुक्त भौतिक विधियों से अलग किया जा सकता है।
2.4 मिश्रण के प्रकार
मिश्रणों को उनके घटकों के वितरण और एकरूपता के आधार पर दो मुख्य प्रकारों में बाँटा जाता है—समांगी मिश्रण और विषमांगी मिश्रण।
(क) समांगी मिश्रण (Homogeneous Mixture)
जिस मिश्रण की संरचना प्रत्येक भाग में समान होती है और जिसके घटक अलग-अलग दिखाई नहीं देते, उसे समांगी मिश्रण कहते हैं। ऐसे मिश्रण में सामान्यतः एक ही प्रावस्था दिखाई देती है।
(ख) विषमांगी मिश्रण (Heterogeneous Mixture)
जिस मिश्रण की संरचना प्रत्येक भाग में समान नहीं होती और जिसके घटक अलग-अलग भागों में भिन्न हो सकते हैं, उसे विषमांगी मिश्रण कहते हैं। इसमें घटकों की अलग-अलग परतें या भाग दिखाई दे सकते हैं।
| आधार | समांगी मिश्रण | विषमांगी मिश्रण |
|---|---|---|
| संरचना | लगभग समान | असमान |
| घटकों का वितरण | समान रूप से वितरित | असमान रूप से वितरित |
| दिखावट | एकसमान | एकसमान नहीं |
| उदाहरण | नमक का पानी, वायु | रेत और पानी, तेल और पानी |
2.5 विलयन (Solution)
जब कोई पदार्थ दूसरे पदार्थ में इस प्रकार मिल जाता है कि एकसमान मिश्रण बनता है, तो प्राप्त मिश्रण को विलयन कहते हैं। नमक का पानी और चीनी का घोल इसके सामान्य उदाहरण हैं।
विलयन के घटक
विलेय (Solute)
वह पदार्थ जो विलायक में घुलता है, विलेय कहलाता है। नमक के पानी में नमक विलेय है।
विलायक (Solvent)
वह पदार्थ जिसमें विलेय घुलता है, विलायक कहलाता है। नमक के पानी में पानी विलायक है।
विलयन में सामान्यतः अधिक मात्रा में उपस्थित घटक विलायक होता है और कम मात्रा में उपस्थित घुलने वाला घटक विलेय होता है। लेकिन कुछ विशेष प्रकार के विलयनों में घटकों की अवस्था और रासायनिक प्रकृति को भी ध्यान में रखना पड़ता है।
विलयन की विशेषताएँ
- विलयन समांगी मिश्रण होता है।
- इसके घटक समान रूप से वितरित रहते हैं।
- विलेय के कण सामान्यतः नंगी आँखों से दिखाई नहीं देते।
- विलेय के कण सामान्य छानने की प्रक्रिया से अलग नहीं किए जा सकते।
- विलयन के कण सामान्यतः नीचे बैठकर तलछट नहीं बनाते।
2.6 विलयन की सांद्रता (Concentration of Solution)
किसी विलयन में उपस्थित विलेय की मात्रा को विलयन की सांद्रता कहते हैं। एक ही विलायक में विलेय की मात्रा बदलने पर विलयन की सांद्रता भी बदल जाती है।
उदाहरण के लिए, दो गिलास पानी में अलग-अलग मात्रा में नमक घोला जाए, तो दोनों विलयनों का स्वाद अलग हो सकता है। जिस विलयन में नमक की मात्रा अधिक होगी, वह अधिक सांद्र होगा।
द्रव्यमान प्रतिशत द्वारा सांद्रता
यदि विलेय और विलयन दोनों का द्रव्यमान दिया हो, तो द्रव्यमान प्रतिशत से सांद्रता ज्ञात की जा सकती है।
20 ग्राम नमक को 180 ग्राम पानी में घोलकर विलयन बनाया गया। विलयन में नमक का द्रव्यमान प्रतिशत ज्ञात कीजिए।
दिया है: नमक = 20 ग्राम, पानी = 180 ग्राम।
विलयन का कुल द्रव्यमान: 20 + 180 = 200 ग्राम।
सूत्र: द्रव्यमान प्रतिशत = (विलेय का द्रव्यमान / विलयन का द्रव्यमान) × 100
= (20 / 200) × 100
उत्तर = 10%
आयतन प्रतिशत द्वारा सांद्रता
जब विलेय और विलयन की मात्रा आयतन में दी गई हो, तब आयतन प्रतिशत का उपयोग किया जा सकता है।
2.7 संतृप्त और असंतृप्त विलयन
किसी निश्चित तापमान पर विलायक में विलेय की घुलने की क्षमता सीमित हो सकती है। इसी आधार पर विलयन को संतृप्त और असंतृप्त कहा जाता है।
असंतृप्त विलयन (Unsaturated Solution)
ऐसा विलयन जिसमें उसी तापमान पर और अधिक विलेय घुल सकता हो, असंतृप्त विलयन कहलाता है।
संतृप्त विलयन (Saturated Solution)
किसी निश्चित तापमान पर ऐसा विलयन जिसमें अधिकतम मात्रा में विलेय घुल चुका हो और अतिरिक्त विलेय सामान्यतः न घुले, संतृप्त विलयन कहलाता है।
2.8 निलंबन (Suspension)
निलंबन में कणों का आकार विलयन के कणों की तुलना में बड़ा होता है। इसके कण सामान्यतः प्रकाश को बिखेर सकते हैं और मिश्रण को कुछ समय तक स्थिर रखने पर तलछट बना सकते हैं।
उदाहरण: पानी में मिट्टी, पानी में चॉक पाउडर तथा कुछ औषधीय निलंबन।
निलंबन की विशेषताएँ
- यह विषमांगी मिश्रण है।
- इसके कण अपेक्षाकृत बड़े होते हैं।
- कण प्रकाश का प्रकीर्णन कर सकते हैं।
- कुछ समय स्थिर रखने पर कण नीचे बैठ जाते हैं।
- उपयुक्त छानने की विधि से इसके कण अलग किए जा सकते हैं।
2.9 कोलॉइड (Colloid)
कोलॉइड के कण विलयन के कणों से बड़े, लेकिन सामान्य निलंबन के कणों से छोटे होते हैं। ये सामान्यतः आँखों से अलग-अलग दिखाई नहीं देते। कोलॉइड में प्रकाश का प्रकीर्णन हो सकता है।
उदाहरण: दूध, धुंध, कोहरा, धुआँ, मक्खन और कुछ जैल।
कोलॉइड की प्रमुख विशेषताएँ
- कोलॉइड सामान्यतः विषमांगी प्रकृति का होता है, यद्यपि देखने में एकसमान लग सकता है।
- इसके कण सामान्यतः नीचे नहीं बैठते।
- इसके कण प्रकाश का प्रकीर्णन कर सकते हैं।
- सामान्य छानने से कोलॉइडी कणों को अलग करना कठिन होता है।
2.10 टिंडल प्रभाव (Tyndall Effect)
जब प्रकाश की किरण किसी कोलॉइडी मिश्रण से गुजरती है, तो उसके कण प्रकाश को विभिन्न दिशाओं में बिखेर सकते हैं। इससे प्रकाश का मार्ग दिखाई देने लगता है। प्रकाश के इस प्रकीर्णन के कारण किरण का मार्ग दिखाई देना टिंडल प्रभाव कहलाता है।
2.11 विलयन, कोलॉइड और निलंबन में अंतर
| आधार | विलयन | कोलॉइड | निलंबन |
|---|---|---|---|
| प्रकृति | समांगी | सूक्ष्म स्तर पर विषमांगी | विषमांगी |
| कणों का आकार | सबसे छोटा | मध्यवर्ती | अपेक्षाकृत बड़ा |
| कण दिखाई देना | नहीं | अलग-अलग सामान्यतः नहीं | कई बार दिखाई दे सकते हैं |
| स्थिर रखने पर | कण नीचे नहीं बैठते | कण सामान्यतः नीचे नहीं बैठते | कण नीचे बैठ सकते हैं |
| प्रकाश का प्रकीर्णन | सामान्यतः नहीं | हाँ | हो सकता है |
| उदाहरण | नमक का पानी | दूध, कोहरा | मिट्टी का पानी |
2.12 भौतिक परिवर्तन (Physical Change)
किसी पदार्थ में ऐसा परिवर्तन जिसमें उसकी रासायनिक संरचना नहीं बदलती और कोई नया पदार्थ नहीं बनता, भौतिक परिवर्तन कहलाता है। इसमें पदार्थ का आकार, आकृति, अवस्था या भौतिक रूप बदल सकता है।
उदाहरण: बर्फ का पिघलना, पानी का जमना, कागज को काटना और मोम का पिघलना।
2.13 रासायनिक परिवर्तन (Chemical Change)
जब किसी पदार्थ की रासायनिक संरचना बदल जाती है और एक या अधिक नए पदार्थ बनते हैं, तो इसे रासायनिक परिवर्तन कहते हैं। रासायनिक परिवर्तन में बनने वाले नए पदार्थों के गुण मूल पदार्थों से भिन्न हो सकते हैं।
उदाहरण: लोहे में जंग लगना, लकड़ी का जलना, दूध का खट्टा होना और भोजन का पचना।
भौतिक और रासायनिक परिवर्तन की तुलना
| आधार | भौतिक परिवर्तन | रासायनिक परिवर्तन |
|---|---|---|
| रासायनिक संरचना | नहीं बदलती | बदलती है |
| नया पदार्थ | नहीं बनता | नया पदार्थ बनता है |
| गुण | रासायनिक पहचान बनी रहती है | नए पदार्थ के गुण अलग हो सकते हैं |
| उदाहरण | बर्फ का पिघलना | लोहे में जंग लगना |
2.14 तत्व (Element)
तत्व पदार्थ का मूल रासायनिक रूप है। प्रत्येक तत्व एक विशेष प्रकार के परमाणु से संबंधित होता है। तत्वों को सामान्यतः धातु, अधातु और उपधातु के रूप में वर्गीकृत किया जाता है।
धातु (Metals)
अनेक धातुओं में चमक, आघातवर्धनीयता और तन्यता जैसे गुण पाए जाते हैं।
उदाहरण: लोहा, ताँबा, एल्युमिनियम, सोना।
अधातु (Non-metals)
अधातुओं में सामान्यतः धातुओं जैसे गुण नहीं होते। कई अधातु गैसों के रूप में पाए जाते हैं।
उदाहरण: ऑक्सीजन, नाइट्रोजन, सल्फर, कार्बन।
उपधातु (Metalloids)
इनमें धातु और अधातु दोनों के कुछ गुण पाए जाते हैं।
उदाहरण: सिलिकॉन और जर्मेनियम।
2.15 यौगिक (Compound)
यौगिक में उपस्थित तत्व रासायनिक बंधों द्वारा जुड़े होते हैं। यौगिक के गुण उसके घटक तत्वों के गुणों से अलग हो सकते हैं। यौगिक की संरचना निश्चित होती है।
उदाहरण:
- जल (H₂O) — हाइड्रोजन और ऑक्सीजन से बना यौगिक।
- कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) — कार्बन और ऑक्सीजन से बना यौगिक।
- सोडियम क्लोराइड (NaCl) — सोडियम और क्लोरीन से बना यौगिक।
2.16 मिश्रण और यौगिक में अंतर
मिश्रण और यौगिक दोनों में एक से अधिक पदार्थों के घटक हो सकते हैं, लेकिन इनके बनने का तरीका और गुण अलग होते हैं।
| आधार | मिश्रण | यौगिक |
|---|---|---|
| निर्माण | पदार्थ भौतिक रूप से मिलते हैं | तत्व रासायनिक रूप से जुड़ते हैं |
| अनुपात | घटकों का अनुपात बदल सकता है | तत्व निश्चित अनुपात में होते हैं |
| गुण | घटक अपने मूल गुण बनाए रखते हैं | यौगिक के गुण घटक तत्वों से अलग होते हैं |
| विभाजन | उपयुक्त भौतिक विधियों से घटक अलग किए जा सकते हैं | रासायनिक विधियों से तत्व अलग किए जा सकते हैं |
| गलनांक/क्वथनांक | सामान्यतः निश्चित नहीं | शुद्ध यौगिक के विशिष्ट गलनांक और क्वथनांक होते हैं |
| उदाहरण | हवा, नमक का पानी | जल, कार्बन डाइऑक्साइड |
2.17 अध्याय का सारांश
- विज्ञान में शुद्ध पदार्थ का अर्थ एक ही प्रकार के कणों से बना पदार्थ है।
- मिश्रण दो या दो से अधिक पदार्थों के मिलने से बनता है।
- मिश्रण समांगी या विषमांगी हो सकता है।
- विलयन समांगी मिश्रण होता है, जिसमें विलेय और विलायक होते हैं।
- विलयन की सांद्रता विलेय की मात्रा से संबंधित होती है।
- निलंबन में बड़े कण होते हैं, जो स्थिर रखने पर नीचे बैठ सकते हैं।
- कोलॉइड में छोटे कण फैले रहते हैं और टिंडल प्रभाव दिखाई दे सकता है।
- भौतिक परिवर्तन में नया पदार्थ नहीं बनता।
- रासायनिक परिवर्तन में नए पदार्थ बनते हैं।
- तत्व रासायनिक विधियों से सरल पदार्थों में विभाजित नहीं किए जा सकते।
- यौगिक निश्चित अनुपात में रासायनिक रूप से जुड़े तत्वों से बनता है।
2.18 हल किए हुए प्रश्न
विलयन का कुल द्रव्यमान = 10 + 90 = 100 ग्राम।
द्रव्यमान प्रतिशत = (10 ÷ 100) × 100
उत्तर = 10%
2.19 वस्तुनिष्ठ प्रश्न (MCQ)
- रेत और पानी
- तेल और पानी
- नमक का पानी
- मिट्टी
- विलयन
- कोलॉइड
- शुद्ध तत्व
- शुद्ध यौगिक
- कोलॉइड
- शुद्ध जल
- शुद्ध नमक
- शुद्ध चीनी
- भौतिक
- रासायनिक
- केवल अवस्था परिवर्तन
- कोई परिवर्तन नहीं
- केवल निश्चित
- केवल समान
- परिवर्तनीय
- हमेशा 1:1
- हवा
- पीतल
- जल
- नमक का पानी
2.20 अभ्यास के लिए अतिरिक्त प्रश्न
अति लघु उत्तरीय प्रश्न
- विलेय किसे कहते हैं?
- विलायक किसे कहते हैं?
- निलंबन का एक उदाहरण लिखिए।
- टिंडल प्रभाव किस प्रकार के मिश्रण से संबंधित है?
- एक धातु और एक अधातु का नाम लिखिए।
लघु उत्तरीय प्रश्न
- समांगी और विषमांगी मिश्रण में अंतर उदाहरण सहित लिखिए।
- विलयन की सांद्रता से क्या तात्पर्य है?
- विलयन और निलंबन में तीन अंतर लिखिए।
- भौतिक और रासायनिक परिवर्तन में अंतर उदाहरण सहित समझाइए।
- मिश्रण और यौगिक में अंतर स्पष्ट कीजिए।
दीर्घ उत्तरीय प्रश्न
- पदार्थों के वर्गीकरण को उदाहरण सहित समझाइए।
- विलयन, कोलॉइड और निलंबन की विशेषताओं की तुलना कीजिए।
- तत्व और यौगिक को उदाहरण सहित समझाइए तथा दोनों में अंतर लिखिए।
- द्रव्यमान प्रतिशत की सहायता से विलयन की सांद्रता ज्ञात करने की विधि उदाहरण सहित समझाइए।
2.21 प्रयोग और गतिविधि
सामग्री: पानी, नमक, गिलास और चम्मच।
विधि: गिलास में पानी लें। उसमें थोड़ा नमक डालकर चम्मच से मिलाएँ। देखें कि नमक कहाँ जाता है।
अवलोकन: नमक दिखाई देना बंद हो जाता है और पानी एकसमान दिखाई देता है।
निष्कर्ष: नमक पानी में घुलकर समांगी विलयन बनाता है।
सामग्री: पानी, थोड़ी साफ मिट्टी और पारदर्शी गिलास।
विधि: पानी में मिट्टी मिलाएँ और गिलास को कुछ समय स्थिर रखें।
अवलोकन: मिट्टी के कण धीरे-धीरे नीचे बैठते दिखाई देंगे।
निष्कर्ष: मिट्टी और पानी का मिश्रण निलंबन का उदाहरण है।
शिक्षक की सहायता से किसी सुरक्षित कोलॉइडी नमूने पर प्रकाश की किरण डालकर उसके मार्ग का अवलोकन करें। कोलॉइडी कणों द्वारा प्रकाश के प्रकीर्णन को पहचानें।
सुरक्षा: तेज लेजर किरण को आँखों पर न डालें। किसी भी पदार्थ का स्वाद न लें और प्रयोग शिक्षक की देखरेख में करें।
परमाणु एवं अणु (Atoms and Molecules)
3.1 पदार्थ की सूक्ष्म दुनिया
हमारे आसपास उपस्थित सभी पदार्थ सूक्ष्म कणों से बने हैं। पानी, हवा, नमक, चीनी, धातु और भोजन—इन सभी के अपने विशिष्ट गुण होते हैं। लेकिन इन पदार्थों के गुणों को समझने के लिए यह जानना आवश्यक है कि इनके भीतर कौन-से कण उपस्थित हैं और वे किस प्रकार एक-दूसरे से जुड़े हैं।
रसायन विज्ञान में परमाणु और अणु दो अत्यंत महत्त्वपूर्ण अवधारणाएँ हैं। परमाणु किसी तत्व की मूल रासायनिक इकाई है, जबकि अणु दो या अधिक परमाणुओं के रासायनिक रूप से जुड़ने से बन सकता है।
3.2 पदार्थों को व्यक्त करने के लिए संकेतों की आवश्यकता
दुनिया में हजारों प्रकार के तत्व और असंख्य यौगिक पाए जाते हैं। यदि प्रत्येक तत्व और पदार्थ का नाम हर बार पूरा लिखा जाए, तो रासायनिक समीकरणों और सूत्रों को लिखना कठिन हो जाएगा। इसलिए वैज्ञानिकों ने तत्वों को संक्षिप्त संकेतों द्वारा व्यक्त करने की व्यवस्था विकसित की।
3.3 तत्वों के रासायनिक संकेत (Chemical Symbols)
प्रत्येक तत्व को एक या दो अक्षरों के विशेष संकेत से व्यक्त किया जाता है। इस संकेत को उस तत्व का रासायनिक संकेत कहते हैं। संकेतों की यह प्रणाली वैज्ञानिकों को रासायनिक सूत्र और समीकरण लिखने में सहायता देती है।
रासायनिक संकेत लिखने के नियम
- किसी तत्व का संकेत सामान्यतः उसके अंग्रेजी या लैटिन नाम के पहले अक्षर से बनाया जाता है।
- यदि संकेत में दो अक्षर हों, तो पहला अक्षर बड़ा (Capital) और दूसरा छोटा (Small) लिखा जाता है।
- कुछ तत्वों के संकेत उनके लैटिन नामों से लिए गए हैं।
- एक ही संकेत का उपयोग किसी दूसरे तत्व के लिए नहीं किया जाता।
| तत्व | रासायनिक संकेत | नाम से सम्बन्ध |
|---|---|---|
| हाइड्रोजन | H | Hydrogen |
| ऑक्सीजन | O | Oxygen |
| कार्बन | C | Carbon |
| नाइट्रोजन | N | Nitrogen |
| सल्फर | S | Sulphur |
| फॉस्फोरस | P | Phosphorus |
| कैल्शियम | Ca | Calcium |
| मैग्नीशियम | Mg | Magnesium |
| एल्युमिनियम | Al | Aluminium |
| क्लोरीन | Cl | Chlorine |
| सोडियम | Na | Natrium |
| पोटैशियम | K | Kalium |
| लोहा | Fe | Ferrum |
| ताँबा | Cu | Cuprum |
| चाँदी | Ag | Argentum |
| सोना | Au | Aurum |
| पारा | Hg | Hydrargyrum |
3.4 परमाणु का द्रव्यमान (Atomic Mass)
परमाणु अत्यंत छोटे होते हैं। उनका द्रव्यमान इतना कम होता है कि उसे सामान्य ग्राम या किलोग्राम में व्यक्त करना सुविधाजनक नहीं है। इसलिए परमाणुओं के द्रव्यमान की तुलना करने के लिए एक विशेष इकाई का प्रयोग किया जाता है, जिसे परमाणु द्रव्यमान इकाई कहते हैं।
किसी तत्व का परमाणु द्रव्यमान यह बताता है कि उसका एक परमाणु कार्बन-12 के द्रव्यमान के बारहवें भाग की तुलना में कितना भारी है।
कुछ सामान्य तत्वों के परमाणु द्रव्यमान
| तत्व | संकेत | लगभग परमाणु द्रव्यमान (u) |
|---|---|---|
| हाइड्रोजन | H | 1 |
| कार्बन | C | 12 |
| नाइट्रोजन | N | 14 |
| ऑक्सीजन | O | 16 |
| सोडियम | Na | 23 |
| मैग्नीशियम | Mg | 24 |
| सल्फर | S | 32 |
| क्लोरीन | Cl | लगभग 35.5 |
| कैल्शियम | Ca | 40 |
ये सामान्य शैक्षिक गणनाओं में प्रयुक्त लगभग मान हैं। क्लोरीन जैसे तत्वों के लिए दशमलव मान विभिन्न समस्थानिकों की प्राकृतिक प्रचुरता से संबंधित औसत परमाणु द्रव्यमान को दर्शाता है।
3.5 परमाणु का अस्तित्व
अनेक तत्वों के परमाणु स्वतंत्र अवस्था में नहीं पाए जाते। कुछ तत्वों के परमाणु स्वतंत्र रूप से रह सकते हैं, जबकि कई तत्वों के परमाणु स्थिरता प्राप्त करने के लिए दूसरे परमाणुओं के साथ जुड़ जाते हैं।
उदाहरण के लिए, हीलियम और निऑन जैसी उत्कृष्ट गैसें सामान्य परिस्थितियों में एकल परमाणुओं के रूप में पाई जाती हैं। दूसरी ओर, हाइड्रोजन और ऑक्सीजन सामान्यतः दो-दो परमाणुओं के अणु के रूप में पाए जाते हैं।
एकपरमाणुक (Monoatomic)
ऐसे कण जिनमें केवल एक परमाणु होता है।
उदाहरण: He, Ne, Ar।
द्विपरमाणुक (Diatomic)
ऐसे अणु जिनमें दो परमाणु होते हैं।
उदाहरण: H₂, O₂, N₂, Cl₂।
3.6 अणु के प्रकार
अणुओं को उनमें उपस्थित परमाणुओं की संख्या के आधार पर वर्गीकृत किया जा सकता है।
एकपरमाणुक अणु
जिन अणुओं में केवल एक परमाणु होता है, उन्हें एकपरमाणुक अणु कहते हैं। उदाहरण के लिए, हीलियम (He) और निऑन (Ne)।
द्विपरमाणुक अणु
जिन अणुओं में दो परमाणु होते हैं, उन्हें द्विपरमाणुक अणु कहते हैं। ये परमाणु समान या अलग-अलग तत्वों के हो सकते हैं।
उदाहरण: H₂, O₂, N₂ तथा HCl।
त्रिपरमाणुक अणु
जिन अणुओं में तीन परमाणु होते हैं, उन्हें त्रिपरमाणुक अणु कहते हैं।
उदाहरण: जल (H₂O) और ओजोन (O₃)।
बहुपरमाणुक अणु
जिन अणुओं में तीन से अधिक परमाणु होते हैं, उन्हें बहुपरमाणुक अणु कहा जाता है।
उदाहरण: अमोनिया (NH₃), मीथेन (CH₄) और सल्फर का अणु (S₈)।
3.7 आयन (Ion)
कुछ परमाणु या परमाणुओं के समूह इलेक्ट्रॉन खोकर या प्राप्त करके विद्युत आवेशित कण बन जाते हैं। ऐसे आवेशित कणों को आयन कहते हैं। आयन धनात्मक या ऋणात्मक हो सकते हैं।
धनायन (Cation)
जब कोई परमाणु एक या अधिक इलेक्ट्रॉन खो देता है, तो उसमें प्रोटॉन की संख्या इलेक्ट्रॉनों से अधिक हो जाती है। इस कारण वह धनात्मक आवेश प्राप्त करता है। ऐसे आयन को धनायन कहते हैं।
उदाहरण: Na⁺, Mg²⁺, Ca²⁺, Al³⁺।
ऋणायन (Anion)
जब कोई परमाणु एक या अधिक इलेक्ट्रॉन प्राप्त करता है, तो उसमें इलेक्ट्रॉनों की संख्या प्रोटॉन से अधिक हो जाती है। इस कारण वह ऋणात्मक आवेश प्राप्त करता है। ऐसे आयन को ऋणायन कहते हैं।
उदाहरण: Cl⁻, O²⁻, S²⁻।
| आयन | आयन का नाम | आवेश |
|---|---|---|
| Na⁺ | सोडियम आयन | +1 |
| K⁺ | पोटैशियम आयन | +1 |
| Mg²⁺ | मैग्नीशियम आयन | +2 |
| Ca²⁺ | कैल्शियम आयन | +2 |
| Al³⁺ | एल्युमिनियम आयन | +3 |
| Cl⁻ | क्लोराइड आयन | −1 |
| O²⁻ | ऑक्साइड आयन | −2 |
| S²⁻ | सल्फाइड आयन | −2 |
बहुपरमाणुक आयन (Polyatomic Ions)
कुछ आयन एक से अधिक परमाणुओं से मिलकर बने होते हैं। ऐसे आवेशित परमाणु समूह को बहुपरमाणुक आयन कहते हैं। इनके परमाणु एक समूह के रूप में व्यवहार करते हैं।
| आयन | नाम | आवेश |
|---|---|---|
| NH₄⁺ | अमोनियम | +1 |
| OH⁻ | हाइड्रॉक्साइड | −1 |
| NO₃⁻ | नाइट्रेट | −1 |
| CO₃²⁻ | कार्बोनेट | −2 |
| SO₄²⁻ | सल्फेट | −2 |
| PO₄³⁻ | फॉस्फेट | −3 |
3.8 रासायनिक संयोजन के नियम
जब दो या दो से अधिक तत्व आपस में मिलकर यौगिक बनाते हैं, तो उनका संयोजन कुछ निश्चित नियमों का पालन करता है। इन नियमों को रासायनिक संयोजन के नियम कहा जाता है। इस अध्याय में दो प्रमुख नियमों का अध्ययन किया जाता है।
(क) द्रव्यमान संरक्षण का नियम (Law of Conservation of Mass)
इस नियम के अनुसार रासायनिक अभिक्रिया में पदार्थ के परमाणु नष्ट नहीं होते और न ही नए परमाणु बनते हैं। वे केवल पुनर्व्यवस्थित होकर नए पदार्थ बनाते हैं।
(ख) निश्चित अनुपात का नियम (Law of Constant Proportions)
उदाहरण के लिए, शुद्ध जल में हाइड्रोजन और ऑक्सीजन का द्रव्यमान अनुपात सदैव 1 : 8 होता है। पानी चाहे नदी से प्राप्त हो, वर्षा से या प्रयोगशाला में बनाया गया हो, शुद्ध जल में तत्वों का द्रव्यमान अनुपात समान रहता है।
3.9 डाल्टन का परमाणु सिद्धान्त (Dalton's Atomic Theory)
वैज्ञानिक जॉन डाल्टन ने पदार्थ की संरचना और रासायनिक संयोजन को समझाने के लिए परमाणु सिद्धान्त प्रस्तुत किया। इस सिद्धान्त ने आधुनिक रसायन विज्ञान के विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
डाल्टन के परमाणु सिद्धान्त की प्रमुख बातें
- सभी पदार्थ अत्यंत छोटे कणों से बने होते हैं, जिन्हें परमाणु कहते हैं।
- परमाणु रासायनिक अभिक्रिया में न तो बनाए जा सकते हैं और न ही नष्ट किए जा सकते हैं।
- किसी एक तत्व के सभी परमाणु द्रव्यमान और रासायनिक गुणों में समान माने गए।
- अलग-अलग तत्वों के परमाणु द्रव्यमान और गुणों में भिन्न होते हैं।
- यौगिक तब बनते हैं जब विभिन्न तत्वों के परमाणु सरल पूर्ण संख्या अनुपात में जुड़ते हैं।
- किसी निश्चित यौगिक में परमाणुओं की सापेक्ष संख्या और प्रकार निश्चित होते हैं।
3.10 रासायनिक सूत्र (Chemical Formula)
किसी पदार्थ के अणु या सूत्र इकाई में उपस्थित तत्वों और उनके परमाणुओं की संख्या को संक्षिप्त रूप में व्यक्त करने के लिए रासायनिक सूत्र का प्रयोग किया जाता है।
रासायनिक सूत्र में तत्वों के संकेत लिखे जाते हैं और उनके नीचे छोटे अंकों द्वारा परमाणुओं की संख्या दर्शाई जाती है। इन छोटे अंकों को अधोलिखित संख्या या सबस्क्रिप्ट कहते हैं।
H₂O
जल के एक अणु में 2 हाइड्रोजन परमाणु और 1 ऑक्सीजन परमाणु होता है।
CO₂
कार्बन डाइऑक्साइड के एक अणु में 1 कार्बन परमाणु और 2 ऑक्सीजन परमाणु होते हैं।
NH₃
अमोनिया के एक अणु में 1 नाइट्रोजन परमाणु और 3 हाइड्रोजन परमाणु होते हैं।
CH₄
मीथेन के एक अणु में 1 कार्बन परमाणु और 4 हाइड्रोजन परमाणु होते हैं।
3.11 संयोजकता (Valency)
किसी परमाणु की दूसरे परमाणुओं के साथ संयोजन करने की क्षमता को संयोजकता कहते हैं। सरल शब्दों में, संयोजकता हमें बताती है कि किसी तत्व का परमाणु कितनी संयोजन इकाइयों में भाग ले सकता है।
रासायनिक सूत्र लिखने के लिए तत्वों और आयनों की संयोजकता या आवेश को समझना आवश्यक है।
| तत्व या आयन | संकेत | सामान्य संयोजकता |
|---|---|---|
| हाइड्रोजन | H | 1 |
| सोडियम | Na | 1 |
| पोटैशियम | K | 1 |
| क्लोरीन | Cl | 1 |
| ऑक्सीजन | O | 2 |
| मैग्नीशियम | Mg | 2 |
| कैल्शियम | Ca | 2 |
| जिंक | Zn | 2 |
| एल्युमिनियम | Al | 3 |
| कार्बन | C | 4 |
कुछ तत्व एक से अधिक संयोजकताएँ प्रदर्शित कर सकते हैं। ऊपर दी गई तालिका सामान्य प्रारम्भिक उदाहरणों के लिए है।
3.12 रासायनिक सूत्र लिखने की विधि
किसी यौगिक का रासायनिक सूत्र लिखने के लिए उसके घटक तत्वों या आयनों के संकेत और उनकी संयोजकता का उपयोग किया जाता है। नीचे दी गई विधि को क्रिस-क्रॉस विधि भी कहा जाता है।
सूत्र लिखने के सामान्य चरण
- यौगिक में उपस्थित धनायन या पहले तत्व का संकेत लिखें।
- उसके बाद ऋणायन या दूसरे तत्व का संकेत लिखें।
- दोनों की संयोजकता लिखें।
- एक की संयोजकता को दूसरे के नीचे अधोलिखित संख्या के रूप में लिखें।
- यदि संख्याओं में समान गुणनखंड हो, तो उन्हें सरलतम पूर्णांक अनुपात में बदलें।
- यदि बहुपरमाणुक आयन एक से अधिक बार आए, तो उसे कोष्ठक में लिखें।
उदाहरण 1: मैग्नीशियम क्लोराइड का सूत्र
मैग्नीशियम की संयोजकता 2 और क्लोरीन की संयोजकता 1 है।
संकेत: Mg और Cl।
संयोजकता: Mg = 2, Cl = 1।
क्रिस-क्रॉस करने पर Mg₁Cl₂ प्राप्त होता है। 1 नहीं लिखा जाता।
उदाहरण 2: एल्युमिनियम ऑक्साइड का सूत्र
एल्युमिनियम की संयोजकता 3 और ऑक्सीजन की संयोजकता 2 है।
संकेत: Al और O।
संयोजकता: Al = 3, O = 2।
क्रिस-क्रॉस करने पर Al₂O₃ प्राप्त होता है।
उदाहरण 3: कैल्शियम क्लोराइड का सूत्र
कैल्शियम की संयोजकता 2 और क्लोरीन की संयोजकता 1 है।
उदाहरण 4: सोडियम ऑक्साइड का सूत्र
सोडियम की संयोजकता 1 और ऑक्सीजन की संयोजकता 2 है।
उदाहरण 5: कैल्शियम हाइड्रॉक्साइड का सूत्र
कैल्शियम आयन Ca²⁺ है और हाइड्रॉक्साइड आयन OH⁻ है। दो हाइड्रॉक्साइड आयनों की आवश्यकता होगी। इसलिए हाइड्रॉक्साइड कोष्ठक में लिखा जाता है।
3.13 आणविक द्रव्यमान (Molecular Mass)
किसी पदार्थ के एक अणु में उपस्थित सभी परमाणुओं के परमाणु द्रव्यमानों का योग उसका आणविक द्रव्यमान कहलाता है। इसे परमाणु द्रव्यमान इकाई (u) में व्यक्त किया जाता है।
उदाहरण 1: जल (H₂O) का आणविक द्रव्यमान
हाइड्रोजन का परमाणु द्रव्यमान = 1 u।
ऑक्सीजन का परमाणु द्रव्यमान = 16 u।
जल का सूत्र = H₂O।
आणविक द्रव्यमान = (2 × 1) + 16।
उदाहरण 2: कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) का आणविक द्रव्यमान
कार्बन = 12 u और ऑक्सीजन = 16 u।
CO₂ = 12 + (2 × 16)।
उदाहरण 3: अमोनिया (NH₃) का आणविक द्रव्यमान
नाइट्रोजन = 14 u और हाइड्रोजन = 1 u।
NH₃ = 14 + (3 × 1)।
उदाहरण 4: सल्फ्यूरिक अम्ल (H₂SO₄) का आणविक द्रव्यमान
H = 1 u, S = 32 u और O = 16 u।
H₂SO₄ = (2 × 1) + 32 + (4 × 16)।
3.14 सूत्र इकाई द्रव्यमान (Formula Unit Mass)
आयनिक यौगिकों में स्वतंत्र अणु के बजाय धनायन और ऋणायन का अनुपात दर्शाने वाली सबसे सरल इकाई होती है। इस इकाई में उपस्थित सभी आयनों के परमाणु द्रव्यमानों के योग को सूत्र इकाई द्रव्यमान कहते हैं।
उदाहरण के लिए, सोडियम क्लोराइड (NaCl) एक आयनिक यौगिक है। इसके सूत्र इकाई द्रव्यमान की गणना सोडियम और क्लोरीन के परमाणु द्रव्यमानों को जोड़कर की जाती है।
उदाहरण: NaCl का सूत्र इकाई द्रव्यमान
सोडियम = 23 u।
क्लोरीन = 35.5 u।
उदाहरण: CaCl₂ का सूत्र इकाई द्रव्यमान
कैल्शियम = 40 u और क्लोरीन = 35.5 u।
CaCl₂ = 40 + (2 × 35.5)।
3.15 अध्याय में प्रयुक्त महत्त्वपूर्ण सूत्र और तथ्य
| विषय | याद रखने योग्य तथ्य |
|---|---|
| 1 u | कार्बन-12 परमाणु के द्रव्यमान का 1/12 भाग |
| जल का सूत्र | H₂O |
| कार्बन डाइऑक्साइड | CO₂ |
| अमोनिया | NH₃ |
| मीथेन | CH₄ |
| सोडियम क्लोराइड | NaCl |
| मैग्नीशियम क्लोराइड | MgCl₂ |
| एल्युमिनियम ऑक्साइड | Al₂O₃ |
| जल में H:O द्रव्यमान अनुपात | 1 : 8 |
3.16 अध्याय का सारांश
- पदार्थ परमाणुओं और अणुओं जैसे सूक्ष्म कणों से बने होते हैं।
- परमाणु किसी तत्व की मूल रासायनिक इकाई है।
- अणु दो या अधिक परमाणुओं के जुड़ने से बन सकता है।
- प्रत्येक तत्व को रासायनिक संकेत से व्यक्त किया जाता है।
- परमाणु द्रव्यमान की तुलना के लिए u इकाई का उपयोग होता है।
- आयन विद्युत आवेशित परमाणु या परमाणुओं के समूह होते हैं।
- धनायन पर धनात्मक और ऋणायन पर ऋणात्मक आवेश होता है।
- द्रव्यमान संरक्षण का नियम कहता है कि रासायनिक अभिक्रिया में कुल द्रव्यमान सुरक्षित रहता है।
- निश्चित अनुपात का नियम कहता है कि शुद्ध यौगिक में तत्व निश्चित द्रव्यमान अनुपात में होते हैं।
- डाल्टन ने परमाणु सिद्धान्त प्रस्तुत किया।
- रासायनिक सूत्र किसी पदार्थ की संरचना को संकेतों और संख्याओं से व्यक्त करता है।
- संयोजकता का उपयोग रासायनिक सूत्र लिखने में किया जाता है।
- अणु में सभी परमाणुओं के द्रव्यमानों का योग आणविक द्रव्यमान कहलाता है।
- आयनिक यौगिकों के लिए सूत्र इकाई द्रव्यमान का उपयोग किया जाता है।
3.17 हल किए हुए प्रश्न
मैग्नीशियम की संयोजकता = 2।
ऑक्सीजन की संयोजकता = 2।
क्रिस-क्रॉस करने पर Mg₂O₂ मिलता है। इसे सरलतम अनुपात में बदलने पर MgO प्राप्त होता है।
उत्तर: MgOH₂O में 2 हाइड्रोजन और 1 ऑक्सीजन परमाणु है।
H = 1 u और O = 16 u।
आणविक द्रव्यमान = (2 × 1) + 16।
उत्तर: 18 uअमोनियम आयन = NH₄⁺।
सल्फेट आयन = SO₄²⁻।
दो अमोनियम आयनों का कुल आवेश +2 और एक सल्फेट आयन का आवेश −2 है।
उत्तर: (NH₄)₂SO₄3.18 वस्तुनिष्ठ प्रश्न (MCQ)
- Ca
- C
- Co
- Cl
- हाइड्रोजन-1
- ऑक्सीजन-16
- कार्बन-12
- नाइट्रोजन-14
- HO
- H₂O
- H₂O₂
- OH₂₂
- Na⁻
- Na²⁺
- Na⁺
- N⁺
- 1 : 2
- 1 : 8
- 2 : 1
- 8 : 1
- 28 u
- 32 u
- 44 u
- 18 u
- AlO
- AlO₂
- Al₂O₃
- Al₃O₂
- ऋणायन
- धनायन
- उदासीन परमाणु
- अणु
3.19 अभ्यास के लिए अतिरिक्त प्रश्न
अति लघु उत्तरीय प्रश्न
- परमाणु किसे कहते हैं?
- अणु किसे कहते हैं?
- एक परमाणु द्रव्यमान इकाई की परिभाषा लिखिए।
- एक धनायन और एक ऋणायन का उदाहरण दीजिए।
- ऑक्सीजन और नाइट्रोजन के रासायनिक संकेत लिखिए।
- द्रव्यमान संरक्षण का नियम किससे संबंधित है?
लघु उत्तरीय प्रश्न
- डाल्टन के परमाणु सिद्धान्त की चार प्रमुख बातें लिखिए।
- द्रव्यमान संरक्षण के नियम को उदाहरण सहित समझाइए।
- निश्चित अनुपात के नियम को जल के उदाहरण से समझाइए।
- धनायन और ऋणायन में अंतर स्पष्ट कीजिए।
- संयोजकता क्या है? दो उदाहरण दीजिए।
दीर्घ उत्तरीय प्रश्न
- रासायनिक संयोजन के दोनों नियमों की व्याख्या कीजिए।
- डाल्टन के परमाणु सिद्धान्त का वर्णन कीजिए।
- संयोजकता की सहायता से रासायनिक सूत्र लिखने की विधि उदाहरण सहित समझाइए।
- आणविक द्रव्यमान और सूत्र इकाई द्रव्यमान में अंतर स्पष्ट कीजिए।
3.20 संख्यात्मक अभ्यास
- NH₃ का आणविक द्रव्यमान ज्ञात कीजिए। (N = 14 u, H = 1 u)
- CH₄ का आणविक द्रव्यमान ज्ञात कीजिए। (C = 12 u, H = 1 u)
- CaCO₃ का सूत्र इकाई द्रव्यमान ज्ञात कीजिए। (Ca = 40 u, C = 12 u, O = 16 u)
- Na₂O का सूत्र इकाई द्रव्यमान ज्ञात कीजिए। (Na = 23 u, O = 16 u)
- H₂SO₄ का आणविक द्रव्यमान ज्ञात कीजिए। (H = 1 u, S = 32 u, O = 16 u)
संख्यात्मक अभ्यास के उत्तर
- NH₃ = 14 + 3 = 17 u
- CH₄ = 12 + 4 = 16 u
- CaCO₃ = 40 + 12 + 48 = 100 u
- Na₂O = 46 + 16 = 62 u
- H₂SO₄ = 2 + 32 + 64 = 98 u
3.21 गतिविधि आधारित सीख
सामग्री: आवर्त सारणी या तत्वों के नाम और संकेतों की सूची।
विधि: दस तत्वों के नाम चुनें और उनके रासायनिक संकेत लिखें। फिर संकेत देखकर तत्व का नाम पहचानने का अभ्यास करें।
निष्कर्ष: रासायनिक संकेत तत्वों को संक्षिप्त और सार्वभौमिक रूप से व्यक्त करते हैं।
कागज पर Na, Mg, Ca, Al, Cl और O के संकेत लिखें। प्रत्येक के सामने उसकी सामान्य संयोजकता लिखें। फिर जोड़ों में मिलाकर NaCl, MgCl₂, CaO, Al₂O₃ और CaCl₂ के सूत्र बनाने का अभ्यास करें।
निष्कर्ष: संयोजकता के आधार पर यौगिकों के सूत्र लिखे जा सकते हैं।
परमाणु की संरचना (Structure of the Atom)
परमाणु पदार्थ की मूलभूत इकाई है। लंबे समय तक परमाणु को पदार्थ का अविभाज्य कण माना जाता था, लेकिन वैज्ञानिक प्रयोगों से पता चला कि परमाणु के भीतर भी छोटे-छोटे कण उपस्थित होते हैं। इन कणों को उप-परमाण्विक कण कहा जाता है। इलेक्ट्रॉन, प्रोटॉन और न्यूट्रॉन परमाणु के प्रमुख उप-परमाण्विक कण हैं। इनके संगठन से परमाणु की संरचना बनती है।
4.1 परमाणु की आंतरिक संरचना
परमाणु मुख्य रूप से दो भागों से मिलकर बना होता है—नाभिक और नाभिक के चारों ओर उपस्थित इलेक्ट्रॉन। परमाणु के केंद्र में स्थित अत्यंत छोटा तथा सघन भाग नाभिक कहलाता है। नाभिक में प्रोटॉन और न्यूट्रॉन पाए जाते हैं। इलेक्ट्रॉन नाभिक के चारों ओर विभिन्न ऊर्जा स्तरों या कोशों में व्यवस्थित रहते हैं।
चित्र 4.1 – परमाणु की संरचना का सांकेतिक निरूपण।
4.2 उप-परमाण्विक कण
परमाणु में पाए जाने वाले तीन प्रमुख उप-परमाण्विक कण निम्नलिखित हैं:
| कण | प्रतीक | आवेश | सापेक्ष द्रव्यमान | स्थिति |
|---|---|---|---|---|
| इलेक्ट्रॉन | e⁻ | ऋणात्मक (−1) | लगभग 1/1836 | नाभिक के बाहर |
| प्रोटॉन | p⁺ | धनात्मक (+1) | लगभग 1 | नाभिक में |
| न्यूट्रॉन | n⁰ | उदासीन (0) | लगभग 1 | नाभिक में |
इलेक्ट्रॉन की खोज
इलेक्ट्रॉन की खोज जे. जे. थॉमसन ने कैथोड किरणों के प्रयोग द्वारा की थी। उन्होंने बताया कि कैथोड किरणें ऋणावेशित कणों से बनी होती हैं। इन कणों को इलेक्ट्रॉन नाम दिया गया।
प्रोटॉन और धनावेशित कण
धनावेशित कणों के अस्तित्व का प्रमाण गोल्डस्टीन के नहर किरण (Canal Rays) प्रयोग से मिला। इन किरणों में धनावेशित कण पाए गए। हाइड्रोजन के नाभिक को प्रोटॉन कहा जाता है। प्रोटॉन का धनावेश इलेक्ट्रॉन के ऋणावेश के परिमाण के बराबर होता है।
न्यूट्रॉन की खोज
न्यूट्रॉन की खोज जेम्स चैडविक ने 1932 में की थी। न्यूट्रॉन पर कोई विद्युत आवेश नहीं होता। इसका द्रव्यमान लगभग प्रोटॉन के द्रव्यमान के बराबर होता है। परमाणु के नाभिक में प्रोटॉन और न्यूट्रॉन उपस्थित रहते हैं।
4.3 थॉमसन का परमाणु मॉडल
जे. जे. थॉमसन ने परमाणु की संरचना समझाने के लिए एक मॉडल प्रस्तुत किया। इस मॉडल के अनुसार परमाणु धनावेशित गोले के समान होता है, जिसमें ऋणावेशित इलेक्ट्रॉन इस प्रकार धँसे रहते हैं जैसे तरबूज में बीज। परमाणु में धनात्मक और ऋणात्मक आवेशों की कुल मात्रा बराबर होने के कारण परमाणु विद्युत रूप से उदासीन होता है।
चित्र 4.2 – थॉमसन का परमाणु मॉडल।
थॉमसन मॉडल की विशेषताएँ
- परमाणु धनावेशित गोले के समान माना गया।
- इलेक्ट्रॉन इस धनावेशित गोले में धँसे हुए माने गए।
- धनात्मक और ऋणात्मक आवेश बराबर होने से परमाणु उदासीन माना गया।
थॉमसन मॉडल की सीमा
यह मॉडल परमाणु में धनात्मक आवेश और द्रव्यमान के वास्तविक वितरण को स्पष्ट नहीं कर पाया। रदरफोर्ड के प्रकीर्णन प्रयोग के परिणामों को यह मॉडल समझाने में असफल रहा।
4.4 रदरफोर्ड का परमाणु मॉडल
अर्नेस्ट रदरफोर्ड ने परमाणु की संरचना जानने के लिए स्वर्ण-पत्र प्रकीर्णन प्रयोग किया। इस प्रयोग में तीव्र गति से चलने वाले अल्फा कणों को एक बहुत पतली सोने की पन्नी पर डाला गया। चारों ओर रखी जिंक सल्फाइड की स्क्रीन पर अल्फा कणों के टकराने से चमक उत्पन्न होती थी। चमक के स्थान से कणों की दिशा का पता लगाया गया।
रदरफोर्ड के प्रयोग के प्रमुख अवलोकन
- अधिकांश अल्फा कण बिना किसी विचलन के सोने की पन्नी से सीधे निकल गए।
- कुछ अल्फा कण छोटे कोण से विचलित हुए।
- बहुत कम अल्फा कण बड़े कोण से विचलित हुए।
- बहुत ही कम कण वापस लौट आए।
चित्र 4.3 – रदरफोर्ड के स्वर्ण-पत्र प्रकीर्णन प्रयोग का सांकेतिक चित्र।
रदरफोर्ड के निष्कर्ष
- परमाणु का अधिकांश भाग खाली होता है, क्योंकि अधिकांश अल्फा कण बिना विचलित हुए निकल गए।
- परमाणु का लगभग संपूर्ण धनावेश और अधिकांश द्रव्यमान उसके केंद्र में बहुत छोटे क्षेत्र में केंद्रित होता है। इस केंद्र को नाभिक कहा गया।
- नाभिक का आकार परमाणु के आकार की तुलना में बहुत छोटा होता है।
- इलेक्ट्रॉन नाभिक के चारों ओर उपस्थित रहते हैं।
रदरफोर्ड मॉडल की सीमाएँ
रदरफोर्ड का मॉडल यह स्पष्ट नहीं कर सका कि नाभिक के चारों ओर घूमते हुए इलेक्ट्रॉन अपनी ऊर्जा खोकर नाभिक में क्यों नहीं गिर जाते। यह मॉडल इलेक्ट्रॉनों की निश्चित ऊर्जा अवस्थाओं और उनकी व्यवस्था को भी पूरी तरह नहीं समझा पाया।
4.5 बोर का परमाणु मॉडल
नील्स बोर ने रदरफोर्ड मॉडल की कमियों को दूर करने के लिए परमाणु का नया मॉडल प्रस्तुत किया। बोर के अनुसार इलेक्ट्रॉन नाभिक के चारों ओर कुछ निश्चित ऊर्जा स्तरों या कोशों में ही रह सकते हैं। इन कोशों को K, L, M, N आदि नाम दिए गए हैं।
बोर मॉडल की प्रमुख मान्यताएँ
- इलेक्ट्रॉन नाभिक के चारों ओर निश्चित ऊर्जा वाले कोशों में रहते हैं।
- किसी निश्चित ऊर्जा स्तर में घूमते समय इलेक्ट्रॉन ऊर्जा का विकिरण नहीं करता।
- इलेक्ट्रॉन ऊर्जा ग्रहण करके उच्च ऊर्जा स्तर में जा सकता है तथा ऊर्जा छोड़कर निम्न ऊर्जा स्तर में आ सकता है।
- नाभिक के निकट स्थित कोश की ऊर्जा अपेक्षाकृत कम होती है।
चित्र 4.4 – बोर मॉडल के अनुसार इलेक्ट्रॉन के ऊर्जा कोश।
4.6 इलेक्ट्रॉनों का वितरण – कोशों में इलेक्ट्रॉन व्यवस्था
परमाणु में इलेक्ट्रॉन अलग-अलग ऊर्जा स्तरों में व्यवस्थित रहते हैं। इन ऊर्जा स्तरों को कोश कहा जाता है। कोशों को K, L, M और N नाम दिए गए हैं। किसी कोश में इलेक्ट्रॉनों की अधिकतम संख्या ज्ञात करने के लिए 2n² नियम का उपयोग किया जाता है, जहाँ n कोश की संख्या है।
यहाँ n का मान K कोश के लिए 1, L कोश के लिए 2, M कोश के लिए 3 और N कोश के लिए 4 होता है।
| कोश | n का मान | अधिकतम इलेक्ट्रॉन |
|---|---|---|
| K | 1 | 2 |
| L | 2 | 8 |
| M | 3 | 18 |
| N | 4 | 32 |
कक्षा 9 के स्तर पर पहले 18 तत्वों के इलेक्ट्रॉनिक विन्यास में बाहरी कोश में सामान्यतः अधिकतम 8 इलेक्ट्रॉन रखे जाते हैं।
| तत्व | परमाणु क्रमांक | K कोश | L कोश | M कोश | इलेक्ट्रॉनिक विन्यास |
|---|---|---|---|---|---|
| हाइड्रोजन (H) | 1 | 1 | – | – | 1 |
| हीलियम (He) | 2 | 2 | – | – | 2 |
| कार्बन (C) | 6 | 2 | 4 | – | 2, 4 |
| ऑक्सीजन (O) | 8 | 2 | 6 | – | 2, 6 |
| नियॉन (Ne) | 10 | 2 | 8 | – | 2, 8 |
| सोडियम (Na) | 11 | 2 | 8 | 1 | 2, 8, 1 |
| मैग्नीशियम (Mg) | 12 | 2 | 8 | 2 | 2, 8, 2 |
| क्लोरीन (Cl) | 17 | 2 | 8 | 7 | 2, 8, 7 |
| आर्गन (Ar) | 18 | 2 | 8 | 8 | 2, 8, 8 |
4.7 संयोजकता (Valency)
किसी तत्व के परमाणु की दूसरे परमाणुओं के साथ रासायनिक संयोग करने की क्षमता को उसकी संयोजकता कहते हैं। परमाणु स्थायी इलेक्ट्रॉनिक विन्यास प्राप्त करने के लिए इलेक्ट्रॉनों का त्याग, ग्रहण या साझेदारी कर सकते हैं।
द्विक और अष्टक नियम
- द्विक नियम: कुछ परमाणु अपने बाहरी कोश में 2 इलेक्ट्रॉन प्राप्त करके स्थायित्व प्राप्त करते हैं। हीलियम इसका उदाहरण है।
- अष्टक नियम: अनेक परमाणु बाहरी कोश में 8 इलेक्ट्रॉन प्राप्त करके स्थायी विन्यास प्राप्त करने का प्रयास करते हैं।
संयोजकता ज्ञात करने की विधि
यदि किसी परमाणु के बाहरी कोश में 1, 2, 3 या 4 इलेक्ट्रॉन हैं, तो सामान्यतः उसकी संयोजकता इन्हीं के बराबर होती है। यदि बाहरी कोश में 5, 6 या 7 इलेक्ट्रॉन हैं, तो सामान्यतः संयोजकता 8 में से बाहरी इलेक्ट्रॉनों की संख्या घटाकर प्राप्त की जाती है। पूर्ण बाहरी कोश वाले तत्वों की संयोजकता शून्य होती है।
| तत्व | इलेक्ट्रॉनिक विन्यास | बाहरी इलेक्ट्रॉन | संयोजकता |
|---|---|---|---|
| सोडियम (Na) | 2, 8, 1 | 1 | 1 |
| मैग्नीशियम (Mg) | 2, 8, 2 | 2 | 2 |
| एल्युमिनियम (Al) | 2, 8, 3 | 3 | 3 |
| कार्बन (C) | 2, 4 | 4 | 4 |
| नाइट्रोजन (N) | 2, 5 | 5 | 3 |
| ऑक्सीजन (O) | 2, 6 | 6 | 2 |
| फ्लोरीन (F) | 2, 7 | 7 | 1 |
| नियॉन (Ne) | 2, 8 | 8 | 0 |
4.8 परमाणु क्रमांक (Atomic Number)
किसी तत्व के परमाणु के नाभिक में उपस्थित प्रोटॉनों की संख्या को उसका परमाणु क्रमांक कहते हैं। इसे अंग्रेजी अक्षर Z से दर्शाते हैं। प्रत्येक तत्व का परमाणु क्रमांक निश्चित होता है और इसी से तत्व की पहचान होती है।
विद्युत रूप से उदासीन परमाणु में प्रोटॉनों और इलेक्ट्रॉनों की संख्या समान होती है।
4.9 द्रव्यमान संख्या (Mass Number)
किसी परमाणु के नाभिक में उपस्थित प्रोटॉनों और न्यूट्रॉनों की कुल संख्या को द्रव्यमान संख्या कहते हैं। इसे A से दर्शाते हैं।
परमाणु का संकेतात्मक निरूपण
किसी तत्व को उसके प्रतीक के साथ परमाणु क्रमांक और द्रव्यमान संख्या लिखकर दर्शाया जाता है:
यहाँ X तत्व का प्रतीक, A द्रव्यमान संख्या और Z परमाणु क्रमांक है।
उदाहरण: सोडियम परमाणु
सोडियम का संकेत ²³₁₁Na है। इसमें:
- परमाणु क्रमांक = 11
- द्रव्यमान संख्या = 23
- प्रोटॉन = 11
- उदासीन परमाणु में इलेक्ट्रॉन = 11
- न्यूट्रॉन = 23 − 11 = 12
4.10 परमाणु और आयन
जब कोई परमाणु इलेक्ट्रॉन का त्याग करता है या ग्रहण करता है, तो वह आवेशित कण बन जाता है। ऐसे आवेशित परमाणु या परमाणुओं के समूह को आयन कहते हैं।
धनायन (Cation)
जब कोई परमाणु एक या अधिक इलेक्ट्रॉन त्याग देता है, तो उसमें प्रोटॉनों की संख्या इलेक्ट्रॉनों की संख्या से अधिक हो जाती है। इस प्रकार धनावेशित आयन बनता है, जिसे धनायन कहते हैं।
उदाहरण: Na → Na⁺ + e⁻
ऋणायन (Anion)
जब कोई परमाणु एक या अधिक इलेक्ट्रॉन ग्रहण करता है, तो उसमें इलेक्ट्रॉनों की संख्या प्रोटॉनों से अधिक हो जाती है। इस प्रकार ऋणावेशित आयन बनता है, जिसे ऋणायन कहते हैं।
उदाहरण: Cl + e⁻ → Cl⁻
| कण | प्रोटॉन | इलेक्ट्रॉन | कुल आवेश |
|---|---|---|---|
| Na परमाणु | 11 | 11 | 0 |
| Na⁺ आयन | 11 | 10 | +1 |
| Cl परमाणु | 17 | 17 | 0 |
| Cl⁻ आयन | 17 | 18 | −1 |
4.11 समस्थानिक (Isotopes)
एक ही तत्व के ऐसे परमाणु जिनका परमाणु क्रमांक समान होता है, लेकिन द्रव्यमान संख्या अलग-अलग होती है, समस्थानिक कहलाते हैं। इन परमाणुओं में प्रोटॉनों की संख्या समान, लेकिन न्यूट्रॉनों की संख्या अलग-अलग होती है।
समस्थानिकों के उदाहरण
हाइड्रोजन के तीन प्रमुख समस्थानिक हैं:
- प्रोटियम (¹₁H): एक प्रोटॉन, कोई न्यूट्रॉन नहीं।
- ड्यूटेरियम (²₁H): एक प्रोटॉन और एक न्यूट्रॉन।
- ट्रिटियम (³₁H): एक प्रोटॉन और दो न्यूट्रॉन।
| समस्थानिक | परमाणु क्रमांक | द्रव्यमान संख्या | प्रोटॉन | न्यूट्रॉन |
|---|---|---|---|---|
| ¹₁H | 1 | 1 | 1 | 0 |
| ²₁H | 1 | 2 | 1 | 1 |
| ³₁H | 1 | 3 | 1 | 2 |
समस्थानिकों के उपयोग
- कोबाल्ट-60 का उपयोग कुछ प्रकार के कैंसर के उपचार में विकिरण चिकित्सा के लिए किया जाता है।
- कार्बन-14 का उपयोग प्राचीन जैविक अवशेषों की आयु का अनुमान लगाने में किया जाता है।
- यूरेनियम-235 का उपयोग परमाणु ऊर्जा उत्पादन में ईंधन के रूप में किया जाता है।
4.12 समभारिक (Isobars)
ऐसे परमाणु जिनकी द्रव्यमान संख्या समान होती है, लेकिन परमाणु क्रमांक अलग-अलग होते हैं, समभारिक कहलाते हैं। समभारिक अलग-अलग तत्वों के परमाणु होते हैं।
उदाहरण: आर्गन-40 और कैल्शियम-40 समभारिक हैं।
- आर्गन-40: परमाणु क्रमांक 18, द्रव्यमान संख्या 40।
- कैल्शियम-40: परमाणु क्रमांक 20, द्रव्यमान संख्या 40।
| आधार | समस्थानिक | समभारिक |
|---|---|---|
| परिभाषा | परमाणु क्रमांक समान, द्रव्यमान संख्या अलग | द्रव्यमान संख्या समान, परमाणु क्रमांक अलग |
| तत्व | एक ही तत्व के परमाणु | अलग-अलग तत्वों के परमाणु |
| उदाहरण | ¹₁H, ²₁H, ³₁H | ⁴⁰₁₈Ar, ⁴⁰₂₀Ca |
4.13 महत्वपूर्ण सूत्र एवं तथ्य
1. परमाणु क्रमांक (Z) = प्रोटॉनों की संख्या
2. उदासीन परमाणु में इलेक्ट्रॉनों की संख्या = प्रोटॉनों की संख्या
3. द्रव्यमान संख्या (A) = प्रोटॉन + न्यूट्रॉन
4. न्यूट्रॉन = द्रव्यमान संख्या − परमाणु क्रमांक
5. कोश में अधिकतम इलेक्ट्रॉन = 2n²
4.14 हल किए गए संख्यात्मक प्रश्न
प्रश्न 1. सोडियम का परमाणु क्रमांक 11 तथा द्रव्यमान संख्या 23 है। इसमें प्रोटॉन, इलेक्ट्रॉन और न्यूट्रॉन की संख्या ज्ञात कीजिए।
हल:
प्रोटॉन = परमाणु क्रमांक = 11
उदासीन परमाणु में इलेक्ट्रॉन = 11
न्यूट्रॉन = द्रव्यमान संख्या − परमाणु क्रमांक
= 23 − 11 = 12
उत्तर: प्रोटॉन = 11, इलेक्ट्रॉन = 11 तथा न्यूट्रॉन = 12।
प्रश्न 2. क्लोरीन का परमाणु क्रमांक 17 तथा द्रव्यमान संख्या 35 है। इसके नाभिक में कितने न्यूट्रॉन होंगे?
हल:
न्यूट्रॉन = A − Z
= 35 − 17 = 18
उत्तर: क्लोरीन के नाभिक में 18 न्यूट्रॉन होंगे।
प्रश्न 3. मैग्नीशियम का परमाणु क्रमांक 12 है। इसके उदासीन परमाणु में कितने इलेक्ट्रॉन होंगे और उनका वितरण क्या होगा?
हल:
इलेक्ट्रॉनों की संख्या = परमाणु क्रमांक = 12
K कोश में 2, L कोश में 8 तथा M कोश में 2 इलेक्ट्रॉन होंगे।
उत्तर: इलेक्ट्रॉनिक विन्यास = 2, 8, 2।
प्रश्न 4. किसी परमाणु का परमाणु क्रमांक 13 और द्रव्यमान संख्या 27 है। प्रोटॉन, इलेक्ट्रॉन तथा न्यूट्रॉन की संख्या ज्ञात कीजिए।
हल:
प्रोटॉन = 13
इलेक्ट्रॉन = 13 (उदासीन परमाणु)
न्यूट्रॉन = 27 − 13 = 14
उत्तर: 13 प्रोटॉन, 13 इलेक्ट्रॉन और 14 न्यूट्रॉन।
4.15 अध्याय का सारांश
- परमाणु इलेक्ट्रॉन, प्रोटॉन और न्यूट्रॉन जैसे उप-परमाण्विक कणों से मिलकर बना होता है।
- इलेक्ट्रॉन पर ऋणात्मक, प्रोटॉन पर धनात्मक तथा न्यूट्रॉन पर कोई आवेश नहीं होता।
- थॉमसन ने परमाणु को धनावेशित गोले में धँसे इलेक्ट्रॉनों के रूप में समझाया।
- रदरफोर्ड के प्रयोग से नाभिक की उपस्थिति और परमाणु के अधिकांश भाग के रिक्त होने का पता चला।
- बोर के अनुसार इलेक्ट्रॉन निश्चित ऊर्जा स्तरों या कोशों में रहते हैं।
- परमाणु क्रमांक प्रोटॉनों की संख्या के बराबर होता है।
- द्रव्यमान संख्या प्रोटॉन और न्यूट्रॉन की कुल संख्या होती है।
- इलेक्ट्रॉनों के त्याग या ग्रहण से आयन बनते हैं।
- समान परमाणु क्रमांक और अलग द्रव्यमान संख्या वाले परमाणु समस्थानिक कहलाते हैं।
- समान द्रव्यमान संख्या और अलग परमाणु क्रमांक वाले परमाणु समभारिक कहलाते हैं।
4.16 महत्वपूर्ण प्रश्न एवं उत्तर
प्रश्न 1. इलेक्ट्रॉन की खोज किसने की थी?
उत्तर: जे. जे. थॉमसन ने कैथोड किरणों के प्रयोग द्वारा इलेक्ट्रॉन की खोज की थी।
प्रश्न 2. न्यूट्रॉन की खोज किस वैज्ञानिक ने की थी?
उत्तर: जेम्स चैडविक ने 1932 में न्यूट्रॉन की खोज की थी।
प्रश्न 3. परमाणु का नाभिक किन कणों से बना होता है?
उत्तर: नाभिक प्रोटॉन और न्यूट्रॉन से मिलकर बना होता है।
प्रश्न 4. रदरफोर्ड के प्रयोग से क्या निष्कर्ष निकला?
उत्तर: रदरफोर्ड के प्रयोग से पता चला कि परमाणु का अधिकांश भाग खाली होता है तथा उसका धनावेश और अधिकांश द्रव्यमान बहुत छोटे केंद्रीय नाभिक में केंद्रित होता है।
प्रश्न 5. परमाणु क्रमांक किसे कहते हैं?
उत्तर: किसी परमाणु के नाभिक में उपस्थित प्रोटॉनों की संख्या को परमाणु क्रमांक कहते हैं।
प्रश्न 6. द्रव्यमान संख्या किसे कहते हैं?
उत्तर: परमाणु के नाभिक में उपस्थित प्रोटॉन और न्यूट्रॉन की कुल संख्या को द्रव्यमान संख्या कहते हैं।
प्रश्न 7. समस्थानिक और समभारिक में अंतर लिखिए।
उत्तर: समस्थानिकों का परमाणु क्रमांक समान तथा द्रव्यमान संख्या अलग होती है, जबकि समभारिकों की द्रव्यमान संख्या समान और परमाणु क्रमांक अलग होता है।
प्रश्न 8. धनायन और ऋणायन में क्या अंतर है?
उत्तर: इलेक्ट्रॉन त्यागने पर धनायन बनता है, जबकि इलेक्ट्रॉन ग्रहण करने पर ऋणायन बनता है।
4.17 बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQs)
- इलेक्ट्रॉन की खोज किसने की थी?
- (क) रदरफोर्ड
- (ख) जे. जे. थॉमसन
- (ग) चैडविक
- (घ) बोर
सही उत्तर: (ख) जे. जे. थॉमसन
- न्यूट्रॉन पर कितना आवेश होता है?
- (क) धनात्मक
- (ख) ऋणात्मक
- (ग) उदासीन
- (घ) दोहरा धनात्मक
सही उत्तर: (ग) उदासीन
- परमाणु का अधिकांश द्रव्यमान कहाँ केंद्रित होता है?
- (क) इलेक्ट्रॉन में
- (ख) नाभिक में
- (ग) बाहरी कोश में
- (घ) रिक्त स्थान में
सही उत्तर: (ख) नाभिक में
- K कोश में अधिकतम कितने इलेक्ट्रॉन हो सकते हैं?
- (क) 2
- (ख) 8
- (ग) 18
- (घ) 32
सही उत्तर: (क) 2
- परमाणु क्रमांक किसके बराबर होता है?
- (क) न्यूट्रॉन की संख्या
- (ख) प्रोटॉन की संख्या
- (ग) प्रोटॉन और न्यूट्रॉन का योग
- (घ) कोशों की संख्या
सही उत्तर: (ख) प्रोटॉन की संख्या
- द्रव्यमान संख्या किसका योग है?
- (क) इलेक्ट्रॉन और प्रोटॉन
- (ख) इलेक्ट्रॉन और न्यूट्रॉन
- (ग) प्रोटॉन और न्यूट्रॉन
- (घ) केवल प्रोटॉन
सही उत्तर: (ग) प्रोटॉन और न्यूट्रॉन
- समस्थानिकों में क्या समान होता है?
- (क) द्रव्यमान संख्या
- (ख) परमाणु क्रमांक
- (ग) न्यूट्रॉन संख्या
- (घ) द्रव्यमान
सही उत्तर: (ख) परमाणु क्रमांक
- आर्गन-40 और कैल्शियम-40 किसके उदाहरण हैं?
- (क) समस्थानिक
- (ख) समभारिक
- (ग) आयन
- (घ) अणु
सही उत्तर: (ख) समभारिक
4.18 अभ्यास प्रश्न
अति लघुत्तरात्मक प्रश्न
- परमाणु के तीन प्रमुख उप-परमाण्विक कणों के नाम लिखिए।
- प्रोटॉन पर कौन-सा आवेश होता है?
- न्यूट्रॉन की खोज किसने की थी?
- परमाणु क्रमांक को किस अक्षर से दर्शाते हैं?
- समभारिक किसे कहते हैं?
लघुत्तरात्मक प्रश्न
- थॉमसन के परमाणु मॉडल की व्याख्या कीजिए।
- रदरफोर्ड के स्वर्ण-पत्र प्रयोग के प्रमुख अवलोकन लिखिए।
- बोर के परमाणु मॉडल की प्रमुख मान्यताएँ बताइए।
- धनायन और ऋणायन में अंतर स्पष्ट कीजिए।
- समस्थानिकों के दो उपयोग लिखिए।
दीर्घ उत्तरीय प्रश्न
- रदरफोर्ड के अल्फा कण प्रकीर्णन प्रयोग का वर्णन करते हुए उसके निष्कर्ष लिखिए।
- परमाणु क्रमांक तथा द्रव्यमान संख्या को उदाहरण सहित समझाइए।
- समस्थानिक और समभारिक में अंतर उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिए।
- बोर के परमाणु मॉडल के आधार पर इलेक्ट्रॉनों के कोशों में वितरण की व्याख्या कीजिए।
संख्यात्मक प्रश्न
- किसी परमाणु का परमाणु क्रमांक 8 और द्रव्यमान संख्या 16 है। प्रोटॉन, इलेक्ट्रॉन और न्यूट्रॉन की संख्या ज्ञात कीजिए।
- किसी तत्व का परमाणु क्रमांक 19 है। उसके उदासीन परमाणु में कितने इलेक्ट्रॉन होंगे?
- किसी परमाणु में 15 प्रोटॉन और 16 न्यूट्रॉन हैं। उसकी द्रव्यमान संख्या ज्ञात कीजिए।
- क्लोरीन परमाणु का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास 2, 8, 7 है। इसकी संयोजकता ज्ञात कीजिए।
4.19 गतिविधियाँ एवं प्रयोग
गतिविधि 1: परमाणु मॉडल बनाना
रंगीन कागज, मिट्टी या थर्माकोल की छोटी गेंदों की सहायता से एक परमाणु का मॉडल बनाइए। अलग-अलग रंगों से प्रोटॉन, न्यूट्रॉन और इलेक्ट्रॉन को दर्शाइए। नाभिक और इलेक्ट्रॉन कोशों को अलग-अलग चिह्नित कीजिए।
गतिविधि 2: इलेक्ट्रॉनिक विन्यास का अभ्यास
हाइड्रोजन, कार्बन, ऑक्सीजन, सोडियम, मैग्नीशियम और क्लोरीन के परमाणु क्रमांक लिखिए। उनके इलेक्ट्रॉनिक विन्यास बनाइए तथा बाहरी कोश के इलेक्ट्रॉनों के आधार पर संयोजकता ज्ञात कीजिए।
गतिविधि 3: समस्थानिक और समभारिक की तुलना
हाइड्रोजन के तीन समस्थानिकों तथा आर्गन-40 और कैल्शियम-40 की तुलना करते हुए एक चार्ट बनाइए। उसमें परमाणु क्रमांक, द्रव्यमान संख्या, प्रोटॉन और न्यूट्रॉन की संख्या दर्शाइए।
अध्याय 4 समाप्त | RBSE कक्षा 9 विज्ञान 2026–27
जीवन की मौलिक इकाई (The Fundamental Unit of Life)
सभी जीवित प्राणी कोशिकाओं से बने होते हैं। कोशिका जीवन की संरचनात्मक एवं क्रियात्मक मौलिक इकाई है। पौधे, पशु और सूक्ष्मजीव सभी एक या अनेक कोशिकाओं से मिलकर बने होते हैं। कोशिका में जीवन की विभिन्न क्रियाएँ संचालित होती हैं। इसी कारण कोशिका को जीवन की मौलिक इकाई कहा जाता है।
5.1 कोशिका की खोज (Discovery of Cell)
कोशिका की खोज का श्रेय अंग्रेज वैज्ञानिक रॉबर्ट हुक को दिया जाता है। उन्होंने 1665 में कॉर्क की पतली काट का सूक्ष्मदर्शी से निरीक्षण किया। उन्हें कॉर्क में छोटे-छोटे कोष्ठ दिखाई दिए। उन्होंने इन कोष्ठों को Cell नाम दिया। Cell शब्द लैटिन भाषा के शब्द Cellula से लिया गया है, जिसका अर्थ छोटा कमरा होता है।
बाद में वैज्ञानिकों ने विभिन्न जीवों की कोशिकाओं का अध्ययन किया और यह स्पष्ट हुआ कि कोशिका सभी जीवों की मूलभूत संरचनात्मक इकाई है।
5.2 कोशिका सिद्धांत (Cell Theory)
कोशिका सिद्धांत का प्रतिपादन वैज्ञानिकों मैथियास श्लाइडेन और थियोडोर श्वान ने किया था। बाद में रुडोल्फ विरचो ने इसमें महत्वपूर्ण संशोधन करते हुए बताया कि नई कोशिकाएँ पहले से उपस्थित कोशिकाओं से बनती हैं।
कोशिका सिद्धांत के प्रमुख बिंदु
- सभी जीवित प्राणी कोशिकाओं से बने होते हैं।
- कोशिका जीवों की संरचनात्मक एवं क्रियात्मक मौलिक इकाई है।
- नई कोशिकाएँ पहले से उपस्थित कोशिकाओं से उत्पन्न होती हैं।
5.3 कोशिका की संरचना (Structure of Cell)
एक सामान्य कोशिका में कोशिका झिल्ली, कोशिकाद्रव्य और केंद्रक प्रमुख भाग होते हैं। कोशिका के भीतर अनेक कोशिकांग भी पाए जाते हैं, जो अलग-अलग कार्य करते हैं। कोशिका की संरचना पौधों और जंतुओं में कुछ भिन्न होती है।
चित्र 5.1 – जंतु कोशिका का सांकेतिक चित्र।
5.4 कोशिका झिल्ली या प्लाज्मा झिल्ली (Plasma Membrane)
कोशिका के सबसे बाहरी आवरण को कोशिका झिल्ली या प्लाज्मा झिल्ली कहते हैं। यह कोशिका को बाहरी वातावरण से अलग करती है और कोशिका के अंदर उपस्थित पदार्थों की सुरक्षा करती है। यह एक पतली, लचीली और चयनात्मक पारगम्य झिल्ली होती है।
कोशिका झिल्ली के प्रमुख कार्य
- कोशिका को बाहरी वातावरण से अलग रखना।
- कोशिका के अंदर और बाहर पदार्थों के आवागमन को नियंत्रित करना।
- कोशिका के आंतरिक पदार्थों की सुरक्षा करना।
- कोशिका के आकार और संरचना को बनाए रखने में सहायता करना।
चयनात्मक पारगम्यता (Selective Permeability)
कोशिका झिल्ली कुछ पदार्थों को अपने आर-पार जाने देती है, जबकि कुछ पदार्थों के आवागमन को नियंत्रित करती है। इस विशेषता को चयनात्मक पारगम्यता कहते हैं।
5.5 पदार्थों का कोशिका झिल्ली से आवागमन
पदार्थ कोशिका झिल्ली के माध्यम से विभिन्न प्रक्रियाओं द्वारा अंदर या बाहर जा सकते हैं। विसरण और परासरण इसके प्रमुख उदाहरण हैं।
विसरण (Diffusion)
किसी पदार्थ के कणों का अधिक सांद्रता वाले क्षेत्र से कम सांद्रता वाले क्षेत्र की ओर स्वतः जाना विसरण कहलाता है। यह प्रक्रिया तब तक होती रहती है जब तक पदार्थ का वितरण संतुलित न हो जाए।
उदाहरण: कमरे में इत्र छिड़कने पर उसकी सुगंध का पूरे कमरे में फैल जाना विसरण का उदाहरण है।
परासरण (Osmosis)
जल के अणुओं का चयनात्मक पारगम्य झिल्ली के माध्यम से कम विलेय सांद्रता वाले क्षेत्र से अधिक विलेय सांद्रता वाले क्षेत्र की ओर जाना परासरण कहलाता है।
परासरण में जल का आवागमन अर्धपारगम्य झिल्ली के माध्यम से होता है। यह प्रक्रिया पौधों की जड़ों द्वारा जल के अवशोषण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
चित्र 5.2 – परासरण का सांकेतिक निरूपण।
परासरण के प्रकार
- अल्पपरासारी विलयन (Hypotonic Solution): ऐसा विलयन जिसमें कोशिका के अंदर की तुलना में बाहर विलेय की सांद्रता कम होती है। ऐसी स्थिति में जल कोशिका के अंदर प्रवेश करता है और कोशिका फूल सकती है।
- समपरासारी विलयन (Isotonic Solution): ऐसा विलयन जिसमें कोशिका के अंदर और बाहर विलेय की सांद्रता समान होती है। ऐसी स्थिति में जल का कुल आवागमन संतुलित रहता है।
- अतिपरासारी विलयन (Hypertonic Solution): ऐसा विलयन जिसमें कोशिका के अंदर की तुलना में बाहर विलेय की सांद्रता अधिक होती है। ऐसी स्थिति में जल कोशिका से बाहर निकलता है और कोशिका सिकुड़ सकती है।
प्लाज्मोलाइसिस (Plasmolysis)
जब किसी पादप कोशिका को अधिक सांद्रता वाले विलयन में रखा जाता है, तो परासरण के कारण जल कोशिका से बाहर निकलता है। इससे कोशिका का कोशिकाद्रव्य सिकुड़कर कोशिका भित्ति से अलग होने लगता है। इस प्रक्रिया को प्लाज्मोलाइसिस कहते हैं।
5.6 कोशिका भित्ति (Cell Wall)
पादप कोशिकाओं में कोशिका झिल्ली के बाहर एक कठोर बाहरी आवरण पाया जाता है, जिसे कोशिका भित्ति कहते हैं। यह मुख्य रूप से सेल्यूलोज से बनी होती है। कोशिका भित्ति पौधों की कोशिकाओं को निश्चित आकार, मजबूती और सुरक्षा प्रदान करती है।
कोशिका भित्ति के कार्य
- कोशिका को निश्चित आकार प्रदान करना।
- कोशिका को यांत्रिक मजबूती देना।
- बाहरी चोट और दबाव से सुरक्षा प्रदान करना।
- अधिक जल प्रवेश करने पर कोशिका को फटने से बचाने में सहायता करना।
5.7 केंद्रक (Nucleus)
केंद्रक कोशिका का एक महत्वपूर्ण अंगक है। इसे कोशिका का नियंत्रण केंद्र भी कहा जाता है, क्योंकि यह कोशिका की विभिन्न गतिविधियों को नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। केंद्रक में आनुवंशिक पदार्थ उपस्थित होता है।
केंद्रक सामान्यतः दोहरी झिल्ली से घिरा होता है। इस झिल्ली को केंद्रक झिल्ली कहते हैं। केंद्रक के अंदर केंद्रक द्रव्य, केंद्रिका और क्रोमैटिन पदार्थ पाए जाते हैं।
केंद्रक के प्रमुख भाग
- केंद्रक झिल्ली: यह केंद्रक को कोशिकाद्रव्य से अलग करती है। इसमें छोटे-छोटे छिद्र होते हैं, जिनसे पदार्थों का आवागमन होता है।
- केंद्रक द्रव्य: केंद्रक के अंदर पाया जाने वाला द्रव पदार्थ केंद्रक द्रव्य कहलाता है।
- केंद्रिका: केंद्रक के अंदर उपस्थित सघन संरचना को केंद्रिका कहते हैं।
- क्रोमैटिन पदार्थ: केंद्रक में पाया जाने वाला धागेनुमा पदार्थ क्रोमैटिन कहलाता है। कोशिका विभाजन के समय यह संघनित होकर गुणसूत्र बनाता है।
केंद्रक के कार्य
- कोशिका की गतिविधियों के नियंत्रण में सहायता करना।
- आनुवंशिक सूचनाओं को सुरक्षित रखना।
- कोशिका विभाजन और वृद्धि में महत्वपूर्ण भूमिका निभाना।
- माता-पिता से संतानों में आनुवंशिक लक्षणों के संचरण में सहायता करना।
5.8 गुणसूत्र (Chromosomes)
गुणसूत्र केंद्रक में पाए जाने वाले धागेनुमा संरचनाएँ हैं, जो कोशिका विभाजन के समय स्पष्ट दिखाई देती हैं। ये DNA और प्रोटीन से मिलकर बने होते हैं। DNA में जीवों के आनुवंशिक लक्षणों से संबंधित सूचनाएँ होती हैं।
गुणसूत्रों पर उपस्थित DNA के विशिष्ट खंड जीन कहलाते हैं। जीन आनुवंशिक लक्षणों के संचरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
5.9 कोशिकाद्रव्य (Cytoplasm)
कोशिका झिल्ली और केंद्रक के बीच उपस्थित जेली जैसा अर्धतरल पदार्थ कोशिकाद्रव्य कहलाता है। इसमें विभिन्न कोशिकांग पाए जाते हैं। कोशिका की अनेक रासायनिक क्रियाएँ कोशिकाद्रव्य में होती हैं।
कोशिकाद्रव्य के कार्य
- कोशिकांगों को अपने भीतर स्थान प्रदान करना।
- कोशिका की अनेक जैव-रासायनिक क्रियाओं का स्थान होना।
- कोशिका के अंदर पदार्थों के आवागमन में सहायता करना।
5.10 कोशिकांग (Cell Organelles)
कोशिका के कोशिकाद्रव्य में विभिन्न प्रकार की छोटी-छोटी संरचनाएँ उपस्थित होती हैं, जिन्हें कोशिकांग कहते हैं। प्रत्येक कोशिकांग का अपना विशिष्ट कार्य होता है। ये कोशिका के सामान्य संचालन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
5.10.1 अंतःप्रद्रव्यी जालिका (Endoplasmic Reticulum – ER)
अंतःप्रद्रव्यी जालिका झिल्लीदार नलिकाओं और थैलियों का जाल होती है। यह कोशिका के भीतर पदार्थों के परिवहन में सहायता करती है।
अंतःप्रद्रव्यी जालिका दो प्रकार की होती है:
- खुरदरी अंतःप्रद्रव्यी जालिका (RER): इसकी सतह पर राइबोसोम लगे होते हैं। यह प्रोटीन के निर्माण में सहायता करती है।
- चिकनी अंतःप्रद्रव्यी जालिका (SER): इसकी सतह पर राइबोसोम नहीं होते। यह वसा और लिपिड के निर्माण में सहायता करती है।
5.10.2 गॉल्जी तंत्र (Golgi Apparatus)
गॉल्जी तंत्र झिल्ली से घिरी चपटी थैलियों का समूह होता है। यह कोशिका में बने पदार्थों के संशोधन, संग्रहण, पैकेजिंग और परिवहन में सहायता करता है।
गॉल्जी तंत्र के कार्य
- प्रोटीन और लिपिड का संशोधन करना।
- पदार्थों की पैकेजिंग और स्राव में सहायता करना।
- लाइसोसोम के निर्माण में भूमिका निभाना।
- कोशिका के अंदर पदार्थों के परिवहन में सहायता करना।
5.10.3 लाइसोसोम (Lysosomes)
लाइसोसोम झिल्ली से घिरी छोटी थैलियाँ होती हैं, जिनमें पाचक एंजाइम पाए जाते हैं। ये कोशिका के भीतर अपशिष्ट पदार्थों, पुराने कोशिकांगों और बाहरी पदार्थों के पाचन में सहायता करते हैं।
लाइसोसोम को कोशिका की आत्मघाती थैली भी कहा जाता है, क्योंकि विशेष परिस्थितियों में इनके एंजाइम कोशिका के अपने घटकों को भी पचा सकते हैं।
5.10.4 माइटोकॉन्ड्रिया (Mitochondria)
माइटोकॉन्ड्रिया कोशिका का महत्वपूर्ण कोशिकांग है। इसमें कोशिकीय श्वसन की प्रक्रिया होती है, जिसके माध्यम से भोजन से ऊर्जा प्राप्त की जाती है। इस ऊर्जा का उपयोग ATP के रूप में कोशिका की विभिन्न गतिविधियों के लिए किया जाता है।
माइटोकॉन्ड्रिया को कोशिका का ऊर्जा गृह (Powerhouse of the Cell) कहा जाता है। इसकी दोहरी झिल्ली होती है। इसकी भीतरी झिल्ली अंदर की ओर मुड़कर क्रिस्टी बनाती है।
माइटोकॉन्ड्रिया के कार्य
- कोशिकीय श्वसन में सहायता करना।
- ATP के रूप में ऊर्जा उपलब्ध कराना।
- कोशिका की विभिन्न जैविक गतिविधियों के लिए ऊर्जा प्रदान करना।
5.10.5 प्लास्टिड (Plastids)
प्लास्टिड मुख्य रूप से पादप कोशिकाओं में पाए जाते हैं। ये दोहरी झिल्ली से घिरे होते हैं। इनमें कुछ प्रकार के वर्णक पाए जाते हैं, जो पौधों को रंग प्रदान करते हैं। प्लास्टिड तीन प्रमुख प्रकार के होते हैं।
- हरितलवक (Chloroplast): इसमें क्लोरोफिल नामक हरा वर्णक होता है। यह प्रकाश संश्लेषण में सहायता करता है।
- वर्णीलवक (Chromoplast): इसमें विभिन्न रंगों के वर्णक होते हैं। ये फूलों और फलों को रंग प्रदान करते हैं।
- अवर्णीलवक (Leucoplast): इनमें रंगीन वर्णक नहीं होते। ये मुख्य रूप से भोजन के संग्रहण में सहायता करते हैं।
5.10.6 रिक्तिका (Vacuole)
रिक्तिका कोशिका के भीतर झिल्ली से घिरी हुई थैली जैसी संरचना होती है। इसमें जल, लवण, शर्करा और अन्य पदार्थ संग्रहित हो सकते हैं। पादप कोशिकाओं में सामान्यतः एक बड़ी केंद्रीय रिक्तिका पाई जाती है, जबकि जंतु कोशिकाओं में छोटी रिक्तिकाएँ हो सकती हैं।
रिक्तिका के कार्य
- जल और अन्य पदार्थों का संग्रह करना।
- पादप कोशिका में स्फीति बनाए रखने में सहायता करना।
- कोशिका के आकार और आंतरिक संतुलन को बनाए रखने में योगदान देना।
- कुछ अपशिष्ट पदार्थों का संग्रह करना।
5.11 पादप कोशिका और जंतु कोशिका में अंतर
पादप कोशिका और जंतु कोशिका दोनों यूकैरियोटिक कोशिकाएँ हैं। इनमें केंद्रक और झिल्ली से घिरे कोशिकांग पाए जाते हैं। हालांकि इनकी संरचना में कुछ महत्वपूर्ण अंतर होते हैं।
चित्र 5.3 – पादप कोशिका और जंतु कोशिका का सांकेतिक चित्र।
| आधार | पादप कोशिका | जंतु कोशिका |
|---|---|---|
| कोशिका भित्ति | उपस्थित होती है। | अनुपस्थित होती है। |
| प्लास्टिड | सामान्यतः उपस्थित होते हैं। | सामान्यतः अनुपस्थित होते हैं। |
| रिक्तिका | अक्सर एक बड़ी केंद्रीय रिक्तिका होती है। | छोटी रिक्तिकाएँ हो सकती हैं। |
| आकार | अक्सर निश्चित और नियमित आकार। | अक्सर अनियमित या गोलाकार आकार। |
| केंद्रक | उपस्थित होता है। | उपस्थित होता है। |
| कोशिका झिल्ली | उपस्थित होती है। | उपस्थित होती है। |
5.12 प्रोकैरियोटिक और यूकैरियोटिक कोशिकाएँ
कोशिकाओं को उनकी संरचना के आधार पर मुख्य रूप से दो प्रकारों में बाँटा जाता है—प्रोकैरियोटिक और यूकैरियोटिक कोशिकाएँ।
प्रोकैरियोटिक कोशिका (Prokaryotic Cell)
ऐसी कोशिका जिसमें स्पष्ट केंद्रक और केंद्रक झिल्ली नहीं होती, प्रोकैरियोटिक कोशिका कहलाती है। इसमें आनुवंशिक पदार्थ कोशिका के एक क्षेत्र में उपस्थित रहता है, जिसे केंद्रकाभ कहा जाता है।
उदाहरण: जीवाणु और सायनोबैक्टीरिया।
यूकैरियोटिक कोशिका (Eukaryotic Cell)
ऐसी कोशिका जिसमें स्पष्ट केंद्रक तथा केंद्रक झिल्ली उपस्थित होती है, यूकैरियोटिक कोशिका कहलाती है। इसमें विभिन्न झिल्लीबद्ध कोशिकांग पाए जाते हैं।
उदाहरण: पौधों, जंतुओं, कवकों और अनेक प्रोटिस्टों की कोशिकाएँ।
| आधार | प्रोकैरियोटिक कोशिका | यूकैरियोटिक कोशिका |
|---|---|---|
| केंद्रक | स्पष्ट केंद्रक अनुपस्थित। | स्पष्ट केंद्रक उपस्थित। |
| केंद्रक झिल्ली | अनुपस्थित। | उपस्थित। |
| कोशिकांग | झिल्लीबद्ध कोशिकांग अनुपस्थित। | झिल्लीबद्ध कोशिकांग उपस्थित। |
| आकार | सामान्यतः छोटा। | सामान्यतः बड़ा। |
| उदाहरण | जीवाणु | पादप और जंतु कोशिकाएँ |
5.13 कोशिका विभाजन (Cell Division)
एक कोशिका से नई कोशिकाओं के बनने की प्रक्रिया को कोशिका विभाजन कहते हैं। कोशिका विभाजन जीवों की वृद्धि, विकास, ऊतकों की मरम्मत और प्रजनन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
कोशिका विभाजन के दो प्रमुख प्रकार हैं:
1. समसूत्री विभाजन (Mitosis)
समसूत्री विभाजन में एक मातृ कोशिका विभाजित होकर दो संतति कोशिकाएँ बनाती है। सामान्यतः इन दोनों कोशिकाओं में गुणसूत्रों की संख्या मातृ कोशिका के समान होती है। यह विभाजन शरीर की वृद्धि और क्षतिग्रस्त कोशिकाओं की मरम्मत में सहायता करता है।
2. अर्धसूत्री विभाजन (Meiosis)
अर्धसूत्री विभाजन विशेष प्रकार का कोशिका विभाजन है, जिसमें गुणसूत्रों की संख्या आधी हो जाती है। यह मुख्य रूप से जनन कोशिकाओं के निर्माण में होता है। इससे बनने वाली कोशिकाओं में गुणसूत्रों की संख्या मातृ कोशिका की तुलना में आधी होती है।
| आधार | समसूत्री विभाजन | अर्धसूत्री विभाजन |
|---|---|---|
| संतति कोशिकाएँ | दो | सामान्यतः चार |
| गुणसूत्र संख्या | समान रहती है। | आधी हो जाती है। |
| मुख्य कार्य | वृद्धि और मरम्मत | जनन कोशिकाओं का निर्माण |
| स्थान | शरीर की कोशिकाएँ | जनन कोशिकाओं के निर्माण वाले ऊतक |
5.14 कोशिकांगों के प्रमुख कार्य – एक नजर में
| कोशिकांग | मुख्य कार्य |
|---|---|
| कोशिका झिल्ली | पदार्थों के आवागमन को नियंत्रित करना। |
| कोशिका भित्ति | सुरक्षा, आकार और मजबूती प्रदान करना। |
| केंद्रक | कोशिका की गतिविधियों का नियंत्रण। |
| कोशिकाद्रव्य | कोशिकांगों को स्थान देना और जैव-रासायनिक क्रियाओं का माध्यम। |
| अंतःप्रद्रव्यी जालिका | पदार्थों का परिवहन और निर्माण। |
| गॉल्जी तंत्र | पदार्थों का संशोधन, पैकेजिंग और स्राव। |
| लाइसोसोम | पाचन और अपशिष्ट पदार्थों का विघटन। |
| माइटोकॉन्ड्रिया | ऊर्जा उत्पादन। |
| प्लास्टिड | प्रकाश संश्लेषण, रंग और भोजन का संग्रहण। |
| रिक्तिका | जल और अन्य पदार्थों का संग्रहण। |
5.15 महत्वपूर्ण परिभाषाएँ
- कोशिका: जीवन की संरचनात्मक एवं क्रियात्मक मौलिक इकाई।
- कोशिका झिल्ली: कोशिका को घेरने वाली चयनात्मक पारगम्य झिल्ली।
- कोशिका भित्ति: पादप कोशिका में कोशिका झिल्ली के बाहर पाया जाने वाला कठोर आवरण।
- केंद्रक: कोशिका का वह भाग जिसमें आनुवंशिक पदार्थ पाया जाता है।
- कोशिकाद्रव्य: कोशिका झिल्ली और केंद्रक के बीच उपस्थित अर्धतरल पदार्थ।
- विसरण: कणों का अधिक सांद्रता से कम सांद्रता की ओर जाना।
- परासरण: चयनात्मक पारगम्य झिल्ली से जल का आवागमन।
- गुणसूत्र: DNA और प्रोटीन से बनी आनुवंशिक संरचनाएँ।
- जीन: DNA का वह विशिष्ट खंड जो आनुवंशिक सूचना रखता है।
- कोशिकांग: कोशिका के भीतर विशिष्ट कार्य करने वाली संरचनाएँ।
5.16 अध्याय का सारांश
- कोशिका जीवन की संरचनात्मक एवं क्रियात्मक मौलिक इकाई है।
- रॉबर्ट हुक ने 1665 में कॉर्क की कोशिकाओं का निरीक्षण किया था।
- कोशिका झिल्ली चयनात्मक पारगम्य होती है।
- विसरण और परासरण कोशिका झिल्ली से पदार्थों के आवागमन की महत्वपूर्ण प्रक्रियाएँ हैं।
- पादप कोशिका में कोशिका भित्ति पाई जाती है, जबकि जंतु कोशिका में यह अनुपस्थित होती है।
- केंद्रक में आनुवंशिक पदार्थ पाया जाता है।
- माइटोकॉन्ड्रिया को कोशिका का ऊर्जा गृह कहा जाता है।
- गॉल्जी तंत्र पदार्थों के संशोधन और पैकेजिंग में सहायता करता है।
- लाइसोसोम में पाचक एंजाइम पाए जाते हैं।
- प्लास्टिड मुख्य रूप से पादप कोशिकाओं में पाए जाते हैं।
- कोशिका विभाजन वृद्धि, मरम्मत और प्रजनन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
5.17 महत्वपूर्ण प्रश्न एवं उत्तर
प्रश्न 1. कोशिका की खोज किसने और कब की थी?
उत्तर: रॉबर्ट हुक ने 1665 में कॉर्क की पतली काट का सूक्ष्मदर्शी से निरीक्षण करते समय कोशिका की खोज की थी।
प्रश्न 2. कोशिका को जीवन की मौलिक इकाई क्यों कहा जाता है?
उत्तर: क्योंकि सभी जीव कोशिकाओं से बने होते हैं और जीवन की आवश्यक क्रियाएँ कोशिकाओं में संपन्न होती हैं। इसलिए कोशिका को जीवन की संरचनात्मक एवं क्रियात्मक मौलिक इकाई कहा जाता है।
प्रश्न 3. प्लाज्मा झिल्ली का प्रमुख कार्य क्या है?
उत्तर: प्लाज्मा झिल्ली कोशिका को बाहरी वातावरण से अलग करती है तथा पदार्थों के कोशिका के अंदर और बाहर आवागमन को नियंत्रित करती है।
प्रश्न 4. विसरण किसे कहते हैं?
उत्तर: किसी पदार्थ के कणों का अधिक सांद्रता वाले क्षेत्र से कम सांद्रता वाले क्षेत्र की ओर स्वतः जाना विसरण कहलाता है।
प्रश्न 5. परासरण किसे कहते हैं?
उत्तर: चयनात्मक पारगम्य झिल्ली के माध्यम से जल के अणुओं का कम विलेय सांद्रता वाले क्षेत्र से अधिक विलेय सांद्रता वाले क्षेत्र की ओर जाना परासरण कहलाता है।
प्रश्न 6. कोशिका भित्ति किस पदार्थ से बनी होती है?
उत्तर: पादप कोशिका की कोशिका भित्ति मुख्य रूप से सेल्यूलोज से बनी होती है।
प्रश्न 7. केंद्रक को कोशिका का नियंत्रण केंद्र क्यों कहते हैं?
उत्तर: केंद्रक कोशिका की विभिन्न गतिविधियों को नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसमें आनुवंशिक पदार्थ भी उपस्थित होता है।
प्रश्न 8. माइटोकॉन्ड्रिया को कोशिका का ऊर्जा गृह क्यों कहते हैं?
उत्तर: माइटोकॉन्ड्रिया में कोशिकीय श्वसन द्वारा ATP के रूप में ऊर्जा प्राप्त होती है। इसलिए इसे कोशिका का ऊर्जा गृह कहते हैं।
प्रश्न 9. लाइसोसोम को आत्मघाती थैली क्यों कहा जाता है?
उत्तर: लाइसोसोम में पाचक एंजाइम होते हैं। विशेष परिस्थितियों में इनके एंजाइम कोशिका के अपने घटकों को भी पचा सकते हैं। इसलिए इन्हें आत्मघाती थैली कहा जाता है।
प्रश्न 10. पादप कोशिका और जंतु कोशिका में दो अंतर लिखिए।
उत्तर: पादप कोशिका में कोशिका भित्ति और सामान्यतः प्लास्टिड पाए जाते हैं, जबकि जंतु कोशिका में ये सामान्यतः अनुपस्थित होते हैं। पादप कोशिका में बड़ी केंद्रीय रिक्तिका होती है, जबकि जंतु कोशिका में छोटी रिक्तिकाएँ हो सकती हैं।
प्रश्न 11. गॉल्जी तंत्र का क्या कार्य है?
उत्तर: गॉल्जी तंत्र कोशिका में बने पदार्थों के संशोधन, संग्रहण, पैकेजिंग और परिवहन में सहायता करता है।
प्रश्न 12. कोशिका विभाजन का क्या महत्व है?
उत्तर: कोशिका विभाजन जीवों की वृद्धि, विकास, क्षतिग्रस्त कोशिकाओं की मरम्मत और प्रजनन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
5.18 बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQs)
- कोशिका की खोज किसने की थी?
- (क) रॉबर्ट हुक
- (ख) रदरफोर्ड
- (ग) थॉमसन
- (घ) चैडविक
सही उत्तर: (क) रॉबर्ट हुक
- कोशिका का ऊर्जा गृह किसे कहते हैं?
- (क) केंद्रक
- (ख) माइटोकॉन्ड्रिया
- (ग) गॉल्जी तंत्र
- (घ) रिक्तिका
सही उत्तर: (ख) माइटोकॉन्ड्रिया
- पादप कोशिका की कोशिका भित्ति मुख्य रूप से किसकी बनी होती है?
- (क) प्रोटीन
- (ख) वसा
- (ग) सेल्यूलोज
- (घ) स्टार्च
सही उत्तर: (ग) सेल्यूलोज
- कोशिका की गतिविधियों का नियंत्रण कौन करता है?
- (क) केंद्रक
- (ख) रिक्तिका
- (ग) कोशिका भित्ति
- (घ) कोशिका झिल्ली
सही उत्तर: (क) केंद्रक
- लाइसोसोम में क्या पाया जाता है?
- (क) प्रकाश संश्लेषक वर्णक
- (ख) पाचक एंजाइम
- (ग) क्लोरोफिल
- (घ) केवल जल
सही उत्तर: (ख) पाचक एंजाइम
- प्रकाश संश्लेषण में कौन-सा कोशिकांग सहायता करता है?
- (क) माइटोकॉन्ड्रिया
- (ख) लाइसोसोम
- (ग) हरितलवक
- (घ) केंद्रक
सही उत्तर: (ग) हरितलवक
- कोशिका झिल्ली की प्रमुख विशेषता क्या है?
- (क) पूर्ण अपारगम्यता
- (ख) चयनात्मक पारगम्यता
- (ग) कठोरता
- (घ) रंगहीनता
सही उत्तर: (ख) चयनात्मक पारगम्यता
- प्रोकैरियोटिक कोशिका में क्या अनुपस्थित होता है?
- (क) कोशिका झिल्ली
- (ख) कोशिकाद्रव्य
- (ग) स्पष्ट केंद्रक
- (घ) राइबोसोम
सही उत्तर: (ग) स्पष्ट केंद्रक
- गॉल्जी तंत्र का प्रमुख कार्य क्या है?
- (क) ऊर्जा उत्पादन
- (ख) पदार्थों का संशोधन और पैकेजिंग
- (ग) प्रकाश संश्लेषण
- (घ) आनुवंशिक सूचना रखना
सही उत्तर: (ख) पदार्थों का संशोधन और पैकेजिंग
- नई कोशिकाएँ किससे उत्पन्न होती हैं?
- (क) निर्जीव पदार्थों से
- (ख) पहले से उपस्थित कोशिकाओं से
- (ग) केवल जल से
- (घ) केवल प्रोटीन से
सही उत्तर: (ख) पहले से उपस्थित कोशिकाओं से
5.19 अभ्यास प्रश्न
अति लघुत्तरात्मक प्रश्न
- कोशिका किसे कहते हैं?
- कोशिका की खोज किस वैज्ञानिक ने की थी?
- कोशिका झिल्ली को चयनात्मक पारगम्य क्यों कहा जाता है?
- माइटोकॉन्ड्रिया को किस नाम से जाना जाता है?
- पादप कोशिका की भित्ति किस पदार्थ से बनी होती है?
- जीन किसे कहते हैं?
- प्लास्टिड के तीन प्रकारों के नाम लिखिए।
लघुत्तरात्मक प्रश्न
- कोशिका सिद्धांत के प्रमुख बिंदु लिखिए।
- विसरण और परासरण में अंतर स्पष्ट कीजिए।
- कोशिका झिल्ली के चार कार्य लिखिए।
- केंद्रक के प्रमुख भागों का वर्णन कीजिए।
- गॉल्जी तंत्र के कार्य लिखिए।
- लाइसोसोम को आत्मघाती थैली क्यों कहा जाता है?
- पादप कोशिका और जंतु कोशिका में अंतर लिखिए।
दीर्घ उत्तरीय प्रश्न
- कोशिका की संरचना का सचित्र वर्णन कीजिए।
- प्लाज्मा झिल्ली की संरचना एवं कार्यों को समझाइए।
- परासरण की प्रक्रिया को उदाहरण सहित समझाइए।
- केंद्रक की संरचना और कार्यों का विस्तार से वर्णन कीजिए।
- माइटोकॉन्ड्रिया, गॉल्जी तंत्र और अंतःप्रद्रव्यी जालिका के कार्यों की व्याख्या कीजिए।
- प्रोकैरियोटिक और यूकैरियोटिक कोशिकाओं में अंतर स्पष्ट कीजिए।
- समसूत्री और अर्धसूत्री विभाजन में अंतर लिखिए।
5.20 गतिविधियाँ एवं प्रयोग
गतिविधि 1: प्याज की झिल्ली की कोशिका का अवलोकन
प्याज की एक पतली झिल्ली लेकर उसे स्लाइड पर रखें। उस पर पानी और उपयुक्त रंग डालकर कवर स्लिप लगाएँ। सूक्ष्मदर्शी की सहायता से कोशिकाओं का निरीक्षण करें। कोशिका भित्ति और केंद्रक को पहचानने का प्रयास करें।
गतिविधि 2: पादप और जंतु कोशिका का मॉडल
चार्ट पेपर या मिट्टी की सहायता से पादप कोशिका और जंतु कोशिका के मॉडल तैयार करें। इनमें कोशिका झिल्ली, कोशिका भित्ति, केंद्रक, माइटोकॉन्ड्रिया और रिक्तिका को अलग-अलग रंगों से दर्शाएँ।
गतिविधि 3: परासरण का प्रदर्शन
किशमिश को पानी में भिगोकर कुछ समय बाद उसके आकार में होने वाले परिवर्तन का निरीक्षण करें। इसके बाद किशमिश को अधिक सांद्रता वाले चीनी के घोल में रखें और परिवर्तन देखें। दोनों स्थितियों में जल के आवागमन को समझने का प्रयास करें।
गतिविधि 4: कोशिकांगों का चार्ट
केंद्रक, माइटोकॉन्ड्रिया, गॉल्जी तंत्र, लाइसोसोम, रिक्तिका और प्लास्टिड के चित्र बनाइए। प्रत्येक कोशिकांग के सामने उसका प्रमुख कार्य लिखिए।
अध्याय 5 समाप्त | RBSE कक्षा 9 विज्ञान 2026–27
ऊतक (Tissues)
ऊतक समान संरचना, उत्पत्ति और कार्य करने वाली कोशिकाओं का ऐसा समूह है, जो मिलकर किसी विशेष कार्य को संपन्न करता है। बहुकोशिकीय जीवों में कोशिकाएँ अलग-अलग कार्य करने के बजाय समूहों में संगठित होकर कार्य करती हैं। पौधों और जंतुओं में विभिन्न प्रकार के ऊतक पाए जाते हैं।
इस अध्याय में पादप ऊतक, जंतु ऊतक, उनकी संरचना, प्रकार, कार्य और उनके बीच के अंतर का अध्ययन किया जाता है।
6.1 ऊतक क्या हैं?
एक कोशिकीय जीवों में एक ही कोशिका जीवन की सभी आवश्यक क्रियाएँ करती है, जबकि बहुकोशिकीय जीवों में अलग-अलग कोशिकाएँ विशेष कार्यों के लिए अनुकूलित होती हैं। समान कार्य करने वाली कोशिकाएँ मिलकर ऊतक बनाती हैं।
उदाहरण के लिए, मनुष्य में पेशीय ऊतक शरीर की गति में सहायता करता है, जबकि तंत्रिका ऊतक संदेशों का संचार करता है। पौधों में जाइलम जल का परिवहन करता है और फ्लोएम भोजन का परिवहन करता है।
ऊतकों के निर्माण का महत्व
- कार्य का विभाजन होने से जीवों की कार्यक्षमता बढ़ती है।
- विशिष्ट कोशिकाएँ विशेष कार्य अधिक कुशलता से करती हैं।
- शरीर की विभिन्न क्रियाओं में समन्वय स्थापित होता है।
- बहुकोशिकीय जीवों में जटिल संरचनाओं का निर्माण संभव होता है।
6.2 ऊतकों के प्रमुख प्रकार
पौधों और जंतुओं में उनकी संरचना तथा कार्यों के आधार पर अलग-अलग प्रकार के ऊतक पाए जाते हैं।
चित्र 6.1 — ऊतकों का वर्गीकरण
6.3 पादप ऊतक (Plant Tissues)
पौधों में पाए जाने वाले ऊतकों को मुख्य रूप से दो वर्गों में बाँटा जाता है:
- विभज्योतक ऊतक (Meristematic Tissue)
- स्थायी ऊतक (Permanent Tissue)
6.4 विभज्योतक ऊतक (Meristematic Tissue)
विभज्योतक ऊतक उन कोशिकाओं से बने होते हैं जो लगातार विभाजित होकर नई कोशिकाओं का निर्माण करती हैं। पौधों की वृद्धि मुख्यतः इन्हीं ऊतकों के कारण होती है। ये ऊतक पौधे के विशेष वृद्धि क्षेत्रों में पाए जाते हैं।
विभज्योतक कोशिकाओं की विशेषताएँ
- कोशिकाएँ लगातार विभाजन करने में सक्षम होती हैं।
- कोशिका भित्ति सामान्यतः पतली होती है।
- कोशिकाओं में घना कोशिकाद्रव्य पाया जाता है।
- इनमें स्पष्ट केंद्रक होता है।
- कोशिकाओं में रिक्तिकाएँ बहुत छोटी या अनुपस्थित होती हैं।
- कोशिकाओं के बीच सामान्यतः अंतरकोशिकीय स्थान नहीं होता।
विभज्योतक ऊतक के प्रकार
स्थिति के आधार पर विभज्योतक ऊतक तीन प्रकार के होते हैं:
1. शीर्षस्थ विभज्योतक (Apical Meristem)
यह पौधे के तने और जड़ के शीर्ष पर पाया जाता है। यह पौधे की लंबाई में वृद्धि करता है। इसे प्राथमिक वृद्धि का प्रमुख कारण माना जाता है।
स्थान: जड़ का अग्रभाग और तने का शीर्ष।
कार्य: जड़ और तने की लंबाई बढ़ाना।
2. अंतर्वेशी विभज्योतक (Intercalary Meristem)
यह ऊतक पत्तियों के आधार या पर्वसंधियों (Internodes) के पास पाया जाता है। यह पौधे के कुछ भागों की लंबाई बढ़ाने में सहायता करता है। घास में यह ऊतक विशेष रूप से महत्वपूर्ण होता है।
स्थान: पत्ती का आधार और पर्वसंधियाँ।
कार्य: पौधे के भागों की लंबाई में वृद्धि।
3. पार्श्व विभज्योतक (Lateral Meristem)
यह ऊतक जड़ और तने के पार्श्व भागों में पाया जाता है। यह पौधे की मोटाई या परिधि बढ़ाने में सहायता करता है।
स्थान: तने और जड़ के पार्श्व भाग।
कार्य: पौधे की मोटाई में वृद्धि करना।
चित्र 6.2 — पौधे में विभज्योतक ऊतकों के स्थान का सांकेतिक चित्र
6.5 स्थायी ऊतक (Permanent Tissue)
जब विभज्योतक कोशिकाएँ विभाजन की क्षमता खोकर एक निश्चित आकार, संरचना और कार्य प्राप्त कर लेती हैं, तब वे स्थायी ऊतक बनाती हैं। इस प्रक्रिया को विभेदन (Differentiation) कहते हैं।
स्थायी ऊतकों की कोशिकाएँ विशेष कार्यों के लिए विकसित होती हैं। सामान्यतः ये कोशिकाएँ विभाजन नहीं करतीं। स्थायी ऊतक मुख्य रूप से सरल स्थायी ऊतक और जटिल स्थायी ऊतक में विभाजित होते हैं।
6.6 सरल स्थायी ऊतक (Simple Permanent Tissue)
सरल स्थायी ऊतक एक ही प्रकार की समान कोशिकाओं से बने होते हैं। इनके प्रमुख प्रकार निम्नलिखित हैं:
1. मृदूतक (Parenchyma)
मृदूतक पौधों में पाया जाने वाला सामान्य जीवित ऊतक है। इसकी कोशिकाएँ पतली कोशिका भित्ति वाली होती हैं और इनके बीच अंतरकोशिकीय स्थान पाए जा सकते हैं।
- यह पौधे के कोमल भागों में पाया जाता है।
- यह भोजन का भंडारण करता है।
- कुछ मृदूतक कोशिकाएँ प्रकाश संश्लेषण करती हैं।
- यह पौधे को सहारा देने में भी सहायता करता है।
मृदूतक के विशेष रूप:
- हरित ऊतक (Chlorenchyma): इसमें क्लोरोफिल पाया जाता है। यह प्रकाश संश्लेषण में सहायता करता है।
- वायूतक (Aerenchyma): इसमें बड़े वायु स्थान पाए जाते हैं। यह जलीय पौधों को तैरने में सहायता कर सकता है।
2. स्थूलकोण ऊतक (Collenchyma)
यह जीवित कोशिकाओं से बना ऊतक है। इसकी कोशिका भित्ति के कोनों पर असमान मोटाई पाई जाती है। यह पौधे के कोमल भागों को लचीलापन और यांत्रिक सहारा प्रदान करता है।
- यह पत्तियों के डंठल और द्विबीजपत्री पौधों के तनों में पाया जाता है।
- यह पौधे को बिना टूटे मुड़ने में सहायता करता है।
- इसकी कोशिकाओं में सामान्यतः अंतरकोशिकीय स्थान बहुत कम होते हैं।
3. दृढ़ोतक (Sclerenchyma)
दृढ़ोतक मृत कोशिकाओं से बना होता है। इसकी कोशिका भित्तियाँ मोटी और लिग्निनयुक्त होती हैं। यह पौधों को कठोरता तथा मजबूती प्रदान करता है।
- इसकी कोशिकाएँ सामान्यतः मृत होती हैं।
- कोशिका भित्तियाँ मोटी और मजबूत होती हैं।
- यह नारियल के रेशों, बीजों के कठोर आवरण तथा पौधों के कठोर भागों में पाया जाता है।
- यह पौधे को यांत्रिक सहारा प्रदान करता है।
सरल स्थायी ऊतकों की तुलना
| ऊतक | कोशिकाओं की प्रकृति | मुख्य विशेषता | कार्य |
|---|---|---|---|
| मृदूतक | जीवित | पतली कोशिका भित्ति | भोजन संग्रह, प्रकाश संश्लेषण |
| स्थूलकोण ऊतक | जीवित | कोनों पर असमान मोटाई | लचीलापन और सहारा |
| दृढ़ोतक | मृत | मोटी लिग्निनयुक्त भित्ति | कठोरता और मजबूती |
6.7 रक्षी ऊतक (Protective Tissue)
पौधों के बाहरी भागों को सुरक्षा प्रदान करने वाले ऊतक रक्षी ऊतक कहलाते हैं। ये पौधे को चोट, संक्रमण और जल की अत्यधिक हानि से बचाने में सहायता करते हैं।
1. एपिडर्मिस (Epidermis)
एपिडर्मिस पौधे की बाहरी कोशिकीय परत होती है। यह पौधे के विभिन्न भागों को ढककर सुरक्षा प्रदान करती है। पत्तियों की एपिडर्मिस पर क्यूटिकल नामक मोम जैसी परत हो सकती है, जो जल की हानि कम करती है।
पत्तियों में पाए जाने वाले रंध्र (Stomata) गैसों के आदान-प्रदान और वाष्पोत्सर्जन में सहायता करते हैं। रंध्रों के खुलने और बंद होने का नियंत्रण रक्षक कोशिकाएँ करती हैं।
2. कॉर्क (Cork)
पुराने तनों और जड़ों में बाहरी सुरक्षा परत के रूप में कॉर्क पाया जा सकता है। इसकी कोशिकाएँ सामान्यतः मृत होती हैं और उनकी भित्तियों में सुबेरिन पाया जाता है। सुबेरिन जल तथा गैसों के आवागमन को सीमित करने में सहायता करता है।
6.8 जटिल स्थायी ऊतक (Complex Permanent Tissue)
जटिल स्थायी ऊतक एक से अधिक प्रकार की कोशिकाओं से मिलकर बनते हैं। इनकी विभिन्न कोशिकाएँ एक साथ मिलकर एक विशेष कार्य करती हैं। पौधों में जाइलम और फ्लोएम दो प्रमुख जटिल स्थायी ऊतक हैं। इन्हें संवहन ऊतक भी कहा जाता है।
1. जाइलम (Xylem)
जाइलम पौधों में जड़ों से जल और घुले हुए खनिज लवणों का परिवहन करता है। यह पौधे को यांत्रिक सहारा देने में भी सहायता करता है।
जाइलम के घटक:
- वाहिनिकाएँ (Tracheids): ये लंबी, संकरी और सामान्यतः मृत कोशिकाएँ होती हैं। ये जल के परिवहन में सहायता करती हैं।
- वाहिकाएँ (Vessels): ये नलिकाकार संरचनाएँ बनाती हैं और जल के परिवहन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
- जाइलम मृदूतक (Xylem Parenchyma): यह जीवित घटक है और भोजन के संग्रह तथा पार्श्व परिवहन में सहायता करता है।
- जाइलम रेशे (Xylem Fibres): ये पौधे को यांत्रिक मजबूती प्रदान करते हैं।
2. फ्लोएम (Phloem)
फ्लोएम पौधों में पत्तियों द्वारा बनाए गए भोजन को पौधे के अन्य भागों तक पहुँचाता है। भोजन का परिवहन आवश्यकता के अनुसार स्रोत से उपयोग या भंडारण वाले भागों तक हो सकता है।
फ्लोएम के घटक:
- चालनी नलिकाएँ (Sieve Tubes): ये भोजन के परिवहन में सहायता करती हैं।
- सहचर कोशिकाएँ (Companion Cells): ये चालनी नलिकाओं के कार्यों को नियंत्रित और समर्थित करती हैं।
- फ्लोएम मृदूतक (Phloem Parenchyma): यह भोजन के संग्रह और परिवहन में सहायता करता है।
- फ्लोएम रेशे (Phloem Fibres): ये पौधे को यांत्रिक मजबूती प्रदान करते हैं।
| आधार | जाइलम | फ्लोएम |
|---|---|---|
| मुख्य कार्य | जल और खनिजों का परिवहन | भोजन का परिवहन |
| परिवहन की दिशा | मुख्यतः जड़ों से ऊपर की ओर | स्रोत से आवश्यकता वाले भागों तक, विभिन्न दिशाओं में |
| मुख्य घटक | वाहिनिकाएँ, वाहिकाएँ, मृदूतक और रेशे | चालनी नलिकाएँ, सहचर कोशिकाएँ, मृदूतक और रेशे |
| कोशिकाओं की प्रकृति | अधिकांश घटक मृत; जाइलम मृदूतक जीवित | अधिकांश घटक जीवित; फ्लोएम रेशे मृत |
6.9 जंतु ऊतक (Animal Tissues)
जंतुओं के शरीर में कोशिकाएँ विभिन्न कार्यों के लिए विशेषीकृत होती हैं। जंतु ऊतकों को मुख्यतः चार वर्गों में बाँटा जाता है:
- उपकला ऊतक (Epithelial Tissue)
- संयोजी ऊतक (Connective Tissue)
- पेशीय ऊतक (Muscular Tissue)
- तंत्रिका ऊतक (Nervous Tissue)
6.10 उपकला ऊतक (Epithelial Tissue)
उपकला ऊतक शरीर की बाहरी सतह, आंतरिक अंगों और विभिन्न नलिकाओं की अंदरूनी सतह को ढकता है। यह शरीर को सुरक्षा प्रदान करता है तथा अवशोषण, स्राव और पदार्थों के आदान-प्रदान जैसे कार्य करता है।
उपकला ऊतक की विशेषताएँ
- कोशिकाएँ एक-दूसरे के बहुत पास व्यवस्थित होती हैं।
- कोशिकाओं के बीच अंतरकोशिकीय स्थान बहुत कम होता है।
- यह शरीर की बाहरी और आंतरिक सतहों को ढकता है।
- यह आधार झिल्ली (Basement Membrane) पर स्थित होता है।
उपकला ऊतक के प्रकार
1. शल्की उपकला (Squamous Epithelium)
यह पतली और चपटी कोशिकाओं की परत से बना होता है। यह पदार्थों के विसरण और आदान-प्रदान में सहायता करता है।
स्थान: फेफड़ों की वायुकोष्ठिकाओं और रक्त वाहिकाओं की भीतरी सतह।
कार्य: गैसों और अन्य पदार्थों के आदान-प्रदान में सहायता।
2. स्तरीकृत शल्की उपकला (Stratified Squamous Epithelium)
यह कोशिकाओं की अनेक परतों से बना होता है। इसकी संरचना घर्षण और चोट से सुरक्षा प्रदान करती है।
स्थान: त्वचा और मुखगुहा की सतह।
कार्य: शरीर को घर्षण और बाहरी क्षति से बचाना।
3. घनाकार उपकला (Cuboidal Epithelium)
इसकी कोशिकाएँ घन के आकार की होती हैं। यह स्राव और अवशोषण में सहायता करती हैं।
स्थान: वृक्क नलिकाएँ और ग्रंथियों की नलिकाएँ।
कार्य: अवशोषण तथा स्राव।
4. स्तंभाकार उपकला (Columnar Epithelium)
इसकी कोशिकाएँ लंबी और स्तंभ जैसी होती हैं। यह अवशोषण तथा स्राव में सहायता करती हैं।
स्थान: आहार नाल की आंतरिक सतह।
कार्य: भोजन का अवशोषण और पदार्थों का स्राव।
5. पक्ष्माभी उपकला (Ciliated Epithelium)
इसकी कोशिकाओं की सतह पर बाल जैसी संरचनाएँ होती हैं, जिन्हें पक्ष्माभ (Cilia) कहते हैं। इनकी गति पदार्थों को आगे बढ़ाने में सहायता करती है।
स्थान: श्वसन नली और कुछ अन्य नलिकाएँ।
कार्य: श्लेष्मा और अन्य पदार्थों को आगे बढ़ाना।
6. ग्रंथिल उपकला (Glandular Epithelium)
यह विशेषीकृत उपकला है, जो विभिन्न पदार्थों का स्राव करती है।
स्थान: विभिन्न ग्रंथियाँ।
कार्य: एंजाइम, हार्मोन, श्लेष्मा और अन्य पदार्थों का स्राव।
6.11 संयोजी ऊतक (Connective Tissue)
संयोजी ऊतक शरीर के विभिन्न अंगों और ऊतकों को जोड़ने, सहारा देने, सुरक्षा प्रदान करने तथा पदार्थों के परिवहन में सहायता करते हैं। इनकी कोशिकाएँ सामान्यतः एक अंतरकोशिकीय पदार्थ या मैट्रिक्स में स्थित होती हैं।
संयोजी ऊतक के प्रकार
1. एरिओलर ऊतक (Areolar Tissue)
यह ढीला संयोजी ऊतक है। यह त्वचा और मांसपेशियों के बीच तथा अंगों के आसपास पाया जाता है।
कार्य: अंगों को सहारा देना, रिक्त स्थान भरना और ऊतकों को जोड़ना।
2. वसामय ऊतक (Adipose Tissue)
यह वसा कोशिकाओं से बना होता है। इसमें वसा का संग्रह किया जाता है।
स्थान: त्वचा के नीचे और आंतरिक अंगों के आसपास।
कार्य: ऊर्जा का संग्रह, शरीर को तापरोधन और अंगों को सुरक्षा देना।
3. कंडरा (Tendon)
कंडरा मजबूत रेशेदार संयोजी ऊतक है, जो मांसपेशियों को हड्डियों से जोड़ता है।
कार्य: मांसपेशियों द्वारा उत्पन्न बल को हड्डियों तक पहुँचाना।
4. स्नायुबंधन (Ligament)
स्नायुबंधन मजबूत और लचीला संयोजी ऊतक है, जो एक हड्डी को दूसरी हड्डी से जोड़ता है।
कार्य: जोड़ों को स्थिरता प्रदान करना।
5. उपास्थि (Cartilage)
उपास्थि एक लचीला संयोजी ऊतक है। इसका मैट्रिक्स ठोस लेकिन लचीला होता है।
स्थान: नाक, कान, श्वासनली और हड्डियों के जोड़ों के सिरों पर।
कार्य: लचीलापन प्रदान करना तथा जोड़ों में घर्षण कम करने में सहायता करना।
6. अस्थि (Bone)
अस्थि कठोर संयोजी ऊतक है। इसके मैट्रिक्स में कैल्शियम और फॉस्फोरस के लवण पाए जाते हैं, जो इसे मजबूती प्रदान करते हैं।
कार्य: शरीर को आकार और सहारा देना, आंतरिक अंगों की सुरक्षा करना तथा मांसपेशियों के साथ मिलकर गति में सहायता करना।
7. रक्त (Blood)
रक्त एक तरल संयोजी ऊतक है। इसका तरल मैट्रिक्स प्लाज्मा कहलाता है। इसमें लाल रक्त कोशिकाएँ, श्वेत रक्त कोशिकाएँ और प्लेटलेट्स पाए जाते हैं।
- लाल रक्त कोशिकाएँ: ऑक्सीजन के परिवहन में सहायता करती हैं।
- श्वेत रक्त कोशिकाएँ: शरीर को संक्रमण से बचाने में सहायता करती हैं।
- प्लेटलेट्स: रक्त का थक्का जमाने में सहायता करते हैं।
- प्लाज्मा: विभिन्न पदार्थों के परिवहन का माध्यम है।
कंडरा और स्नायुबंधन में अंतर
| आधार | कंडरा (Tendon) | स्नायुबंधन (Ligament) |
|---|---|---|
| जोड़ने का कार्य | मांसपेशी को हड्डी से जोड़ता है | एक हड्डी को दूसरी हड्डी से जोड़ता है |
| प्रकृति | मजबूत और कम लचीला | मजबूत और अपेक्षाकृत अधिक लचीला |
| मुख्य कार्य | मांसपेशियों का बल हड्डियों तक पहुँचाना | जोड़ों को स्थिरता देना |
6.12 पेशीय ऊतक (Muscular Tissue)
पेशीय ऊतक ऐसी विशेष कोशिकाओं से बना होता है, जिनमें संकुचन और शिथिलन की क्षमता होती है। इन्हीं क्रियाओं के कारण शरीर के विभिन्न अंगों और शरीर की गति संभव होती है।
पेशीय कोशिकाओं को पेशी तंतु भी कहा जाता है। इनमें संकुचनशील प्रोटीन पाए जाते हैं। पेशीय ऊतक मुख्यतः तीन प्रकार के होते हैं।
1. रेखित पेशी (Striated Muscle)
- इनमें हल्की और गहरी धारियाँ दिखाई देती हैं।
- ये सामान्यतः लंबी, बेलनाकार और बहुनाभिकीय कोशिकाओं से बनी होती हैं।
- इनकी गति सामान्यतः ऐच्छिक होती है।
- ये हाथ-पैर तथा शरीर की अस्थियों से जुड़ी होती हैं।
कार्य: शरीर के अंगों को इच्छानुसार गति प्रदान करना।
2. अरेखित पेशी (Smooth Muscle)
- इनमें स्पष्ट धारियाँ नहीं होती हैं।
- कोशिकाएँ सामान्यतः तर्कुरूपी होती हैं।
- प्रत्येक कोशिका में सामान्यतः एक केंद्रक होता है।
- इनकी गति अनैच्छिक होती है।
स्थान: आहार नाल, रक्त वाहिकाओं और मूत्राशय की दीवारों में।
कार्य: आंतरिक अंगों की गतियों को नियंत्रित करना।
3. हृदय पेशी (Cardiac Muscle)
- ये केवल हृदय में पाई जाती हैं।
- इनमें धारियाँ दिखाई देती हैं।
- इनकी कोशिकाएँ शाखित होती हैं।
- इनकी गति अनैच्छिक और लयबद्ध होती है।
- ये बिना थके लगातार कार्य करने के लिए अनुकूलित होती हैं।
कार्य: हृदय का संकुचन और रक्त का पंप करना।
| विशेषता | रेखित पेशी | अरेखित पेशी | हृदय पेशी |
|---|---|---|---|
| धारियाँ | उपस्थित | अनुपस्थित | उपस्थित |
| नियंत्रण | ऐच्छिक | अनैच्छिक | अनैच्छिक |
| कोशिका का आकार | लंबी और बेलनाकार | तर्कुरूपी | शाखित |
| केंद्रक | अनेक | एक | सामान्यतः एक |
| स्थान | अस्थियों से जुड़ी मांसपेशियाँ | आंतरिक अंगों की दीवारें | हृदय |
6.13 तंत्रिका ऊतक (Nervous Tissue)
तंत्रिका ऊतक शरीर में संदेशों को ग्रहण करने, उनका संचार करने और विभिन्न क्रियाओं का समन्वय स्थापित करने का कार्य करता है। यह मस्तिष्क, मेरुरज्जु और तंत्रिकाओं में पाया जाता है।
तंत्रिका ऊतक की संरचनात्मक और क्रियात्मक इकाई न्यूरॉन (Neuron) कहलाती है। न्यूरॉन विशेष प्रकार की कोशिका है, जो तंत्रिका आवेगों का संचार करती है।
न्यूरॉन की संरचना
- कोशिका काय (Cell Body): इसमें केंद्रक और कोशिकाद्रव्य पाया जाता है।
- द्रुमिका (Dendrites): ये छोटी शाखाएँ होती हैं, जो संदेश ग्रहण करने में सहायता करती हैं।
- अक्षतंतु (Axon): यह लंबा तंतु होता है, जो तंत्रिका आवेग को कोशिका काय से आगे ले जाता है।
चित्र 6.3 — न्यूरॉन की संरचना का सांकेतिक चित्र
तंत्रिका ऊतक के कार्य
- शरीर के विभिन्न भागों से सूचनाएँ ग्रहण करना।
- तंत्रिका आवेगों का संचार करना।
- शरीर की गतिविधियों का नियंत्रण और समन्वय करना।
- बाहरी और आंतरिक उद्दीपनों के प्रति प्रतिक्रिया उत्पन्न करना।
6.14 पादप ऊतक और जंतु ऊतक में अंतर
| आधार | पादप ऊतक | जंतु ऊतक |
|---|---|---|
| वृद्धि | मुख्यतः विभज्योतक क्षेत्रों में होती है। | विभिन्न अंगों और ऊतकों में वृद्धि हो सकती है। |
| ऊतकों का प्रकार | विभज्योतक और स्थायी ऊतक प्रमुख हैं। | उपकला, संयोजी, पेशीय और तंत्रिका ऊतक प्रमुख हैं। |
| सहारा | कई मृत और मोटी भित्ति वाली कोशिकाएँ सहारा देती हैं। | अस्थि, उपास्थि और अन्य संयोजी ऊतक सहारा देते हैं। |
| गति | अधिकांश पौधों में गति सीमित होती है। | पेशीय ऊतक के कारण सक्रिय गति संभव होती है। |
| विशेष कार्य | जल, खनिज और भोजन का परिवहन तथा प्रकाश संश्लेषण। | गति, संवेदना, सुरक्षा और शरीर की क्रियाओं का समन्वय। |
6.15 अध्याय का सारांश
- समान संरचना और कार्य वाली कोशिकाओं के समूह को ऊतक कहते हैं।
- पादप ऊतक मुख्यतः विभज्योतक और स्थायी ऊतक होते हैं।
- विभज्योतक ऊतक पौधों की वृद्धि में सहायक होते हैं।
- शीर्षस्थ विभज्योतक लंबाई, पार्श्व विभज्योतक मोटाई और अंतर्वेशी विभज्योतक विशेष भागों की लंबाई बढ़ाता है।
- सरल स्थायी ऊतकों में मृदूतक, स्थूलकोण ऊतक और दृढ़ोतक शामिल हैं।
- जाइलम जल और खनिजों का परिवहन करता है।
- फ्लोएम पत्तियों में बने भोजन का परिवहन करता है।
- जंतु ऊतक चार प्रमुख प्रकार के होते हैं—उपकला, संयोजी, पेशीय और तंत्रिका ऊतक।
- रक्त एक तरल संयोजी ऊतक है।
- न्यूरॉन तंत्रिका ऊतक की संरचनात्मक और क्रियात्मक इकाई है।
6.16 महत्वपूर्ण शब्दावली
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| ऊतक (Tissue) | समान कार्य करने वाली कोशिकाओं का समूह |
| विभज्योतक (Meristem) | विभाजन करने वाली कोशिकाओं का ऊतक |
| विभेदन (Differentiation) | कोशिकाओं का विशेष संरचना और कार्य प्राप्त करना |
| मृदूतक (Parenchyma) | पतली भित्ति वाला सामान्य जीवित पादप ऊतक |
| स्थूलकोण ऊतक (Collenchyma) | कोनों पर मोटी भित्ति वाला सहायक ऊतक |
| दृढ़ोतक (Sclerenchyma) | मोटी लिग्निनयुक्त भित्ति वाला सामान्यतः मृत ऊतक |
| जाइलम (Xylem) | जल और खनिजों का संवहन करने वाला ऊतक |
| फ्लोएम (Phloem) | भोजन का संवहन करने वाला ऊतक |
| उपकला (Epithelium) | शरीर की सतहों को ढकने वाला ऊतक |
| कंडरा (Tendon) | मांसपेशी को हड्डी से जोड़ने वाला ऊतक |
| स्नायुबंधन (Ligament) | एक हड्डी को दूसरी हड्डी से जोड़ने वाला ऊतक |
| न्यूरॉन (Neuron) | तंत्रिका ऊतक की संरचनात्मक और क्रियात्मक इकाई |
6.17 अति महत्वपूर्ण प्रश्न एवं उत्तर
- शीर्षस्थ विभज्योतक
- अंतर्वेशी विभज्योतक
- पार्श्व विभज्योतक
- यह पौधों के विभिन्न भागों में भोजन का संग्रह करता है।
- हरित ऊतक के रूप में यह प्रकाश संश्लेषण में सहायता करता है।
- यह शरीर की बाहरी सतह और आंतरिक अंगों को ढककर सुरक्षा प्रदान करता है।
- यह अवशोषण, स्राव और पदार्थों के आदान-प्रदान में सहायता करता है।
- रेखित पेशी
- अरेखित पेशी
- हृदय पेशी
- हृदय पेशी की कोशिकाएँ शाखित होती हैं और इनमें धारियाँ दिखाई देती हैं।
- इनकी गति अनैच्छिक तथा लयबद्ध होती है।
6.18 बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQs)
1. पौधों की लंबाई में वृद्धि किस ऊतक के कारण होती है?
(A) पार्श्व विभज्योतक
(B) शीर्षस्थ विभज्योतक
(C) दृढ़ोतक
(D) फ्लोएम
सही उत्तर देखें
सही उत्तर: (B) शीर्षस्थ विभज्योतक
2. पौधों की मोटाई में वृद्धि कौन करता है?
(A) शीर्षस्थ विभज्योतक
(B) अंतर्वेशी विभज्योतक
(C) पार्श्व विभज्योतक
(D) मृदूतक
सही उत्तर देखें
सही उत्तर: (C) पार्श्व विभज्योतक
3. पौधों में भोजन का परिवहन किसके द्वारा होता है?
(A) जाइलम
(B) फ्लोएम
(C) दृढ़ोतक
(D) एपिडर्मिस
सही उत्तर देखें
सही उत्तर: (B) फ्लोएम
4. जल और खनिजों का परिवहन कौन करता है?
(A) फ्लोएम
(B) मृदूतक
(C) जाइलम
(D) स्थूलकोण ऊतक
सही उत्तर देखें
सही उत्तर: (C) जाइलम
5. नारियल के रेशों में कौन-सा ऊतक पाया जाता है?
(A) मृदूतक
(B) दृढ़ोतक
(C) फ्लोएम
(D) उपकला
सही उत्तर देखें
सही उत्तर: (B) दृढ़ोतक
6. रक्त किस प्रकार का ऊतक है?
(A) पेशीय ऊतक
(B) तंत्रिका ऊतक
(C) तरल संयोजी ऊतक
(D) उपकला ऊतक
सही उत्तर देखें
सही उत्तर: (C) तरल संयोजी ऊतक
7. मांसपेशी को हड्डी से कौन जोड़ता है?
(A) स्नायुबंधन
(B) कंडरा
(C) उपास्थि
(D) रक्त
सही उत्तर देखें
सही उत्तर: (B) कंडरा
8. एक हड्डी को दूसरी हड्डी से कौन जोड़ता है?
(A) कंडरा
(B) स्नायुबंधन
(C) मृदूतक
(D) जाइलम
सही उत्तर देखें
सही उत्तर: (B) स्नायुबंधन
9. हृदय में कौन-सी पेशी पाई जाती है?
(A) रेखित पेशी
(B) अरेखित पेशी
(C) हृदय पेशी
(D) ऐच्छिक पेशी
सही उत्तर देखें
सही उत्तर: (C) हृदय पेशी
10. तंत्रिका ऊतक की संरचनात्मक और क्रियात्मक इकाई क्या है?
(A) न्यूरॉन
(B) नेफ्रॉन
(C) प्लेटलेट
(D) रंध्र
सही उत्तर देखें
सही उत्तर: (A) न्यूरॉन
11. वायूतक (Aerenchyma) किसमें सहायता करता है?
(A) भोजन पचाने में
(B) जलीय पौधों को तैरने में
(C) रक्त का परिवहन करने में
(D) हड्डियों को जोड़ने में
सही उत्तर देखें
सही उत्तर: (B) जलीय पौधों को तैरने में
12. शरीर की बाहरी सतह को ढकने वाला ऊतक कौन-सा है?
(A) उपकला ऊतक
(B) पेशीय ऊतक
(C) तंत्रिका ऊतक
(D) जाइलम
सही उत्तर देखें
सही उत्तर: (A) उपकला ऊतक
6.19 अभ्यास प्रश्न
अति लघुत्तरात्मक प्रश्न
- ऊतक की परिभाषा लिखिए।
- विभज्योतक ऊतक क्या हैं?
- विभेदन किसे कहते हैं?
- मृदूतक का एक कार्य लिखिए।
- जाइलम का मुख्य कार्य क्या है?
- फ्लोएम का मुख्य कार्य क्या है?
- न्यूरॉन किसे कहते हैं?
- रक्त किस प्रकार का ऊतक है?
लघुत्तरात्मक प्रश्न
- विभज्योतक ऊतक के तीनों प्रकारों का वर्णन कीजिए।
- मृदूतक, स्थूलकोण ऊतक और दृढ़ोतक में अंतर लिखिए।
- जाइलम के चार घटकों के नाम और कार्य लिखिए।
- फ्लोएम के विभिन्न घटकों का वर्णन कीजिए।
- उपकला ऊतक के प्रमुख प्रकारों का वर्णन कीजिए।
- कंडरा और स्नायुबंधन में अंतर स्पष्ट कीजिए।
- पेशीय ऊतक के तीन प्रकारों की तुलना कीजिए।
दीर्घ उत्तरीय प्रश्न
- पादप ऊतकों का वर्गीकरण करते हुए विभज्योतक तथा स्थायी ऊतकों का विस्तार से वर्णन कीजिए।
- सरल स्थायी ऊतकों के प्रकारों का उदाहरण सहित वर्णन कीजिए।
- जाइलम और फ्लोएम की संरचना तथा कार्यों का वर्णन कीजिए।
- जंतु ऊतकों के चारों प्रमुख प्रकारों का विस्तार से वर्णन कीजिए।
- पेशीय ऊतक के विभिन्न प्रकारों की संरचना, स्थान और कार्यों के आधार पर तुलना कीजिए।
- न्यूरॉन का नामांकित चित्र बनाकर इसके विभिन्न भागों के कार्य लिखिए।
6.20 गतिविधियाँ एवं प्रयोग
गतिविधि 1: पादप ऊतक का अवलोकन
उद्देश्य: पौधे के विभिन्न भागों की संरचना का सामान्य अवलोकन करना।
सामग्री: पत्ती, तने का पतला भाग, आवर्धक लेंस और सूक्ष्मदर्शी (यदि उपलब्ध हो)।
विधि: पत्ती और तने के पतले भागों को ध्यान से देखें। कोशिकाओं की व्यवस्था और उनके आकार में अंतर का अवलोकन करें।
निष्कर्ष: पौधों के विभिन्न भागों में अलग-अलग संरचना वाले ऊतक पाए जाते हैं।
गतिविधि 2: तने में जल का परिवहन
उद्देश्य: पौधों में जल के परिवहन को समझना।
सामग्री: सफेद फूल या पत्तियों वाली टहनी, पानी और खाद्य रंग।
विधि: पानी में थोड़ा खाद्य रंग मिलाएँ और उसमें टहनी रखें। कुछ समय बाद तने और पत्तियों में रंग के परिवर्तन का अवलोकन करें।
निष्कर्ष: रंगीन जल पौधे के संवहन तंत्र के माध्यम से ऊपर की ओर पहुँचता है। जाइलम जल के परिवहन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
गतिविधि 3: पेशीय गति का अवलोकन
उद्देश्य: पेशियों के संकुचन और शिथिलन को समझना।
विधि: अपनी कोहनी को धीरे-धीरे मोड़ें और सीधा करें। ऊपरी भुजा की मांसपेशियों में होने वाले परिवर्तन को महसूस करें।
निष्कर्ष: पेशियों के संकुचन और शिथिलन से शरीर के अंगों में गति होती है।
6.21 परीक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण बिंदु
- ऊतक की परिभाषा और ऊतकों का महत्व समझें।
- विभज्योतक ऊतक के तीनों प्रकारों के स्थान और कार्य याद रखें।
- मृदूतक, स्थूलकोण ऊतक और दृढ़ोतक की तुलना का अभ्यास करें।
- जाइलम और फ्लोएम के घटकों तथा कार्यों को समझें।
- उपकला ऊतक के प्रकारों के स्थान और कार्यों पर ध्यान दें।
- रक्त, अस्थि, उपास्थि, कंडरा और स्नायुबंधन के कार्य याद रखें।
- तीनों प्रकार की पेशियों की तुलना का अभ्यास करें।
- न्यूरॉन का नामांकित चित्र बनाना सीखें।
अध्याय का निर्धारित भारांक: 14 अंक। यह भारांक RBSE के 2026–27 के आधिकारिक पाठ्यक्रम में दिया गया है। परीक्षा में प्रश्नों का वास्तविक स्वरूप बोर्ड के प्रश्नपत्र के अनुसार होगा।
अगला अध्याय: अध्याय 7 — गति (Motion)
गति (Motion)
हम अपने दैनिक जीवन में अनेक वस्तुओं को गति करते हुए देखते हैं। सड़क पर चलती गाड़ियाँ, उड़ते हुए पक्षी, दौड़ते हुए व्यक्ति और सूर्य के चारों ओर पृथ्वी की परिक्रमा—ये सभी गति के उदाहरण हैं। विज्ञान में किसी वस्तु की स्थिति में समय के साथ होने वाले परिवर्तन का अध्ययन गति कहलाता है।
इस अध्याय में विराम और गति, दूरी, विस्थापन, चाल, वेग, त्वरण, गति के समीकरण तथा दूरी-समय और वेग-समय ग्राफ का अध्ययन किया जाता है।
7.1 गति क्या है? (What is Motion?)
जब किसी वस्तु की स्थिति में समय के साथ उसके आसपास की वस्तुओं के सापेक्ष परिवर्तन होता है, तो कहा जाता है कि वस्तु गति में है।
उदाहरण: सड़क पर चलती कार, आकाश में उड़ता विमान, दौड़ता हुआ खिलाड़ी और घूमता हुआ पंखा गति के उदाहरण हैं।
विराम (Rest)
जब किसी वस्तु की स्थिति अपने आसपास की वस्तुओं के सापेक्ष समय के साथ नहीं बदलती, तो वह वस्तु विराम अवस्था में कहलाती है।
उदाहरण: मेज पर रखी पुस्तक मेज के सापेक्ष विराम अवस्था में है।
गति और विराम की सापेक्षता
गति और विराम का निर्धारण संदर्भ बिंदु पर निर्भर करता है। एक ही वस्तु किसी एक संदर्भ में विराम अवस्था में तथा दूसरे संदर्भ में गतिशील हो सकती है।
उदाहरण: चलती बस में बैठा यात्री बस में बैठे दूसरे यात्री के सापेक्ष विराम में है, लेकिन सड़क पर खड़े व्यक्ति के सापेक्ष गतिशील है।
7.2 दूरी (Distance)
किसी वस्तु द्वारा तय किए गए वास्तविक मार्ग की कुल लंबाई को दूरी कहते हैं। दूरी एक अदिश राशि है, अर्थात इसमें केवल परिमाण होता है, दिशा नहीं होती।
- दूरी सदैव धनात्मक या शून्य होती है।
- यह वस्तु द्वारा तय किए गए वास्तविक मार्ग पर निर्भर करती है।
- दूरी का SI मात्रक मीटर (m) है।
- दूरी में दिशा का उल्लेख आवश्यक नहीं होता।
उदाहरण: यदि कोई व्यक्ति 5 मीटर पूर्व दिशा में चलता है और फिर 3 मीटर पश्चिम दिशा में चलता है, तो उसके द्वारा तय की गई कुल दूरी होगी:
7.3 विस्थापन (Displacement)
किसी वस्तु की प्रारंभिक स्थिति और अंतिम स्थिति के बीच की सबसे छोटी सीधी दूरी, एक निश्चित दिशा में, विस्थापन कहलाती है। यह एक सदिश राशि है, अर्थात इसमें परिमाण और दिशा दोनों होते हैं।
- विस्थापन की दिशा प्रारंभिक स्थिति से अंतिम स्थिति की ओर होती है।
- विस्थापन का SI मात्रक मीटर (m) है।
- विस्थापन का परिमाण दूरी से अधिक नहीं हो सकता।
- यदि वस्तु अपनी प्रारंभिक स्थिति पर लौट आती है, तो उसका विस्थापन शून्य होता है।
चित्र 7.1 — दूरी और विस्थापन का अंतर
दूरी और विस्थापन में अंतर
| आधार | दूरी | विस्थापन |
|---|---|---|
| परिभाषा | तय किए गए वास्तविक मार्ग की कुल लंबाई | प्रारंभिक और अंतिम स्थिति के बीच दिशा सहित सीधी दूरी |
| राशि का प्रकार | अदिश राशि | सदिश राशि |
| दिशा | आवश्यक नहीं | आवश्यक |
| मान | शून्य या धनात्मक | धनात्मक, ऋणात्मक या शून्य घटक हो सकते हैं; परिमाण सदैव गैर-ऋणात्मक होता है |
| संबंध | विस्थापन के परिमाण से बड़ा या बराबर | दूरी से अधिक नहीं |
7.4 एकसमान और असमान गति
एकसमान गति (Uniform Motion)
जब कोई वस्तु समान समयांतरालों में समान दूरी तय करती है, तो उसकी गति एकसमान गति कहलाती है।
उदाहरण: यदि कोई कार प्रत्येक घंटे में 40 किलोमीटर की दूरी तय करती है, तो उसकी गति एकसमान है, बशर्ते प्रत्येक समान समयांतराल में उसकी तय दूरी समान हो।
असमान गति (Non-uniform Motion)
जब कोई वस्तु समान समयांतरालों में असमान दूरी तय करती है, तो उसकी गति असमान गति कहलाती है।
उदाहरण: शहर की सड़क पर चलती कार कभी तेज चलती है और कभी धीमी हो जाती है। इसलिए उसकी गति असमान होती है।
7.5 चाल (Speed)
किसी वस्तु द्वारा प्रति इकाई समय में तय की गई दूरी को चाल कहते हैं। चाल से पता चलता है कि कोई वस्तु कितनी तेजी से दूरी तय कर रही है।
चाल का SI मात्रक मीटर प्रति सेकंड (m/s) है। इसका एक अन्य प्रचलित मात्रक किलोमीटर प्रति घंटा (km/h) है।
औसत चाल (Average Speed)
किसी वस्तु द्वारा तय की गई कुल दूरी और कुल समय के अनुपात को औसत चाल कहते हैं।
उदाहरण 1: औसत चाल की गणना
प्रश्न: एक कार 2 घंटे में 100 किलोमीटर की दूरी तय करती है। कार की औसत चाल ज्ञात कीजिए।
कुल दूरी = 100 km
कुल समय = 2 h
औसत चाल = कुल दूरी / कुल समय
= 100 / 2
औसत चाल = 50 km/h
7.6 वेग (Velocity)
किसी वस्तु के विस्थापन की समय के सापेक्ष दर को वेग कहते हैं। वेग एक सदिश राशि है, इसलिए इसमें परिमाण और दिशा दोनों होते हैं।
वेग का SI मात्रक मीटर प्रति सेकंड (m/s) है।
एकसमान वेग (Uniform Velocity)
जब कोई वस्तु समान समयांतरालों में समान दिशा में समान विस्थापन करती है, तो उसका वेग एकसमान कहलाता है।
असमान वेग (Non-uniform Velocity)
जब किसी वस्तु के वेग के परिमाण या दिशा में समय के साथ परिवर्तन होता है, तो उसका वेग असमान कहलाता है।
औसत वेग (Average Velocity)
कुल विस्थापन और कुल समय के अनुपात को औसत वेग कहते हैं।
7.7 चाल और वेग में अंतर
| आधार | चाल (Speed) | वेग (Velocity) |
|---|---|---|
| परिभाषा | दूरी तय करने की दर | विस्थापन की दर |
| प्रकार | अदिश राशि | सदिश राशि |
| दिशा | नहीं होती | होती है |
| मान | शून्य या धनात्मक | दिशा के अनुसार बदल सकता है |
| सूत्र | दूरी / समय | विस्थापन / समय |
7.8 त्वरण (Acceleration)
किसी वस्तु के वेग में प्रति इकाई समय में होने वाले परिवर्तन की दर को त्वरण कहते हैं। जब किसी वस्तु का वेग समय के साथ बदलता है, तो उसमें त्वरण होता है।
यदि प्रारंभिक वेग u, अंतिम वेग v और समय t हो, तो:
जहाँ:
- a = त्वरण
- u = प्रारंभिक वेग
- v = अंतिम वेग
- t = लगा हुआ समय
त्वरण का SI मात्रक मीटर प्रति सेकंड वर्ग (m/s²) है।
धनात्मक त्वरण (Positive Acceleration)
जब चुनी गई धनात्मक दिशा में वस्तु का वेग बढ़ता है, तो त्वरण धनात्मक हो सकता है।
ऋणात्मक त्वरण (Negative Acceleration)
जब त्वरण की दिशा चुनी गई धनात्मक दिशा के विपरीत होती है, तो उसका मान ऋणात्मक होता है। गति की दिशा में वेग कम होने की स्थिति में इसे सामान्यतः मंदन भी कहा जाता है।
उदाहरण 2: त्वरण की गणना
प्रश्न: एक कार का वेग 5 सेकंड में 10 m/s से बढ़कर 20 m/s हो जाता है। कार का त्वरण ज्ञात कीजिए।
प्रारंभिक वेग u = 10 m/s
अंतिम वेग v = 20 m/s
समय t = 5 s
सूत्र:
a = (v - u) / t
हल:
a = (20 - 10) / 5
a = 10 / 5
a = 2 m/s²
7.9 एकसमान त्वरण और असमान त्वरण
एकसमान त्वरण (Uniform Acceleration)
जब किसी वस्तु के वेग में समान समयांतरालों में समान परिवर्तन होता है, तो उसका त्वरण एकसमान कहलाता है।
असमान त्वरण (Non-uniform Acceleration)
जब किसी वस्तु के वेग में समान समयांतरालों में असमान परिवर्तन होता है, तो उसका त्वरण असमान कहलाता है।
7.10 गति के समीकरण (Equations of Motion)
जब कोई वस्तु सरल रेखा में एकसमान त्वरण से गति करती है, तब उसकी गति का वर्णन करने के लिए तीन प्रमुख समीकरणों का उपयोग किया जाता है।
इन समीकरणों में प्रयुक्त संकेत:
- u = प्रारंभिक वेग
- v = अंतिम वेग
- a = एकसमान त्वरण
- t = समय
- s = समय t में विस्थापन
प्रथम गति समीकरण
यह समीकरण प्रारंभिक वेग, अंतिम वेग, त्वरण और समय के बीच संबंध बताता है।
द्वितीय गति समीकरण
यह समीकरण समय, प्रारंभिक वेग, त्वरण और विस्थापन के बीच संबंध बताता है।
तृतीय गति समीकरण
इस समीकरण में समय का उपयोग किए बिना वेग, त्वरण और विस्थापन के बीच संबंध प्राप्त होता है।
7.11 गति के समीकरणों पर आधारित हल किए गए प्रश्न
प्रश्न 1: एक वस्तु विराम अवस्था से चलना शुरू करती है और 4 सेकंड में 8 m/s का वेग प्राप्त करती है। उसका त्वरण ज्ञात कीजिए।
u = 0 m/s
v = 8 m/s
t = 4 s
सूत्र:
v = u + at
a = (v - u) / t
हल:
a = (8 - 0) / 4
a = 8 / 4
त्वरण = 2 m/s²
प्रश्न 2: एक वस्तु 5 m/s के प्रारंभिक वेग से चल रही है। यदि उसका त्वरण 2 m/s² है, तो 4 सेकंड में उसका अंतिम वेग ज्ञात कीजिए।
u = 5 m/s
a = 2 m/s²
t = 4 s
सूत्र:
v = u + at
हल:
v = 5 + (2 × 4)
v = 5 + 8
अंतिम वेग = 13 m/s
प्रश्न 3: एक कार विराम अवस्था से 2 m/s² के एकसमान त्वरण से 5 सेकंड तक चलती है। इस समय में कार द्वारा तय किया गया विस्थापन ज्ञात कीजिए।
u = 0 m/s
a = 2 m/s²
t = 5 s
सूत्र:
s = ut + ½at²
हल:
s = (0 × 5) + ½ × 2 × 5²
s = 0 + 1 × 25
विस्थापन = 25 m
प्रश्न 4: एक वस्तु का प्रारंभिक वेग 10 m/s है। वह 2 m/s² के एकसमान त्वरण से 20 मीटर विस्थापन करती है। अंतिम वेग ज्ञात कीजिए।
u = 10 m/s
a = 2 m/s²
s = 20 m
सूत्र:
v² = u² + 2as
हल:
v² = 10² + 2 × 2 × 20
v² = 100 + 80
v² = 180
v = √180
अंतिम वेग ≈ 13.42 m/s
7.12 ग्राफ द्वारा गति का वर्णन
ग्राफ की सहायता से किसी वस्तु की गति को सरलता से समझा जा सकता है। इस अध्याय में मुख्यतः दूरी-समय ग्राफ और वेग-समय ग्राफ का अध्ययन किया जाता है।
1. दूरी-समय ग्राफ (Distance-Time Graph)
दूरी-समय ग्राफ में क्षैतिज अक्ष (X-axis) पर समय और ऊर्ध्वाधर अक्ष (Y-axis) पर दूरी दर्शाई जाती है। इस ग्राफ से पता चलता है कि किसी वस्तु द्वारा अलग-अलग समय पर कितनी दूरी तय की गई है।
- सीधी तिरछी रेखा एकसमान चाल को दर्शाती है।
- समय के साथ दूरी में परिवर्तन न होने पर रेखा क्षैतिज होती है।
- वक्र रेखा असमान चाल को दर्शा सकती है।
- ग्राफ की ढाल चाल को दर्शाती है।
चित्र 7.2 — एकसमान चाल का दूरी-समय ग्राफ
2. वेग-समय ग्राफ (Velocity-Time Graph)
वेग-समय ग्राफ में क्षैतिज अक्ष पर समय और ऊर्ध्वाधर अक्ष पर वेग दर्शाया जाता है। इस ग्राफ से समय के साथ वस्तु के वेग में होने वाले परिवर्तन का पता चलता है।
- एकसमान वेग के लिए ग्राफ समय अक्ष के समानांतर सीधी रेखा होता है।
- एकसमान त्वरण के लिए वेग-समय ग्राफ सीधी तिरछी रेखा होता है।
- ग्राफ की ढाल त्वरण को दर्शाती है।
- वेग-समय ग्राफ और समय अक्ष के बीच का क्षेत्रफल विस्थापन दर्शाता है।
चित्र 7.3 — एकसमान त्वरण का वेग-समय ग्राफ
7.13 ग्राफ की ढाल और क्षेत्रफल
दूरी-समय ग्राफ की ढाल
दूरी-समय ग्राफ की ढाल वस्तु की चाल बताती है।
वेग-समय ग्राफ की ढाल
वेग-समय ग्राफ की ढाल वस्तु का त्वरण बताती है।
वेग-समय ग्राफ के नीचे का क्षेत्रफल
वेग-समय ग्राफ और समय अक्ष के बीच का क्षेत्रफल वस्तु का विस्थापन बताता है।
7.14 एकसमान वृत्तीय गति (Uniform Circular Motion)
जब कोई वस्तु वृत्ताकार पथ पर समान चाल से गति करती है, तो उसकी गति एकसमान वृत्तीय गति कहलाती है। इस गति में चाल स्थिर रहती है, लेकिन वेग की दिशा लगातार बदलती रहती है। इसलिए वस्तु का वेग एकसमान नहीं होता।
उदाहरण:
- घड़ी की सुई की नोक की गति।
- रस्सी से बँधे पत्थर को वृत्ताकार घुमाना।
- वृत्ताकार पथ पर समान चाल से चलती वस्तु।
वृत्तीय गति में तय दूरी
यदि कोई वस्तु त्रिज्या r वाले वृत्त का एक पूरा चक्कर लगाती है, तो तय की गई दूरी वृत्त की परिधि के बराबर होगी।
यदि एक चक्कर पूरा करने में समय T लगता है, तो वस्तु की चाल होगी:
एक पूरा चक्कर लगाने के बाद वस्तु अपनी प्रारंभिक स्थिति पर लौट आती है। इसलिए एक पूरे चक्कर के लिए उसका विस्थापन शून्य होता है, जबकि तय की गई दूरी शून्य नहीं होती।
चित्र 7.4 — एकसमान वृत्तीय गति का सांकेतिक चित्र
7.15 गति के प्रमुख सूत्र
| भौतिक राशि | सूत्र | SI मात्रक |
|---|---|---|
| चाल | दूरी / समय | m/s |
| औसत चाल | कुल दूरी / कुल समय | m/s |
| वेग | विस्थापन / समय | m/s |
| औसत वेग | कुल विस्थापन / कुल समय | m/s |
| त्वरण | (v - u) / t | m/s² |
| प्रथम गति समीकरण | v = u + at | संबंध |
| द्वितीय गति समीकरण | s = ut + ½at² | संबंध |
| तृतीय गति समीकरण | v² = u² + 2as | संबंध |
| वृत्त की परिधि | 2πr | m |
| वृत्तीय गति की चाल | 2πr / T | m/s |
7.16 मात्रकों का रूपांतरण
गति से संबंधित प्रश्नों में km/h और m/s के बीच रूपांतरण करना आवश्यक हो सकता है।
उदाहरण 1: km/h से m/s में
प्रश्न: 72 km/h को m/s में बदलिए।
72 × 5/18
= 4 × 5
= 20 m/s
उदाहरण 2: m/s से km/h में
प्रश्न: 15 m/s को km/h में बदलिए।
15 × 18/5
= 3 × 18
= 54 km/h
7.17 अध्याय का सारांश
- समय के साथ किसी वस्तु की स्थिति में परिवर्तन गति कहलाता है।
- वस्तु की स्थिति में परिवर्तन न होने पर वह दिए गए संदर्भ में विराम अवस्था में होती है।
- दूरी वास्तविक मार्ग की कुल लंबाई है और अदिश राशि है।
- विस्थापन प्रारंभिक और अंतिम स्थिति के बीच दिशा सहित सीधी दूरी है।
- चाल प्रति इकाई समय में तय की गई दूरी है।
- वेग प्रति इकाई समय में हुआ विस्थापन है।
- वेग में परिवर्तन की दर को त्वरण कहते हैं।
- एकसमान त्वरण के लिए गति के तीन समीकरण उपयोग किए जाते हैं।
- दूरी-समय ग्राफ की ढाल चाल बताती है।
- वेग-समय ग्राफ की ढाल त्वरण बताती है।
- वेग-समय ग्राफ के नीचे का क्षेत्रफल विस्थापन बताता है।
- एकसमान वृत्तीय गति में चाल स्थिर रहती है, लेकिन वेग की दिशा बदलती रहती है।
7.18 महत्वपूर्ण शब्दावली
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| गति (Motion) | समय के साथ स्थिति में परिवर्तन |
| विराम (Rest) | संदर्भ के सापेक्ष स्थिति में परिवर्तन न होना |
| दूरी (Distance) | वास्तविक मार्ग की कुल लंबाई |
| विस्थापन (Displacement) | प्रारंभिक और अंतिम स्थिति के बीच दिशा सहित सीधी दूरी |
| चाल (Speed) | दूरी तय करने की दर |
| वेग (Velocity) | विस्थापन की दर |
| त्वरण (Acceleration) | वेग में परिवर्तन की दर |
| एकसमान गति | समान समयांतरालों में समान दूरी तय करना |
| एकसमान त्वरण | समान समयांतरालों में वेग में समान परिवर्तन |
| वृत्तीय गति | वृत्ताकार पथ पर होने वाली गति |
7.19 अति महत्वपूर्ण प्रश्न एवं उत्तर
- v = u + at
- s = ut + ½at²
- v² = u² + 2as
7.20 बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQs)
1. दूरी किस प्रकार की राशि है?
(A) सदिश राशि
(B) अदिश राशि
(C) दोनों
(D) इनमें से कोई नहीं
सही उत्तर देखें
सही उत्तर: (B) अदिश राशि
2. विस्थापन किस प्रकार की राशि है?
(A) अदिश राशि
(B) सदिश राशि
(C) मूल राशि नहीं
(D) इनमें से कोई नहीं
सही उत्तर देखें
सही उत्तर: (B) सदिश राशि
3. चाल का SI मात्रक क्या है?
(A) m/s
(B) m/s²
(C) km
(D) m²/s
सही उत्तर देखें
सही उत्तर: (A) m/s
4. त्वरण का SI मात्रक क्या है?
(A) m
(B) m/s
(C) m/s²
(D) km/h
सही उत्तर देखें
सही उत्तर: (C) m/s²
5. गति का प्रथम समीकरण कौन-सा है?
(A) v = u + at
(B) s = ut + ½at²
(C) v² = u² + 2as
(D) s = vt
सही उत्तर देखें
सही उत्तर: (A) v = u + at
6. दूरी-समय ग्राफ की ढाल क्या दर्शाती है?
(A) त्वरण
(B) चाल
(C) बल
(D) विस्थापन
सही उत्तर देखें
सही उत्तर: (B) चाल
7. वेग-समय ग्राफ की ढाल क्या दर्शाती है?
(A) दूरी
(B) चाल
(C) त्वरण
(D) समय
सही उत्तर देखें
सही उत्तर: (C) त्वरण
8. वेग-समय ग्राफ के नीचे का क्षेत्रफल क्या बताता है?
(A) त्वरण
(B) विस्थापन
(C) चाल
(D) द्रव्यमान
सही उत्तर देखें
सही उत्तर: (B) विस्थापन
9. एक पूरा वृत्ताकार चक्कर लगाने पर विस्थापन कितना होता है?
(A) वृत्त की परिधि
(B) त्रिज्या
(C) शून्य
(D) व्यास
सही उत्तर देखें
सही उत्तर: (C) शून्य
10. 36 km/h बराबर है:
(A) 5 m/s
(B) 10 m/s
(C) 15 m/s
(D) 20 m/s
सही उत्तर देखें
सही उत्तर: (B) 10 m/s
11. एकसमान गति में वस्तु समान समयांतरालों में क्या तय करती है?
(A) असमान दूरी
(B) समान दूरी
(C) शून्य दूरी
(D) केवल विस्थापन
सही उत्तर देखें
सही उत्तर: (B) समान दूरी
12. यदि किसी वस्तु का प्रारंभिक और अंतिम वेग समान है, तो उसका त्वरण क्या होगा, यदि गति का वेग नहीं बदलता?
(A) शून्य
(B) अधिकतम
(C) ऋणात्मक
(D) अनंत
सही उत्तर देखें
सही उत्तर: (A) शून्य
7.21 संख्यात्मक अभ्यास प्रश्न
- एक व्यक्ति 200 मीटर की दूरी 40 सेकंड में तय करता है। उसकी औसत चाल ज्ञात कीजिए।
- एक कार 60 km/h की चाल से 3 घंटे चलती है। उसके द्वारा तय की गई दूरी ज्ञात कीजिए।
- एक वस्तु का वेग 5 सेकंड में 10 m/s से 30 m/s हो जाता है। उसका त्वरण ज्ञात कीजिए।
- एक वस्तु विराम अवस्था से 3 m/s² के त्वरण से 4 सेकंड तक चलती है। उसका अंतिम वेग ज्ञात कीजिए।
- एक कार का प्रारंभिक वेग 5 m/s है और त्वरण 2 m/s² है। 3 सेकंड में उसका विस्थापन ज्ञात कीजिए।
- 72 km/h को m/s में बदलिए।
- 20 m/s को km/h में बदलिए।
- एक वस्तु 7 मीटर पूर्व की ओर और फिर 3 मीटर पश्चिम की ओर चलती है। कुल दूरी और विस्थापन ज्ञात कीजिए।
7.22 गतिविधियाँ एवं प्रयोग
गतिविधि 1: दूरी और विस्थापन का अध्ययन
उद्देश्य: दूरी और विस्थापन के अंतर को समझना।
सामग्री: मापने वाला फीता, कागज और पेंसिल।
विधि: किसी स्थान से सीधे आगे जाएँ और फिर अलग रास्ते से प्रारंभिक स्थान पर लौटें। तय किए गए पूरे रास्ते की लंबाई मापें तथा प्रारंभिक और अंतिम स्थिति की तुलना करें।
निष्कर्ष: तय की गई दूरी शून्य नहीं होगी, जबकि प्रारंभिक स्थान पर लौटने के कारण विस्थापन शून्य होगा।
गतिविधि 2: चाल की गणना
उद्देश्य: औसत चाल ज्ञात करना।
सामग्री: स्टॉपवॉच और मापने वाला फीता।
विधि: एक निश्चित दूरी मापें। किसी व्यक्ति को उस दूरी को तय करने दें और समय नोट करें। दूरी को समय से विभाजित करके औसत चाल ज्ञात करें।
निष्कर्ष: औसत चाल कुल दूरी और कुल समय के अनुपात के बराबर होती है।
गतिविधि 3: दूरी-समय ग्राफ बनाना
उद्देश्य: दूरी-समय ग्राफ को समझना।
विधि: किसी वस्तु द्वारा अलग-अलग समय पर तय की गई दूरी के आँकड़े एकत्र करें। ग्राफ पेपर पर X-अक्ष पर समय और Y-अक्ष पर दूरी दर्शाएँ। प्राप्त बिंदुओं को मिलाएँ।
निष्कर्ष: ग्राफ की ढाल से वस्तु की चाल का पता लगाया जा सकता है।
7.23 परीक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण बिंदु
- दूरी और विस्थापन की परिभाषा तथा अंतर अच्छी तरह समझें।
- चाल, औसत चाल, वेग और औसत वेग के सूत्र याद रखें।
- त्वरण की परिभाषा, सूत्र और SI मात्रक का अभ्यास करें।
- गति के तीनों समीकरणों को याद करने के साथ उनका उपयोग भी सीखें।
- गति के समीकरणों पर आधारित संख्यात्मक प्रश्नों का अभ्यास करें।
- दूरी-समय और वेग-समय ग्राफ बनाना तथा उनकी ढाल समझना सीखें।
- वेग-समय ग्राफ के नीचे के क्षेत्रफल का महत्व समझें।
- एकसमान वृत्तीय गति में चाल और वेग के अंतर को समझें।
- km/h और m/s के बीच मात्रक रूपांतरण का अभ्यास करें।
अध्याय का निर्धारित भारांक: 9 अंक। यह भारांक RBSE के 2026–27 के आधिकारिक पाठ्यक्रम में दिया गया है। परीक्षा में प्रश्नों का वास्तविक स्वरूप बोर्ड के प्रश्नपत्र के अनुसार होगा।
अगला अध्याय: अध्याय 8 — बल तथा गति के नियम (Force and Laws of Motion)
बल तथा गति के नियम (Force and Laws of Motion)
हम अपने दैनिक जीवन में अनेक ऐसी घटनाएँ देखते हैं जिनमें वस्तुओं की गति में परिवर्तन होता है। फुटबॉल को किक मारने पर वह गति करने लगती है, चलती हुई साइकिल पर ब्रेक लगाने से उसकी गति कम हो जाती है और किसी गतिशील वस्तु को धक्का देने पर उसकी गति या दिशा बदल सकती है। इन सभी घटनाओं के पीछे बल की भूमिका होती है।
इस अध्याय में बल, संतुलित और असंतुलित बल, जड़त्व, संवेग तथा न्यूटन के गति के तीन नियमों का अध्ययन किया जाता है।
8.1 बल क्या है? (What is Force?)
बल वह बाहरी प्रभाव है जो किसी वस्तु की विराम अवस्था या गति की अवस्था में परिवर्तन कर सकता है अथवा वस्तु के आकार में परिवर्तन कर सकता है।
जब किसी वस्तु को धक्का दिया जाता है या खींचा जाता है, तो उस पर बल लगाया जाता है। बल के कारण वस्तु की गति की दिशा, चाल या आकार बदल सकता है।
बल के प्रभाव
- बल किसी विराम अवस्था में रखी वस्तु को गतिशील कर सकता है।
- बल किसी गतिशील वस्तु को रोक सकता है।
- बल किसी वस्तु की चाल बढ़ा या घटा सकता है।
- बल किसी वस्तु की गति की दिशा बदल सकता है।
- बल किसी वस्तु के आकार या आकृति में परिवर्तन कर सकता है।
उदाहरण: रबर की गेंद को दबाने पर उसका आकार बदल जाता है। फुटबॉल को किक मारने पर उसकी गति बदलती है। ब्रेक लगाने पर साइकिल की चाल कम हो जाती है।
8.2 बल का SI मात्रक
बल का SI मात्रक न्यूटन (Newton) है। इसे N से प्रदर्शित करते हैं। बल एक सदिश राशि है, क्योंकि इसमें परिमाण के साथ दिशा भी होती है।
एक न्यूटन वह बल है जो 1 किलोग्राम द्रव्यमान की वस्तु में 1 मीटर प्रति सेकंड² का त्वरण उत्पन्न करता है।
8.3 संतुलित और असंतुलित बल (Balanced and Unbalanced Forces)
1. संतुलित बल (Balanced Forces)
जब किसी वस्तु पर लगने वाले सभी बलों का परिणामी बल शून्य होता है, तो वे संतुलित बल कहलाते हैं। संतुलित बल किसी वस्तु की गति की अवस्था में परिवर्तन नहीं करते। हालांकि, वे वस्तु के आकार में परिवर्तन कर सकते हैं।
उदाहरण: मेज पर रखी पुस्तक पर नीचे की ओर गुरुत्वाकर्षण बल और ऊपर की ओर मेज का अभिलंब बल कार्य करता है। यदि दोनों बल बराबर और विपरीत दिशा में हों, तो पुस्तक संतुलन में रहती है।
2. असंतुलित बल (Unbalanced Forces)
जब किसी वस्तु पर लगने वाले बलों का परिणामी बल शून्य नहीं होता, तो वे असंतुलित बल कहलाते हैं। असंतुलित बल किसी वस्तु की गति की अवस्था में परिवर्तन कर सकते हैं।
उदाहरण: यदि दो व्यक्ति किसी बॉक्स को विपरीत दिशाओं में धक्का देते हैं और एक व्यक्ति अधिक बल लगाता है, तो बॉक्स अधिक बल की दिशा में गति कर सकता है।
चित्र 8.1 — संतुलित और असंतुलित बल का सांकेतिक चित्र
संतुलित और असंतुलित बल में अंतर
| आधार | संतुलित बल | असंतुलित बल |
|---|---|---|
| परिणामी बल | शून्य होता है। | शून्य नहीं होता। |
| गति पर प्रभाव | गति की अवस्था में परिवर्तन नहीं करते। | गति की अवस्था में परिवर्तन कर सकते हैं। |
| उदाहरण | मेज पर रखी पुस्तक पर लगने वाले संतुलित बल। | किसी वस्तु को एक दिशा में धक्का देना। |
8.4 जड़त्व (Inertia)
किसी वस्तु का वह गुण जिसके कारण वह अपनी विराम अवस्था या एकसमान सरल रेखीय गति की अवस्था में परिवर्तन का विरोध करती है, जड़त्व कहलाता है।
प्रत्येक वस्तु अपनी वर्तमान अवस्था को बनाए रखना चाहती है। यदि वस्तु विराम में है, तो वह विराम में ही रहना चाहती है। यदि वह एकसमान वेग से सीधी रेखा में चल रही है, तो वह उसी अवस्था में बने रहना चाहती है।
जड़त्व के दैनिक जीवन के उदाहरण
- जब चलती बस अचानक रुकती है, तो यात्री आगे की ओर झुक जाते हैं।
- जब बस अचानक चलना शुरू करती है, तो यात्री पीछे की ओर झुकते हैं।
- पेड़ की शाखा को हिलाने पर कुछ फल नीचे गिर जाते हैं।
- कालीन को झटकने पर उसमें से धूल बाहर निकल जाती है।
8.5 जड़त्व के प्रकार
जड़त्व को सामान्यतः तीन प्रकारों में समझाया जाता है:
1. विराम का जड़त्व (Inertia of Rest)
किसी वस्तु का विराम अवस्था में बने रहने का गुण विराम का जड़त्व कहलाता है।
उदाहरण: बस के अचानक चलने पर यात्री पीछे की ओर झुकते हैं, क्योंकि उनका शरीर विराम अवस्था में बने रहने का प्रयास करता है।
2. गति का जड़त्व (Inertia of Motion)
किसी गतिशील वस्तु का अपनी गति की अवस्था बनाए रखने का गुण गति का जड़त्व कहलाता है।
उदाहरण: चलती बस अचानक रुकने पर यात्री आगे की ओर झुकते हैं, क्योंकि उनका शरीर गति की अवस्था बनाए रखना चाहता है।
3. दिशा का जड़त्व (Inertia of Direction)
किसी वस्तु का अपनी गति की दिशा बनाए रखने का गुण दिशा का जड़त्व कहलाता है।
उदाहरण: तेज गति से मुड़ती कार में बैठे यात्री बाहर की ओर झुकते हुए महसूस कर सकते हैं।
8.6 द्रव्यमान और जड़त्व
किसी वस्तु का द्रव्यमान उसके जड़त्व का माप होता है। जिस वस्तु का द्रव्यमान अधिक होता है, उसका जड़त्व भी अधिक होता है। इसलिए अधिक द्रव्यमान वाली वस्तु की गति की अवस्था में परिवर्तन करना अपेक्षाकृत कठिन होता है।
उदाहरण: खाली ठेले को धक्का देना, सामान से भरे ठेले को धक्का देने की तुलना में आसान होता है। सामान से भरे ठेले का द्रव्यमान अधिक होने के कारण उसका जड़त्व भी अधिक होता है।
8.7 संवेग (Momentum)
किसी वस्तु के द्रव्यमान और वेग के गुणनफल को संवेग कहते हैं। संवेग एक सदिश राशि है, क्योंकि यह वेग की दिशा में होता है।
जहाँ:
- p = संवेग
- m = वस्तु का द्रव्यमान
- v = वस्तु का वेग
संवेग का SI मात्रक kg m/s है।
संवेग के उदाहरण
- समान वेग से चल रहे ट्रक का संवेग साइकिल की तुलना में अधिक होता है, क्योंकि ट्रक का द्रव्यमान अधिक होता है।
- किसी वस्तु का वेग बढ़ने पर उसका संवेग भी बढ़ता है।
- विराम अवस्था में रखी वस्तु का संवेग शून्य होता है।
उदाहरण 1: संवेग की गणना
प्रश्न: 5 kg द्रव्यमान की एक वस्तु 4 m/s के वेग से चल रही है। उसका संवेग ज्ञात कीजिए।
द्रव्यमान m = 5 kg
वेग v = 4 m/s
सूत्र:
p = mv
हल:
p = 5 × 4
संवेग = 20 kg m/s
8.8 न्यूटन का गति का प्रथम नियम (Newton's First Law of Motion)
न्यूटन के प्रथम गति नियम के अनुसार, कोई वस्तु तब तक विराम अवस्था में या एकसमान वेग से सरल रेखा में गति करती रहती है, जब तक उस पर कोई बाहरी असंतुलित बल कार्य नहीं करता।
इस नियम को जड़त्व का नियम (Law of Inertia) भी कहते हैं, क्योंकि यह वस्तुओं के जड़त्व के गुण को स्पष्ट करता है।
न्यूटन के प्रथम नियम के उदाहरण
- बस के अचानक रुकने पर यात्री आगे की ओर झुकते हैं।
- बस के अचानक चलने पर यात्री पीछे की ओर झुकते हैं।
- मेज पर रखी पुस्तक तब तक स्थिर रहती है, जब तक उस पर असंतुलित बल न लगाया जाए।
- चलती गेंद घर्षण के कारण धीरे-धीरे रुक जाती है।
8.9 न्यूटन का गति का द्वितीय नियम (Newton's Second Law of Motion)
न्यूटन का द्वितीय नियम बताता है कि किसी वस्तु के संवेग में परिवर्तन की दर उस पर लगाए गए असंतुलित बल के समानुपाती होती है तथा संवेग में परिवर्तन बल की दिशा में होता है।
यदि किसी वस्तु का द्रव्यमान m, प्रारंभिक वेग u और अंतिम वेग v हो तथा यह परिवर्तन t समय में होता है, तो:
न्यूटन के द्वितीय नियम के अनुसार:
यदि द्रव्यमान स्थिर है, तो:
चूँकि त्वरण:
इसलिए:
SI पद्धति में समानुपात स्थिरांक 1 रखने पर:
जहाँ:
- F = वस्तु पर लगने वाला परिणामी बल
- m = वस्तु का द्रव्यमान
- a = वस्तु का त्वरण
न्यूटन के द्वितीय नियम के उदाहरण
- खाली ठेले की तुलना में भरे हुए ठेले को समान त्वरण देने के लिए अधिक बल लगाना पड़ता है।
- क्रिकेट में गेंद को रोकते समय खिलाड़ी अपने हाथ पीछे की ओर खींचता है, जिससे गेंद को रोकने का समय बढ़ता है और बल कम हो सकता है।
- फुटबॉल को अधिक बल से किक मारने पर उसमें अधिक त्वरण उत्पन्न हो सकता है।
उदाहरण 2: बल की गणना
प्रश्न: 10 kg द्रव्यमान की वस्तु में 2 m/s² का त्वरण उत्पन्न किया जाता है। वस्तु पर लगाया गया परिणामी बल ज्ञात कीजिए।
m = 10 kg
a = 2 m/s²
सूत्र:
F = ma
हल:
F = 10 × 2
बल = 20 N
उदाहरण 3: त्वरण की गणना
प्रश्न: 20 N का परिणामी बल 5 kg द्रव्यमान की वस्तु पर लगाया जाता है। वस्तु में उत्पन्न त्वरण ज्ञात कीजिए।
F = 20 N
m = 5 kg
सूत्र:
F = ma
a = F/m
हल:
a = 20/5
त्वरण = 4 m/s²
8.10 न्यूटन का गति का तृतीय नियम (Newton's Third Law of Motion)
न्यूटन के तृतीय गति नियम के अनुसार, प्रत्येक क्रिया के बराबर और विपरीत दिशा में प्रतिक्रिया होती है।
जब एक वस्तु दूसरी वस्तु पर बल लगाती है, तो दूसरी वस्तु भी पहली वस्तु पर समान परिमाण का बल विपरीत दिशा में लगाती है। ये दोनों बल अलग-अलग वस्तुओं पर कार्य करते हैं।
क्रिया और प्रतिक्रिया के उदाहरण
- चलना: चलते समय व्यक्ति अपने पैर से जमीन को पीछे की ओर धकेलता है। जमीन व्यक्ति को आगे की ओर प्रतिक्रिया बल प्रदान करती है।
- बंदूक का प्रतिक्षेप: गोली आगे की ओर जाती है और बंदूक पीछे की ओर प्रतिक्षेप करती है।
- नाव चलाना: नाव को चप्पू से पीछे की ओर पानी धकेलने पर नाव आगे बढ़ती है।
- रॉकेट का उड़ना: रॉकेट से गैसें तेज गति से नीचे की ओर निकलती हैं, जिसके परिणामस्वरूप रॉकेट ऊपर की ओर गति करता है।
चित्र 8.2 — चलने में क्रिया और प्रतिक्रिया बल
8.11 संवेग संरक्षण का नियम (Law of Conservation of Momentum)
संवेग संरक्षण के नियम के अनुसार, यदि किसी निकाय पर कोई बाहरी असंतुलित बल कार्य नहीं करता, तो उस निकाय का कुल संवेग स्थिर रहता है।
अर्थात किसी पृथक निकाय में टक्कर या अन्य पारस्परिक क्रिया से पहले का कुल संवेग, क्रिया के बाद के कुल संवेग के बराबर होता है।
दो वस्तुओं के लिए संवेग संरक्षण
मान लीजिए दो वस्तुओं के द्रव्यमान m₁ और m₂ हैं। टक्कर से पहले उनके वेग u₁ और u₂ तथा टक्कर के बाद उनके वेग v₁ और v₂ हैं।
संवेग संरक्षण के अनुसार:
संवेग संरक्षण के उदाहरण
- बंदूक से गोली चलने पर बंदूक का पीछे की ओर प्रतिक्षेप करना।
- टक्कर के दौरान दो वस्तुओं के संवेग में परिवर्तन होना, जबकि पृथक निकाय का कुल संवेग संरक्षित रहता है।
- रॉकेट से गैसों के बाहर निकलने पर रॉकेट का विपरीत दिशा में आगे बढ़ना।
8.12 न्यूटन के तीनों गति नियमों की तुलना
| नियम | मुख्य कथन | प्रमुख अवधारणा |
|---|---|---|
| प्रथम नियम | बाहरी असंतुलित बल न होने पर वस्तु अपनी विराम या एकसमान सरल रेखीय गति की अवस्था बनाए रखती है। | जड़त्व |
| द्वितीय नियम | संवेग परिवर्तन की दर लगाए गए परिणामी बल के समानुपाती होती है। | F = ma |
| तृतीय नियम | प्रत्येक क्रिया के बराबर और विपरीत दिशा में प्रतिक्रिया होती है। | क्रिया-प्रतिक्रिया |
8.13 अध्याय के महत्वपूर्ण सूत्र
| भौतिक राशि | सूत्र | SI मात्रक |
|---|---|---|
| बल | F = ma | न्यूटन (N) |
| संवेग | p = mv | kg m/s |
| त्वरण | a = (v - u)/t | m/s² |
| संवेग में परिवर्तन | Δp = mv - mu | kg m/s |
| बल और संवेग | F = Δp/t | न्यूटन (N) |
| संवेग संरक्षण | m₁u₁ + m₂u₂ = m₁v₁ + m₂v₂ | संबंध |
8.14 अध्याय का सारांश
- बल किसी वस्तु की गति, दिशा या आकार में परिवर्तन कर सकता है।
- बल का SI मात्रक न्यूटन है।
- संतुलित बलों का परिणामी बल शून्य होता है।
- असंतुलित बल वस्तु की गति की अवस्था बदल सकते हैं।
- जड़त्व वस्तु का अपनी वर्तमान अवस्था में परिवर्तन का विरोध करने का गुण है।
- द्रव्यमान जड़त्व का माप है।
- द्रव्यमान और वेग के गुणनफल को संवेग कहते हैं।
- न्यूटन का प्रथम नियम जड़त्व के नियम के रूप में भी जाना जाता है।
- न्यूटन का द्वितीय नियम संवेग परिवर्तन की दर और बल के बीच संबंध बताता है।
- स्थिर द्रव्यमान के लिए बल का सूत्र F = ma है।
- न्यूटन का तृतीय नियम क्रिया और प्रतिक्रिया के बारे में बताता है।
- संवेग संरक्षण के नियम के अनुसार पृथक निकाय का कुल संवेग स्थिर रहता है।
8.15 महत्वपूर्ण शब्दावली
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| बल (Force) | वह बाहरी प्रभाव जो गति या आकार में परिवर्तन कर सकता है। |
| संतुलित बल | ऐसे बल जिनका परिणामी बल शून्य होता है। |
| असंतुलित बल | ऐसे बल जिनका परिणामी बल शून्य नहीं होता। |
| जड़त्व (Inertia) | वस्तु का अपनी वर्तमान अवस्था में परिवर्तन का विरोध करने का गुण। |
| संवेग (Momentum) | द्रव्यमान और वेग का गुणनफल। |
| त्वरण (Acceleration) | वेग में परिवर्तन की दर। |
| क्रिया (Action) | एक वस्तु द्वारा दूसरी वस्तु पर लगाया गया बल। |
| प्रतिक्रिया (Reaction) | दूसरी वस्तु द्वारा पहली वस्तु पर लगाया गया बराबर और विपरीत बल। |
| संवेग संरक्षण | पृथक निकाय का कुल संवेग स्थिर रहने का सिद्धांत। |
8.16 अति महत्वपूर्ण प्रश्न एवं उत्तर
8.17 बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQs)
1. बल का SI मात्रक क्या है?
(A) जूल
(B) न्यूटन
(C) वाट
(D) पास्कल
सही उत्तर देखें
सही उत्तर: (B) न्यूटन
2. जड़त्व किस पर निर्भर करता है?
(A) वेग
(B) द्रव्यमान
(C) दूरी
(D) समय
सही उत्तर देखें
सही उत्तर: (B) द्रव्यमान
3. जड़त्व का नियम किसे कहा जाता है?
(A) न्यूटन का प्रथम नियम
(B) न्यूटन का द्वितीय नियम
(C) न्यूटन का तृतीय नियम
(D) गुरुत्वाकर्षण का नियम
सही उत्तर देखें
सही उत्तर: (A) न्यूटन का प्रथम नियम
4. संवेग का सूत्र क्या है?
(A) p = m/a
(B) p = mv
(C) p = ma
(D) p = v/t
सही उत्तर देखें
सही उत्तर: (B) p = mv
5. संवेग का SI मात्रक क्या है?
(A) kg m/s
(B) kg m/s²
(C) m/s²
(D) न्यूटन/मीटर
सही उत्तर देखें
सही उत्तर: (A) kg m/s
6. न्यूटन के द्वितीय नियम का सरल रूप क्या है?
(A) F = mv
(B) F = ma
(C) F = m/a
(D) F = at
सही उत्तर देखें
सही उत्तर: (B) F = ma
7. प्रत्येक क्रिया के बराबर और विपरीत प्रतिक्रिया होती है। यह किसका नियम है?
(A) प्रथम नियम
(B) द्वितीय नियम
(C) तृतीय नियम
(D) संवेग संरक्षण नियम
सही उत्तर देखें
सही उत्तर: (C) तृतीय नियम
8. संतुलित बलों का परिणामी बल कितना होता है?
(A) 1 N
(B) शून्य
(C) अनंत
(D) 10 N
सही उत्तर देखें
सही उत्तर: (B) शून्य
9. अधिक द्रव्यमान वाली वस्तु का जड़त्व कैसा होता है?
(A) कम
(B) अधिक
(C) शून्य
(D) समान
सही उत्तर देखें
सही उत्तर: (B) अधिक
10. पृथक निकाय का कुल संवेग किस नियम के अनुसार स्थिर रहता है?
(A) जड़त्व का नियम
(B) संवेग संरक्षण का नियम
(C) गुरुत्वाकर्षण का नियम
(D) ऊर्जा संरक्षण का नियम
सही उत्तर देखें
सही उत्तर: (B) संवेग संरक्षण का नियम
8.18 संख्यात्मक अभ्यास प्रश्न
- 4 kg द्रव्यमान की वस्तु 5 m/s के वेग से चल रही है। उसका संवेग ज्ञात कीजिए।
- 10 kg द्रव्यमान की वस्तु में 3 m/s² का त्वरण उत्पन्न किया जाता है। उस पर लगने वाला परिणामी बल ज्ञात कीजिए।
- 50 N का बल 10 kg द्रव्यमान की वस्तु पर लगाया जाता है। वस्तु का त्वरण ज्ञात कीजिए।
- 2 kg द्रव्यमान की वस्तु का वेग 3 m/s से बढ़कर 7 m/s हो जाता है। संवेग में परिवर्तन ज्ञात कीजिए।
- 5 kg द्रव्यमान की वस्तु विराम अवस्था से 2 m/s² के त्वरण से चलती है। 4 सेकंड बाद उसका वेग और संवेग ज्ञात कीजिए।
- एक वस्तु पर 20 N का बल लगाने से उसमें 4 m/s² का त्वरण उत्पन्न होता है। वस्तु का द्रव्यमान ज्ञात कीजिए।
8.19 गतिविधियाँ एवं प्रयोग
गतिविधि 1: जड़त्व का प्रदर्शन
उद्देश्य: विराम के जड़त्व को समझना।
सामग्री: एक गिलास, गत्ते का छोटा टुकड़ा और सिक्का।
विधि: गिलास के ऊपर गत्ता रखें और गत्ते पर सिक्का रखें। गत्ते को तेजी से क्षैतिज दिशा में खींचें। सिक्के के व्यवहार का अवलोकन करें।
निष्कर्ष: सिक्का अपनी विराम अवस्था बनाए रखने का प्रयास करता है। गत्ता हटने पर सिक्का नीचे गिलास में गिर सकता है।
गतिविधि 2: बल और त्वरण का संबंध
उद्देश्य: बल और त्वरण के संबंध को समझना।
सामग्री: खिलौना गाड़ी और हल्के भार।
विधि: खिलौना गाड़ी को अलग-अलग बल से धक्का दें। समान परिस्थितियों में उसकी गति में होने वाले परिवर्तन का अवलोकन करें।
निष्कर्ष: समान द्रव्यमान के लिए परिणामी बल बढ़ने पर त्वरण बढ़ता है।
गतिविधि 3: क्रिया और प्रतिक्रिया का अध्ययन
उद्देश्य: न्यूटन के तृतीय नियम को समझना।
सामग्री: एक फूला हुआ गुब्बारा और धागा।
विधि: गुब्बारे में हवा भरें। उसके मुँह को छोड़े बिना धागे की सहायता से दिशा निर्धारित करें। फिर गुब्बारे का मुँह छोड़कर उसकी गति देखें।
निष्कर्ष: गुब्बारे से हवा एक दिशा में बाहर निकलती है और गुब्बारा विपरीत दिशा में गति करता है।
8.20 परीक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण बिंदु
- बल की परिभाषा, प्रभाव और SI मात्रक याद रखें।
- संतुलित और असंतुलित बल में अंतर समझें।
- जड़त्व की परिभाषा और उसके दैनिक जीवन के उदाहरण तैयार करें।
- द्रव्यमान और जड़त्व के संबंध को समझें।
- संवेग की परिभाषा, सूत्र और SI मात्रक याद रखें।
- न्यूटन के तीनों गति नियमों के कथन और उदाहरणों का अभ्यास करें।
- द्वितीय नियम से F = ma का संबंध समझें।
- संवेग संरक्षण का नियम और उसका गणितीय रूप याद रखें।
- बल, त्वरण और संवेग पर आधारित संख्यात्मक प्रश्न हल करें।
अध्याय का निर्धारित भारांक: 7 अंक। यह भारांक RBSE के 2026–27 के आधिकारिक पाठ्यक्रम में दिया गया है। परीक्षा में प्रश्नों का वास्तविक स्वरूप बोर्ड के प्रश्नपत्र के अनुसार होगा।
अगला अध्याय: अध्याय 9 — गुरुत्वाकर्षण (Gravitation)
गुरुत्वाकर्षण (Gravitation)
जब हम किसी वस्तु को ऊपर की ओर फेंकते हैं, तो वह कुछ समय बाद वापस पृथ्वी पर आ जाती है। पेड़ों से फल नीचे गिरते हैं और चंद्रमा पृथ्वी के चारों ओर परिक्रमा करता है। इन सभी घटनाओं के पीछे गुरुत्वाकर्षण बल की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
गुरुत्वाकर्षण ब्रह्मांड की प्रत्येक वस्तु के बीच लगने वाला आकर्षण बल है। इस अध्याय में गुरुत्वाकर्षण का सार्वत्रिक नियम, मुक्त पतन, गुरुत्वीय त्वरण, द्रव्यमान, भार, प्रणोद, दाब और उत्प्लावन बल का अध्ययन किया जाता है।
9.1 गुरुत्वाकर्षण क्या है? (What is Gravitation?)
ब्रह्मांड में प्रत्येक वस्तु दूसरी वस्तु को अपनी ओर आकर्षित करती है। दो वस्तुओं के बीच लगने वाले इस आकर्षण बल को गुरुत्वाकर्षण बल (Gravitational Force) कहते हैं।
यह बल वस्तुओं के द्रव्यमान और उनके बीच की दूरी पर निर्भर करता है। पृथ्वी का द्रव्यमान बहुत अधिक होने के कारण वह अपने आसपास की वस्तुओं को अपनी ओर आकर्षित करती है। इसी कारण वस्तुएँ पृथ्वी की सतह की ओर गिरती हैं।
गुरुत्वाकर्षण के दैनिक जीवन के उदाहरण
- पेड़ से फल का नीचे गिरना।
- ऊपर फेंकी गई गेंद का वापस पृथ्वी पर आना।
- पृथ्वी का सूर्य के चारों ओर परिक्रमा करना।
- चंद्रमा का पृथ्वी के चारों ओर घूमना।
- समुद्र में ज्वार-भाटा उत्पन्न होने में चंद्रमा और सूर्य का गुरुत्वाकर्षण प्रभाव।
9.2 गुरुत्वाकर्षण का सार्वत्रिक नियम (Universal Law of Gravitation)
गुरुत्वाकर्षण का सार्वत्रिक नियम आइजैक न्यूटन ने प्रतिपादित किया था। इस नियम के अनुसार, ब्रह्मांड की प्रत्येक वस्तु दूसरी वस्तु को एक आकर्षण बल से खींचती है। यह बल दोनों वस्तुओं के द्रव्यमानों के गुणनफल के समानुपाती तथा उनके केंद्रों के बीच की दूरी के वर्ग के व्युत्क्रमानुपाती होता है।
मान लीजिए दो वस्तुओं के द्रव्यमान m₁ और m₂ हैं तथा उनके केंद्रों के बीच की दूरी r है। उनके बीच लगने वाला गुरुत्वाकर्षण बल F होगा:
दोनों संबंधों को मिलाने पर:
जहाँ:
- F = दोनों वस्तुओं के बीच गुरुत्वाकर्षण बल।
- m₁ और m₂ = दोनों वस्तुओं के द्रव्यमान।
- r = वस्तुओं के केंद्रों के बीच की दूरी।
- G = सार्वत्रिक गुरुत्वाकर्षण नियतांक।
सार्वत्रिक गुरुत्वाकर्षण नियतांक (G)
G का मान सभी स्थानों पर समान माना जाता है। इसका मान है:
G का SI मात्रक न्यूटन मीटर वर्ग प्रति किलोग्राम वर्ग (N m²/kg²) है।
चित्र 9.1 — दो वस्तुओं के बीच गुरुत्वाकर्षण बल का सांकेतिक चित्र
गुरुत्वाकर्षण बल किन बातों पर निर्भर करता है?
- दोनों वस्तुओं के द्रव्यमान बढ़ने पर गुरुत्वाकर्षण बल बढ़ता है।
- दोनों वस्तुओं के बीच की दूरी बढ़ने पर गुरुत्वाकर्षण बल कम होता है।
- दूरी दोगुनी होने पर गुरुत्वाकर्षण बल मूल बल का एक-चौथाई हो जाता है।
- दूरी आधी होने पर गुरुत्वाकर्षण बल चार गुना हो जाता है।
9.3 गुरुत्वाकर्षण का महत्व
गुरुत्वाकर्षण बल प्रकृति में अनेक महत्वपूर्ण घटनाओं को संभव बनाता है। इसके प्रमुख महत्व निम्नलिखित हैं:
- यह वस्तुओं को पृथ्वी की सतह पर बनाए रखता है।
- यह पृथ्वी के वायुमंडल को पृथ्वी के आसपास बनाए रखने में सहायता करता है।
- यह चंद्रमा को पृथ्वी के चारों ओर कक्षा में बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
- यह ग्रहों को सूर्य के चारों ओर परिक्रमा करने में सहायता करता है।
- यह समुद्र में ज्वार-भाटा उत्पन्न होने का एक प्रमुख कारण है।
9.4 मुक्त पतन (Free Fall)
जब कोई वस्तु केवल गुरुत्वाकर्षण बल के प्रभाव में गिरती है और उस पर वायु प्रतिरोध जैसे अन्य बलों का प्रभाव नगण्य माना जाता है, तो उसकी गति को मुक्त पतन कहते हैं।
पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण के कारण मुक्त रूप से गिरती वस्तु का वेग समय के साथ बढ़ता है। इस गति में उत्पन्न त्वरण को गुरुत्वीय त्वरण कहते हैं।
मुक्त पतन के उदाहरण
- ऊँचाई से छोड़ी गई गेंद का नीचे गिरना।
- पेड़ से टूटकर नीचे गिरने वाला फल।
- ऊँचाई से गिरती हुई कोई वस्तु, जब वायु प्रतिरोध नगण्य माना जाए।
9.5 गुरुत्वीय त्वरण (Acceleration Due to Gravity)
पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण बल के कारण मुक्त रूप से गिरती वस्तु में जो त्वरण उत्पन्न होता है, उसे गुरुत्वीय त्वरण कहते हैं। इसे अंग्रेजी के छोटे अक्षर g से प्रदर्शित करते हैं।
पृथ्वी की सतह के पास g का औसत मान लगभग होता है:
इसका अर्थ है कि वायु प्रतिरोध को नगण्य मानने पर मुक्त रूप से गिरती वस्तु का वेग प्रत्येक सेकंड में लगभग 9.8 m/s से बढ़ता है।
गुरुत्वीय त्वरण का सूत्र
यदि पृथ्वी का द्रव्यमान M और पृथ्वी की त्रिज्या R हो, तो पृथ्वी की सतह पर स्थित m द्रव्यमान की वस्तु पर लगने वाला गुरुत्वाकर्षण बल होगा:
न्यूटन के द्वितीय नियम से:
दोनों समीकरणों की तुलना करने पर:
इस समीकरण से स्पष्ट होता है कि पृथ्वी की सतह पर गुरुत्वीय त्वरण पृथ्वी के द्रव्यमान और उसकी त्रिज्या पर निर्भर करता है।
9.6 मुक्त पतन में गति के समीकरण
मुक्त पतन के दौरान वस्तु का त्वरण g होता है। इसलिए गति के सामान्य समीकरणों में a के स्थान पर g का उपयोग किया जाता है।
जहाँ:
- u = प्रारंभिक वेग
- v = अंतिम वेग
- g = गुरुत्वीय त्वरण
- t = समय
- s = विस्थापन
यदि वस्तु को विराम अवस्था से छोड़ा जाता है, तो उसका प्रारंभिक वेग u = 0 होगा। तब:
उदाहरण 1: मुक्त पतन में वेग की गणना
प्रश्न: एक वस्तु को विराम अवस्था से छोड़ा जाता है। 2 सेकंड बाद उसका वेग ज्ञात कीजिए। g = 9.8 m/s² लीजिए।
u = 0 m/s
t = 2 s
g = 9.8 m/s²
सूत्र:
v = u + gt
हल:
v = 0 + 9.8 × 2
अंतिम वेग = 19.6 m/s
उदाहरण 2: गिरती वस्तु द्वारा तय दूरी
प्रश्न: एक वस्तु को विराम अवस्था से छोड़ा जाता है। 3 सेकंड में वह कितनी दूरी तय करेगी? g = 9.8 m/s² लीजिए।
u = 0 m/s
t = 3 s
g = 9.8 m/s²
सूत्र:
s = ut + ½gt²
हल:
s = 0 + ½ × 9.8 × 3²
s = 4.9 × 9
दूरी = 44.1 m
9.7 द्रव्यमान (Mass)
किसी वस्तु में उपस्थित पदार्थ की मात्रा को उसका द्रव्यमान कहते हैं। द्रव्यमान वस्तु के जड़त्व का माप भी है।
- द्रव्यमान का SI मात्रक किलोग्राम (kg) है।
- द्रव्यमान एक अदिश राशि है।
- किसी वस्तु का द्रव्यमान सामान्यतः स्थान बदलने पर नहीं बदलता।
- द्रव्यमान को तुला या तराजू से मापा जा सकता है।
9.8 भार (Weight)
किसी वस्तु पर पृथ्वी द्वारा लगाया गया गुरुत्वाकर्षण बल उसका भार कहलाता है। भार एक सदिश राशि है और इसकी दिशा पृथ्वी के केंद्र की ओर होती है।
जहाँ:
- W = वस्तु का भार
- m = वस्तु का द्रव्यमान
- g = गुरुत्वीय त्वरण
भार का SI मात्रक न्यूटन (N) है।
उदाहरण 3: भार की गणना
प्रश्न: 10 kg द्रव्यमान वाली वस्तु का पृथ्वी पर भार ज्ञात कीजिए। g = 9.8 m/s² लीजिए।
m = 10 kg
g = 9.8 m/s²
सूत्र:
W = mg
हल:
W = 10 × 9.8
भार = 98 N
9.9 द्रव्यमान और भार में अंतर
| आधार | द्रव्यमान (Mass) | भार (Weight) |
|---|---|---|
| परिभाषा | वस्तु में उपस्थित पदार्थ की मात्रा | वस्तु पर लगने वाला गुरुत्वाकर्षण बल |
| प्रकार | अदिश राशि | सदिश राशि |
| SI मात्रक | किलोग्राम (kg) | न्यूटन (N) |
| स्थान के साथ परिवर्तन | सामान्यतः स्थिर रहता है। | गुरुत्वीय त्वरण के अनुसार बदलता है। |
| मापन | तुला या तराजू | स्प्रिंग तुला |
| संबंध | वस्तु के जड़त्व का माप | W = mg |
9.10 चंद्रमा पर भार
चंद्रमा का द्रव्यमान और गुरुत्वाकर्षण पृथ्वी की तुलना में कम है। चंद्रमा की सतह पर गुरुत्वीय त्वरण पृथ्वी के गुरुत्वीय त्वरण का लगभग 1/6 होता है। इसलिए किसी वस्तु का चंद्रमा पर भार पृथ्वी पर उसके भार का लगभग 1/6 होता है।
किसी वस्तु का द्रव्यमान चंद्रमा पर भी वही रहता है, लेकिन उसका भार कम हो जाता है।
उदाहरण 4: चंद्रमा पर भार की गणना
प्रश्न: किसी वस्तु का पृथ्वी पर भार 60 N है। चंद्रमा पर उसका भार कितना होगा?
चंद्रमा पर भार = पृथ्वी पर भार / 6
हल:
= 60 / 6
चंद्रमा पर भार = 10 N
9.11 प्रणोद (Thrust)
जब कोई वस्तु किसी सतह पर लंबवत दिशा में बल लगाती है, तो उस बल को प्रणोद कहते हैं। प्रणोद एक प्रकार का बल है और इसका SI मात्रक न्यूटन (N) है।
उदाहरण: जब कोई व्यक्ति जमीन पर खड़ा होता है, तो उसके शरीर के भार के कारण वह जमीन पर नीचे की ओर बल लगाता है। यह सतह पर लंबवत लगाया गया बल प्रणोद का उदाहरण है।
9.12 दाब (Pressure)
किसी सतह के प्रति इकाई क्षेत्रफल पर लंबवत लगने वाले बल को दाब कहते हैं।
जहाँ:
- P = दाब
- F = सतह पर लंबवत लगाया गया बल
- A = संपर्क क्षेत्रफल
दाब का SI मात्रक पास्कल (Pa) है।
दाब और क्षेत्रफल का संबंध
- समान बल के लिए क्षेत्रफल कम होने पर दाब बढ़ता है।
- समान बल के लिए क्षेत्रफल बढ़ने पर दाब कम होता है।
दाब के दैनिक जीवन के उदाहरण
- नुकीली कील आसानी से लकड़ी में प्रवेश कर जाती है, क्योंकि उसके सिरे का क्षेत्रफल कम होता है और दाब अधिक होता है।
- चाकू की धार पतली बनाई जाती है ताकि कम क्षेत्रफल पर अधिक दाब लगाया जा सके।
- ऊँट के पैर चौड़े होते हैं, जिससे रेत पर लगने वाला दाब कम होता है।
- भारी वाहनों के टायर अपेक्षाकृत चौड़े बनाए जाते हैं ताकि संपर्क क्षेत्रफल बढ़े और दाब कम हो।
चित्र 9.2 — क्षेत्रफल कम होने पर दाब अधिक होता है
9.13 द्रवों में दाब (Pressure in Fluids)
द्रव अपने पात्र की दीवारों और तल पर दाब लगाते हैं। द्रव के भीतर किसी बिंदु पर दाब गहराई के साथ बढ़ता है। समान द्रव में समान गहराई पर दाब समान होता है।
द्रव के भीतर दाब के प्रमुख गुण:
- द्रव सभी दिशाओं में दाब लगाते हैं।
- द्रव में गहराई बढ़ने पर दाब बढ़ता है।
- एक ही द्रव में समान गहराई पर दाब समान होता है।
- द्रव का दाब उसकी प्रकृति और घनत्व पर भी निर्भर करता है।
द्रवों में दाब के उदाहरण
- बाँध की दीवार नीचे की ओर अधिक मोटी बनाई जाती है, क्योंकि पानी का दाब गहराई के साथ बढ़ता है।
- पानी से भरे पात्र में नीचे बने छेद से पानी अधिक दूरी तक निकल सकता है।
- गहरे पानी में गोताखोरों पर अधिक दाब लगता है।
9.14 उत्प्लावन बल (Buoyant Force)
जब किसी वस्तु को किसी द्रव में डुबोया जाता है, तो द्रव उस वस्तु पर ऊपर की ओर एक बल लगाता है। इस ऊपर की ओर लगने वाले बल को उत्प्लावन बल कहते हैं।
उत्प्लावन बल के कारण पानी में डूबी वस्तु का आभासी भार कम महसूस होता है।
उत्प्लावन बल के उदाहरण
- पानी में लकड़ी का टुकड़ा तैरता है।
- पानी में पत्थर उठाना जमीन की तुलना में आसान महसूस हो सकता है।
- जहाज का पानी पर तैरना उत्प्लावन बल से संबंधित है।
- पानी में भरी बाल्टी उठाने पर वस्तु के भार में आभासी कमी महसूस होती है।
चित्र 9.3 — द्रव में डूबी वस्तु पर उत्प्लावन बल
9.15 आर्किमिडीज का सिद्धांत (Archimedes' Principle)
आर्किमिडीज के सिद्धांत के अनुसार, जब किसी वस्तु को किसी द्रव में पूर्णतः या आंशिक रूप से डुबोया जाता है, तो उस पर लगने वाला उत्प्लावन बल वस्तु द्वारा हटाए गए द्रव के भार के बराबर होता है।
अर्थात:
यह सिद्धांत वस्तुओं के तैरने और डूबने की घटनाओं को समझने में सहायता करता है।
आर्किमिडीज के सिद्धांत के अनुप्रयोग
- जहाजों के निर्माण में।
- पनडुब्बियों के कार्य करने में।
- द्रवों का घनत्व ज्ञात करने वाले उपकरणों में।
- वस्तुओं का आयतन और आपेक्षिक घनत्व ज्ञात करने में।
9.16 वस्तुएँ कब तैरती या डूबती हैं?
किसी द्रव में रखी वस्तु का तैरना या डूबना मुख्यतः वस्तु और द्रव के घनत्व तथा उत्प्लावन बल और भार के संबंध पर निर्भर करता है।
वस्तु के तैरने की स्थिति
यदि वस्तु का औसत घनत्व द्रव के घनत्व से कम है, तो वह सामान्यतः द्रव की सतह पर तैर सकती है। तैरती हुई वस्तु के लिए उत्प्लावन बल उसके भार के बराबर होता है।
वस्तु के डूबने की स्थिति
यदि वस्तु का घनत्व द्रव के घनत्व से अधिक है, तो वह सामान्यतः द्रव में डूब जाती है।
वस्तु के द्रव में निलंबित रहने की स्थिति
यदि वस्तु का औसत घनत्व द्रव के घनत्व के बराबर हो, तो वह द्रव के भीतर संतुलन की अवस्था में निलंबित रह सकती है।
| स्थिति | घनत्व का संबंध | परिणाम |
|---|---|---|
| वस्तु तैरती है | वस्तु का औसत घनत्व द्रव से कम | वस्तु सतह पर तैर सकती है। |
| वस्तु डूबती है | वस्तु का घनत्व द्रव से अधिक | वस्तु नीचे चली जाती है। |
| वस्तु निलंबित रहती है | वस्तु का औसत घनत्व द्रव के बराबर | वस्तु द्रव के भीतर संतुलन में रह सकती है। |
9.17 घनत्व (Density)
किसी पदार्थ के इकाई आयतन में उपस्थित द्रव्यमान को उसका घनत्व कहते हैं।
जहाँ:
- ρ = घनत्व
- m = द्रव्यमान
- V = आयतन
घनत्व का SI मात्रक kg/m³ है।
उदाहरण 5: घनत्व की गणना
प्रश्न: किसी वस्तु का द्रव्यमान 200 kg और आयतन 0.1 m³ है। उसका घनत्व ज्ञात कीजिए।
m = 200 kg
V = 0.1 m³
सूत्र:
ρ = m/V
हल:
ρ = 200/0.1
घनत्व = 2000 kg/m³
9.18 आपेक्षिक घनत्व (Relative Density)
किसी पदार्थ के घनत्व और 4°C पर जल के घनत्व के अनुपात को उस पदार्थ का आपेक्षिक घनत्व कहते हैं।
आपेक्षिक घनत्व एक अनुपात है, इसलिए इसका कोई मात्रक नहीं होता।
उदाहरण 6: आपेक्षिक घनत्व की गणना
प्रश्न: किसी पदार्थ का घनत्व 800 kg/m³ है। जल का घनत्व 1000 kg/m³ मानकर उसका आपेक्षिक घनत्व ज्ञात कीजिए।
आपेक्षिक घनत्व = पदार्थ का घनत्व / जल का घनत्व
हल:
= 800/1000
आपेक्षिक घनत्व = 0.8
9.19 अध्याय के महत्वपूर्ण सूत्र
| भौतिक राशि | सूत्र | SI मात्रक |
|---|---|---|
| गुरुत्वाकर्षण बल | F = Gm₁m₂/r² | N |
| गुरुत्वीय त्वरण | g = GM/R² | m/s² |
| भार | W = mg | N |
| दाब | P = F/A | Pa |
| घनत्व | ρ = m/V | kg/m³ |
| आपेक्षिक घनत्व | पदार्थ का घनत्व / जल का घनत्व | कोई मात्रक नहीं |
| मुक्त पतन का प्रथम समीकरण | v = u + gt | संबंध |
| मुक्त पतन का द्वितीय समीकरण | s = ut + ½gt² | संबंध |
| मुक्त पतन का तृतीय समीकरण | v² = u² + 2gs | संबंध |
| चंद्रमा पर भार | पृथ्वी पर भार / 6 | N |
9.20 अध्याय का सारांश
- ब्रह्मांड की प्रत्येक वस्तु दूसरी वस्तु को आकर्षित करती है।
- दो वस्तुओं के बीच लगने वाला आकर्षण बल गुरुत्वाकर्षण बल कहलाता है।
- गुरुत्वाकर्षण बल दोनों वस्तुओं के द्रव्यमानों के गुणनफल के समानुपाती और उनके बीच की दूरी के वर्ग के व्युत्क्रमानुपाती होता है।
- गुरुत्वाकर्षण नियतांक G का मान 6.67 × 10⁻¹¹ N m²/kg² है।
- केवल गुरुत्वाकर्षण बल के प्रभाव में गिरती वस्तु की गति मुक्त पतन कहलाती है।
- पृथ्वी की सतह के पास गुरुत्वीय त्वरण का मान लगभग 9.8 m/s² है।
- द्रव्यमान वस्तु में पदार्थ की मात्रा है और यह जड़त्व का माप है।
- भार वस्तु पर लगने वाला गुरुत्वाकर्षण बल है।
- चंद्रमा पर किसी वस्तु का भार पृथ्वी पर उसके भार का लगभग 1/6 होता है।
- प्रति इकाई क्षेत्रफल पर लंबवत लगने वाला बल दाब कहलाता है।
- द्रव में डूबी वस्तु पर ऊपर की ओर लगने वाला बल उत्प्लावन बल कहलाता है।
- आर्किमिडीज का सिद्धांत उत्प्लावन बल और हटाए गए द्रव के भार के बीच संबंध बताता है।
- घनत्व द्रव्यमान और आयतन का अनुपात है।
- आपेक्षिक घनत्व का कोई मात्रक नहीं होता।
9.21 महत्वपूर्ण शब्दावली
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| गुरुत्वाकर्षण | दो द्रव्यमान वाली वस्तुओं के बीच आकर्षण बल। |
| गुरुत्वाकर्षण नियतांक (G) | सार्वत्रिक गुरुत्वाकर्षण नियम में प्रयुक्त नियतांक। |
| मुक्त पतन | केवल गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव में वस्तु की गति। |
| गुरुत्वीय त्वरण (g) | गुरुत्वाकर्षण के कारण उत्पन्न त्वरण। |
| द्रव्यमान | वस्तु में उपस्थित पदार्थ की मात्रा। |
| भार | वस्तु पर लगने वाला गुरुत्वाकर्षण बल। |
| प्रणोद | सतह पर लंबवत लगाया गया बल। |
| दाब | प्रति इकाई क्षेत्रफल पर लंबवत लगने वाला बल। |
| उत्प्लावन बल | द्रव द्वारा डूबी वस्तु पर ऊपर की ओर लगाया गया बल। |
| आर्किमिडीज का सिद्धांत | उत्प्लावन बल हटाए गए द्रव के भार के बराबर होता है। |
| घनत्व | इकाई आयतन में उपस्थित द्रव्यमान। |
| आपेक्षिक घनत्व | पदार्थ के घनत्व और जल के घनत्व का अनुपात। |
9.22 अति महत्वपूर्ण प्रश्न एवं उत्तर
9.23 बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQs)
1. गुरुत्वाकर्षण का सार्वत्रिक नियम किसने दिया?
(A) आइंस्टीन
(B) न्यूटन
(C) गैलीलियो
(D) आर्किमिडीज
सही उत्तर देखें
सही उत्तर: (B) न्यूटन
2. सार्वत्रिक गुरुत्वाकर्षण नियतांक G का SI मात्रक क्या है?
(A) N/kg
(B) N m²/kg²
(C) kg/m³
(D) m/s²
सही उत्तर देखें
सही उत्तर: (B) N m²/kg²
3. पृथ्वी की सतह के पास g का लगभग मान कितना है?
(A) 6.67 m/s²
(B) 9.8 m/s²
(C) 98 m/s²
(D) 1.6 m/s²
सही उत्तर देखें
सही उत्तर: (B) 9.8 m/s²
4. भार का SI मात्रक क्या है?
(A) किलोग्राम
(B) मीटर
(C) न्यूटन
(D) पास्कल
सही उत्तर देखें
सही उत्तर: (C) न्यूटन
5. द्रव्यमान का SI मात्रक क्या है?
(A) न्यूटन
(B) किलोग्राम
(C) पास्कल
(D) जूल
सही उत्तर देखें
सही उत्तर: (B) किलोग्राम
6. चंद्रमा पर किसी वस्तु का भार पृथ्वी की तुलना में कितना होता है?
(A) दोगुना
(B) आधा
(C) एक-छठा
(D) समान
सही उत्तर देखें
सही उत्तर: (C) एक-छठा
7. दाब का SI मात्रक क्या है?
(A) न्यूटन
(B) पास्कल
(C) किलोग्राम
(D) मीटर
सही उत्तर देखें
सही उत्तर: (B) पास्कल
8. द्रव में डूबी वस्तु पर ऊपर की ओर लगने वाला बल क्या कहलाता है?
(A) घर्षण बल
(B) चुंबकीय बल
(C) उत्प्लावन बल
(D) पेशीय बल
सही उत्तर देखें
सही उत्तर: (C) उत्प्लावन बल
9. आर्किमिडीज के सिद्धांत के अनुसार उत्प्लावन बल किसके बराबर होता है?
(A) वस्तु के द्रव्यमान के
(B) हटाए गए द्रव के भार के
(C) वस्तु के आयतन के
(D) द्रव के तापमान के
सही उत्तर देखें
सही उत्तर: (B) हटाए गए द्रव के भार के
10. घनत्व का SI मात्रक क्या है?
(A) kg/m³
(B) N/m²
(C) kg m/s
(D) m/s²
सही उत्तर देखें
सही उत्तर: (A) kg/m³
11. आपेक्षिक घनत्व का मात्रक क्या होता है?
(A) kg/m³
(B) ग्राम
(C) कोई मात्रक नहीं
(D) न्यूटन
सही उत्तर देखें
सही उत्तर: (C) कोई मात्रक नहीं
12. द्रव में गहराई बढ़ने पर दाब पर क्या प्रभाव पड़ता है?
(A) घटता है
(B) बढ़ता है
(C) शून्य हो जाता है
(D) कोई परिवर्तन नहीं होता
सही उत्तर देखें
सही उत्तर: (B) बढ़ता है
9.24 संख्यात्मक अभ्यास प्रश्न
- 5 kg द्रव्यमान वाली वस्तु का पृथ्वी पर भार ज्ञात कीजिए। g = 9.8 m/s² लीजिए।
- किसी वस्तु का भार 196 N है। उसका द्रव्यमान ज्ञात कीजिए। g = 9.8 m/s² लीजिए।
- किसी वस्तु का पृथ्वी पर भार 120 N है। चंद्रमा पर उसका भार ज्ञात कीजिए।
- एक वस्तु को विराम अवस्था से छोड़ा जाता है। 5 सेकंड बाद उसका वेग ज्ञात कीजिए। g = 9.8 m/s² लीजिए।
- एक वस्तु को विराम अवस्था से गिराया जाता है। 2 सेकंड में तय दूरी ज्ञात कीजिए। g = 9.8 m/s² लीजिए।
- 50 N का बल 0.5 m² क्षेत्रफल पर लंबवत लगाया जाता है। दाब ज्ञात कीजिए।
- किसी वस्तु का द्रव्यमान 300 kg और आयतन 0.2 m³ है। उसका घनत्व ज्ञात कीजिए।
- किसी पदार्थ का घनत्व 600 kg/m³ है। जल का घनत्व 1000 kg/m³ मानकर आपेक्षिक घनत्व ज्ञात कीजिए।
9.25 गतिविधियाँ एवं प्रयोग
गतिविधि 1: गुरुत्वाकर्षण का अवलोकन
उद्देश्य: पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण प्रभाव को समझना।
सामग्री: एक छोटी गेंद।
विधि: गेंद को सुरक्षित स्थान पर थोड़ी ऊँचाई से छोड़ें और उसके नीचे गिरने का अवलोकन करें।
निष्कर्ष: पृथ्वी गेंद को अपने केंद्र की दिशा में आकर्षित करती है।
गतिविधि 2: दाब और क्षेत्रफल का संबंध
उद्देश्य: संपर्क क्षेत्रफल बदलने पर दाब में होने वाले परिवर्तन को समझना।
सामग्री: एक किताब और मुलायम मिट्टी या गद्देदार सतह।
विधि: किताब को पहले बड़े पृष्ठ पर और फिर किनारे पर सतह के संपर्क में रखें। दोनों स्थितियों में सतह पर पड़ने वाले प्रभाव की तुलना करें।
निष्कर्ष: समान बल के लिए संपर्क क्षेत्रफल कम होने पर दाब अधिक होता है।
गतिविधि 3: उत्प्लावन बल का अनुभव
उद्देश्य: द्रव में उत्प्लावन बल को समझना।
सामग्री: पानी से भरी बाल्टी और पानी में सुरक्षित रूप से डुबोई जा सकने वाली कोई वस्तु।
विधि: वस्तु को पहले हवा में पकड़ें और फिर पानी में पूरी तरह डुबोकर पकड़ें। दोनों स्थितियों में महसूस होने वाले भार की तुलना करें।
निष्कर्ष: पानी में डुबोने पर वस्तु का आभासी भार कम महसूस होता है, क्योंकि पानी उस पर ऊपर की ओर उत्प्लावन बल लगाता है।
9.26 परीक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण बिंदु
- गुरुत्वाकर्षण के सार्वत्रिक नियम का कथन और सूत्र याद रखें।
- G और g के मान तथा मात्रक में अंतर समझें।
- मुक्त पतन और गुरुत्वीय त्वरण की परिभाषा याद रखें।
- द्रव्यमान और भार में अंतर स्पष्ट रूप से लिखने का अभ्यास करें।
- चंद्रमा पर भार पृथ्वी के भार का लगभग 1/6 क्यों होता है, समझें।
- प्रणोद और दाब की परिभाषा तथा सूत्र याद रखें।
- द्रवों में दाब और उत्प्लावन बल को समझें।
- आर्किमिडीज के सिद्धांत का कथन और अनुप्रयोग याद रखें।
- घनत्व और आपेक्षिक घनत्व के सूत्रों का अभ्यास करें।
- गुरुत्वाकर्षण, भार, दाब और घनत्व पर आधारित संख्यात्मक प्रश्न हल करें।
अध्याय का निर्धारित भारांक: 6 अंक। यह भारांक RBSE के 2026–27 के आधिकारिक पाठ्यक्रम में दिया गया है। परीक्षा में प्रश्नों का वास्तविक स्वरूप बोर्ड के प्रश्नपत्र के अनुसार होगा।
अगला अध्याय: अध्याय 10 — कार्य तथा ऊर्जा (Work and Energy)
अध्याय 10 : कार्य तथा ऊर्जा (Work and Energy)
परिचय : हमारे दैनिक जीवन में अनेक प्रकार के कार्य होते हैं। कोई व्यक्ति सामान उठाता है, कोई साइकिल चलाता है, कोई मशीन चलाता है और कोई वस्तु को एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाता है। विज्ञान में कार्य, ऊर्जा और शक्ति की अवधारणाएँ इन सभी गतिविधियों को समझने में सहायता करती हैं। भौतिक विज्ञान में कार्य की परिभाषा सामान्य भाषा में प्रयुक्त कार्य की परिभाषा से अलग होती है।
इस अध्याय में हम कार्य, ऊर्जा, गतिज ऊर्जा, स्थितिज ऊर्जा, ऊर्जा संरक्षण का नियम और शक्ति का अध्ययन करेंगे।
1. कार्य (Work)
भौतिक विज्ञान में किसी वस्तु पर बल लगाने से यदि वस्तु में बल की दिशा में विस्थापन होता है, तो कहा जाता है कि वस्तु पर कार्य हुआ है।
कार्य की वैज्ञानिक परिभाषा : किसी वस्तु पर लगाया गया बल तथा बल की दिशा में हुआ विस्थापन का गुणनफल कार्य कहलाता है।
W = F × s
जहाँ :
- W = किया गया कार्य
- F = वस्तु पर लगाया गया बल
- s = बल की दिशा में वस्तु का विस्थापन
कार्य का SI मात्रक जूल (Joule) है। एक जूल कार्य तब होता है जब किसी वस्तु पर एक न्यूटन बल लगाने से वस्तु बल की दिशा में एक मीटर विस्थापित होती है।
1 J = 1 N m
2. कार्य के प्रकार
बल और विस्थापन की दिशाओं के आधार पर कार्य मुख्यतः तीन प्रकार का होता है।
(क) धनात्मक कार्य (Positive Work)
जब वस्तु पर लगाया गया बल और वस्तु का विस्थापन एक ही दिशा में होता है, तो किया गया कार्य धनात्मक कहलाता है।
उदाहरण : जमीन पर रखे डिब्बे को धक्का देकर आगे बढ़ाना।
(ख) ऋणात्मक कार्य (Negative Work)
जब लगाया गया बल और विस्थापन विपरीत दिशाओं में होते हैं, तो किया गया कार्य ऋणात्मक कहलाता है।
उदाहरण : गतिशील वस्तु पर घर्षण बल द्वारा किया गया कार्य। घर्षण बल गति की दिशा के विपरीत कार्य करता है।
(ग) शून्य कार्य (Zero Work)
जब वस्तु का विस्थापन शून्य हो या बल और विस्थापन एक-दूसरे के लंबवत हों, तो कार्य शून्य होता है।
उदाहरण : सिर पर बोझ रखकर समतल सड़क पर चलने वाले व्यक्ति द्वारा बोझ पर किया गया कार्य शून्य होता है, क्योंकि बोझ पर लगाया गया ऊपर की ओर बल और उसका क्षैतिज विस्थापन परस्पर लंबवत हैं।
3. ऊर्जा (Energy)
किसी वस्तु की कार्य करने की क्षमता को ऊर्जा कहते हैं। किसी वस्तु में ऊर्जा होने के कारण वह स्वयं कार्य कर सकती है या किसी दूसरी वस्तु पर कार्य कर सकती है।
- ऊर्जा का SI मात्रक जूल (J) है।
- ऊर्जा एक अदिश राशि है।
- कार्य और ऊर्जा के मात्रक समान होते हैं।
- ऊर्जा के अनेक रूप होते हैं, जैसे गतिज, स्थितिज, ऊष्मीय, प्रकाश, ध्वनि, रासायनिक और विद्युत ऊर्जा।
4. ऊर्जा के प्रमुख रूप
(क) गतिज ऊर्जा (Kinetic Energy)
किसी वस्तु में उसकी गति के कारण जो ऊर्जा होती है, उसे गतिज ऊर्जा कहते हैं। गतिशील कार, दौड़ता हुआ व्यक्ति, बहता हुआ पानी और उड़ती हुई गेंद गतिज ऊर्जा के उदाहरण हैं।
किसी गतिशील वस्तु की गतिज ऊर्जा उसके द्रव्यमान और वेग पर निर्भर करती है।
K.E. = ½ mv²
जहाँ :
- m = वस्तु का द्रव्यमान (किलोग्राम में)
- v = वस्तु का वेग (मीटर/सेकंड में)
- K.E. = गतिज ऊर्जा (जूल में)
गतिज ऊर्जा के बारे में महत्वपूर्ण बातें :
- वस्तु का द्रव्यमान बढ़ने पर समान वेग के लिए गतिज ऊर्जा बढ़ती है।
- वेग दोगुना होने पर गतिज ऊर्जा चार गुनी हो जाती है।
- स्थिर वस्तु का वेग शून्य होता है, इसलिए उसकी गतिज ऊर्जा भी शून्य होती है।
गतिज ऊर्जा के सूत्र की व्युत्पत्ति
मान लीजिए m द्रव्यमान की कोई वस्तु विराम अवस्था से चलना प्रारंभ करती है। उस पर F बल लगाने से उसमें a त्वरण उत्पन्न होता है और वह s दूरी तय करके v वेग प्राप्त करती है।
न्यूटन के गति के दूसरे नियम से :
गति के तीसरे समीकरण से :
प्रारंभिक वेग u = 0 रखने पर :
a = v² / 2s
किया गया कार्य :
W = ma × s
W = m × (v² / 2s) × s
W = ½ mv²
यह कार्य वस्तु की गतिज ऊर्जा में वृद्धि के बराबर है। अतः गतिज ऊर्जा का सूत्र है :
(ख) स्थितिज ऊर्जा (Potential Energy)
किसी वस्तु में उसकी स्थिति या विन्यास के कारण जो ऊर्जा होती है, उसे स्थितिज ऊर्जा कहते हैं। किसी ऊँचाई पर रखी वस्तु में गुरुत्वीय स्थितिज ऊर्जा होती है। खिंचा हुआ धनुष और दबाया हुआ स्प्रिंग भी स्थितिज ऊर्जा के उदाहरण हैं।
पृथ्वी की सतह के निकट किसी वस्तु की गुरुत्वीय स्थितिज ऊर्जा का सूत्र है :
P.E. = mgh
जहाँ :
- m = वस्तु का द्रव्यमान (kg)
- g = गुरुत्वीय त्वरण (m/s²)
- h = संदर्भ स्तर से वस्तु की ऊँचाई (m)
स्थितिज ऊर्जा का मान चुने गए संदर्भ स्तर पर निर्भर करता है। ऊँचाई जितनी अधिक होगी, समान द्रव्यमान के लिए स्थितिज ऊर्जा उतनी अधिक होगी।
5. यांत्रिक ऊर्जा (Mechanical Energy)
किसी वस्तु की गतिज ऊर्जा और स्थितिज ऊर्जा के योग को उसकी यांत्रिक ऊर्जा कहते हैं।
M.E. = K.E. + P.E.
उदाहरण के लिए, ऊँचाई से गिरती हुई वस्तु में स्थितिज ऊर्जा धीरे-धीरे गतिज ऊर्जा में परिवर्तित होती जाती है।
6. ऊर्जा संरक्षण का नियम (Law of Conservation of Energy)
ऊर्जा संरक्षण के नियम के अनुसार ऊर्जा न तो उत्पन्न की जा सकती है और न ही नष्ट की जा सकती है। ऊर्जा केवल एक रूप से दूसरे रूप में परिवर्तित हो सकती है। किसी पृथक निकाय की कुल ऊर्जा स्थिर रहती है।
उदाहरण : ऊँचाई से गिरती हुई वस्तु
जब किसी वस्तु को ऊँचाई से गिराया जाता है, तब प्रारंभ में उसकी स्थितिज ऊर्जा अधिक और गतिज ऊर्जा शून्य होती है। जैसे-जैसे वस्तु नीचे गिरती है, उसकी स्थितिज ऊर्जा कम होती जाती है तथा गतिज ऊर्जा बढ़ती जाती है। जमीन के पास उसकी गतिज ऊर्जा अधिकतम और स्थितिज ऊर्जा न्यूनतम होती है। वायु प्रतिरोध की उपेक्षा करने पर कुल यांत्रिक ऊर्जा समान रहती है।
| स्थिति | स्थितिज ऊर्जा | गतिज ऊर्जा | कुल यांत्रिक ऊर्जा |
|---|---|---|---|
| सबसे ऊपर | अधिकतम | शून्य (यदि विराम से छोड़ी गई हो) | स्थिर |
| बीच में | कम होती है | बढ़ती है | स्थिर |
| जमीन के पास | न्यूनतम | अधिकतम | स्थिर |
7. शक्ति (Power)
कार्य करने की दर को शक्ति कहते हैं। समान कार्य को कम समय में करने वाली मशीन की शक्ति अधिक होती है।
P = W / t
जहाँ :
- P = शक्ति
- W = किया गया कार्य
- t = लगा समय
शक्ति का SI मात्रक वाट (Watt) है।
1 W = 1 J/s
शक्ति के बड़े मात्रक किलोवाट (kW) और मेगावाट (MW) हैं।
- 1 किलोवाट = 1000 वाट
- 1 मेगावाट = 10,00,000 वाट
8. ऊर्जा का व्यावसायिक मात्रक (Commercial Unit of Energy)
विद्युत ऊर्जा की खपत को सामान्यतः किलोवाट-घंटा (kWh) में मापा जाता है। इसे ऊर्जा का व्यावसायिक मात्रक कहते हैं। बिजली के बिल में प्रयुक्त एक यूनिट ऊर्जा का अर्थ एक किलोवाट-घंटा होता है।
= 1000 W × 3600 s
1 kWh = 3.6 × 10⁶ J
9. कार्य, ऊर्जा और शक्ति में अंतर
| आधार | कार्य | ऊर्जा | शक्ति |
|---|---|---|---|
| अर्थ | बल द्वारा विस्थापन कराने की प्रक्रिया का माप | कार्य करने की क्षमता | कार्य करने की दर |
| सूत्र | W = F × s | रूप के अनुसार अलग-अलग | P = W/t |
| SI मात्रक | जूल | जूल | वाट |
10. हल किए गए संख्यात्मक प्रश्न (Solved Numericals)
दिया गया है : F = 10 N, s = 5 m
सूत्र : W = F × s
W = 10 × 5
उत्तर : W = 50 जूल
दिया गया है : m = 2 kg, v = 3 m/s
सूत्र : K.E. = ½ mv²
= ½ × 2 × 3²
= 1 × 9
उत्तर : गतिज ऊर्जा = 9 जूल
दिया गया है : m = 5 kg, h = 4 m, g = 10 m/s²
सूत्र : P.E. = mgh
= 5 × 10 × 4
उत्तर : स्थितिज ऊर्जा = 200 जूल
दिया गया है : W = 200 J, t = 10 s
सूत्र : P = W/t
= 200/10
उत्तर : शक्ति = 20 वाट
शक्ति = 2 kW
समय = 3 घंटे
ऊर्जा = शक्ति × समय
= 2 × 3
उत्तर : ऊर्जा = 6 kWh
m = 5 kg, v = 4 m/s
K.E. = ½ mv²
= ½ × 5 × 4²
= 2.5 × 16
उत्तर : 40 जूल
11. महत्त्वपूर्ण प्रश्न एवं उत्तर (Important Questions and Answers)
- जब वस्तु का विस्थापन शून्य हो।
- जब बल और विस्थापन एक-दूसरे के लंबवत हों।
12. बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQs)
1. कार्य का SI मात्रक क्या है?
- न्यूटन
- जूल
- वाट
- मीटर
2. ऊर्जा की परिभाषा क्या है?
- बल लगाने की क्षमता
- कार्य करने की क्षमता
- दूरी तय करने की क्षमता
- द्रव्यमान मापने की क्षमता
3. गतिज ऊर्जा का सूत्र है :
- mv
- mgh
- ½ mv²
- F × s
4. स्थितिज ऊर्जा का सूत्र कौन-सा है?
- mgh
- ½ mv²
- W/t
- F/a
5. शक्ति का SI मात्रक है :
- जूल
- न्यूटन
- वाट
- पास्कल
6. एक वाट बराबर होता है :
- 1 J/s
- 1 N/m
- 1 kg/m
- 1 J/m
7. एक किलोवाट में कितने वाट होते हैं?
- 10
- 100
- 1000
- 10,000
8. विद्युत ऊर्जा का व्यावसायिक मात्रक है :
- वाट
- किलोवाट-घंटा
- न्यूटन
- मीटर
9. ऊर्जा संरक्षण के नियम के अनुसार ऊर्जा :
- नष्ट हो जाती है
- उत्पन्न होती है
- केवल स्थान बदलती है
- न उत्पन्न होती है, न नष्ट; केवल रूप बदलती है
10. यदि किसी वस्तु का वेग दोगुना कर दिया जाए, तो उसकी गतिज ऊर्जा हो जाएगी :
- दोगुनी
- तीन गुनी
- चार गुनी
- आधी
13. अभ्यास प्रश्न (Practice Questions)
- कार्य का SI मात्रक लिखिए।
- ऊर्जा किसे कहते हैं?
- गतिज ऊर्जा का सूत्र लिखिए।
- स्थितिज ऊर्जा का सूत्र लिखिए।
- शक्ति का SI मात्रक क्या है?
- एक किलोवाट में कितने वाट होते हैं?
- ऊर्जा के व्यावसायिक मात्रक का नाम लिखिए।
- धनात्मक, ऋणात्मक तथा शून्य कार्य को उदाहरण सहित समझाइए।
- गतिज ऊर्जा और स्थितिज ऊर्जा में अंतर लिखिए।
- ऊर्जा संरक्षण के नियम को उदाहरण सहित समझाइए।
- शक्ति किसे कहते हैं? इसका सूत्र और SI मात्रक लिखिए।
- एक किलोवाट-घंटा को जूल में व्यक्त कीजिए।
- कार्य की वैज्ञानिक परिभाषा लिखिए तथा कार्य के विभिन्न प्रकारों को उदाहरण सहित समझाइए।
- गतिज ऊर्जा का व्यंजक K.E. = ½ mv² प्राप्त कीजिए।
- ऊर्जा संरक्षण के नियम को ऊँचाई से गिरती वस्तु के उदाहरण द्वारा समझाइए।
- कार्य, ऊर्जा और शक्ति में अंतर स्पष्ट कीजिए।
- 20 न्यूटन का बल किसी वस्तु को 8 मीटर विस्थापित करता है। किया गया कार्य ज्ञात कीजिए।
- 4 kg द्रव्यमान की वस्तु 5 m/s के वेग से चल रही है। उसकी गतिज ऊर्जा ज्ञात कीजिए।
- 10 kg द्रव्यमान की वस्तु 2 मीटर की ऊँचाई पर रखी है। g = 10 m/s² लेकर स्थितिज ऊर्जा ज्ञात कीजिए।
- एक व्यक्ति 600 जूल कार्य 30 सेकंड में करता है। उसकी शक्ति ज्ञात कीजिए।
- एक 1.5 kW का विद्युत उपकरण 4 घंटे चलता है। खर्च हुई ऊर्जा kWh में ज्ञात कीजिए।
14. गतिविधियाँ एवं प्रयोग (Activities)
गतिविधि 1 : कार्य का अनुभव
एक भारी वस्तु को मेज पर रखकर उसे धक्का देने का प्रयास करें। देखें कि वस्तु कब विस्थापित होती है। बल लगाने और विस्थापन होने के बीच संबंध समझें।
निष्कर्ष : भौतिक विज्ञान में कार्य होने के लिए बल के साथ विस्थापन भी आवश्यक है।
गतिविधि 2 : गतिज ऊर्जा का प्रभाव
एक छोटी गेंद को धीरे और फिर अपेक्षाकृत तेज गति से किसी सुरक्षित हल्के लक्ष्य की ओर लुढ़काएँ। दोनों स्थितियों में लक्ष्य पर पड़ने वाले प्रभाव की तुलना करें।
निष्कर्ष : समान द्रव्यमान की वस्तु का वेग बढ़ने पर उसकी गतिज ऊर्जा बढ़ती है।
गतिविधि 3 : स्थितिज ऊर्जा का अध्ययन
एक छोटी गेंद को अलग-अलग ऊँचाइयों पर रखकर सुरक्षित तरीके से नीचे गिराएँ। ऊँचाई में परिवर्तन के साथ उसकी स्थितिज ऊर्जा के संबंध को समझें।
निष्कर्ष : समान द्रव्यमान की वस्तु की गुरुत्वीय स्थितिज ऊर्जा ऊँचाई बढ़ने पर बढ़ती है।
गतिविधि 4 : शक्ति की तुलना
सीढ़ियों पर धीरे और तेज गति से चढ़ने में लगे समय की तुलना करें। यदि दोनों बार समान ऊँचाई तक चढ़ा जाए, तो किए गए कार्य की तुलना की जा सकती है।
निष्कर्ष : समान कार्य कम समय में करने पर शक्ति अधिक होती है।
15. अध्याय का सारांश (Chapter Summary)
- कार्य तब होता है जब बल के कारण वस्तु में बल की दिशा में विस्थापन होता है।
- कार्य का सूत्र W = F × s है।
- कार्य का SI मात्रक जूल है।
- कार्य धनात्मक, ऋणात्मक या शून्य हो सकता है।
- ऊर्जा कार्य करने की क्षमता है।
- गतिज ऊर्जा गति के कारण उत्पन्न होती है।
- गतिज ऊर्जा का सूत्र K.E. = ½ mv² है।
- स्थितिज ऊर्जा स्थिति या विन्यास के कारण होती है।
- गुरुत्वीय स्थितिज ऊर्जा का सूत्र P.E. = mgh है।
- गतिज ऊर्जा और स्थितिज ऊर्जा के योग को यांत्रिक ऊर्जा कहते हैं।
- ऊर्जा संरक्षण के नियम के अनुसार ऊर्जा केवल एक रूप से दूसरे रूप में बदलती है।
- शक्ति कार्य करने की दर है और इसका SI मात्रक वाट है।
- ऊर्जा का व्यावसायिक मात्रक किलोवाट-घंटा है।
16. परीक्षा की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण सूत्र
| भौतिक राशि | सूत्र | SI मात्रक |
|---|---|---|
| कार्य | W = F × s | जूल (J) |
| गतिज ऊर्जा | K.E. = ½ mv² | जूल (J) |
| स्थितिज ऊर्जा | P.E. = mgh | जूल (J) |
| यांत्रिक ऊर्जा | M.E. = K.E. + P.E. | जूल (J) |
| शक्ति | P = W/t | वाट (W) |
| ऊर्जा का व्यावसायिक मात्रक | 1 kWh = 3.6 × 10⁶ J | kWh |
अध्याय 11 : ध्वनि (Sound)
परिचय : ध्वनि हमारे दैनिक जीवन का एक महत्त्वपूर्ण भाग है। हम अपने आसपास अनेक प्रकार की ध्वनियाँ सुनते हैं, जैसे मनुष्य की आवाज, पक्षियों का चहचहाना, वाहनों का हॉर्न, घंटी की आवाज और संगीत। ध्वनि के माध्यम से हम एक-दूसरे से संवाद कर पाते हैं तथा अपने आसपास होने वाली घटनाओं की जानकारी प्राप्त करते हैं।
ध्वनि एक प्रकार की ऊर्जा है, जो कंपन करने वाली वस्तुओं से उत्पन्न होती है। इस अध्याय में हम ध्वनि का उत्पादन, संचरण, तरंगों के गुण, आवृत्ति, आयाम, तारत्व, प्रबलता, प्रतिध्वनि तथा पराश्रव्य ध्वनि का अध्ययन करेंगे।
1. ध्वनि का उत्पादन (Production of Sound)
ध्वनि कंपन करने वाली वस्तुओं से उत्पन्न होती है। जब कोई वस्तु अपनी माध्य स्थिति के इधर-उधर तेजी से गति करती है, तो उसकी इस गति को कंपन कहते हैं। कंपन करने वाली वस्तु अपने आसपास के माध्यम में विक्षोभ उत्पन्न करती है, जिससे ध्वनि तरंगें पैदा होती हैं।
ध्वनि उत्पन्न करने वाले कुछ उदाहरण :
- घंटी को बजाने पर उसकी धातु में कंपन होता है।
- सितार या गिटार के तार को छेड़ने पर तार कंपन करते हैं।
- ढोलक की झिल्ली पर चोट करने से झिल्ली में कंपन होता है।
- मनुष्य के बोलने पर स्वरयंत्र में स्थित स्वर-तंत्रियाँ कंपन करती हैं।
- बाँसुरी में हवा के कंपन से ध्वनि उत्पन्न होती है।
2. ध्वनि का संचरण (Propagation of Sound)
ध्वनि को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँचने के लिए किसी माध्यम की आवश्यकता होती है। ध्वनि ठोस, द्रव और गैस तीनों माध्यमों में संचरित हो सकती है। सामान्यतः ध्वनि निर्वात में संचरित नहीं हो सकती, क्योंकि वहाँ कंपन को आगे पहुँचाने के लिए कोई माध्यम उपस्थित नहीं होता।
ध्वनि के संचरण के लिए आवश्यक माध्यम :
- ठोस — जैसे लकड़ी, लोहे और दीवारों में।
- द्रव — जैसे पानी में।
- गैस — जैसे वायु में।
जब कोई वस्तु कंपन करती है, तो वह अपने पास की वायु के कणों को कंपन कराती है। ये कण अपने पास के कणों तक ऊर्जा पहुँचाते हैं। इस प्रकार ध्वनि एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँचती है। माध्यम के कण अपने स्थान से बहुत दूर नहीं जाते, बल्कि अपनी माध्य स्थिति के आसपास कंपन करते हैं।
3. ध्वनि तरंगें (Sound Waves)
ध्वनि का संचरण तरंगों के रूप में होता है। वायु में ध्वनि तरंगें अनुदैर्ध्य तरंगें होती हैं। अनुदैर्ध्य तरंगों में माध्यम के कणों का कंपन तरंग के संचरण की दिशा के समानांतर होता है।
अनुदैर्ध्य तरंगों के दो प्रमुख भाग
(क) संपीड़न (Compression)
जब माध्यम के कण एक-दूसरे के पास आ जाते हैं, तो उस क्षेत्र में दाब और घनत्व बढ़ जाता है। इस क्षेत्र को संपीड़न कहते हैं।
(ख) विरलन (Rarefaction)
जब माध्यम के कण एक-दूसरे से दूर हो जाते हैं, तो उस क्षेत्र में दाब और घनत्व कम हो जाता है। इस क्षेत्र को विरलन कहते हैं।
4. ध्वनि तरंगों के प्रमुख गुण
(क) आयाम (Amplitude)
कंपन करने वाले कण का अपनी माध्य स्थिति से अधिकतम विस्थापन आयाम कहलाता है। इसे सामान्यतः A से दर्शाते हैं। आयाम का SI मात्रक मीटर है। ध्वनि का आयाम अधिक होने पर सामान्यतः ध्वनि अधिक प्रबल सुनाई देती है।
(ख) आवर्तकाल (Time Period)
किसी माध्यम के कण द्वारा एक पूरा कंपन करने में लगे समय को आवर्तकाल कहते हैं। इसे T से दर्शाते हैं। इसका SI मात्रक सेकंड है।
(ग) आवृत्ति (Frequency)
एक सेकंड में होने वाले पूर्ण कंपनों की संख्या को आवृत्ति कहते हैं। इसे f या ν से दर्शाते हैं।
f = 1/T
आवृत्ति का SI मात्रक हर्ट्ज (Hz) है। यदि कोई वस्तु एक सेकंड में 100 कंपन करती है, तो उसकी आवृत्ति 100 हर्ट्ज होगी।
(घ) तरंगदैर्ध्य (Wavelength)
दो क्रमागत संपीड़नों या दो क्रमागत विरलनों के बीच की दूरी को तरंगदैर्ध्य कहते हैं। इसे λ (लैम्ब्डा) से दर्शाते हैं। इसका SI मात्रक मीटर है।
(ङ) तरंग वेग (Wave Speed)
ध्वनि तरंग द्वारा एक सेकंड में तय की गई दूरी को तरंग वेग कहते हैं।
v = fλ
जहाँ v = तरंग वेग, f = आवृत्ति तथा λ = तरंगदैर्ध्य है।
| राशि | प्रतीक | SI मात्रक |
|---|---|---|
| आयाम | A | मीटर (m) |
| आवर्तकाल | T | सेकंड (s) |
| आवृत्ति | f | हर्ट्ज (Hz) |
| तरंगदैर्ध्य | λ | मीटर (m) |
| तरंग वेग | v | मीटर/सेकंड (m/s) |
5. ध्वनि की चाल (Speed of Sound)
ध्वनि की चाल वह दूरी है, जिसे ध्वनि तरंग एक सेकंड में तय करती है। ध्वनि की चाल माध्यम के प्रकार और उसकी अवस्था पर निर्भर करती है। सामान्यतः ध्वनि ठोसों में सबसे तेज, द्रवों में उससे कम तथा गैसों में अपेक्षाकृत धीमी गति से चलती है।
वायु में 20°C तापमान पर ध्वनि की चाल लगभग 343 मीटर प्रति सेकंड होती है। तापमान बढ़ने पर वायु में ध्वनि की चाल सामान्यतः बढ़ती है।
6. ध्वनि का तारत्व (Pitch)
ध्वनि का वह गुण जिसके कारण हम किसी ध्वनि को तीखी या भारी पहचानते हैं, तारत्व कहलाता है। तारत्व ध्वनि की आवृत्ति पर निर्भर करता है।
- अधिक आवृत्ति वाली ध्वनि का तारत्व अधिक होता है।
- कम आवृत्ति वाली ध्वनि का तारत्व कम होता है।
- बच्चों की आवाज सामान्यतः वयस्क पुरुषों की आवाज की तुलना में अधिक तारत्व वाली होती है।
7. ध्वनि की प्रबलता (Loudness)
ध्वनि का वह गुण जिसके कारण कोई ध्वनि तेज या धीमी सुनाई देती है, प्रबलता कहलाता है। ध्वनि की प्रबलता मुख्यतः उसके आयाम पर निर्भर करती है। अधिक आयाम वाली ध्वनि सामान्यतः अधिक तेज सुनाई देती है।
ध्वनि की प्रबलता का अनुभव सुनने वाले व्यक्ति, दूरी तथा वातावरण पर भी निर्भर कर सकता है। ध्वनि स्तर को सामान्यतः डेसीबल (dB) में व्यक्त किया जाता है।
8. ध्वनि का परावर्तन (Reflection of Sound)
जब ध्वनि तरंगें किसी कठोर सतह से टकराकर वापस लौटती हैं, तो इस घटना को ध्वनि का परावर्तन कहते हैं। ध्वनि का परावर्तन दीवारों, पहाड़ों, बड़ी इमारतों और अन्य कठोर सतहों से हो सकता है।
ध्वनि के परावर्तन के नियम प्रकाश के परावर्तन के नियमों के समान होते हैं :
- आपतित ध्वनि तरंग, परावर्तित ध्वनि तरंग और अभिलंब एक ही तल में होते हैं।
- आपतन कोण और परावर्तन कोण बराबर होते हैं।
9. प्रतिध्वनि (Echo)
जब किसी ध्वनि का परावर्तन होकर वह कुछ समय बाद दोबारा सुनाई देती है, तो उसे प्रतिध्वनि कहते हैं। पहाड़ों, कुओं और बड़ी खाली इमारतों में प्रतिध्वनि का अनुभव किया जा सकता है।
मानव कान में ध्वनि का प्रभाव लगभग 0.1 सेकंड तक बना रहता है। इसलिए मूल ध्वनि और परावर्तित ध्वनि के बीच कम-से-कम 0.1 सेकंड का समयांतर होना चाहिए, ताकि दोनों ध्वनियाँ अलग-अलग सुनाई दे सकें।
यदि वायु में ध्वनि की चाल लगभग 344 m/s मानी जाए, तो प्रतिध्वनि सुनने के लिए परावर्तक सतह की न्यूनतम दूरी लगभग 17.2 मीटर होनी चाहिए।
d = (v × t) / 2
यहाँ 2 से भाग इसलिए दिया जाता है क्योंकि ध्वनि परावर्तक सतह तक जाकर वापस आती है और कुल दूरी दो गुनी होती है।
10. अनुरणन (Reverberation)
किसी बड़े बंद स्थान में ध्वनि के बार-बार परावर्तन के कारण ध्वनि का कुछ समय तक बने रहना अनुरणन कहलाता है। बड़े हॉल, सभागार और कमरे में ध्वनि की तरंगें दीवारों, छत और फर्श से परावर्तित होती रहती हैं।
यदि अनुरणन बहुत अधिक हो, तो बोली गई आवाज स्पष्ट रूप से सुनाई नहीं देती। इसे कम करने के लिए सभागारों में ध्वनि अवशोषित करने वाली सामग्री का उपयोग किया जाता है।
अनुरणन कम करने के उपाय :
- दीवारों और छत पर ध्वनि अवशोषक पदार्थ लगाना।
- मोटे पर्दों का उपयोग करना।
- फर्श पर कालीन बिछाना।
- कुर्सियों और अन्य ध्वनि अवशोषित करने वाली वस्तुओं का उपयोग करना।
11. ध्वनि के उपयोग (Uses of Sound)
- मनुष्य ध्वनि के माध्यम से बातचीत और संचार करता है।
- संगीत और मनोरंजन में ध्वनि का उपयोग होता है।
- चिकित्सा में अल्ट्रासाउंड का उपयोग शरीर के आंतरिक अंगों की जाँच के लिए किया जाता है।
- SONAR का उपयोग समुद्र की गहराई और पानी के भीतर स्थित वस्तुओं की दूरी ज्ञात करने में किया जाता है।
- ध्वनि संकेतों का उपयोग चेतावनी और सुरक्षा व्यवस्था में किया जाता है।
12. मानव कान की संरचना एवं कार्य (Human Ear)
मानव कान ध्वनि को सुनने वाला अंग है। यह ध्वनि तरंगों को ग्रहण करके उन्हें ऐसे संकेतों में बदलने में सहायता करता है, जिन्हें मस्तिष्क समझ सकता है। कान के तीन प्रमुख भाग होते हैं :
(क) बाह्य कर्ण (Outer Ear)
बाह्य कर्ण ध्वनि तरंगों को एकत्र करता है और उन्हें कर्ण नलिका के माध्यम से कान के पर्दे तक पहुँचाता है।
(ख) मध्य कर्ण (Middle Ear)
मध्य कर्ण में तीन छोटी अस्थियाँ होती हैं, जिन्हें हथौड़ी, निहाई और रकाब कहते हैं। ये अस्थियाँ कान के पर्दे के कंपन को बढ़ाकर आंतरिक कर्ण तक पहुँचाती हैं।
(ग) आंतरिक कर्ण (Inner Ear)
आंतरिक कर्ण में कर्णावर्त (Cochlea) नामक संरचना होती है। यह कंपन को तंत्रिका संकेतों में बदलने में सहायता करती है। श्रवण तंत्रिका इन संकेतों को मस्तिष्क तक पहुँचाती है।
13. श्रव्यता की सीमा (Range of Hearing)
मनुष्य का सामान्य कान लगभग 20 Hz से 20,000 Hz तक की आवृत्ति वाली ध्वनियाँ सुन सकता है। इस सीमा को मानव श्रव्यता की सीमा कहते हैं।
| ध्वनि का प्रकार | आवृत्ति सीमा | विशेषता |
|---|---|---|
| अवश्रव्य ध्वनि (Infrasonic) | 20 Hz से कम | मनुष्य सामान्यतः नहीं सुन सकता। |
| श्रव्य ध्वनि (Audible) | 20 Hz से 20,000 Hz | मनुष्य सामान्यतः सुन सकता है। |
| पराश्रव्य ध्वनि (Ultrasonic) | 20,000 Hz से अधिक | मनुष्य सामान्यतः नहीं सुन सकता। |
14. पराश्रव्य ध्वनि (Ultrasound)
20,000 हर्ट्ज से अधिक आवृत्ति वाली ध्वनि तरंगों को पराश्रव्य ध्वनि कहते हैं। मनुष्य इन्हें सामान्य रूप से नहीं सुन सकता, लेकिन कुछ जीव जैसे चमगादड़ और डॉल्फिन इनका उपयोग दिशा और दूरी का पता लगाने में करते हैं।
पराश्रव्य ध्वनि के प्रमुख उपयोग :
- अल्ट्रासाउंड द्वारा गर्भस्थ शिशु और शरीर के आंतरिक अंगों की जाँच।
- धातु के ब्लॉकों में आंतरिक दरारों का पता लगाना।
- मशीनों के छोटे और कठिन भागों की सफाई।
- SONAR द्वारा पानी के भीतर वस्तुओं की दूरी और समुद्र की गहराई मापना।
15. SONAR क्या है? (Sound Navigation and Ranging)
SONAR एक ऐसी तकनीक है जिसमें पराश्रव्य ध्वनि तरंगों का उपयोग करके पानी के भीतर स्थित वस्तुओं की दूरी, दिशा और समुद्र की गहराई ज्ञात की जाती है।
SONAR में ध्वनि तरंगें पानी में भेजी जाती हैं। ये तरंगें किसी वस्तु से टकराकर वापस लौटती हैं। लौटने में लगे समय और पानी में ध्वनि की चाल की सहायता से वस्तु की दूरी ज्ञात की जाती है।
d = vt/2
यहाँ समय ध्वनि तरंग के जाने और वापस आने में लगा कुल समय है।
16. ध्वनि प्रदूषण (Noise Pollution)
जब वातावरण में अवांछित और अत्यधिक तेज ध्वनियाँ उत्पन्न होती हैं, तो इसे ध्वनि प्रदूषण कहते हैं। वाहनों के हॉर्न, लाउडस्पीकर, मशीनें, निर्माण कार्य और पटाखे ध्वनि प्रदूषण के प्रमुख स्रोत हैं।
ध्वनि प्रदूषण के दुष्प्रभाव :
- नींद में बाधा उत्पन्न होना।
- तनाव और चिड़चिड़ापन बढ़ना।
- एकाग्रता और कार्यक्षमता में कमी आना।
- लंबे समय तक तेज ध्वनि के संपर्क में रहने से सुनने की क्षमता प्रभावित होना।
ध्वनि प्रदूषण रोकने के उपाय :
- अनावश्यक रूप से हॉर्न न बजाएँ।
- लाउडस्पीकर की आवाज नियंत्रित रखें।
- वाहनों और मशीनों का नियमित रखरखाव करें।
- आवासीय क्षेत्रों में तेज ध्वनि वाले उपकरणों का उपयोग सीमित रखें।
- सड़कों और भवनों के आसपास पेड़-पौधे लगाएँ।
17. हल किए गए संख्यात्मक प्रश्न (Solved Numericals)
एक सेकंड में कंपन = 100
आवृत्ति = एक सेकंड में पूर्ण कंपनों की संख्या
f = 100 Hz
उत्तर : 100 हर्ट्ज
दिया गया है : f = 500 Hz, λ = 0.68 m
सूत्र : v = fλ
v = 500 × 0.68
उत्तर : v = 340 m/s
f = 200 Hz
सूत्र : T = 1/f
T = 1/200
उत्तर : T = 0.005 सेकंड
ध्वनि की चाल v = 340 m/s
कुल समय t = 2 s
सूत्र : d = vt/2
d = (340 × 2)/2
उत्तर : पहाड़ की दूरी = 340 मीटर
T = 0.02 s
सूत्र : f = 1/T
f = 1/0.02
उत्तर : f = 50 Hz
18. महत्त्वपूर्ण प्रश्न एवं उत्तर (Important Questions and Answers)
विरलन : वह क्षेत्र जहाँ माध्यम के कण दूर-दूर होते हैं तथा दाब और घनत्व कम होता है।
19. बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQs)
1. ध्वनि किससे उत्पन्न होती है?
- प्रकाश से
- कंपन से
- छाया से
- चुंबक से
2. ध्वनि के संचरण के लिए क्या आवश्यक है?
- निर्वात
- माध्यम
- केवल प्रकाश
- केवल ऊष्मा
3. वायु में ध्वनि तरंगें किस प्रकार की होती हैं?
- अनुप्रस्थ
- अनुदैर्ध्य
- विद्युत चुंबकीय
- स्थिर
4. आवृत्ति का SI मात्रक क्या है?
- मीटर
- सेकंड
- हर्ट्ज
- न्यूटन
5. आवृत्ति और आवर्तकाल में क्या संबंध है?
- f = T
- f = 1/T
- f = T²
- f = 2T
6. ध्वनि तरंग का वेग किसके बराबर होता है?
- f/λ
- f × λ
- λ/T²
- T × λ
7. मनुष्य की सामान्य श्रव्यता सीमा है :
- 2 Hz से 200 Hz
- 20 Hz से 20,000 Hz
- 200 Hz से 2,000 Hz
- 20,000 Hz से 40,000 Hz
8. 20,000 Hz से अधिक आवृत्ति वाली ध्वनि कहलाती है :
- अवश्रव्य
- श्रव्य
- पराश्रव्य
- सामान्य ध्वनि
9. ध्वनि का तारत्व किस पर निर्भर करता है?
- आवृत्ति
- दूरी
- रंग
- द्रव्यमान
10. ध्वनि की प्रबलता मुख्यतः किस पर निर्भर करती है?
- आयाम
- तरंगदैर्ध्य
- माध्यम का रंग
- वस्तु के आकार पर ही
11. ध्वनि का परावर्तन किसके समान नियमों का पालन करता है?
- गुरुत्वाकर्षण
- प्रकाश का परावर्तन
- विद्युत धारा
- ऊष्मा संचरण
12. प्रतिध्वनि सुनने के लिए मूल ध्वनि और परावर्तित ध्वनि के बीच न्यूनतम समयांतर लगभग कितना होना चाहिए?
- 0.01 सेकंड
- 0.1 सेकंड
- 1 सेकंड
- 10 सेकंड
13. SONAR में सामान्यतः किस प्रकार की ध्वनि तरंगों का उपयोग किया जाता है?
- अवश्रव्य
- पराश्रव्य
- केवल श्रव्य
- प्रकाश तरंगें
14. ध्वनि प्रदूषण का एक प्रमुख स्रोत कौन-सा है?
- पेड़-पौधे
- वाहनों के अनावश्यक हॉर्न
- शांत वातावरण
- पुस्तकें
20. अभ्यास प्रश्न (Practice Questions)
- ध्वनि किससे उत्पन्न होती है?
- ध्वनि के संचरण के लिए किसकी आवश्यकता होती है?
- आवृत्ति का SI मात्रक लिखिए।
- तरंगदैर्ध्य किसे कहते हैं?
- आवर्तकाल का SI मात्रक क्या है?
- मानव श्रव्यता की सामान्य सीमा लिखिए।
- पराश्रव्य ध्वनि किसे कहते हैं?
- SONAR का पूरा नाम लिखिए।
- ध्वनि का उत्पादन कैसे होता है? उदाहरण सहित समझाइए।
- संपीड़न और विरलन में अंतर स्पष्ट कीजिए।
- आवृत्ति और आवर्तकाल में संबंध लिखिए।
- तारत्व और प्रबलता में अंतर बताइए।
- प्रतिध्वनि किसे कहते हैं? इसके लिए आवश्यक शर्त लिखिए।
- अनुरणन क्या है? इसे कम करने के दो उपाय लिखिए।
- पराश्रव्य ध्वनि के चार उपयोग लिखिए।
- ध्वनि प्रदूषण के दुष्प्रभाव और रोकथाम के उपाय लिखिए।
- अनुदैर्ध्य ध्वनि तरंगों में संपीड़न और विरलन को चित्र सहित समझाइए।
- ध्वनि तरंगों के आयाम, आवृत्ति, आवर्तकाल और तरंगदैर्ध्य को समझाइए।
- मानव कान की संरचना तथा ध्वनि सुनने की प्रक्रिया का वर्णन कीजिए।
- प्रतिध्वनि और अनुरणन में अंतर स्पष्ट कीजिए।
- SONAR का सिद्धांत और उपयोग समझाइए।
- एक वस्तु एक सेकंड में 250 कंपन करती है। उसकी आवृत्ति ज्ञात कीजिए।
- किसी ध्वनि तरंग की आवृत्ति 400 Hz तथा तरंगदैर्ध्य 0.85 m है। उसकी चाल ज्ञात कीजिए।
- किसी तरंग का आवर्तकाल 0.005 सेकंड है। उसकी आवृत्ति ज्ञात कीजिए।
- एक व्यक्ति 1.5 सेकंड बाद प्रतिध्वनि सुनता है। यदि ध्वनि की चाल 340 m/s है, तो परावर्तक सतह की दूरी ज्ञात कीजिए।
- एक ध्वनि तरंग की चाल 330 m/s और आवृत्ति 110 Hz है। उसका तरंगदैर्ध्य ज्ञात कीजिए।
21. गतिविधियाँ एवं प्रयोग (Activities)
गतिविधि 1 : कंपन से ध्वनि का उत्पादन
एक रबर बैंड को दोनों ओर से खींचकर हल्के से छोड़ें। रबर बैंड में होने वाले कंपन को देखें और उससे उत्पन्न ध्वनि सुनें।
निष्कर्ष : कंपन करने वाली वस्तु ध्वनि उत्पन्न करती है।
गतिविधि 2 : ध्वनि के संचरण का अध्ययन
एक मेज के एक सिरे पर हल्के से खटखटाएँ और दूसरे सिरे पर कान लगाकर ध्वनि सुनें। फिर उसी स्थान पर हवा के माध्यम से आने वाली ध्वनि से तुलना करें।
निष्कर्ष : ध्वनि ठोस माध्यम में भी संचरित हो सकती है।
गतिविधि 3 : रबर बैंड से तारत्व का अनुभव
अलग-अलग तनाव पर खींचे गए रबर बैंड को हल्के से छेड़ें। उनसे उत्पन्न ध्वनियों की तुलना करें।
निष्कर्ष : कंपन की आवृत्ति में परिवर्तन होने पर ध्वनि का तारत्व बदलता है।
गतिविधि 4 : प्रतिध्वनि का अनुभव
किसी सुरक्षित खुले स्थान में दूर स्थित बड़ी दीवार या पहाड़ी की दिशा में आवाज लगाएँ। यदि ध्वनि पर्याप्त समयांतर के बाद वापस सुनाई दे, तो यह प्रतिध्वनि का उदाहरण है।
निष्कर्ष : ध्वनि कठोर सतहों से परावर्तित होकर वापस लौट सकती है।
22. अध्याय का सारांश (Chapter Summary)
- ध्वनि कंपन करने वाली वस्तुओं से उत्पन्न होती है।
- ध्वनि के संचरण के लिए ठोस, द्रव या गैस जैसे माध्यम की आवश्यकता होती है।
- ध्वनि निर्वात में संचरित नहीं हो सकती।
- वायु में ध्वनि तरंगें अनुदैर्ध्य होती हैं।
- अनुदैर्ध्य तरंगों में संपीड़न और विरलन बनते हैं।
- एक सेकंड में होने वाले पूर्ण कंपनों की संख्या आवृत्ति कहलाती है।
- आवृत्ति का SI मात्रक हर्ट्ज है।
- आवर्तकाल और आवृत्ति में व्युत्क्रम संबंध होता है।
- तरंग वेग = आवृत्ति × तरंगदैर्ध्य।
- ध्वनि का तारत्व उसकी आवृत्ति पर निर्भर करता है।
- ध्वनि की प्रबलता मुख्यतः उसके आयाम पर निर्भर करती है।
- ध्वनि का कठोर सतहों से टकराकर लौटना परावर्तन कहलाता है।
- परावर्तित ध्वनि के अलग से सुनाई देने को प्रतिध्वनि कहते हैं।
- बार-बार परावर्तन से ध्वनि का कुछ समय तक बने रहना अनुरणन कहलाता है।
- मनुष्य सामान्यतः 20 Hz से 20,000 Hz तक की ध्वनि सुन सकता है।
- 20,000 Hz से अधिक आवृत्ति वाली ध्वनि पराश्रव्य कहलाती है।
- SONAR में पराश्रव्य तरंगों का उपयोग किया जाता है।
- अवांछित और अत्यधिक तेज ध्वनि ध्वनि प्रदूषण उत्पन्न करती है।
23. परीक्षा की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण सूत्र
| भौतिक राशि | सूत्र | SI मात्रक |
|---|---|---|
| आवृत्ति | f = 1/T | हर्ट्ज (Hz) |
| आवर्तकाल | T = 1/f | सेकंड (s) |
| तरंग वेग | v = fλ | मीटर/सेकंड (m/s) |
| तरंगदैर्ध्य | λ = v/f | मीटर (m) |
| प्रतिध्वनि की दूरी | d = vt/2 | मीटर (m) |
| SONAR द्वारा दूरी | d = vt/2 | मीटर (m) |
अध्याय 12 : खाद्य संसाधनों में सुधार (Improvement in Food Resources)
परिचय : भोजन मनुष्य की मूलभूत आवश्यकताओं में से एक है। बढ़ती जनसंख्या के कारण खाद्यान्न, दूध, फल, सब्जियों, अंडों, मांस और मछली की माँग लगातार बढ़ रही है। सीमित कृषि भूमि और प्राकृतिक संसाधनों के बावजूद सभी लोगों को पर्याप्त तथा पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराना एक महत्त्वपूर्ण चुनौती है।
खाद्य उत्पादन बढ़ाने के लिए फसलों की अच्छी किस्में विकसित करना, मिट्टी की उर्वरता बनाए रखना, सिंचाई और पोषक तत्त्वों का उचित प्रबंधन करना तथा पशुपालन की वैज्ञानिक विधियाँ अपनाना आवश्यक है। इन सभी उपायों को खाद्य संसाधनों में सुधार कहा जाता है।
1. खाद्य संसाधनों में सुधार की आवश्यकता
भारत में कृषि और पशुपालन भोजन प्राप्त करने के प्रमुख साधन हैं। जनसंख्या में वृद्धि के कारण खाद्य पदार्थों की माँग भी बढ़ती है। इसलिए कृषि उत्पादन और पशुधन से प्राप्त उत्पादों की मात्रा तथा गुणवत्ता में सुधार करना आवश्यक है।
खाद्य संसाधनों में सुधार के प्रमुख उद्देश्य :
- अधिक मात्रा में खाद्यान्न उत्पादन करना।
- फसलों की गुणवत्ता और पोषण स्तर में सुधार करना।
- रोगों और कीटों से फसलों की सुरक्षा करना।
- कम भूमि और उपलब्ध जल संसाधनों का उचित उपयोग करना।
- पशुओं से दूध, अंडे और मांस का उत्पादन बढ़ाना।
- कृषि उत्पादन को प्राकृतिक आपदाओं और प्रतिकूल परिस्थितियों से सुरक्षित रखना।
2. फसल उत्पादन प्रबंधन (Crop Production Management)
फसल उत्पादन को बढ़ाने के लिए खेती की विभिन्न प्रक्रियाओं का वैज्ञानिक तरीके से प्रबंधन करना आवश्यक है। इसमें मिट्टी की तैयारी, बीज का चयन, पोषक तत्त्वों की आपूर्ति, सिंचाई तथा फसल सुरक्षा शामिल हैं।
2.1 फसल की किस्मों में सुधार (Crop Variety Improvement)
फसल की किस्मों में सुधार का अर्थ ऐसी नई किस्में विकसित करना है, जिनसे अधिक उत्पादन प्राप्त हो और जो विभिन्न पर्यावरणीय परिस्थितियों में अच्छी तरह विकसित हो सकें। इसके लिए पौधों के वांछित गुणों का चयन और संकरण जैसी विधियों का उपयोग किया जाता है।
फसल की किस्मों में सुधार के प्रमुख उद्देश्य :
- अधिक उपज : प्रति इकाई क्षेत्र में अधिक खाद्यान्न प्राप्त करना।
- बेहतर गुणवत्ता : अनाज में प्रोटीन, तेल, विटामिन और अन्य पोषक तत्त्वों की मात्रा में सुधार करना।
- रोग प्रतिरोधक क्षमता : फसलों को रोगों और कीटों से बचाने की क्षमता विकसित करना।
- सूखा सहनशीलता : कम पानी की स्थिति में भी फसल का विकास बनाए रखना।
- लवणता सहनशीलता : अधिक लवण वाली मिट्टी में भी फसल की वृद्धि की क्षमता विकसित करना।
- परिपक्वता अवधि : कम समय में फसल तैयार करने वाली किस्मों का विकास करना।
- व्यापक अनुकूलन : विभिन्न जलवायु और मिट्टी की परिस्थितियों में उगाई जा सकने वाली किस्में विकसित करना।
2.2 फसल किस्मों में सुधार की विधियाँ
(क) चयन (Selection)
इस विधि में किसी फसल के पौधों में से अच्छे गुणों वाले पौधों का चयन करके उनके बीजों का उपयोग अगली पीढ़ी के लिए किया जाता है। चयन द्वारा बेहतर उपज, गुणवत्ता और अन्य वांछित गुणों वाली किस्में प्राप्त की जा सकती हैं।
(ख) संकरण (Hybridisation)
दो आनुवंशिक रूप से भिन्न पौधों के बीच संकरण कराकर नई संतति प्राप्त करने की प्रक्रिया संकरण कहलाती है। इसका उद्देश्य दोनों पौधों के उपयोगी गुणों को एक ही नई किस्म में लाना होता है।
संकरण निम्न प्रकार का हो सकता है :
- अंतराकिस्मीय संकरण : एक ही प्रजाति की अलग-अलग किस्मों के बीच संकरण।
- अंतरास्पीशीज संकरण : एक ही वंश की अलग-अलग प्रजातियों के बीच संकरण।
- अंतरावंशीय संकरण : अलग-अलग वंशों के पौधों के बीच संकरण।
(ग) आनुवंशिक अभियांत्रिकी (Genetic Engineering)
इस विधि में जीव के आनुवंशिक पदार्थ में परिवर्तन करके वांछित गुण प्राप्त करने का प्रयास किया जाता है। इसके माध्यम से फसलों में रोग प्रतिरोधक क्षमता, कीट प्रतिरोधकता या अन्य उपयोगी गुण विकसित किए जा सकते हैं।
3. फसल उत्पादन के प्रमुख मौसम
भारत में फसलों को मुख्यतः दो प्रमुख कृषि मौसमों में उगाया जाता है। ये मौसम जलवायु, तापमान और वर्षा की परिस्थितियों पर आधारित होते हैं।
| आधार | खरीफ फसलें | रबी फसलें |
|---|---|---|
| बुवाई का समय | वर्षा ऋतु के प्रारंभ में | शीत ऋतु के प्रारंभ में |
| कटाई का समय | वर्षा ऋतु के बाद | वसंत ऋतु में |
| मुख्य उदाहरण | धान, मक्का, सोयाबीन, कपास, मूँगफली | गेहूँ, चना, मटर, सरसों, अलसी |
| जलवायु | सामान्यतः गर्म और आर्द्र | सामान्यतः ठंडी और अपेक्षाकृत शुष्क |
4. फसल उत्पादन में पोषक तत्त्वों का प्रबंधन (Crop Production Management)
पौधों को वृद्धि, विकास और भोजन निर्माण के लिए विभिन्न पोषक तत्त्वों की आवश्यकता होती है। ये पोषक तत्त्व पौधों को मिट्टी, वायु और जल से प्राप्त होते हैं। पोषक तत्त्वों की उचित मात्रा उपलब्ध कराने से फसल की वृद्धि और उत्पादन में सुधार होता है।
4.1 पौधों के आवश्यक पोषक तत्त्व
पौधों के लिए आवश्यक पोषक तत्त्वों को मुख्यतः दो वर्गों में बाँटा जाता है :
(क) वृहत् पोषक तत्त्व (Macronutrients)
वे पोषक तत्त्व जिनकी पौधों को अपेक्षाकृत अधिक मात्रा में आवश्यकता होती है, वृहत् पोषक तत्त्व कहलाते हैं।
उदाहरण : नाइट्रोजन, फॉस्फोरस, पोटैशियम, कैल्शियम, मैग्नीशियम और सल्फर।
(ख) सूक्ष्म पोषक तत्त्व (Micronutrients)
वे पोषक तत्त्व जिनकी पौधों को बहुत कम मात्रा में आवश्यकता होती है, सूक्ष्म पोषक तत्त्व कहलाते हैं।
उदाहरण : लोहा, मैंगनीज, बोरॉन, जिंक, कॉपर, मॉलिब्डेनम और क्लोरीन।
4.2 पोषक तत्त्वों के स्रोत
पौधों को पोषक तत्त्व उपलब्ध कराने के लिए मुख्यतः खाद और उर्वरकों का उपयोग किया जाता है।
खाद (Manure)
पौधों और पशुओं के अपशिष्ट पदार्थों के अपघटन से प्राप्त जैविक पदार्थ को खाद कहते हैं। खाद मिट्टी में ह्यूमस और पोषक तत्त्वों की मात्रा बढ़ाती है तथा मिट्टी की संरचना में सुधार करती है।
खाद के प्रमुख प्रकार :
- कम्पोस्ट खाद : पौधों के अवशेष, घरेलू जैविक कचरे और अन्य अपघटनीय पदार्थों के सड़ने से बनती है।
- वर्मी कम्पोस्ट : केंचुओं की सहायता से जैविक पदार्थों के अपघटन द्वारा तैयार की जाती है।
- हरी खाद : कुछ हरी फसलों को खेत में उगाकर मिट्टी में मिला दिया जाता है, जिससे मिट्टी की उर्वरता बढ़ती है।
उर्वरक (Fertilisers)
वे रासायनिक पदार्थ जो पौधों को आवश्यक पोषक तत्त्व उपलब्ध कराने के लिए खेतों में डाले जाते हैं, उर्वरक कहलाते हैं। इनमें सामान्यतः नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और पोटैशियम जैसे पोषक तत्त्व पाए जाते हैं।
उर्वरकों के उदाहरण : यूरिया, अमोनियम सल्फेट, सुपर फॉस्फेट और पोटाश उर्वरक।
| आधार | खाद | उर्वरक |
|---|---|---|
| स्रोत | जैविक पदार्थों से बनती है। | सामान्यतः औद्योगिक रूप से तैयार रासायनिक पदार्थ। |
| पोषक तत्त्व | पोषक तत्त्व अपेक्षाकृत कम और विविध मात्रा में होते हैं। | विशिष्ट पोषक तत्त्व अधिक सघन मात्रा में होते हैं। |
| मिट्टी पर प्रभाव | ह्यूमस और मिट्टी की संरचना में सुधार करती है। | पोषक तत्त्व शीघ्र उपलब्ध करा सकती है। |
| उपयोग | मिट्टी की दीर्घकालीन उर्वरता बनाए रखने में सहायक। | फसल की पोषक आवश्यकता पूरी करने में सहायक। |
5. सिंचाई (Irrigation)
फसलों को उचित समय पर आवश्यक मात्रा में पानी उपलब्ध कराने की प्रक्रिया सिंचाई कहलाती है। पौधों को अंकुरण, वृद्धि, फूल आने और फल बनने जैसी अवस्थाओं में पानी की आवश्यकता होती है।
भारत में सिंचाई के प्रमुख स्रोत निम्नलिखित हैं :
- कुएँ और नलकूप।
- नहरें।
- तालाब और झीलें।
- नदियाँ और बाँध।
- वर्षा जल का संग्रहण।
5.1 सिंचाई की आधुनिक विधियाँ
(क) छिड़काव प्रणाली (Sprinkler System)
इस विधि में पानी को पाइपों और घूमने वाले नोजल की सहायता से वर्षा की तरह खेत में छिड़का जाता है। यह विधि असमतल भूमि तथा कम पानी उपलब्ध होने की स्थिति में उपयोगी हो सकती है।
(ख) ड्रिप प्रणाली (Drip System)
इस विधि में पानी पाइपों और विशेष उपकरणों के माध्यम से पौधों की जड़ों के पास बूंद-बूंद करके पहुँचाया जाता है। इससे पानी की बचत होती है और जल सीधे पौधों के जड़ क्षेत्र में पहुँचता है।
6. फसल प्रतिरूप (Cropping Patterns)
एक खेत में एक वर्ष के दौरान फसलें किस क्रम और तरीके से उगाई जाती हैं, इसे फसल प्रतिरूप कहते हैं। उचित फसल प्रतिरूप अपनाने से भूमि, पानी और पोषक तत्त्वों का बेहतर उपयोग किया जा सकता है।
6.1 मिश्रित फसल (Mixed Cropping)
एक ही खेत में एक साथ दो या दो से अधिक फसलें उगाने की विधि मिश्रित फसल कहलाती है। इसमें फसलों के बीजों को मिलाकर बोया जाता है।
उदाहरण : गेहूँ और चना, गेहूँ और सरसों।
लाभ :
- फसल खराब होने का जोखिम कम हो सकता है।
- किसान को एक से अधिक फसलों से उत्पादन प्राप्त होता है।
- प्रतिकूल मौसम की स्थिति में पूरी फसल नष्ट होने की आशंका कम हो सकती है।
6.2 अंतराफसलीकरण (Intercropping)
दो या दो से अधिक फसलों को एक ही खेत में निश्चित पंक्तियों के क्रम में उगाने की विधि अंतराफसलीकरण कहलाती है। इसमें प्रत्येक फसल की पंक्तियाँ अलग-अलग व्यवस्थित की जाती हैं।
उदाहरण : सोयाबीन और मक्का, बाजरा और लोबिया।
लाभ :
- फसलों के बीच पोषक तत्त्वों के लिए प्रतिस्पर्धा कम की जा सकती है।
- खेत में उपलब्ध संसाधनों का बेहतर उपयोग होता है।
- फसल रोग और कीटों के फैलाव को नियंत्रित करने में सहायता मिल सकती है।
- एक ही खेत से एक से अधिक फसलों का उत्पादन प्राप्त होता है।
6.3 फसल चक्र (Crop Rotation)
एक ही खेत में निश्चित क्रम से अलग-अलग मौसमों में अलग-अलग फसलें उगाने की विधि फसल चक्र कहलाती है। इसमें फसलों का चयन मिट्टी के पोषक तत्त्वों की आवश्यकता के अनुसार किया जाता है।
उदाहरण : एक मौसम में गेहूँ और अगले मौसम में दलहनी फसल उगाना।
लाभ :
- मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने में सहायता मिलती है।
- दलहनी फसलें वायुमंडलीय नाइट्रोजन के स्थिरीकरण में सहायता करती हैं।
- खरपतवार, रोग और कीटों के चक्र को तोड़ने में मदद मिल सकती है।
- मिट्टी के पोषक तत्त्वों का संतुलित उपयोग होता है।
| फसल प्रतिरूप | मुख्य विशेषता | उदाहरण |
|---|---|---|
| मिश्रित फसल | दो या अधिक फसलें एक साथ, बिना निश्चित पंक्ति व्यवस्था के। | गेहूँ + चना |
| अंतराफसलीकरण | दो या अधिक फसलें निश्चित पंक्तियों में उगाई जाती हैं। | सोयाबीन + मक्का |
| फसल चक्र | अलग-अलग मौसमों में निश्चित क्रम से फसलें उगाई जाती हैं। | गेहूँ के बाद दलहन |
7. फसल सुरक्षा प्रबंधन (Crop Protection Management)
फसल के विकास के दौरान अनेक प्रकार के खरपतवार, कीट और रोग फसल को नुकसान पहुँचा सकते हैं। इनसे फसल की उपज और गुणवत्ता कम हो जाती है। फसल को इन हानिकारक कारकों से बचाने की प्रक्रिया फसल सुरक्षा प्रबंधन कहलाती है।
7.1 खरपतवार (Weeds)
फसल के साथ खेत में अपने आप उगने वाले अवांछित पौधों को खरपतवार कहते हैं। ये फसल के साथ पानी, प्रकाश, स्थान और पोषक तत्त्वों के लिए प्रतिस्पर्धा करते हैं।
खरपतवार के उदाहरण : दूब घास, मोथा और बथुआ।
खरपतवार नियंत्रण की विधियाँ :
- खेत की निराई-गुड़ाई करना।
- हाथ या कृषि उपकरणों से खरपतवार निकालना।
- आवश्यकता के अनुसार खरपतवारनाशी रसायनों का उपयोग करना।
- समय पर खेत की तैयारी और फसल प्रबंधन करना।
7.2 फसल के कीट (Insect Pests)
कुछ कीट पौधों के विभिन्न भागों को नुकसान पहुँचाते हैं। कुछ कीट पत्तियों को खाते हैं, कुछ तनों और जड़ों में छेद करते हैं तथा कुछ पौधों का रस चूसते हैं।
कीटों द्वारा होने वाली हानि :
- पत्तियों को खाकर पौधों की वृद्धि प्रभावित करना।
- तने और फलों में छेद करना।
- पौधों का रस चूसकर उन्हें कमजोर करना।
- कुछ कीटों द्वारा रोगों का प्रसार करना।
7.3 फसल रोग (Plant Diseases)
फसलों में रोग मुख्यतः जीवाणु, कवक और विषाणु जैसे रोगजनकों के कारण होते हैं। ये पौधों की पत्तियों, जड़ों, तनों, फूलों और फलों को प्रभावित कर सकते हैं।
फसल रोग नियंत्रण के उपाय :
- रोग प्रतिरोधी किस्मों का चयन करना।
- स्वस्थ और उपचारित बीजों का उपयोग करना।
- खेत की स्वच्छता बनाए रखना।
- फसल चक्र अपनाना।
- आवश्यकता के अनुसार उचित कीटनाशक और कवकनाशी का उपयोग करना।
8. अनाज का भंडारण (Storage of Grains)
फसल कटाई के बाद अनाज को भविष्य में उपयोग के लिए सुरक्षित रखना आवश्यक होता है। भंडारण के दौरान अनाज को नमी, कीटों, चूहों, सूक्ष्मजीवों और अन्य हानिकारक कारकों से बचाना पड़ता है।
भंडारण के दौरान होने वाली हानियाँ :
- जैविक कारक : कीट, चूहे, कवक, जीवाणु और अन्य जीव।
- अजैविक कारक : अधिक नमी, अनुचित तापमान और भंडारण की खराब परिस्थितियाँ।
अनाज को सुरक्षित रखने के उपाय :
- भंडारण से पहले अनाज को अच्छी तरह सुखाना।
- भंडार गृह को साफ और सूखा रखना।
- नमी और कीटों से बचाव करना।
- अनाज को उचित बंद डिब्बों या भंडारण संरचनाओं में रखना।
- बड़े स्तर पर अनाज के भंडारण के लिए साइलो और गोदामों का उपयोग करना।
9. पशुपालन (Animal Husbandry)
दूध, अंडे, मांस, ऊन और अन्य उपयोगी उत्पाद प्राप्त करने के लिए पशुओं का वैज्ञानिक तरीके से पालन-पोषण करना पशुपालन कहलाता है। पशुपालन में पशुओं की नस्ल, भोजन, आवास, स्वास्थ्य और प्रजनन का उचित प्रबंधन किया जाता है।
पशुपालन खाद्य संसाधनों में सुधार का एक महत्त्वपूर्ण भाग है। इससे ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार और आय के अवसर भी उपलब्ध होते हैं।
10. पशुओं की नस्ल में सुधार (Improvement in Animal Breeds)
पशुओं की नस्लों में सुधार का उद्देश्य अधिक दूध, बेहतर गुणवत्ता का मांस, अधिक अंडे या अन्य उपयोगी उत्पाद प्राप्त करना है। इसके लिए अच्छी नस्ल के पशुओं का चयन और प्रजनन कराया जाता है।
नस्ल सुधार के प्रमुख उद्देश्य :
- दूध उत्पादन की क्षमता बढ़ाना।
- पशुओं की रोग प्रतिरोधक क्षमता में सुधार करना।
- जलवायु के अनुकूल पशुओं का चयन करना।
- अच्छी प्रजनन क्षमता वाली नस्लें विकसित करना।
- पशुओं की कार्यक्षमता और उपयोगिता बढ़ाना।
10.1 संकरण द्वारा नस्ल सुधार
दो अलग-अलग नस्लों के पशुओं के बीच प्रजनन कराकर उपयोगी गुणों वाली संतति प्राप्त करने की प्रक्रिया संकरण कहलाती है। इसमें एक नस्ल के अच्छे गुणों को दूसरी नस्ल के उपयोगी गुणों के साथ मिलाने का प्रयास किया जाता है।
उदाहरण के लिए, विदेशी नस्लों में अधिक दूध उत्पादन की क्षमता हो सकती है, जबकि देशी नस्लों में स्थानीय जलवायु और रोगों के प्रति बेहतर अनुकूलन क्षमता हो सकती है। संकरण का उद्देश्य इन उपयोगी गुणों का संयोजन करना है।
11. पशुओं का आहार प्रबंधन (Animal Nutrition)
पशुओं के उचित विकास, स्वास्थ्य और उत्पादन के लिए संतुलित आहार आवश्यक है। पशुओं को भोजन से ऊर्जा, प्रोटीन, खनिज, विटामिन और पानी प्राप्त होते हैं।
पशुओं के आहार को मुख्यतः दो भागों में बाँटा जा सकता है :
(क) रेशेदार आहार (Roughage)
ऐसा आहार जिसमें रेशे की मात्रा अधिक होती है, रेशेदार आहार कहलाता है। उदाहरण के लिए हरा चारा, सूखी घास और भूसा।
(ख) सान्द्र आहार (Concentrates)
ऐसा आहार जिसमें पोषक तत्त्व अधिक मात्रा में और रेशा अपेक्षाकृत कम होता है, सान्द्र आहार कहलाता है। उदाहरण के लिए अनाज, खली और दालों के कुछ उत्पाद।
संतुलित आहार के प्रमुख घटक :
- कार्बोहाइड्रेट और वसा — ऊर्जा प्रदान करते हैं।
- प्रोटीन — शरीर की वृद्धि और ऊतकों के निर्माण में सहायक होते हैं।
- खनिज — शरीर की विभिन्न जैविक प्रक्रियाओं के लिए आवश्यक हैं।
- विटामिन — सामान्य स्वास्थ्य और शरीर की क्रियाओं के लिए आवश्यक हैं।
- पानी — पाचन, तापमान नियंत्रण और अन्य जैविक क्रियाओं में सहायता करता है।
12. पशुओं का आवास और स्वास्थ्य प्रबंधन
पशुओं को स्वस्थ रखने के लिए स्वच्छ, सुरक्षित और हवादार आवास आवश्यक है। पशुओं के रहने का स्थान ऐसा होना चाहिए जहाँ उन्हें पर्याप्त जगह, साफ पानी और आराम मिल सके।
स्वास्थ्य प्रबंधन के प्रमुख उपाय :
- पशुओं के रहने के स्थान की नियमित सफाई करना।
- स्वच्छ पेयजल उपलब्ध कराना।
- समय पर टीकाकरण कराना।
- बीमार पशुओं को स्वस्थ पशुओं से अलग रखना।
- पशु चिकित्सक की सलाह के अनुसार उपचार कराना।
- पशुओं को परजीवी और संक्रामक रोगों से बचाना।
13. दुग्ध उत्पादन (Milk Production)
दूध उत्पादन के लिए गाय, भैंस और अन्य दूध देने वाले पशुओं का पालन किया जाता है। दुग्ध उत्पादन बढ़ाने के लिए अच्छी नस्ल, संतुलित आहार, स्वच्छ आवास और उचित स्वास्थ्य देखभाल आवश्यक है।
दूध देने वाले पशुओं के प्रबंधन में दो प्रमुख बातें महत्त्वपूर्ण हैं :
- दुग्ध उत्पादन क्षमता : पशु कितनी मात्रा में दूध देता है।
- दुग्ध उत्पादन अवधि : पशु कितने समय तक दूध देता है।
दूध उत्पादन पर नस्ल, आहार, स्वास्थ्य, वातावरण और देखभाल का प्रभाव पड़ता है।
14. कुक्कुट पालन (Poultry Farming)
अंडे और मांस प्राप्त करने के लिए मुर्गियों तथा अन्य पक्षियों का वैज्ञानिक तरीके से पालन करना कुक्कुट पालन कहलाता है। कुक्कुट पालन खाद्य उत्पादन और ग्रामीण रोजगार का महत्त्वपूर्ण साधन है।
कुक्कुट पालन में मुर्गियों की नस्ल, आहार, आवास, तापमान और स्वास्थ्य का उचित प्रबंधन किया जाता है।
14.1 कुक्कुट पालन के उद्देश्य
- अंडों का उत्पादन करना।
- मांस उत्पादन करना।
- अच्छी नस्ल के पक्षियों का विकास करना।
- पक्षियों को रोगों से सुरक्षित रखना।
14.2 अंडा उत्पादन और मांस उत्पादन के लिए नस्लें
| प्रकार | मुख्य उद्देश्य | विशेषता |
|---|---|---|
| लेयर (Layer) | अंडा उत्पादन | अधिक संख्या में अंडे देने के लिए पाली जाती हैं। |
| ब्रॉयलर (Broiler) | मांस उत्पादन | तेजी से बढ़ने और कम समय में मांस उत्पादन के लिए पाले जाते हैं। |
कुक्कुट पालन में आवश्यक प्रबंधन :
- पक्षियों को संतुलित आहार देना।
- स्वच्छ और हवादार आवास उपलब्ध कराना।
- पेयजल की उचित व्यवस्था करना।
- उचित तापमान और प्रकाश बनाए रखना।
- संक्रामक रोगों से बचाव के लिए टीकाकरण करना।
15. मत्स्य उत्पादन (Fish Production)
मछलियों को भोजन के रूप में प्राप्त करने और उनका व्यावसायिक उत्पादन करने की प्रक्रिया मत्स्य उत्पादन कहलाती है। मछली प्रोटीन का अच्छा स्रोत है। भारत में समुद्री तथा अंतर्देशीय जल स्रोतों से मछलियाँ प्राप्त की जाती हैं।
15.1 समुद्री मत्स्य उत्पादन (Marine Fisheries)
समुद्र और समुद्री जल क्षेत्रों से मछलियाँ प्राप्त करने की प्रक्रिया समुद्री मत्स्य उत्पादन कहलाती है। समुद्र में प्राकृतिक रूप से पाई जाने वाली मछलियों के अतिरिक्त समुद्री जीवों का नियंत्रित पालन भी किया जाता है।
उदाहरण : टूना, सार्डिन, बॉम्बे डक और मैकेरल।
15.2 अंतर्देशीय मत्स्य उत्पादन (Inland Fisheries)
नदियों, झीलों, तालाबों, जलाशयों और अन्य आंतरिक जल स्रोतों से मछलियाँ प्राप्त करना अंतर्देशीय मत्स्य उत्पादन कहलाता है। इसमें मछलियों का नियंत्रित पालन भी किया जाता है।
16. मिश्रित मछली संवर्धन (Composite Fish Culture)
एक ही तालाब में मछलियों की ऐसी विभिन्न प्रजातियों का पालन करना, जो भोजन के लिए अलग-अलग स्तरों का उपयोग करती हैं, मिश्रित मछली संवर्धन कहलाता है। इससे तालाब के उपलब्ध भोजन और स्थान का बेहतर उपयोग होता है।
इस पद्धति में मछलियों की अलग-अलग प्रजातियाँ तालाब के अलग-अलग भागों में भोजन करती हैं। इसलिए उनके बीच भोजन के लिए प्रतिस्पर्धा कम होती है।
| मछली का प्रकार | भोजन प्राप्त करने का स्थान |
|---|---|
| कतला | जल की ऊपरी सतह |
| रोहू | जल का मध्य भाग |
| मृगल | जल की निचली सतह |
| कॉमन कार्प | मुख्यतः तालाब की निचली सतह |
| ग्रास कार्प | जलीय पौधों और वनस्पतियों के पास |
| सिल्वर कार्प | जल की ऊपरी सतह के पास |
17. मधुमक्खी पालन (Bee-Keeping)
शहद और मोम प्राप्त करने के लिए मधुमक्खियों का वैज्ञानिक तरीके से पालन करना मधुमक्खी पालन या एपिकल्चर कहलाता है। मधुमक्खियाँ फूलों से मकरंद और पराग एकत्र करती हैं तथा शहद का निर्माण करती हैं।
मधुमक्खी पालन के प्रमुख लाभ :
- शहद प्राप्त होता है।
- मधुमक्खी का मोम प्राप्त होता है।
- फसलों में परागण की प्रक्रिया में सहायता मिलती है।
- कृषि उत्पादन और ग्रामीण आय में वृद्धि हो सकती है।
17.1 मधुमक्खी पालन में आवश्यक बातें
- मधुमक्खियों के लिए उपयुक्त स्थान का चयन करना।
- आसपास पर्याप्त फूलों वाले पौधों की उपलब्धता होना।
- मधुमक्खियों के छत्तों की नियमित देखभाल करना।
- रोगों और परजीवियों से बचाव करना।
- शहद निकालने की स्वच्छ विधियों का उपयोग करना।
18. खाद्य संसाधनों में सुधार के प्रमुख क्षेत्र : एक दृष्टि में
| क्षेत्र | सुधार के प्रमुख उपाय | प्राप्त लाभ |
|---|---|---|
| फसल किस्म सुधार | चयन, संकरण और आनुवंशिक सुधार | अधिक उपज और बेहतर गुणवत्ता |
| पोषक तत्त्व प्रबंधन | खाद और उर्वरकों का संतुलित उपयोग | मिट्टी की उर्वरता और पौधों की वृद्धि |
| सिंचाई | छिड़काव और ड्रिप सिंचाई | जल का बेहतर उपयोग |
| फसल प्रतिरूप | मिश्रित फसल, अंतराफसलीकरण और फसल चक्र | संसाधनों का बेहतर उपयोग और जोखिम में कमी |
| फसल सुरक्षा | खरपतवार, कीट और रोग नियंत्रण | फसल की हानि में कमी |
| पशुपालन | नस्ल, आहार और स्वास्थ्य प्रबंधन | दूध, अंडे और मांस उत्पादन में सुधार |
| मत्स्य पालन | मछलियों का वैज्ञानिक पालन | मछली उत्पादन में वृद्धि |
| मधुमक्खी पालन | मधुमक्खियों का नियंत्रित पालन | शहद, मोम और परागण में सहायता |
19. महत्त्वपूर्ण प्रश्न एवं उत्तर (Important Questions and Answers)
- अधिक उपज प्राप्त करना।
- फसल की गुणवत्ता में सुधार करना।
- रोगों और कीटों के प्रति प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाना।
- सूखा और लवणता जैसी प्रतिकूल परिस्थितियों को सहन करने की क्षमता विकसित करना।
- फसल की परिपक्वता अवधि कम करना।
रबी फसलें : शीत ऋतु में बोई जाती हैं और सामान्यतः वसंत ऋतु में काटी जाती हैं। उदाहरण — गेहूँ, चना और सरसों।
- पानी सीधे पौधों की जड़ों के पास पहुँचता है, जिससे जल की बचत होती है।
- अनावश्यक जल बहाव और वाष्पीकरण में कमी आती है।
- मधुमक्खियों से शहद और मोम प्राप्त होता है।
- मधुमक्खियाँ परागण में सहायता करती हैं, जिससे फसल उत्पादन में लाभ हो सकता है।
20. बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQs)
1. फसल की किस्मों में सुधार का प्रमुख उद्देश्य क्या है?
- उत्पादन कम करना
- अधिक उपज और बेहतर गुणवत्ता प्राप्त करना
- मिट्टी को बंजर बनाना
- सिंचाई रोकना
2. निम्नलिखित में से खरीफ फसल कौन-सी है?
- गेहूँ
- चना
- धान
- सरसों
3. निम्नलिखित में से रबी फसल कौन-सी है?
- मक्का
- सोयाबीन
- गेहूँ
- कपास
4. वर्मी कम्पोस्ट बनाने में किसका उपयोग किया जाता है?
- मछली
- केंचुए
- मधुमक्खियाँ
- पक्षी
5. निम्नलिखित में से कौन-सा उर्वरक है?
- यूरिया
- भूसा
- सूखी पत्तियाँ
- गोबर की खाद
6. ड्रिप सिंचाई में पानी कहाँ पहुँचाया जाता है?
- केवल पत्तियों पर
- पौधों की जड़ों के पास
- खेत के बाहर
- आसमान में
7. एक ही खेत में दो या अधिक फसलें निश्चित पंक्तियों में उगाना कहलाता है :
- मिश्रित फसल
- अंतराफसलीकरण
- भंडारण
- कटाई
8. फसल चक्र का प्रमुख लाभ क्या है?
- मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने में सहायता
- मिट्टी में पानी समाप्त करना
- फसल की वृद्धि रोकना
- खेत को खाली रखना
9. फसल के साथ उगने वाले अवांछित पौधे कहलाते हैं :
- उर्वरक
- खरपतवार
- दलहन
- तिलहन
10. निम्नलिखित में से अनाज के भंडारण में हानि का कारण कौन है?
- नमी
- कीट
- चूहे
- उपर्युक्त सभी
11. पशुपालन का प्रमुख उद्देश्य क्या है?
- केवल लकड़ी प्राप्त करना
- दूध, अंडे और मांस जैसे उत्पाद प्राप्त करना
- केवल खनिज प्राप्त करना
- मिट्टी का निर्माण करना
12. अंडा उत्पादन के लिए पाली जाने वाली मुर्गियाँ कहलाती हैं :
- ब्रॉयलर
- लेयर
- मछली
- कतला
13. मांस उत्पादन के लिए पाले जाने वाले पक्षी कहलाते हैं :
- लेयर
- ब्रॉयलर
- कतला
- रोहू
14. मिश्रित मछली संवर्धन का प्रमुख लाभ क्या है?
- तालाब के भोजन का बेहतर उपयोग
- मछलियों को भोजन न देना
- तालाब का पानी समाप्त करना
- मछलियों की संख्या कम करना
15. मधुमक्खी पालन से क्या प्राप्त होता है?
- शहद और मोम
- केवल दूध
- केवल मांस
- केवल अनाज
21. अभ्यास प्रश्न (Practice Questions)
- खाद्य संसाधनों में सुधार से क्या अभिप्राय है?
- खरीफ फसल के दो उदाहरण लिखिए।
- रबी फसल के दो उदाहरण लिखिए।
- वर्मी कम्पोस्ट किसकी सहायता से बनाई जाती है?
- ड्रिप सिंचाई किसे कहते हैं?
- खरपतवार किसे कहते हैं?
- पशुपालन की परिभाषा लिखिए।
- लेयर और ब्रॉयलर किसे कहते हैं?
- SONAR का उपयोग किस क्षेत्र में होता है? (इस अध्याय के संदर्भ में लागू नहीं; इसे ध्वनि अध्याय से जोड़कर पढ़ें।)
- मधुमक्खी पालन से प्राप्त दो उत्पादों के नाम लिखिए।
- फसल की किस्मों में सुधार के पाँच उद्देश्य लिखिए।
- खाद और उर्वरक में अंतर स्पष्ट कीजिए।
- सिंचाई की आधुनिक विधियों का वर्णन कीजिए।
- मिश्रित फसल और अंतराफसलीकरण में अंतर लिखिए।
- फसल चक्र के लाभ बताइए।
- फसल सुरक्षा प्रबंधन क्यों आवश्यक है?
- अनाज के सुरक्षित भंडारण के उपाय लिखिए।
- पशुओं के संतुलित आहार का महत्त्व समझाइए।
- कुक्कुट पालन में लेयर और ब्रॉयलर का अंतर बताइए।
- मिश्रित मछली संवर्धन के लाभ लिखिए।
- फसल किस्मों में सुधार के प्रमुख उद्देश्य और विधियों का वर्णन कीजिए।
- पोषक तत्त्वों के प्रबंधन में खाद और उर्वरकों की भूमिका समझाइए।
- मिश्रित फसल, अंतराफसलीकरण और फसल चक्र में अंतर उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिए।
- फसल सुरक्षा प्रबंधन के अंतर्गत खरपतवार, कीट और रोग नियंत्रण के उपाय समझाइए।
- पशुपालन में नस्ल सुधार, आहार प्रबंधन और स्वास्थ्य प्रबंधन का महत्त्व लिखिए।
- मत्स्य उत्पादन और मिश्रित मछली संवर्धन का वर्णन कीजिए।
- खाद्य संसाधनों में सुधार के लिए फसल उत्पादन और पशुपालन के योगदान को समझाइए।
22. गतिविधियाँ एवं प्रयोग (Activities)
गतिविधि 1 : बीज अंकुरण का तुलनात्मक अध्ययन
दो छोटे पात्रों में समान प्रकार के बीज बोएँ। एक पात्र में उचित नमी बनाए रखें और दूसरे में पानी की मात्रा कम रखें। कुछ दिनों बाद दोनों में अंकुरण और पौधों की वृद्धि की तुलना करें।
निष्कर्ष : पौधों के अंकुरण और विकास के लिए उचित मात्रा में पानी आवश्यक है।
गतिविधि 2 : खाद और मिट्टी का अध्ययन
दो समान पात्रों में समान प्रकार की मिट्टी लें। एक पात्र में थोड़ी जैविक खाद मिलाएँ और दूसरे में बिना खाद वाली मिट्टी रखें। दोनों में समान प्रकार के बीज बोकर उनकी वृद्धि का अवलोकन करें।
निष्कर्ष : जैविक खाद मिट्टी में पोषक तत्त्व और ह्यूमस बढ़ाने में सहायता करती है।
गतिविधि 3 : फसल प्रतिरूप का अध्ययन
अपने आसपास के खेतों का निरीक्षण करें और पता लगाएँ कि किसान एक खेत में कौन-कौन सी फसलें उगाते हैं। यह भी देखें कि फसलें एक साथ बोई गई हैं या अलग-अलग मौसमों में।
निष्कर्ष : अलग-अलग फसल प्रतिरूपों का उपयोग कृषि संसाधनों के बेहतर प्रबंधन के लिए किया जाता है।
गतिविधि 4 : अनाज भंडारण का अध्ययन
घर में रखे अनाज के भंडारण स्थान का निरीक्षण करें। देखें कि अनाज सूखा है या उसमें नमी है तथा उसे कीटों और चूहों से बचाने की क्या व्यवस्था की गई है।
निष्कर्ष : अनाज की गुणवत्ता बनाए रखने के लिए सूखा और स्वच्छ भंडारण आवश्यक है।
गतिविधि 5 : पशुपालन का स्थानीय सर्वेक्षण
अपने क्षेत्र के किसी पशुपालक या डेयरी संचालक से जानकारी प्राप्त करें। पता लगाएँ कि पशुओं को कौन-सा चारा दिया जाता है, उनके रहने की व्यवस्था कैसी है और उनके स्वास्थ्य की देखभाल कैसे की जाती है।
निष्कर्ष : पशुओं की नस्ल, आहार, आवास और स्वास्थ्य प्रबंधन का उत्पादन पर प्रभाव पड़ता है।
23. अध्याय का सारांश (Chapter Summary)
- बढ़ती जनसंख्या के लिए खाद्य उत्पादन बढ़ाना आवश्यक है।
- फसल की किस्मों में सुधार से अधिक उपज और बेहतर गुणवत्ता प्राप्त की जा सकती है।
- फसल सुधार के लिए चयन, संकरण और आनुवंशिक अभियांत्रिकी जैसी विधियों का उपयोग किया जाता है।
- भारत में खरीफ और रबी दो प्रमुख फसल मौसम हैं।
- पौधों को वृहत् और सूक्ष्म पोषक तत्त्वों की आवश्यकता होती है।
- खाद जैविक पदार्थों के अपघटन से प्राप्त होती है, जबकि उर्वरक पौधों को विशिष्ट पोषक तत्त्व उपलब्ध कराते हैं।
- सिंचाई से फसलों को आवश्यकतानुसार पानी मिलता है।
- छिड़काव और ड्रिप सिंचाई आधुनिक सिंचाई विधियाँ हैं।
- मिश्रित फसल, अंतराफसलीकरण और फसल चक्र प्रमुख फसल प्रतिरूप हैं।
- खरपतवार, कीट और रोग फसलों को नुकसान पहुँचाते हैं।
- अनाज के सुरक्षित भंडारण के लिए नमी, कीट और चूहों से बचाव आवश्यक है।
- पशुपालन से दूध, अंडे, मांस और अन्य उपयोगी उत्पाद प्राप्त होते हैं।
- पशुओं के लिए संतुलित आहार, स्वच्छ आवास और स्वास्थ्य देखभाल आवश्यक हैं।
- कुक्कुट पालन में लेयर अंडों और ब्रॉयलर मांस उत्पादन के लिए पाले जाते हैं।
- मत्स्य उत्पादन समुद्री और अंतर्देशीय दोनों स्रोतों से किया जाता है।
- मिश्रित मछली संवर्धन में तालाब के विभिन्न स्तरों पर भोजन करने वाली मछलियों का पालन किया जाता है।
- मधुमक्खी पालन से शहद और मोम प्राप्त होते हैं तथा परागण में सहायता मिलती है।
24. परीक्षा की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण अंतर
| विषय | पहला प्रकार | दूसरा प्रकार |
|---|---|---|
| पोषक तत्त्व | वृहत् पोषक तत्त्व — अधिक मात्रा में आवश्यक | सूक्ष्म पोषक तत्त्व — कम मात्रा में आवश्यक |
| सिंचाई | छिड़काव — पानी का छिड़काव | ड्रिप — जड़ों के पास बूंद-बूंद पानी |
| फसल प्रतिरूप | मिश्रित फसल — फसलें एक साथ उगाई जाती हैं | अंतराफसलीकरण — फसलें निश्चित पंक्तियों में उगाई जाती हैं |
| पशु आहार | रेशेदार — रेशे की मात्रा अधिक | सान्द्र — पोषक तत्त्व अधिक सघन |
| कुक्कुट पालन | लेयर — अंडा उत्पादन | ब्रॉयलर — मांस उत्पादन |
| मत्स्य उत्पादन | समुद्री — समुद्र से | अंतर्देशीय — नदियों, तालाबों और झीलों से |
RBSE कक्षा 9 विज्ञान — संपूर्ण पाठ्यक्रम का पुनरावलोकन
राजस्थान माध्यमिक शिक्षा बोर्ड के कक्षा 9 विज्ञान पाठ्यक्रम में निर्धारित 12 अध्यायों का अध्ययन पूरा करने के बाद विद्यार्थियों को सभी अध्यायों के महत्त्वपूर्ण सिद्धांत, परिभाषाएँ, सूत्र, चित्र और संख्यात्मक प्रश्नों का नियमित अभ्यास करना चाहिए।
सभी अध्यायों की सूची एवं निर्धारित अंकभार
| क्रमांक | अध्याय का नाम | अंकभार |
|---|---|---|
| 1 | हमारे आस-पास के पदार्थ | 7 |
| 2 | हमारे आस-पास के पदार्थों की शुद्धता | 6 |
| 3 | परमाणु एवं अणु | 9 |
| 4 | परमाणु की संरचना | 8 |
| 5 | जीवन की मौलिक इकाई | 12 |
| 6 | ऊतक | 14 |
| 7 | गति | 9 |
| 8 | बल तथा गति के नियम | 7 |
| 9 | गुरुत्वाकर्षण | 6 |
| 10 | कार्य तथा ऊर्जा | 6 |
| 11 | ध्वनि | 8 |
| 12 | खाद्य संसाधनों में सुधार | 8 |
| कुल | 100 | |
परीक्षा की तैयारी के लिए सुझाव
- प्रत्येक अध्याय की परिभाषाओं और महत्त्वपूर्ण शब्दों को समझकर याद करें।
- भौतिक विज्ञान के सभी सूत्रों का नियमित अभ्यास करें।
- रासायनिक सूत्र, परमाणु द्रव्यमान और संयोजकता का अभ्यास करें।
- जीव विज्ञान के महत्त्वपूर्ण चित्रों का नामांकन सहित अभ्यास करें।
- प्रत्येक अध्याय के बहुविकल्पीय प्रश्नों और लघुत्तरात्मक प्रश्नों को हल करें।
- संख्यात्मक प्रश्नों में सूत्र, मान, गणना और अंतिम उत्तर का मात्रक अवश्य लिखें।
- परीक्षा से पहले निर्धारित पाठ्यक्रम और अंकभार के अनुसार पुनरावृत्ति करें।
RBSE कक्षा 9 विज्ञान 2026–27 – अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. RBSE कक्षा 9 विज्ञान का पाठ्यक्रम 2026–27 कहाँ से पढ़ें?
विद्यार्थी इस पेज पर RBSE कक्षा 9 विज्ञान 2026–27 के सभी 12 अध्यायों के विस्तृत नोट्स, महत्वपूर्ण प्रश्न-उत्तर, बहुविकल्पीय प्रश्न और अभ्यास सामग्री हिंदी में पढ़ सकते हैं।
2. RBSE कक्षा 9 विज्ञान में कुल कितने अध्याय हैं?
राजस्थान माध्यमिक शिक्षा बोर्ड के 2026–27 के निर्धारित पाठ्यक्रम में कक्षा 9 विज्ञान के कुल 12 अध्याय शामिल हैं।
3. RBSE कक्षा 9 विज्ञान की परीक्षा कितने अंकों की होती है?
निर्धारित पाठ्यक्रम के अनुसार विज्ञान का सैद्धांतिक प्रश्नपत्र 100 अंकों का है। परीक्षा की अवधि 3 घंटे 15 मिनट है।
4. RBSE कक्षा 9 विज्ञान के लिए कौन-सी पुस्तक निर्धारित है?
RBSE कक्षा 9 विज्ञान 2026–27 के लिए निर्धारित पुस्तक NCERT विज्ञान है।
5. क्या इस पेज पर सभी अध्यायों के महत्वपूर्ण प्रश्न उपलब्ध हैं?
हाँ, इस पेज पर सभी 12 अध्यायों के अंतर्गत महत्वपूर्ण प्रश्न-उत्तर, MCQ, अभ्यास प्रश्न और परीक्षा उपयोगी अध्ययन सामग्री दी गई है।
6. कक्षा 9 विज्ञान की तैयारी कैसे करें?
विद्यार्थियों को प्रत्येक अध्याय की अवधारणाओं को समझना चाहिए, परिभाषाओं और सूत्रों का नियमित अभ्यास करना चाहिए तथा महत्वपूर्ण प्रश्नों और संख्यात्मक समस्याओं को हल करना चाहिए।
7. क्या ये नोट्स हिंदी माध्यम के विद्यार्थियों के लिए उपयोगी हैं?
हाँ, यह अध्ययन सामग्री हिंदी में तैयार की गई है और RBSE कक्षा 9 विज्ञान के विद्यार्थियों की तैयारी को ध्यान में रखती है।
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