नाभिक (Nuclei)
परमाणु के केंद्र में स्थित अत्यंत सघन एवं सूक्ष्म क्षेत्र को नाभिक कहा जाता है। यहीं वह स्थान है जहाँ लगभग सम्पूर्ण परमाणु द्रव्यमान केंद्रित रहता है और जहाँ प्रकृति की सबसे प्रबल ज्ञात शक्तियाँ कार्य करती हैं।
नाभिक का अध्ययन केवल परमाणु संरचना को समझने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह ऊर्जा उत्पादन, चिकित्सा, खगोल भौतिकी, और ब्रह्मांड की उत्पत्ति जैसे गहरे प्रश्नों से भी जुड़ा हुआ है।
1. नाभिक की खोज एवं ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
उन्नीसवीं शताब्दी के अंत तक यह माना जाता था कि परमाणु एक अविभाज्य इकाई है। यह धारणा अल्फा कण प्रकीर्णन प्रयोग द्वारा मूल रूप से बदल गई।
अर्नेस्ट रदरफोर्ड द्वारा किए गए इस प्रयोग में यह पाया गया कि परमाणु का अधिकांश भाग रिक्त है और उसका धनात्मक आवेश एक अत्यंत छोटे केंद्रीय भाग में केंद्रित है — यही भाग नाभिक कहलाया।
2. नाभिक की संरचना
नाभिक मुख्यतः दो प्रकार के कणों से मिलकर बना होता है:
- प्रोटॉन (Proton) – धनात्मक आवेश (+e)
- न्यूट्रॉन (Neutron) – विद्युत रूप से उदासीन
इन दोनों को संयुक्त रूप से न्यूक्लियॉन (Nucleons) कहा जाता है।
यदि किसी नाभिक में:
- प्रोटॉनों की संख्या = Z (परमाणु क्रमांक)
- न्यूट्रॉनों की संख्या = N
- कुल न्यूक्लियॉन = A = Z + N (द्रव्यमान संख्या)
तो नाभिक को सामान्यतः इस रूप में लिखा जाता है:
AZX
3. नाभिक का आकार एवं त्रिज्या
प्रयोगों से यह पाया गया कि नाभिक की त्रिज्या द्रव्यमान संख्या पर निर्भर करती है और इसका संबंध निम्न प्रकार से व्यक्त किया जाता है:
R = R0 A1/3
जहाँ R0 ≈ 1.2 × 10−15 m होता है।
4. नाभिकीय घनत्व
नाभिक का घनत्व इस प्रकार परिभाषित किया जाता है:
ρ = नाभिकीय द्रव्यमान / नाभिकीय आयतन
गणना से यह घनत्व लगभग:
ρ ≈ 2.3 × 1017 kg/m³
यह मान पृथ्वी के किसी भी ज्ञात पदार्थ से करोड़ों गुना अधिक है।
5. नाभिकीय बल (Nuclear Force)
नाभिक के भीतर प्रोटॉन–प्रोटॉन के बीच प्रबल विद्युत प्रतिकर्षण के बावजूद नाभिक स्थिर रहता है। इसका कारण है नाभिकीय बल।
नाभिकीय बल की विशेषताएँ:
- अत्यंत प्रबल लेकिन अल्प दूरी का बल
- आवेश से स्वतंत्र
- केवल न्यूक्लियॉनों के बीच कार्य करता है
- लगभग 2–3 फर्मी की दूरी तक प्रभावी
6. द्रव्यमान दोष (Mass Defect)
नाभिक के अध्ययन में एक अत्यंत महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि किसी नाभिक का वास्तविक द्रव्यमान उसमें उपस्थित सभी प्रोटॉनों और न्यूट्रॉनों के स्वतंत्र द्रव्यमानों के योग से थोड़ा कम पाया जाता है। इसी अंतर को द्रव्यमान दोष कहा जाता है।
यदि किसी नाभिक में Z प्रोटॉन और N न्यूट्रॉन हों, तो सैद्धांतिक द्रव्यमान होगा:
m = Z mp + N mn
परंतु प्रयोग से प्राप्त वास्तविक नाभिकीय द्रव्यमान इससे कम होता है। इस अंतर को:
Δm = (Z mp + N mn) − mnucleus
द्रव्यमान दोष यह संकेत देता है कि नाभिक के निर्माण के समय कुछ द्रव्यमान ऊर्जा में परिवर्तित हो जाता है।
7. नाभिकीय बंधन ऊर्जा (Binding Energy)
द्रव्यमान दोष का प्रत्यक्ष परिणाम नाभिकीय बंधन ऊर्जा के रूप में प्रकट होता है। आइंस्टीन के द्रव्यमान–ऊर्जा समतुल्यता सिद्धांत के अनुसार:
E = Δm c2
यह ऊर्जा वह न्यूनतम ऊर्जा है जो नाभिक को उसके सभी न्यूक्लियॉनों में पूर्णतः विघटित करने के लिए आवश्यक होती है।
अतः बंधन ऊर्जा नाभिक की स्थिरता का प्रत्यक्ष माप मानी जाती है।
8. प्रति न्यूक्लियॉन बंधन ऊर्जा एवं स्थिरता
नाभिकों की तुलनात्मक स्थिरता को समझने के लिए प्रति न्यूक्लियॉन बंधन ऊर्जा का प्रयोग किया जाता है।
Binding Energy per Nucleon = कुल बंधन ऊर्जा / A
प्रयोगों से प्राप्त ग्राफ यह दर्शाता है कि:
- हल्के नाभिकों में प्रति न्यूक्लियॉन बंधन ऊर्जा कम होती है
- मध्यम द्रव्यमान (जैसे लौह) में यह अधिकतम होती है
- अत्यधिक भारी नाभिकों में यह पुनः घटने लगती है
यही तथ्य नाभिकीय विखंडन और नाभिकीय संलयन दोनों प्रक्रियाओं का ऊर्जा स्रोत है।
9. रेडियोधर्मिता (Radioactivity)
कुछ नाभिक स्वाभाविक रूप से अस्थिर होते हैं और वे स्वतः ऊर्जा एवं कणों का उत्सर्जन करते हुए अन्य नाभिकों में परिवर्तित हो जाते हैं। इस प्रक्रिया को रेडियोधर्मिता कहा जाता है।
रेडियोधर्मिता एक नाभिकीय प्रक्रिया है जो ताप, दाब या रासायनिक अवस्था से प्रभावित नहीं होती।
α (अल्फा) विकिरण
अल्फा कण वास्तव में हीलियम नाभिक होते हैं। इनकी आयनन क्षमता अधिक परंतु प्रवेश क्षमता कम होती है।
β (बीटा) विकिरण
बीटा विकिरण उच्च वेग वाले इलेक्ट्रॉन या पोजिट्रॉन होते हैं। इनकी प्रवेश क्षमता अल्फा से अधिक होती है।
γ (गामा) विकिरण
गामा विकिरण उच्च ऊर्जा के विद्युतचुंबकीय तरंगें होती हैं। इनकी प्रवेश क्षमता सर्वाधिक होती है।
10. रेडियोधर्मी क्षय का नियम
रेडियोधर्मी क्षय की दर नाभिकों की संख्या के समानुपाती होती है।
dN/dt = −λN
जहाँ λ क्षय नियतांक है।
इससे अर्द्धायु (Half-life) की अवधारणा प्राप्त होती है, जो नाभिकीय स्थिरता का एक व्यावहारिक माप है।
11. नाभिकीय विखंडन (Nuclear Fission)
जब कोई भारी नाभिक हल्के नाभिकों में टूटता है और ऊर्जा मुक्त होती है, तो इस प्रक्रिया को नाभिकीय विखंडन कहते हैं।
यह प्रक्रिया परमाणु रिएक्टरों और परमाणु ऊर्जा उत्पादन की आधारशिला है।
12. नाभिकीय संलयन (Nuclear Fusion)
जब दो हल्के नाभिक संयोजित होकर एक भारी नाभिक बनाते हैं और ऊर्जा मुक्त होती है, तो इसे नाभिकीय संलयन कहा जाता है।
यही प्रक्रिया सूर्य एवं तारों में ऊर्जा उत्पादन का मुख्य स्रोत है।
13. नाभिकीय भौतिकी का व्यापक महत्व
नाभिकीय प्रक्रियाएँ ऊर्जा उत्पादन, चिकित्सा (रेडियोथेरेपी), खगोल भौतिकी, और पदार्थ विज्ञान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
इस प्रकार नाभिक का अध्ययन प्रकृति की सबसे गहन ऊर्जा प्रक्रियाओं को समझने का माध्यम बनता है।
समेकित दृष्टिकोण
नाभिक का अध्ययन द्रव्यमान, ऊर्जा और बलों के अत्यंत सूक्ष्म संतुलन को उजागर करता है। द्रव्यमान दोष और बंधन ऊर्जा की अवधारणाएँ यह स्पष्ट करती हैं कि नाभिकीय स्थिरता सिर्फ कणों की संख्या का परिणाम नहीं, बल्कि उनके बीच कार्यरत बलों की प्रकृति पर निर्भर करती है।
प्रति न्यूक्लियॉन बंधन ऊर्जा का वितरण यह समझाने में सक्षम है कि क्यों कुछ नाभिक स्वाभाविक रूप से स्थिर होते हैं और क्यों कुछ नाभिक ऊर्जा मुक्त करते हुए परिवर्तित होते रहते हैं। यही समेकित दृष्टि नाभिकीय विखंडन और संलयन दोनों प्रक्रियाओं को एक ही भौतिक ढाँचे में रखती है।
दृश्य समेकन (SVG आधारित व्याख्या)
1. नाभिकीय बंधन ऊर्जा बनाम द्रव्यमान संख्या
यह वक्र दर्शाता है कि मध्यम द्रव्यमान वाले नाभिकों में प्रति न्यूक्लियॉन बंधन ऊर्जा अधिकतम होती है। यही कारण है कि हल्के नाभिक संलयन द्वारा और भारी नाभिक विखंडन द्वारा ऊर्जा मुक्त करते हैं।
2. रेडियोधर्मी क्षय की घातीय प्रकृति
यह आरेख यह स्पष्ट करता है कि रेडियोधर्मी क्षय समय के साथ घातीय रूप से घटता है। अर्द्धायु की अवधारणा इसी व्यवहार का व्यावहारिक निरूपण है।
3. नाभिकीय विखंडन और श्रृंखला अभिक्रिया
यह दृश्य संकेत देता है कि एक भारी नाभिक के विखंडन से अनेक न्यूट्रॉन उत्पन्न होते हैं, जो आगे अन्य नाभिकों को विखंडित कर सकते हैं। नियंत्रित अवस्था में यही प्रक्रिया रिएक्टरों में ऊर्जा उत्पादन का आधार है।
4. नाभिकीय संलयन का संकेत
यह आरेख दर्शाता है कि दो हल्के नाभिक संयोजित होकर एक भारी नाभिक बनाते हैं। उच्च ताप और दाब की स्थिति में यह प्रक्रिया ऊर्जा का विशाल स्रोत बन जाती है, जैसा कि तारों में देखा जाता है।
संक्षिप्त नोट्स (Quick Revision)
- द्रव्यमान दोष नाभिकीय ऊर्जा का मूल स्रोत है।
- बंधन ऊर्जा नाभिक की स्थिरता का माप है।
- रेडियोधर्मिता ताप एवं रासायनिक अवस्था से स्वतंत्र है।
- विखंडन भारी नाभिकों में ऊर्जा मुक्त करता है।
- संलयन हल्के नाभिकों में अधिक ऊर्जा देता है।
दैनिक जीवन एवं परिवेश में नाभिकीय प्रक्रियाएँ
- परमाणु ऊर्जा संयंत्रों में विद्युत उत्पादन
- चिकित्सा में रेडियोथेरेपी और निदान
- कार्बन डेटिंग द्वारा पुरातात्विक आयु निर्धारण
- खगोल भौतिकी में तारों की ऊर्जा प्रक्रिया
काल्पनिक प्रश्न–उत्तर (Concept Clarity)
प्रश्न: यदि नाभिकीय बल विद्युत बल से कमजोर होता, तो क्या होता?
उत्तर: ऐसी स्थिति में प्रोटॉनों के बीच प्रतिकर्षण नाभिक को स्थिर नहीं रहने देता। परमाणु अस्तित्व में नहीं रह पाते और पदार्थ का वर्तमान स्वरूप संभव न होता।
UPSC एवं उच्च स्तरीय परीक्षाओं में महत्व
नाभिक अध्याय से प्रश्न द्रव्यमान–ऊर्जा संबंध, बंधन ऊर्जा वक्र, रेडियोधर्मी क्षय के नियम और विखंडन–संलयन की तुलनात्मक व्याख्या पर आधारित होते हैं।
प्रमुख वैज्ञानिकों का योगदान
- रदरफोर्ड – नाभिकीय संरचना
- आइंस्टीन – द्रव्यमान–ऊर्जा समतुल्यता
- मीट्नर एवं फर्मी – नाभिकीय विखंडन की समझ
भविष्य की वैज्ञानिक चुनौतियाँ
नियंत्रित नाभिकीय संलयन, नाभिकीय अपशिष्ट प्रबंधन और ऊर्जा–सुरक्षा आने वाले समय की प्रमुख वैज्ञानिक चुनौतियाँ हैं।
प्रिंट एवं अध्ययन हेतु
यह अध्याय प्रिंट-अनुकूल रूप में संरचित है। प्रिंट करते समय ब्राउज़र में “Background graphics” सक्षम रखने पर आरेख एवं संरचना स्पष्ट बनी रहती है।
© RBSE Marwari Mission 100 | ncertclasses.com
🔗 संबंधित भौतिकी अध्याय (Class 12)
- 📘 RBSE Class 12 Physics – सम्पूर्ण पाठ्यक्रम
- 📗 पिछला अध्याय: परमाणु (Atoms)
- 📙 संबंधित अध्याय: विकिरण एवं पदार्थ की द्वैत प्रकृति
- 📕 अनुप्रयोग आधारित अध्याय: अर्धचालक इलेक्ट्रॉनिकी


No comments:
Post a Comment