RBSE Class 12 Physics – Ray Optics and Optical Instruments | किरण प्रकाशिकी Complete Guide 2026

📅 Monday, 12 January 2026 📖 3-5 min read

🔗 इससे पहले पढ़ें: RBSE Class 12 Physics – विद्युतचुम्बकीय तरंगें (Electromagnetic Waves)

किरण प्रकाशिकी एवं प्रकाशीय उपकरण (Ray Optics and Optical Instruments)

प्रकाश का अध्ययन भौतिकी के सबसे प्राचीन और सबसे प्रभावशाली क्षेत्रों में से एक रहा है। जब प्रकाश को सीधी रेखा में संचरित होती ऊर्जा के रूप में माना जाता है, तो उसके व्यवहार का विश्लेषण किरण प्रकाशिकी के अंतर्गत किया जाता है। यह दृष्टिकोण प्रकाश की तरंग प्रकृति से पूर्व विकसित हुआ, फिर भी आज भी अनेक व्यावहारिक परिस्थितियों में अत्यंत प्रभावी और सटीक सिद्ध होता है।

किरण प्रकाशिकी इस धारणा पर आधारित है कि जब प्रकाश का तरंगदैर्घ्य उपयोग में आने वाली वस्तुओं के आयामों की तुलना में अत्यंत छोटा होता है, तो प्रकाश को किरणों के रूप में निरूपित किया जा सकता है। इसी आधार पर परावर्तन, अपवर्तन, प्रतिबिंब निर्माण और प्रकाशीय उपकरणों का अध्ययन किया जाता है।

प्रकाश का सीधी रेखा में गमन

समरूप और पारदर्शी माध्यम में प्रकाश सदैव सीधी रेखा में गमन करता है। यह गुण छाया निर्माण, ग्रहण और पिनहोल कैमरा जैसी घटनाओं में स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। यही गुण किरण प्रकाशिकी की आधारशिला है।

जब माध्यम असमरूप हो जाता है या माध्यम की प्रकृति में परिवर्तन होता है, तो प्रकाश की दिशा बदल जाती है। यह परिवर्तन परावर्तन अथवा अपवर्तन के रूप में प्रकट होता है, जिनका अध्ययन आगे किया जाता है।

परावर्तन की अवधारणा

जब प्रकाश किसी चमकीली सतह पर आपतित होता है और उसी माध्यम में लौट आता है, तो इस घटना को परावर्तन कहा जाता है। परावर्तन प्राकृतिक और कृत्रिम दोनों सतहों पर होता है, परंतु चिकनी और समतल सतहों पर यह अधिक स्पष्ट और नियमबद्ध होता है।

परावर्तन के नियम यह स्पष्ट करते हैं कि आपतन कोण और परावर्तन कोण आपस में बराबर होते हैं तथा आपतित किरण, परावर्तित किरण और अभिलंब एक ही तल में स्थित होते हैं। ये नियम दर्पणों द्वारा प्रतिबिंब निर्माण को समझने का आधार प्रदान करते हैं।

समतल दर्पण में प्रतिबिंब

समतल दर्पण में बनने वाला प्रतिबिंब आभासी, सीधा और वस्तु के समान आकार का होता है। प्रतिबिंब की दूरी दर्पण के पीछे उतनी ही होती है जितनी दूरी वस्तु की दर्पण के सामने होती है।

दैनिक जीवन में दर्पण के साथ होने वाले अनुभव— जैसे चेहरे का प्रतिबिंब, पार्श्व व्युत्क्रमण— किरण प्रकाशिकी के इन्हीं सिद्धांतों की सीधी अभिव्यक्ति हैं।

📘 प्रकाश की प्रकृति का तरंगीय विस्तार आगे Wave Optics अध्याय में किया गया है, जहाँ व्यतिकरण और विवर्तन जैसे प्रभावों का अध्ययन होगा।

गोलीय दर्पणों की भूमिका

जब परावर्तक सतह समतल न होकर वक्र होती है, तो उसे गोलीय दर्पण कहा जाता है। इन दर्पणों को अवतल और उत्तल दो वर्गों में विभाजित किया जाता है। इनका उपयोग दैनिक उपकरणों से लेकर वैज्ञानिक यंत्रों तक विस्तृत रूप में होता है।

गोलीय दर्पणों द्वारा प्रतिबिंब निर्माण आपतन किरणों के ज्यामितीय विश्लेषण पर आधारित होता है। इसी विश्लेषण से फोकस, वक्रता केंद्र और प्रतिबिंब की प्रकृति निर्धारित की जाती है।

अवतल एवं उत्तल दर्पण

गोलीय दर्पणों को उनकी वक्रता की दिशा के आधार पर अवतल और उत्तल दर्पणों में विभाजित किया जाता है। अवतल दर्पण अंदर की ओर वक्र परावर्तक सतह रखता है, जबकि उत्तल दर्पण बाहर की ओर वक्र परावर्तक सतह वाला होता है। इन दोनों का प्रकाशीय व्यवहार स्पष्ट रूप से भिन्न होता है।

अवतल दर्पण समानांतर आपतित किरणों को परावर्तन के बाद एक बिंदु पर एकत्रित करता है। इसी कारण इसे अभिसारी दर्पण कहा जाता है। इसके विपरीत, उत्तल दर्पण परावर्तित किरणों को फैला देता है और इसे अपसारी दर्पण कहा जाता है।

दर्पण से संबंधित महत्त्वपूर्ण पद

गोलीय दर्पणों के अध्ययन में कुछ ज्यामितीय पद मौलिक भूमिका निभाते हैं। इन पदों की स्पष्ट समझ के बिना प्रतिबिंब निर्माण का सही विश्लेषण संभव नहीं है।

  • ध्रुव (Pole): दर्पण की परावर्तक सतह का मध्य बिंदु।
  • वक्रता केंद्र (Centre of Curvature): उस गोलीय पृष्ठ का केंद्र, जिसका भाग दर्पण की सतह होती है।
  • मुख्य अक्ष (Principal Axis): ध्रुव और वक्रता केंद्र को जोड़ने वाली रेखा।
  • फोकस (Focus): वह बिंदु जहाँ मुख्य अक्ष के समांतर आपतित किरणें परावर्तन के बाद मिलती हैं अथवा मिलती हुई प्रतीत होती हैं।
अवतल उत्तल F F

चित्र से स्पष्ट है कि अवतल दर्पण वास्तविक फोकस रखता है, जबकि उत्तल दर्पण का फोकस आभासी होता है। इसी अंतर के कारण दोनों दर्पणों के उपयोग भिन्न-भिन्न परिस्थितियों में किए जाते हैं।

दर्पण सूत्र और आवर्धन

गोलीय दर्पणों में प्रतिबिंब की स्थिति और आकार का निर्धारण एक सरल गणितीय संबंध द्वारा किया जाता है, जिसे दर्पण सूत्र कहा जाता है। यह सूत्र वस्तु दूरी, प्रतिबिंब दूरी और फोकस दूरी के बीच संबंध स्थापित करता है।

इसी प्रकार, आवर्धन प्रतिबिंब के आकार और वस्तु के आकार के अनुपात को दर्शाता है। आवर्धन का चिह्न प्रतिबिंब की प्रकृति (सीधा या उल्टा) की सूचना देता है।

अपवर्तन की अवधारणा

जब प्रकाश एक माध्यम से दूसरे माध्यम में प्रवेश करता है और उसकी गति में परिवर्तन होता है, तो उसकी दिशा भी बदल जाती है। इस घटना को अपवर्तन कहा जाता है। अपवर्तन प्रकाशीय उपकरणों की कार्यक्षमता का मूल आधार है।

अपवर्तन का परिमाण माध्यमों की प्रकृति पर निर्भर करता है और इसे अपवर्तनांक द्वारा व्यक्त किया जाता है। यही राशि लेंसों के व्यवहार को नियंत्रित करती है।

📘 अपवर्तन से जुड़ा तरंगीय दृष्टिकोण Wave Optics अध्याय में विस्तार से समझाया गया है।

लेंसों का परिचय

लेंस पारदर्शी माध्यम के बने होते हैं जिनकी कम से कम एक सतह वक्र होती है। लेंसों को उत्तल और अवतल दो प्रमुख वर्गों में बाँटा जाता है। इनका कार्य अपवर्तन के माध्यम से प्रकाश किरणों को अभिसारित या अपसारित करना होता है।

लेंसों के द्वारा प्रतिबिंब निर्माण दैनिक जीवन के उपकरणों— जैसे चश्मा, कैमरा, सूक्ष्मदर्शी और दूरबीन— का आधार है।

उत्तल एवं अवतल लेंस

लेंसों को उनकी वक्रता और प्रकाश पर प्रभाव के आधार पर उत्तल तथा अवतल वर्गों में विभाजित किया जाता है। उत्तल लेंस मुख्य अक्ष के समांतर आपतित किरणों को अपवर्तन के बाद एक बिंदु पर एकत्रित करता है, अतः इसे अभिसारी लेंस कहा जाता है। इसके विपरीत, अवतल लेंस किरणों को फैलाता है और अपसारी लेंस कहलाता है।

लेंसों का व्यवहार माध्यम के अपवर्तनांक, वक्रता की त्रिज्या और आकृति पर निर्भर करता है। इसी कारण, एक ही पदार्थ के बने लेंस भी भिन्न आकृतियों में भिन्न प्रकाशीय प्रभाव उत्पन्न कर सकते हैं।

लेंस से संबंधित महत्त्वपूर्ण पद

  • ऑप्टिकल केंद्र (Optical Centre): लेंस का वह बिंदु, जिससे होकर गुजरने वाली किरण बिना विचलन के निकल जाती है।
  • मुख्य अक्ष: दोनों वक्र सतहों के केंद्रों को जोड़ने वाली रेखा।
  • फोकस: वह बिंदु जहाँ मुख्य अक्ष के समांतर आपतित किरणें अपवर्तन के बाद मिलती हैं अथवा मिलती हुई प्रतीत होती हैं।
  • फोकस दूरी: ऑप्टिकल केंद्र और फोकस के बीच की दूरी।

लेंस सूत्र और आवर्धन

लेंस द्वारा प्रतिबिंब की स्थिति एक सरल गणितीय संबंध द्वारा निर्धारित की जाती है, जिसे लेंस सूत्र कहा जाता है। यह सूत्र वस्तु दूरी, प्रतिबिंब दूरी और फोकस दूरी के बीच सुस्पष्ट संबंध स्थापित करता है।

आवर्धन प्रतिबिंब के आकार और वस्तु के आकार के अनुपात को दर्शाता है। आवर्धन का परिमाण प्रतिबिंब के बड़े या छोटे होने की सूचना देता है, जबकि उसका चिह्न प्रतिबिंब की प्रकृति (सीधा या उल्टा) को स्पष्ट करता है।

प्रकाशीय उपकरणों की भूमिका

किरण प्रकाशिकी के सिद्धांत केवल सैद्धांतिक नहीं हैं, बल्कि अनेक व्यावहारिक उपकरणों का आधार बनते हैं। मानव नेत्र से लेकर उन्नत वैज्ञानिक यंत्रों तक, प्रकाशीय उपकरणों की कार्यप्रणाली इन्हीं सिद्धांतों पर आधारित है।

प्रकाशीय उपकरणों का उद्देश्य या तो सूक्ष्म वस्तुओं को स्पष्ट दिखाना होता है या दूर स्थित वस्तुओं को निकट और विस्तृत रूप में प्रस्तुत करना। इसी लक्ष्य के अनुरूप विभिन्न उपकरणों की संरचना विकसित की गई है।

सूक्ष्मदर्शी (Microscope)

सूक्ष्मदर्शी का उपयोग अत्यंत छोटी वस्तुओं को देखने के लिए किया जाता है। सरल सूक्ष्मदर्शी एक उत्तल लेंस पर आधारित होता है, जो वस्तु का आभासी, सीधा और आवर्धित प्रतिबिंब बनाता है।

संयोजित सूक्ष्मदर्शी में दो लेंसों का प्रयोग किया जाता है— एक उद्देश्य लेंस और एक नेत्र लेंस। इन दोनों के संयुक्त प्रभाव से वस्तु का अत्यधिक आवर्धित प्रतिबिंब प्राप्त होता है, जो वैज्ञानिक अनुसंधान में अत्यंत उपयोगी सिद्ध होता है।

दूरबीन (Telescope)

दूरबीन का उद्देश्य दूर स्थित वस्तुओं को स्पष्ट और विस्तृत रूप में देखना है। खगोलीय दूरबीन दो उत्तल लेंसों— उद्देश्य और नेत्र— के संयोजन पर आधारित होती है।

उद्देश्य लेंस दूर स्थित वस्तु का वास्तविक और उल्टा प्रतिबिंब बनाता है, जिसे नेत्र लेंस आभासी और बड़ा बनाकर नेत्र के लिए उपयुक्त करता है। इसी सिद्धांत पर आधुनिक दूरबीनों का विकास हुआ है।


Physics Chapter Series – RBSE Class 12

मानव नेत्र : संरचना और कार्य

मानव नेत्र प्रकृति द्वारा विकसित एक अत्यंत परिष्कृत प्रकाशीय उपकरण है। यह अपवर्तन के सिद्धांत पर कार्य करता है और बाह्य वस्तुओं से आने वाली प्रकाश किरणों को रेटिना पर केंद्रित कर दृष्टि की अनुभूति कराता है। किरण प्रकाशिकी के नियम मानव नेत्र की कार्यप्रणाली को सुस्पष्ट रूप से समझाने में सक्षम हैं।

नेत्र में प्रवेश करने वाली प्रकाश किरणें कॉर्निया और नेत्र लेंस से होकर गुजरती हैं। कॉर्निया प्रारंभिक अपवर्तन करता है, जबकि लचीला नेत्र लेंस अपवर्तन को समायोजित कर विभिन्न दूरियों की वस्तुओं का स्पष्ट प्रतिबिंब रेटिना पर बनाता है।

आवास (Accommodation) की अवधारणा

नेत्र लेंस की एक विशेष क्षमता वस्तु की दूरी के अनुसार अपनी फोकस दूरी बदलने की होती है। इस क्षमता को आवास कहा जाता है। आवास के कारण मानव नेत्र निकट और दूर दोनों प्रकार की वस्तुओं को स्पष्ट देख सकता है।

यह प्रक्रिया नेत्र लेंस की वक्रता में सूक्ष्म परिवर्तन के माध्यम से संपन्न होती है। दूर की वस्तु के लिए लेंस अपेक्षाकृत पतला हो जाता है, जबकि निकट वस्तु के लिए उसकी वक्रता बढ़ जाती है।

दृष्टि दोषों का उद्गम

जब नेत्र की प्रकाशीय प्रणाली प्रकाश किरणों को रेटिना पर सही ढंग से केंद्रित करने में असमर्थ हो जाती है, तो दृष्टि दोष उत्पन्न होते हैं। ये दोष नेत्र की संरचना या लेंस की आवास क्षमता में परिवर्तन के कारण उत्पन्न हो सकते हैं।

दृष्टि दोष दैनिक जीवन को प्रभावित करते हैं, परंतु किरण प्रकाशिकी के सिद्धांतों का प्रयोग कर इनका प्रभावी सुधार संभव है।

निकट दृष्टि दोष (Myopia)

निकट दृष्टि दोष में व्यक्ति निकट की वस्तुओं को स्पष्ट देख पाता है, परंतु दूर की वस्तुएँ धुँधली दिखाई देती हैं। इस स्थिति में दूर की वस्तु से आने वाली किरणें रेटिना के पहले ही एकत्रित हो जाती हैं।

इस दोष का सुधार उचित फोकस दूरी वाले अवतल लेंस के प्रयोग से किया जाता है। अवतल लेंस किरणों को थोड़ा फैला देता है, जिससे वे रेटिना पर ठीक से केंद्रित हो सकें।

दूर दृष्टि दोष (Hypermetropia)

दूर दृष्टि दोष में व्यक्ति दूर की वस्तुओं को अपेक्षाकृत स्पष्ट देख पाता है, परंतु निकट की वस्तुएँ स्पष्ट नहीं दिखाई देतीं। इसमें निकट वस्तु की किरणें रेटिना के पीछे जाकर एकत्रित होती हैं।

इस दोष के सुधार के लिए उत्तल लेंस का प्रयोग किया जाता है। उत्तल लेंस किरणों को पहले ही कुछ हद तक एकत्रित कर देता है, जिससे नेत्र लेंस के लिए रेटिना पर फोकस बनाना संभव हो जाता है।

वृद्धावस्था दृष्टि दोष (Presbyopia)

वृद्धावस्था दृष्टि दोष आवास क्षमता के क्षय के कारण उत्पन्न होता है। आयु बढ़ने के साथ नेत्र लेंस की लचक कम हो जाती है, जिससे निकट वस्तुओं को देखना कठिन हो जाता है।

इस दोष का सुधार उचित शक्ति के द्विफोकसी या प्रगतिशील लेंसों द्वारा किया जाता है। इन लेंसों में निकट और दूर दोनों प्रकार की दृष्टि के लिए उपयुक्त अपवर्तन व्यवस्था होती है।

किरण प्रकाशिकी का समेकित महत्व

मानव नेत्र, दर्पण, लेंस और प्रकाशीय उपकरण— ये सभी किरण प्रकाशिकी के एक ही सैद्धांतिक ढाँचे से जुड़े हुए हैं। इसी कारण, यह अध्याय न केवल परीक्षा की दृष्टि से, बल्कि दृष्टि और तकनीक की समग्र समझ के लिए भी अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।

किरण प्रकाशिकी प्रकाश को समझने का एक सशक्त और व्यावहारिक माध्यम प्रदान करती है, जो आगे चलकर तरंग प्रकाशिकी और आधुनिक प्रकाश विज्ञान की भूमिका को भी स्पष्ट करती है।

समेकित दृष्टिकोण

किरण प्रकाशिकी प्रकाश के उस व्यवहार का अध्ययन प्रस्तुत करती है जहाँ प्रकाश को सीधी रेखाओं में गमन करने वाली किरणों के रूप में माना जाता है। परावर्तन और अपवर्तन के नियम, दर्पण और लेंस, तथा मानव नेत्र और प्रकाशीय उपकरण— ये सभी इसी ज्यामितीय दृष्टिकोण के स्वाभाविक विस्तार हैं।

इस अध्याय में यह स्पष्ट हुआ कि प्रकाशीय उपकरणों की कार्यप्रणाली कुछ सरल किंतु गहन सिद्धांतों पर आधारित होती है। इन सिद्धांतों की सहायता से न केवल प्रतिबिंब निर्माण को समझा जा सकता है, बल्कि दृष्टि दोषों का वैज्ञानिक समाधान भी संभव हो पाता है।

संक्षिप्त नोट्स

  • किरण प्रकाशिकी प्रकाश को सीधी रेखा में गमन करता मानती है।
  • परावर्तन में आपतन कोण = परावर्तन कोण होता है।
  • अवतल दर्पण अभिसारी और उत्तल दर्पण अपसारी होता है।
  • लेंसों में अपवर्तन के कारण प्रतिबिंब बनता है।
  • उत्तल लेंस अभिसारी तथा अवतल लेंस अपसारी होता है।
  • मानव नेत्र अपवर्तन के सिद्धांत पर कार्य करता है।
  • दृष्टि दोषों का सुधार उपयुक्त लेंसों द्वारा किया जाता है।

संबंधित प्रयोग (संक्षेप में)

  • गोलीय दर्पण द्वारा प्रतिबिंब निर्माण: विभिन्न वस्तु स्थितियों पर प्रतिबिंब की स्थिति और प्रकृति का अध्ययन।
  • लेंस सूत्र का सत्यापन: उत्तल लेंस द्वारा बने प्रतिबिंबों से लेंस सूत्र और आवर्धन का प्रयोगात्मक सत्यापन।
  • दृष्टि दोषों का अध्ययन: मॉडल की सहायता से निकट एवं दूर दृष्टि दोषों की व्याख्या।

वैज्ञानिक योगदान

  • यूक्लिड: प्रकाश के सीधी रेखा में गमन की अवधारणा।
  • इब्न अल-हैथम (Alhazen): दृष्टि और परावर्तन पर वैज्ञानिक अध्ययन, प्रकाशिकी की आधारशिला।
  • रेने देकार्त: अपवर्तन के नियमों का विकास।

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यह अध्ययन सामग्री राजस्थान माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (RBSE) के निर्धारित पाठ्यक्रम के अनुरूप शैक्षणिक उद्देश्य से तैयार की गई है। परीक्षा में अंतिम उत्तर लेखन हेतु आधिकारिक पाठ्यपुस्तकों का अध्ययन आवश्यक है।

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