अर्धचालक इलेक्ट्रॉनिकी : पदार्थ, युक्तियाँ एवं सरल परिपथ
आधुनिक विज्ञान और प्रौद्योगिकी का लगभग सम्पूर्ण ढाँचा उन सूक्ष्म युक्तियों पर आधारित है, जिनका संचालन विद्युत आवेशों के नियंत्रित प्रवाह से होता है। इन युक्तियों की आधारशिला अर्धचालक इलेक्ट्रॉनिकी है, जिसने मानव समाज को यांत्रिक युग से निकालकर डिजिटल युग में प्रवेश कराया।
कम्प्यूटर, मोबाइल फ़ोन, उपग्रह संचार, इंटरनेट, चिकित्सा उपकरण, स्वचालित नियंत्रण प्रणालियाँ तथा कृत्रिम बुद्धिमत्ता — इन सभी के मूल में अर्धचालक पदार्थों का सुव्यवस्थित उपयोग निहित है। इस अध्याय में उन्हीं मूलभूत भौतिक सिद्धांतों का क्रमबद्ध अध्ययन किया गया है, जो इन तकनीकों को संभव बनाते हैं।
पदार्थों का विद्युत वर्गीकरण
विद्युत व्यवहार के आधार पर ठोस पदार्थों को तीन प्रमुख वर्गों में विभाजित किया जाता है: चालक, कुचालक तथा अर्धचालक। यह वर्गीकरण इस बात पर निर्भर करता है कि पदार्थ में विद्युत आवेश कितनी सरलता से गति कर सकता है।
चालक (Conductors)
चालक वे पदार्थ हैं जिनमें मुक्त इलेक्ट्रॉनों की संख्या अधिक होती है। धातुएँ जैसे ताँबा, चाँदी तथा एल्युमिनियम इस श्रेणी में आते हैं। इनमें विद्युत क्षेत्र लगाने पर इलेक्ट्रॉन आसानी से गति करते हैं, जिससे बड़ी मात्रा में विद्युत धारा प्रवाहित होती है।
कुचालक (Insulators)
कुचालक पदार्थों में मुक्त आवेश वाहकों की संख्या अत्यंत कम होती है। रबर, काँच, प्लास्टिक और अभ्रक जैसे पदार्थ विद्युत धारा के प्रवाह का प्रबल विरोध करते हैं। इनका उपयोग विद्युत सुरक्षा तथा पृथक्करण के लिए किया जाता है।
अर्धचालक (Semiconductors)
अर्धचालक पदार्थ चालक और कुचालक के बीच का व्यवहार प्रदर्शित करते हैं। सामान्य ताप पर इनमें सीमित मात्रा में विद्युत चालकता होती है, परंतु तापमान, प्रकाश अथवा अशुद्धि मिलाने पर इनकी चालकता में उल्लेखनीय परिवर्तन किया जा सकता है।
सिलिकॉन और जर्मेनियम सर्वाधिक महत्वपूर्ण अर्धचालक हैं। इन्हीं पदार्थों पर आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक उद्योग आधारित है।
ऊर्जा बैंड सिद्धांत का आधार
अर्धचालकों के विद्युत गुणों को समझने के लिए ऊर्जा बैंड सिद्धांत अत्यंत आवश्यक है। परमाणु स्तर पर इलेक्ट्रॉन निश्चित ऊर्जा अवस्थाओं में रहते हैं। जब अनेक परमाणु मिलकर ठोस बनाते हैं, तो ये अवस्थाएँ विस्तृत ऊर्जा बैंड का रूप ले लेती हैं।
दो प्रमुख ऊर्जा बैंड होते हैं: संयोजक बैंड तथा चालकता बैंड। इन दोनों के बीच का अंतराल वर्जित ऊर्जा अंतराल कहलाता है।
अर्धचालकों में यह वर्जित ऊर्जा अंतराल इतना होता है कि सामान्य परिस्थितियों में कुछ इलेक्ट्रॉन संयोजक बैंड से चालकता बैंड में जा सकें, और विद्युत धारा का सीमित प्रवाह संभव हो।
आंतरिक अर्धचालक (Intrinsic Semiconductor)
जब किसी अर्धचालक पदार्थ को अत्यंत शुद्ध अवस्था में प्राप्त किया जाता है, और उसमें किसी प्रकार की बाहरी अशुद्धि नहीं मिलाई जाती, तो उसे आंतरिक अर्धचालक कहा जाता है। सिलिकॉन और जर्मेनियम की शुद्ध क्रिस्टलीय अवस्था इसका प्रमुख उदाहरण है।
आंतरिक अर्धचालक में सामान्य ताप पर अधिकांश इलेक्ट्रॉन संयोजक बैंड में बंधे रहते हैं। किन्तु तापीय ऊर्जा प्राप्त होने पर कुछ इलेक्ट्रॉन वर्जित ऊर्जा अंतराल को पार कर चालकता बैंड में पहुँच जाते हैं।
इलेक्ट्रॉन–होल युग्म की उत्पत्ति
जब कोई इलेक्ट्रॉन संयोजक बैंड छोड़कर चालकता बैंड में प्रवेश करता है, तो संयोजक बैंड में एक रिक्त स्थान उत्पन्न हो जाता है। इस रिक्त स्थान को होल कहा जाता है।
होल वास्तविक कण नहीं होता, परंतु इसका व्यवहार धनात्मक आवेश वाहक के समान होता है। अतः आंतरिक अर्धचालक में विद्युत धारा का प्रवाह दोनों के कारण होता है — मुक्त इलेक्ट्रॉन तथा होल।
इस अवस्था में इलेक्ट्रॉन और होल हमेशा युग्म के रूप में उत्पन्न होते हैं, अतः उनकी संख्या समान होती है। यही कारण है कि आंतरिक अर्धचालक की चालकता सीमित होती है।
तापमान का प्रभाव
आंतरिक अर्धचालक की चालकता तापमान पर अत्यधिक निर्भर करती है। जैसे-जैसे ताप बढ़ाया जाता है, अधिक इलेक्ट्रॉन संयोजक बैंड से मुक्त होकर चालकता बैंड में पहुँचते हैं।
इस कारण आंतरिक अर्धचालक की चालकता ताप बढ़ने पर बढ़ती है, जो इसे चालकों से स्पष्ट रूप से भिन्न बनाती है। यही गुण अर्धचालकों को संवेदनशील एवं नियंत्रित इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के लिए उपयुक्त बनाता है।
आंतरिक अर्धचालक की सीमाएँ
यद्यपि आंतरिक अर्धचालक भौतिकी की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं, परंतु व्यावहारिक उपयोगों में इनकी सीमाएँ स्पष्ट हो जाती हैं।
सामान्य ताप पर इनकी चालकता अत्यधिक कम होती है, जिससे इन्हें सीधे इलेक्ट्रॉनिक युक्तियों में प्रयोग करना संभव नहीं होता। इसी समस्या के समाधान ने अगले महत्वपूर्ण विचार को जन्म दिया — डोपिंग।
डोपिंग द्वारा अर्धचालक की चालकता को नियंत्रित रूप से बढ़ाया जा सकता है, जिससे आधुनिक इलेक्ट्रॉनिकी का वास्तविक विकास संभव हुआ।
डोपिंग की आवश्यकता
आंतरिक अर्धचालक की सीमित चालकता व्यावहारिक इलेक्ट्रॉनिक युक्तियों के लिए पर्याप्त नहीं होती। आधुनिक परिपथों में धारा का सटीक और विश्वसनीय नियंत्रण आवश्यक है, जो केवल शुद्ध अर्धचालक से संभव नहीं।
इसी आवश्यकता ने डोपिंग की अवधारणा को जन्म दिया। डोपिंग वह प्रक्रिया है जिसमें अर्धचालक क्रिस्टल में अत्यल्प मात्रा में विशिष्ट अशुद्धियाँ मिलाई जाती हैं, ताकि उसकी विद्युत चालकता नियंत्रित रूप से बढ़ाई जा सके।
यह ध्यान देने योग्य है कि डोपिंग से अर्धचालक की क्रिस्टलीय संरचना नष्ट नहीं होती। अशुद्धि परमाणु मूल क्रिस्टल में नियमित रूप से समाहित हो जाते हैं, और नए विद्युत गुण उत्पन्न करते हैं।
डोपिंग का भौतिक आधार
सिलिकॉन और जर्मेनियम जैसे अर्धचालक परमाणु चार संयोजक इलेक्ट्रॉनों वाले होते हैं। क्रिस्टल संरचना में प्रत्येक परमाणु चार सहसंयोजक बंध बनाता है, जिससे संरचना स्थिर रहती है।
जब इस संरचना में भिन्न संयोजकता वाला परमाणु प्रतिस्थापित किया जाता है, तो बंधन व्यवस्था में सूक्ष्म असंतुलन उत्पन्न होता है। यही असंतुलन नए आवेश वाहकों के उत्पादन का कारण बनता है।
n-प्रकार अर्धचालक
यदि चतुर्संयोजक अर्धचालक में पंचसंयोजक अशुद्धि जैसे फॉस्फोरस, आर्सेनिक या एंटीमनी मिलाई जाए, तो प्रत्येक अशुद्धि परमाणु चार बंधों में भाग लेता है और एक इलेक्ट्रॉन बंध से मुक्त रह जाता है।
यह मुक्त इलेक्ट्रॉन बहुत कम ऊर्जा प्राप्त करके चालकता बैंड में पहुँच सकता है। फलस्वरूप अर्धचालक में मुक्त इलेक्ट्रॉनों की संख्या अत्यधिक बढ़ जाती है।
इस प्रकार प्राप्त अर्धचालक को n-प्रकार अर्धचालक कहा जाता है। यहाँ इलेक्ट्रॉन प्रमुख आवेश वाहक होते हैं, जबकि होल अल्पसंख्यक वाहक के रूप में उपस्थित रहते हैं।
n-प्रकार अर्धचालक का ऊर्जा-बैंड दृष्टिकोण
ऊर्जा बैंड के संदर्भ में n-प्रकार अर्धचालक में चालकता बैंड के ठीक नीचे एक नया ऊर्जा स्तर प्रकट होता है। इसे दाता स्तर कहा जाता है।
इस दाता स्तर से इलेक्ट्रॉन को चालकता बैंड में पहुँचने के लिए अत्यल्प ऊर्जा की आवश्यकता होती है। इसी कारण n-प्रकार अर्धचालक सामान्य ताप पर ही उच्च चालकता प्रदर्शित करता है।
p-प्रकार अर्धचालक
यदि चतुर्संयोजक अर्धचालक में त्रिसंयोजक अशुद्धि जैसे बोरॉन, एल्यूमिनियम या गैलियम मिलाई जाए, तो बंधन व्यवस्था में एक इलेक्ट्रॉन की कमी रह जाती है।
यह कमी संयोजक बैंड में एक रिक्त स्थान के रूप में प्रकट होती है, जिसे होल कहा जाता है। होल का व्यवहार धनात्मक आवेश वाहक के समान होता है।
इस प्रकार प्राप्त अर्धचालक को p-प्रकार अर्धचालक कहा जाता है। यहाँ होल प्रमुख आवेश वाहक होते हैं, जबकि इलेक्ट्रॉन अल्पसंख्यक रहते हैं।
p-प्रकार अर्धचालक का ऊर्जा-बैंड दृष्टिकोण
p-प्रकार अर्धचालक में संयोजक बैंड के ठीक ऊपर एक नया ऊर्जा स्तर उत्पन्न होता है, जिसे स्वीकर्ता स्तर कहा जाता है।
इस स्तर पर इलेक्ट्रॉन आसानी से स्थानांतरित हो सकते हैं, जिससे होल की प्रभावी गति संभव होती है। इसी प्रक्रिया के कारण p-प्रकार अर्धचालक विद्युत धारा का विश्वसनीय वहन कर पाता है।
डोपिंग के माध्यम से अर्धचालकों में आवेश वाहकों के प्रकार और संख्या को सटीक रूप से नियंत्रित किया जा सकता है। यही नियंत्रण आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक युक्तियों की मूलभूत शर्त है।
p–n संधि (p–n Junction) का निर्माण
जब p-प्रकार और n-प्रकार अर्धचालकों को निकट संपर्क में लाया जाता है, तो उनके संपर्क क्षेत्र में एक विशेष संरचना का निर्माण होता है, जिसे p–n संधि कहा जाता है। यही संरचना अर्धचालक इलेक्ट्रॉनिकी की केन्द्रीय अवधारणा है।
संधि बनने के तुरंत बाद n-प्रकार क्षेत्र के मुक्त इलेक्ट्रॉन और p-प्रकार क्षेत्र के होल सांद्रता के अंतर के कारण एक-दूसरे की ओर विसरित होने लगते हैं। इलेक्ट्रॉन p-क्षेत्र में जाकर होल से पुनर्संयोजित हो जाते हैं, और इसी प्रकार कुछ होल n-क्षेत्र में प्रवेश करते हैं।
अपक्षय परत (Depletion Layer)
इस विसरण एवं पुनर्संयोजन के परिणामस्वरूप संधि के आसपास का क्षेत्र मुक्त आवेश वाहकों से लगभग रिक्त हो जाता है। इस क्षेत्र को अपक्षय परत कहा जाता है।
अपक्षय परत में केवल स्थिर आयन शेष रह जाते हैं— n-क्षेत्र में धनात्मक आयन और p-क्षेत्र में ऋणात्मक आयन। ये आयन एक आंतरिक विद्युत क्षेत्र उत्पन्न करते हैं, जो आगे के विसरण का विरोध करता है।
आंतरिक विद्युत क्षेत्र एवं अवरोध विभव
अपक्षय परत में उत्पन्न आंतरिक विद्युत क्षेत्र एक विभवांतर को जन्म देता है, जिसे अवरोध विभव कहा जाता है। यह विभव बहुसंख्यक आवेश वाहकों को संधि पार करने से रोकता है।
एक समय के बाद विसरण प्रवृत्ति और आंतरिक विद्युत क्षेत्र द्वारा उत्पन्न बल संतुलन में आ जाते हैं। इस अवस्था में p–n संधि स्थिर संतुलन अवस्था में पहुँच जाती है, और बिना किसी बाह्य प्रभाव के धारा प्रवाहित नहीं होती।
p–n संधि का ऊर्जा-बैंड आरेख
ऊर्जा-बैंड दृष्टिकोण से देखने पर p–n संधि का व्यवहार और अधिक स्पष्ट हो जाता है। संधि बनने से पहले p और n क्षेत्रों के फर्मी स्तर अलग-अलग होते हैं।
संधि बनने के बाद इलेक्ट्रॉनों के पुनर्वितरण के कारण दोनों क्षेत्रों का फर्मी स्तर एक ही स्तर पर आ जाता है। इस प्रक्रिया में ऊर्जा बैंडों में वक्रता उत्पन्न होती है, जो अपक्षय परत और अवरोध विभव को दर्शाती है।
p–n संधि का दिशा-संवेदनशील व्यवहार
p–n संधि का सबसे महत्वपूर्ण गुण उसका दिशा-संवेदनशील होना है। यह संधि एक दिशा में आवेश वाहकों के प्रवाह को सुगम बनाती है, जबकि दूसरी दिशा में उसका प्रबल विरोध करती है।
यही गुण डायोड जैसे अर्धचालक उपकरणों का मूल आधार बनता है। p–n संधि के बिना आधुनिक रेक्टिफिकेशन, संकेत संसाधन और स्विचिंग तकनीकें संभव नहीं होतीं।
संधि की भौतिक महत्ता
p–n संधि सिर्फ दो भिन्न अर्धचालकों का संपर्क नहीं, बल्कि एक ऐसी भौतिक व्यवस्था है जहाँ सूक्ष्म स्तर पर विद्युत क्षेत्र, विभव और आवेश वाहकों का संतुलन एक साथ कार्य करता है।
इस संतुलन को समझे बिना न तो डायोड का व्यवहार स्पष्ट हो सकता है और न ही ट्रांजिस्टर जैसे जटिल उपकरणों की कार्यप्रणाली।
p–n संधि पर बाह्य बायस
p–n संधि का व्यवहार तब पूर्ण रूप से स्पष्ट होता है जब उस पर बाह्य विभव लगाया जाता है। इस बाह्य विभव को बायस कहा जाता है। बायस के माध्यम से संधि के भीतर उत्पन्न आंतरिक विद्युत क्षेत्र को या तो कम किया जा सकता है या बढ़ाया जा सकता है।
बायस के प्रकार के अनुसार p–n संधि का विद्युत व्यवहार मौलिक रूप से बदल जाता है। इसी गुण के कारण p–n संधि एक दिशा में धारा का प्रवाह स्वीकार करती है और दूसरी दिशा में उसका विरोध करती है।
अग्र बायस (Forward Bias)
जब p-प्रकार क्षेत्र को बैटरी के धनात्मक सिरे से और n-प्रकार क्षेत्र को ऋणात्मक सिरे से जोड़ा जाता है, तो p–n संधि अग्र बायस में होती है।
इस अवस्था में बाह्य विद्युत क्षेत्र आंतरिक अवरोध विभव का विरोध करता है। फलस्वरूप अपक्षय परत की चौड़ाई कम हो जाती है, और बहुसंख्यक आवेश वाहक संधि पार करने में सक्षम हो जाते हैं।
जैसे ही बाह्य विभव अवरोध विभव के तुल्य या उससे अधिक हो जाता है, p–n संधि से धारा का प्रवाह तीव्रता से बढ़ने लगता है। यही अवस्था डायोड के चालक व्यवहार को स्पष्ट करती है।
पश्च बायस (Reverse Bias)
जब p-प्रकार क्षेत्र को बैटरी के ऋणात्मक सिरे से और n-प्रकार क्षेत्र को धनात्मक सिरे से जोड़ा जाता है, तो p–n संधि पश्च बायस में होती है।
इस स्थिति में बाह्य विद्युत क्षेत्र आंतरिक विद्युत क्षेत्र को और अधिक प्रबल बना देता है। अपक्षय परत की चौड़ाई बढ़ जाती है, जिससे बहुसंख्यक वाहकों का प्रवाह लगभग रुक जाता है।
हालाँकि, अल्पसंख्यक वाहकों के कारण अत्यल्प धारा अब भी प्रवाहित होती है। इस धारा को पश्च संतृप्ति धारा कहा जाता है।
p–n संधि का V–I व्यवहार
p–n संधि के विद्युत गुणों को V–I विशेषता वक्र द्वारा समझा जाता है। अग्र बायस में एक निश्चित विभव के बाद धारा तीव्रता से बढ़ती है, जबकि पश्च बायस में धारा लगभग स्थिर रहती है।
यह वक्र यह दर्शाता है कि p–n संधि एक आदर्श एकदिशीय चालक नहीं, बल्कि एक नियंत्रित अर्धचालक युक्ति है।
डायोड का भौतिक अर्थ
p–n संधि पर आधारित युक्ति को डायोड कहा जाता है। डायोड का मूल कार्य विद्युत धारा को एक दिशा में प्रवाहित होने देना और दूसरी दिशा में उसका विरोध करना है।
डायोड का यह व्यवहार केवल परिपथीय नियमों का परिणाम नहीं, बल्कि अपक्षय परत, आंतरिक विद्युत क्षेत्र और आवेश वाहकों के सूक्ष्म संतुलन का प्रत्यक्ष परिणाम है।
डायोड की उपयोगिता का आधार
डायोड की दिशा-संवेदनशीलता इसे रेक्टिफिकेशन, संकेत संसाधन और विद्युत सुरक्षा परिपथों में अत्यंत उपयोगी बनाती है।
डायोड के बिना परिवर्ती धारा को एकदिशीय धारा में बदलना संभव नहीं होता, और न ही संवेदनशील इलेक्ट्रॉनिक युक्तियों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सकती।
ज़ेनर डायोड (Zener Diode)
डायोडों के व्यवहार का अध्ययन करते समय यह स्पष्ट होता है कि सामान्य p–n संधि डायोड पश्च बायस में धारा के प्रवाह का विरोध करती है। किन्तु एक विशेष रूप से निर्मित डायोड ऐसा भी होता है, जो पश्च बायस की एक निश्चित अवस्था में स्थिर और नियंत्रित व्यवहार प्रदर्शित करता है। इसी विशेष युक्ति को ज़ेनर डायोड कहा जाता है।
ज़ेनर डायोड को इस प्रकार डिज़ाइन किया जाता है कि उसका अपक्षय क्षेत्र अत्यंत पतला हो। फलस्वरूप, जब पश्च बायस विभव एक निश्चित मान तक पहुँचता है, तो संधि में अचानक धारा का प्रवाह प्रारम्भ हो जाता है, परन्तु डायोड के सिरों के बीच विभव लगभग स्थिर बना रहता है।
ज़ेनर विभव एवं ब्रेकडाउन
जिस पश्च विभव पर ज़ेनर डायोड में अचानक धारा प्रवाहित होने लगती है, उसे ज़ेनर विभव कहा जाता है। यह विभव डायोड की संरचना, डोपिंग स्तर और पदार्थ की प्रकृति पर निर्भर करता है।
इस अवस्था को ज़ेनर ब्रेकडाउन कहा जाता है। यह ब्रेकडाउन सामान्य डायोड के ब्रेकडाउन से भिन्न होता है, क्योंकि यहाँ प्रक्रिया नियंत्रित एवं प्रतिवर्ती होती है। यदि धारा को अनुमत सीमा में रखा जाए, तो डायोड को कोई क्षति नहीं होती।
ज़ेनर डायोड का भौतिक आधार
ज़ेनर ब्रेकडाउन का कारण अपक्षय परत में उत्पन्न अत्यधिक प्रबल विद्युत क्षेत्र है। यह क्षेत्र संयोजक इलेक्ट्रॉनों को बंधन से मुक्त कर देता है, जिससे धारा में तीव्र वृद्धि होती है।
इस प्रक्रिया में ऊर्जा का अवशोषण या उत्सर्जन असामान्य नहीं होता, बल्कि इलेक्ट्रॉनों की स्थिति में सूक्ष्म पुनर्व्यवस्था होती है। यही कारण है कि ज़ेनर डायोड स्थिर विभव प्रदान करने में सक्षम होता है।
विभव नियमन में ज़ेनर डायोड
ज़ेनर डायोड का सर्वाधिक महत्वपूर्ण उपयोग विभव नियमन में होता है। इसे उपयुक्त श्रृंखला प्रतिरोध के साथ परिपथ में जोड़ा जाता है, ताकि धारा को नियंत्रित रखा जा सके।
जब बाह्य स्रोत विभव में उतार–चढ़ाव होता है, तो ज़ेनर डायोड अपने सिरों के बीच लगभग स्थिर विभव बनाए रखता है। इस प्रकार संवेदनशील इलेक्ट्रॉनिक परिपथों को अवांछित विभव परिवर्तनों से सुरक्षित रखा जा सकता है।
ज़ेनर डायोड का महत्व
ज़ेनर डायोड यह दर्शाता है कि कभी-कभी जो प्रक्रिया सामान्यतः अवांछनीय मानी जाती है, वही नियंत्रित रूप में अत्यंत उपयोगी बन सकती है। यह अवधारणा अर्धचालक इलेक्ट्रॉनिकी की परिपक्वता को दर्शाती है।
ज़ेनर डायोड के अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि p–n संधि का व्यवहार केवल अग्र एवं पश्च बायस तक सीमित नहीं, बल्कि उचित संरचना के साथ नए कार्य भी संभव हैं।
ट्रांजिस्टर : संरचना एवं आवश्यकता
डायोड विद्युत धारा को केवल एक दिशा में नियंत्रित कर सकता है, परंतु आधुनिक इलेक्ट्रॉनिकी में ऐसी युक्ति की आवश्यकता होती है जो धारा को न केवल नियंत्रित करे, बल्कि एक छोटे संकेत द्वारा बड़े विद्युत प्रभाव को नियंत्रित कर सके। इसी आवश्यकता से ट्रांजिस्टर का विकास हुआ।
ट्रांजिस्टर तीन अर्धचालक क्षेत्रों से मिलकर बना होता है, जो दो p–n संधियों का निर्माण करते हैं। इसकी संरचना के आधार पर ट्रांजिस्टर के दो प्रमुख प्रकार होते हैं— n–p–n तथा p–n–p।
ट्रांजिस्टर के तीन भाग
ट्रांजिस्टर के तीन विशिष्ट भाग होते हैं— एमिटर (Emitter), बेस (Base) तथा कलेक्टर (Collector)। इन तीनों भागों की डोपिंग एवं भौतिक भूमिका एक-दूसरे से भिन्न होती है।
- एमिटर: यह भाग अत्यधिक डोप किया जाता है, ताकि अधिक संख्या में आवेश वाहक प्रदान कर सके।
- बेस: यह अत्यंत पतला और हल्का डोप किया जाता है, ताकि इसमें प्रवेश करने वाले अधिकांश आवेश वाहक कलेक्टर तक पहुँच सकें।
- कलेक्टर: यह मध्यम रूप से डोप किया जाता है और इसका आकार अपेक्षाकृत बड़ा होता है, ताकि ऊष्मा का अपसारण संभव हो।
ट्रांजिस्टर का कार्य सिद्धांत
ट्रांजिस्टर का मूल सिद्धांत दो p–n संधियों के भिन्न बायस पर आधारित है। सामान्यतः एमिटर–बेस संधि को अग्र बायस में और कलेक्टर–बेस संधि को पश्च बायस में रखा जाता है।
इस व्यवस्था में एमिटर से निकलने वाले बहुसंख्यक आवेश वाहक बेस में प्रवेश करते हैं। चूँकि बेस अत्यंत पतला होता है, इनमें से बहुत कम वाहक बेस में पुनर्संयोजित होते हैं, और अधिकांश कलेक्टर की ओर आकर्षित हो जाते हैं।
इस प्रकार बेस में प्रवाहित अत्यल्प धारा कलेक्टर में अधिक धारा को नियंत्रित करती है। यही गुण ट्रांजिस्टर को अत्यंत शक्तिशाली इलेक्ट्रॉनिक युक्ति बनाता है।
ट्रांजिस्टर में प्रवर्धन का भौतिक अर्थ
ट्रांजिस्टर द्वारा किया गया प्रवर्धन ऊर्जा के निर्माण का परिणाम नहीं, बल्कि ऊर्जा नियंत्रण की प्रक्रिया है। इनपुट संकेत बेस धारा के रूप में केवल नियंत्रण संकेत प्रदान करता है, जबकि आवश्यक ऊर्जा बाह्य स्रोत से प्राप्त होती है।
इस दृष्टि से ट्रांजिस्टर एक ऐसा उपकरण है जो सूक्ष्म विद्युत संकेतों को व्यावहारिक रूप से उपयोगी बड़े संकेतों में परिवर्तित करता है।
ट्रांजिस्टर का ऐतिहासिक महत्व
ट्रांजिस्टर का आविष्कार आधुनिक विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के सबसे निर्णायक मोड़ों में से एक है। इसने वैक्यूम ट्यूबों का स्थान लिया, उपकरणों को छोटा, ऊर्जा दक्ष और अधिक विश्वसनीय बनाया।
कम्प्यूटर, रेडियो, टीवी, मोबाइल संचार और डिजिटल परिपथों का विस्तार ट्रांजिस्टर के बिना कल्पना से परे है।
ट्रांजिस्टर के विन्यास (Configurations)
ट्रांजिस्टर का व्यवहार केवल उसकी संरचना से ही नहीं, बल्कि इस बात से भी निर्धारित होता है कि परिपथ में उसे किस प्रकार जोड़ा गया है। एमिटर, बेस और कलेक्टर में से किस टर्मिनल को इनपुट और आउटपुट के लिए सामान्य रखा गया है, इसी आधार पर ट्रांजिस्टर के विभिन्न विन्यास परिभाषित होते हैं।
इन विन्यासों का अध्ययन यह स्पष्ट करता है कि एक ही ट्रांजिस्टर विभिन्न परिस्थितियों में भिन्न विद्युत गुण प्रदर्शित कर सकता है।
सामान्य बेस विन्यास (Common Base)
इस विन्यास में बेस टर्मिनल को इनपुट और आउटपुट दोनों के लिए सामान्य रखा जाता है। एमिटर से इनपुट और कलेक्टर से आउटपुट प्राप्त किया जाता है।
इस व्यवस्था में धारा प्रवर्धन अपेक्षाकृत कम होता है, परंतु वोल्टेज प्रवर्धन अधिक होता है। यह विन्यास उच्च आवृत्ति अनुप्रयोगों में उपयोगी सिद्ध होता है।
सामान्य एमिटर विन्यास (Common Emitter)
सामान्य एमिटर विन्यास सबसे अधिक प्रचलित एवं उपयोगी है। इसमें एमिटर टर्मिनल को सामान्य रखा जाता है, बेस इनपुट के लिए और कलेक्टर आउटपुट के लिए प्रयुक्त होता है।
इस विन्यास में धारा और वोल्टेज दोनों का उल्लेखनीय प्रवर्धन प्राप्त होता है। इसी कारण अधिकांश प्रवर्धक परिपथों में इसी विन्यास का प्रयोग किया जाता है।
यहाँ यह विशेष रूप से ध्यान देने योग्य है कि इनपुट संकेत में अत्यल्प परिवर्तन आउटपुट में बड़े परिवर्तन को जन्म देता है। यही गुण इलेक्ट्रॉनिक संकेतों को प्रक्रियायुक्त करने में अत्यंत उपयोगी है।
सामान्य कलेक्टर विन्यास (Common Collector)
इस विन्यास में कलेक्टर टर्मिनल को सामान्य रखा जाता है। इसे एमिटर फॉलोअर भी कहा जाता है।
इस व्यवस्था में वोल्टेज प्रवर्धन लगभग एक के बराबर होता है, परंतु धारा प्रवर्धन अधिक प्राप्त होता है। यह विन्यास प्रतिबाधा मिलान (impedance matching) के लिए विशेष रूप से उपयोगी है।
ट्रांजिस्टर के विन्यासों की तुलनात्मक दृष्टि
इन तीनों विन्यासों का अध्ययन यह स्पष्ट करता है कि ट्रांजिस्टर एक बहुपयोगी युक्ति है। परिपथ की आवश्यकता के अनुसार उचित विन्यास का चयन करके इसे प्रवर्धन, स्विचिंग या संकेत संसाधन के लिए प्रयोग किया जा सकता है।
यही लचीलापन ट्रांजिस्टर को डिजिटल एवं एनालॉग इलेक्ट्रॉनिकी का मूल आधार बनाता है।
स्विच के रूप में ट्रांजिस्टर
ट्रांजिस्टर का उपयोग केवल प्रवर्धक के रूप में ही नहीं, बल्कि स्विच के रूप में भी किया जाता है। डिजिटल इलेक्ट्रॉनिकी में यह भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है।
जब ट्रांजिस्टर को पूर्णतः चालू या पूर्णतः बंद अवस्था में संचालित किया जाता है, तो यह तार्किक अवस्थाओं (ON और OFF) का प्रतिनिधित्व करता है। इसी सिद्धांत पर डिजिटल परिपथों का निर्माण किया जाता है।
डिजिटल इलेक्ट्रॉनिकी की ओर संक्रमण
यहाँ से अर्धचालक इलेक्ट्रॉनिकी एक नए क्षेत्र में प्रवेश करती है, जहाँ संकेतों को निरंतर मानों के बजाय विविक्त अवस्थाओं में प्रस्तुत किया जाता है।
यही विचार लॉजिक गेट्स, फ्लिप-फ्लॉप और समेकित परिपथों की आधारशिला बनता है। ट्रांजिस्टर इस पूरे डिजिटल ढाँचे की मूल इकाई है।
लॉजिक गेट्स : डिजिटल चिंतन की आधारशिला
डिजिटल इलेक्ट्रॉनिकी में सूचनाओं को निरंतर मानों के रूप में नहीं, बल्कि स्पष्ट विविक्त अवस्थाओं में व्यक्त किया जाता है। इन अवस्थाओं को सामान्यतः 0 और 1 द्वारा निरूपित किया जाता है। इन अवस्थाओं पर आधारित तार्किक क्रियाओं को लॉजिक गेट्स के माध्यम से व्यवहार में लाया जाता है।
लॉजिक गेट्स मूलतः ऐसे परिपथ होते हैं जो एक या अधिक इनपुट संकेतों को लेकर निर्धारित तार्किक नियमों के अनुसार एक आउटपुट उत्पन्न करते हैं। इन गेट्स का निर्माण ट्रांजिस्टरों के संयोजन से किया जाता है।
OR गेट
OR गेट का सिद्धांत तार्किक जोड़ पर आधारित है। यदि किसी भी एक इनपुट पर तार्किक अवस्था 1 हो, तो आउटपुट भी 1 प्राप्त होता है। केवल तब आउटपुट 0 होता है जब सभी इनपुट 0 हों।
यह गेट ऐसी परिस्थितियों को दर्शाता है जहाँ कई संभावनाओं में से किसी एक का भी सत्य होना परिणाम को सत्य बना देता है।
AND गेट
AND गेट तार्किक गुणा के सिद्धांत पर आधारित है। इसमें आउटपुट 1 केवल तभी प्राप्त होता है जब सभी इनपुट 1 हों।
यदि किसी भी इनपुट पर तार्किक अवस्था 0 हो, तो आउटपुट अनिवार्य रूप से 0 हो जाता है। यह गेट शर्त-आधारित निर्णयों को डिजिटल रूप में प्रस्तुत करता है।
NOT गेट
NOT गेट एकमात्र ऐसा लॉजिक गेट है जिसमें केवल एक इनपुट होता है। यह गेट इनपुट अवस्था को उलट देता है।
यदि इनपुट 1 हो, तो आउटपुट 0 प्राप्त होता है, और यदि इनपुट 0 हो, तो आउटपुट 1। इस गुण के कारण इसे इन्वर्टर भी कहा जाता है।
संयोजित लॉजिक गेट्स
OR, AND और NOT गेट्स के विभिन्न संयोजनों से अन्य लॉजिक गेट्स निर्मित किए जाते हैं, जैसे NAND, NOR, XOR और XNOR। इन गेट्स की सहायता से अत्यंत जटिल तार्किक क्रियाएँ सरल परिपथों द्वारा संपन्न की जा सकती हैं।
विशेष रूप से NAND और NOR गेट्स को यूनिवर्सल गेट कहा जाता है, क्योंकि केवल इन्हीं की सहायता से किसी भी तार्किक परिपथ का निर्माण संभव है।
लॉजिक गेट्स का भौतिक आधार
यद्यपि लॉजिक गेट्स तार्किक प्रतीकों द्वारा प्रस्तुत किए जाते हैं, परंतु उनका वास्तविक आधार भौतिक है। प्रत्येक लॉजिक क्रिया ट्रांजिस्टरों के चालू और बंद होने पर आधारित होती है।
इस प्रकार अमूर्त तर्क भौतिक युक्तियों के माध्यम से व्यवहार में रूपांतरित होता है। यही प्रक्रिया डिजिटल तकनीक को मानव सोच से मशीन क्रिया तक ले जाती है।
समेकित परिपथों की ओर
लॉजिक गेट्स का वास्तविक महत्व तब प्रकट होता है जब इन्हें एक ही अर्धचालक चिप पर विशाल संख्या में संयोजित किया जाता है। यही अवधारणा समेकित परिपथ की है।
समेकित परिपथों ने इलेक्ट्रॉनिकी को सूक्ष्मता, विश्वसनीयता और तीव्रता प्रदान की, जिससे आधुनिक कम्प्यूटिंग और संचार प्रणालियाँ विकसित हो सकीं।
समेकित परिपथ (Integrated Circuits)
जब अनेक ट्रांजिस्टर, डायोड, प्रतिरोधक और संधारित्र एक ही अर्धचालक चिप पर सूक्ष्म स्तर पर निर्मित किए जाते हैं, तो इस व्यवस्था को समेकित परिपथ कहा जाता है। यह तकनीक इलेक्ट्रॉनिकी के इतिहास में एक निर्णायक परिवर्तन का प्रतीक है।
समेकित परिपथों के आगमन से परिपथों का आकार अत्यंत छोटा, ऊर्जा खपत कम और विश्वसनीयता अधिक हो गई। यही कारण है कि आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों में अलग-अलग घटकों के स्थान पर IC का प्रयोग किया जाता है।
समेकित परिपथों का वर्गीकरण
समेकित परिपथों को उनमें समाहित घटकों की संख्या के आधार पर विभिन्न वर्गों में विभाजित किया जाता है।
- SSI (Small Scale Integration): कम संख्या में लॉजिक गेट्स वाले परिपथ।
- MSI (Medium Scale Integration): काउंटर, रजिस्टर जैसे जटिल परिपथ।
- LSI (Large Scale Integration): हजारों ट्रांजिस्टरों वाले परिपथ।
- VLSI (Very Large Scale Integration): लाखों से करोड़ों ट्रांजिस्टरों वाली चिप, जिसका उपयोग माइक्रोप्रोसेसरों में होता है।
समेकित परिपथों का महत्व
समेकित परिपथों ने इलेक्ट्रॉनिक प्रणालियों को तेज़, सटीक और किफ़ायती बनाया। इनके बिना कम्प्यूटर, मोबाइल संचार, उपग्रह नियंत्रण और चिकित्सा उपकरणों की आधुनिक कल्पना संभव नहीं।
अर्धचालक इलेक्ट्रॉनिकी का यह चरण यह स्पष्ट करता है कि मौलिक भौतिक सिद्धांत कैसे व्यावहारिक तकनीक में रूपांतरित होते हैं।
समेकित दृष्टिकोण
अर्धचालक इलेक्ट्रॉनिकी पदार्थों के सूक्ष्म गुणों से आरम्भ होकर डिजिटल प्रणालियों तक पहुँचती है। ऊर्जा बैंड सिद्धांत, डोपिंग, p–n संधि, डायोड, ट्रांजिस्टर, लॉजिक गेट्स और समेकित परिपथ — ये सभी एक ही वैज्ञानिक धारा के विभिन्न चरण हैं।
यह अध्याय दर्शाता है कि सूक्ष्म स्तर पर इलेक्ट्रॉनों का नियंत्रित व्यवहार कैसे मानव सभ्यता के तकनीकी ढाँचे को आकार देता है।
संक्षिप्त नोट्स
- अर्धचालकों की चालकता को डोपिंग द्वारा नियंत्रित किया जाता है।
- p–n संधि अर्धचालक युक्तियों का मूल आधार है।
- डायोड दिशा-संवेदनशील होता है।
- ट्रांजिस्टर प्रवर्धन और स्विचिंग दोनों करता है।
- लॉजिक गेट्स डिजिटल इलेक्ट्रॉनिकी की नींव हैं।
काल्पनिक प्रश्न–उत्तर ⭐
प्रश्न: यदि ट्रांजिस्टर न होता तो आधुनिक इलेक्ट्रॉनिकी कैसी होती?
उत्तर: तब इलेक्ट्रॉनिकी वैक्यूम ट्यूबों तक सीमित रहती, उपकरण बड़े, ऊर्जा-खपत अधिक और विश्वसनीयता कम होती।
सबसे कठिन प्रश्न और उसका कारण
प्रश्न: p–n संधि में अवरोध विभव क्यों उत्पन्न होता है?
उत्तर: यह प्रश्न कठिन इसलिए है क्योंकि इसमें विसरण, पुनर्संयोजन, स्थिर आयन और आंतरिक विद्युत क्षेत्र — चारों अवधारणाओं को एक साथ समझना पड़ता है।
वैज्ञानिक प्रयास और भविष्य की दिशा
अर्धचालक इलेक्ट्रॉनिकी प्लांक, आइंस्टीन और शॉक्ली जैसे वैज्ञानिकों के प्रयासों का परिणाम है। आज अनुसंधान का केंद्र नैनो-इलेक्ट्रॉनिकी, क्वांटम डिवाइस और ऊर्जा-कुशल चिप डिज़ाइन है।
भविष्य में अर्धचालक तकनीक और भी सूक्ष्म, तेज़ और बुद्धिमान प्रणालियों का मार्ग प्रशस्त करेगी।
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अध्याय का दृश्य प्रदर्शन (Visual Consolidation)
अर्धचालक इलेक्ट्रॉनिकी की अवधारणाएँ सूक्ष्म स्तर पर घटित होती हैं। इन्हें पूर्णतः समझने के लिए दृश्य निरूपण अत्यंत सहायक होता है। नीचे दिए गए चित्र पूरे अध्याय को एक समेकित दृष्टि में स्पष्ट करते हैं।
1. ऊर्जा बैंड आरेख (Energy Band Diagram)
यह आरेख संयोजक बैंड (VB) और चालकता बैंड (CB) के बीच के वर्जित ऊर्जा अंतराल को दर्शाता है। अर्धचालकों में यह अंतराल इतना होता है कि सामान्य ताप पर कुछ इलेक्ट्रॉन चालकता बैंड में पहुँच सकें। यही सीमित चालकता का मूल कारण है।
2. आंतरिक अर्धचालक में इलेक्ट्रॉन–होल युग्म
जब कोई इलेक्ट्रॉन संयोजक बैंड से मुक्त होकर चालकता बैंड में जाता है, तो पीछे एक होल उत्पन्न होता है। धारा का प्रवाह इलेक्ट्रॉन और होल दोनों की संयुक्त गति से होता है। यही द्वैध वहन आंतरिक अर्धचालक की विशेषता है।
3. p-प्रकार एवं n-प्रकार अर्धचालक (Doping)
डोपिंग द्वारा अर्धचालक में आवेश वाहकों के प्रकार और संख्या नियंत्रित की जाती है। n-प्रकार में इलेक्ट्रॉन प्रमुख होते हैं, जबकि p-प्रकार में होल। यह नियंत्रण ही डायोड और ट्रांजिस्टर जैसी युक्तियों की नींव है।
4. p–n संधि एवं अपक्षय परत
p–n संधि पर इलेक्ट्रॉन और होल के विसरण से अपक्षय परत बनती है। इस परत में मुक्त वाहक नहीं होते, परंतु स्थिर आयन एक आंतरिक विद्युत क्षेत्र उत्पन्न करते हैं। यही क्षेत्र अवरोध विभव का कारण है।
5. डायोड की V–I विशेषता
अग्र बायस में एक निश्चित विभव के बाद धारा तीव्रता से बढ़ती है, जबकि पश्च बायस में धारा लगभग स्थिर रहती है। यह वक्र डायोड की दिशा-संवेदनशील प्रकृति को स्पष्ट करता है।
6. ज़ेनर ब्रेकडाउन
ज़ेनर डायोड में पश्च बायस पर एक निश्चित विभव पर अचानक धारा बढ़ जाती है, परंतु विभव लगभग स्थिर रहता है। इसी गुण के कारण ज़ेनर डायोड विभव नियमन में प्रयुक्त होता है।
7. ट्रांजिस्टर की संरचना
ट्रांजिस्टर में एमिटर आवेश वाहक प्रदान करता है, बेस नियंत्रण करता है और कलेक्टर उन्हें एकत्र करता है। बेस में अल्प परिवर्तन कलेक्टर धारा में बड़े परिवर्तन को जन्म देता है। यही प्रवर्धन का मूल सिद्धांत है।
8. लॉजिक गेट्स की अवधारणा
लॉजिक गेट्स डिजिटल संकेतों (0 और 1) पर तार्किक क्रियाएँ करते हैं। इनका भौतिक आधार ट्रांजिस्टरों का चालू-बंद व्यवहार है। यहीं से डिजिटल इलेक्ट्रॉनिकी का उद्भव होता है।
9. समेकित परिपथ (IC) का अमूर्त दृश्य
समेकित परिपथ में लाखों ट्रांजिस्टर एक ही चिप पर समाहित होते हैं। यह दृश्य सूक्ष्म भौतिक सिद्धांतों के व्यापक तकनीकी अनुप्रयोग को दर्शाता है।
UPSC में पूछे गए प्रश्न (Conceptual Relevance)
अर्धचालक इलेक्ट्रॉनिकी से संबंधित अवधारणाएँ केवल विद्यालयी पाठ्यक्रम तक सीमित नहीं हैं। इनकी गहराई और अनुप्रयोग के कारण संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) की परीक्षाओं में भी इनसे जुड़े प्रश्न पूछे जा चुके हैं। नीचे ऐसे ही चुनिंदा प्रश्न दिए गए हैं, जो इसी अध्याय के मूल सिद्धांतों पर आधारित हैं।
प्रश्न 1
आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों में अर्धचालक पदार्थों का महत्व चालकों की तुलना में अधिक क्यों है?
उत्तर:
अर्धचालकों की चालकता को
डोपिंग, तापमान और विद्युत क्षेत्र द्वारा
नियंत्रित किया जा सकता है,
जबकि चालकों में यह नियंत्रण संभव नहीं।
इसी नियंत्रित व्यवहार के कारण
डायोड, ट्रांजिस्टर और IC जैसे उपकरण बनाए जा सकते हैं,
जो आधुनिक इलेक्ट्रॉनिकी की आधारशिला हैं।
प्रश्न 2
p–n संधि में अवरोध विभव का निर्माण किस भौतिक प्रक्रिया का परिणाम है?
उत्तर:
p–n संधि में
बहुसंख्यक आवेश वाहकों के विसरण और
उनके पुनर्संयोजन से
अपक्षय परत बनती है।
इस परत में उपस्थित स्थिर आयन
एक आंतरिक विद्युत क्षेत्र उत्पन्न करते हैं,
जिससे अवरोध विभव का निर्माण होता है।
प्रश्न 3
ट्रांजिस्टर को आधुनिक तकनीक का मूल आधार क्यों माना जाता है?
उत्तर:
ट्रांजिस्टर सूक्ष्म संकेतों द्वारा
बड़े विद्युत प्रभावों को नियंत्रित करता है।
यह प्रवर्धन और स्विचिंग दोनों कार्य कर सकता है।
डिजिटल परिपथ, कम्प्यूटर,
संचार प्रणालियाँ और माइक्रोप्रोसेसर
इसी सिद्धांत पर आधारित हैं,
इसलिए इसे आधुनिक तकनीक का मूल आधार माना जाता है।
प्रश्न 4
समेकित परिपथों ने इलेक्ट्रॉनिक प्रणालियों को किस प्रकार रूपांतरित किया है?
उत्तर:
समेकित परिपथों ने
अनेक इलेक्ट्रॉनिक घटकों को
एक ही चिप पर समाहित कर दिया,
जिससे परिपथों का आकार छोटा,
ऊर्जा खपत कम
और विश्वसनीयता अधिक हो गई।
इसी कारण आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक्स
तेज़, सस्ती और व्यापक हुई।
टिप्पणी: ये प्रश्न UPSC के दीर्घकालिक रुझानों के अनुरूप इसी अध्याय की अवधारणाओं पर आधारित हैं।
वैज्ञानिकों के अथक प्रयास, योगदान एवं भविष्य की चुनौतियाँ
अर्धचालक इलेक्ट्रॉनिकी का विकास किसी एक खोज या एक वैज्ञानिक का परिणाम नहीं है। यह अनेक वैज्ञानिकों के सतत प्रयासों, प्रयोगों, असफलताओं और नवीन विचारों का संगठित परिणाम है, जिसने आधुनिक तकनीकी सभ्यता को आकार दिया।
प्रमुख वैज्ञानिकों का योगदान
मैक्स प्लांक ने ऊर्जा के क्वांटीकरण की अवधारणा प्रस्तुत की, जिससे यह स्पष्ट हुआ कि सूक्ष्म स्तर पर ऊर्जा सतत नहीं बल्कि विविक्त रूप में व्यवहार करती है। यही विचार आगे चलकर अर्धचालक सिद्धांतों की बौद्धिक नींव बना।
अल्बर्ट आइंस्टीन ने प्रकाश-विद्युत प्रभाव की व्याख्या कर यह सिद्ध किया कि इलेक्ट्रॉन ऊर्जा को निश्चित क्वांटाओं में अवशोषित करते हैं। इसने इलेक्ट्रॉनिक युक्तियों की भौतिक व्याख्या को ठोस आधार प्रदान किया।
जॉन बार्डीन, विलियम शॉक्ली और वॉल्टर ब्रैटन ने ट्रांजिस्टर का विकास किया, जिसने वैक्यूम ट्यूबों का स्थान लेकर इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों को छोटा, विश्वसनीय और ऊर्जा-कुशल बनाया। यह खोज आधुनिक इलेक्ट्रॉनिकी का सबसे निर्णायक मोड़ सिद्ध हुई।
जैक किल्बी और रॉबर्ट नॉयस ने समेकित परिपथ (Integrated Circuit) की अवधारणा को साकार किया, जिससे एक ही चिप पर अनेक इलेक्ट्रॉनिक घटकों को समाहित करना संभव हुआ। यही तकनीक आज के कम्प्यूटर और माइक्रोप्रोसेसरों का आधार है।
वैज्ञानिक दृष्टि से महत्व
इन वैज्ञानिक प्रयासों से यह स्पष्ट होता है कि अर्धचालक इलेक्ट्रॉनिकी केवल अनुप्रयोगों का विषय नहीं, बल्कि क्वांटम भौतिकी, ठोस अवस्था भौतिकी और पदार्थ विज्ञान का संयुक्त परिणाम है।
भविष्य की चुनौतियाँ
जैसे-जैसे इलेक्ट्रॉनिक युक्तियाँ और अधिक सूक्ष्म होती जा रही हैं, वैज्ञानिकों के सामने नई चुनौतियाँ उत्पन्न हो रही हैं।
- नैनो-स्तर पर क्वांटम प्रभावों का नियंत्रण
- ऊर्जा-कुशल एवं ऊष्मा-नियंत्रित चिप डिज़ाइन
- भौतिक सीमाओं के समीप ट्रांजिस्टर का व्यवहार
- क्वांटम कंप्यूटिंग और पारंपरिक इलेक्ट्रॉनिकी का समन्वय
इन चुनौतियों का समाधान भविष्य की तकनीकों को और अधिक शक्तिशाली, स्मार्ट और मानव-हितैषी बनाएगा। अर्धचालक इलेक्ट्रॉनिकी इस वैज्ञानिक यात्रा का केंद्रबिंदु बनी हुई है।
दैनिक जीवन एवं परिवेश में उपयोग
अर्धचालक इलेक्ट्रॉनिकी केवल प्रयोगशाला या पाठ्यपुस्तक तक सीमित विषय नहीं है, बल्कि यह प्रतिदिन मानव जीवन के लगभग प्रत्येक क्षेत्र में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से उपस्थित है।
- मोबाइल फोन एवं कम्प्यूटर: इन उपकरणों में प्रयुक्त प्रोसेसर, मेमोरी चिप और संचार मॉड्यूल समेकित परिपथों पर आधारित होते हैं, जिनका मूल सिद्धांत अर्धचालक इलेक्ट्रॉनिकी है।
- विद्युत आपूर्ति एवं चार्जर: रेक्टिफायर डायोड और ज़ेनर डायोड विद्युत विभव को नियंत्रित कर उपकरणों को सुरक्षित ऊर्जा प्रदान करते हैं।
- डिजिटल उपकरण: कैलकुलेटर, डिजिटल घड़ियाँ और स्मार्ट उपकरण लॉजिक गेट्स के माध्यम से तार्किक निर्णय लेते हैं।
- चिकित्सा एवं संचार तकनीक: हृदय-नियंत्रक (pacemaker), डायग्नोस्टिक उपकरण और उपग्रह संचार प्रणालियाँ अर्धचालक युक्तियों पर निर्भर करती हैं।
इस प्रकार अर्धचालक इलेक्ट्रॉनिकी आधुनिक जीवन की अदृश्य लेकिन अनिवार्य आधारशिला बन चुकी है।
इस अध्याय से संबंधित प्रमुख प्रयोग
अर्धचालक इलेक्ट्रॉनिकी की अवधारणाओं को प्रयोगात्मक रूप से समझने के लिए कुछ मूलभूत प्रयोग विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं।
- p–n संधि डायोड की V–I विशेषता: इस प्रयोग द्वारा अग्र और पश्च बायस में डायोड के व्यवहार को समझा जाता है, जिससे दिशा-संवेदनशीलता स्पष्ट होती है।
- ज़ेनर डायोड द्वारा विभव नियमन: इस प्रयोग में यह दर्शाया जाता है कि ज़ेनर ब्रेकडाउन अवस्था में विभव लगभग स्थिर रहता है, भले ही इनपुट विभव में परिवर्तन हो।
- ट्रांजिस्टर का प्रवर्धन व्यवहार: सामान्य एमिटर विन्यास में बेस धारा और कलेक्टर धारा के संबंध का अध्ययन प्रवर्धन की अवधारणा को स्पष्ट करता है।
- लॉजिक गेट्स का सत्यापन: AND, OR और NOT गेट्स की सत्य सारणी डिजिटल इलेक्ट्रॉनिकी के तार्किक आधार को प्रदर्शित करती है।
ये प्रयोग सिद्धांत और व्यवहार के बीच सीधा संबंध स्थापित करते हैं और अध्याय की समझ को पूर्ण करते हैं।
संदर्भ एवं प्रामाणिक स्रोत
अध्ययन की विश्वसनीयता और अकादमिक प्रामाणिकता बनाए रखने हेतु नीचे कुछ मान्य एवं आधिकारिक स्रोत दिए जा रहे हैं, जो अर्धचालक इलेक्ट्रॉनिकी के सैद्धांतिक एवं व्यावहारिक पहलुओं को समर्थन प्रदान करते हैं।
- NCERT Physics Textbook (Class XII): भारत सरकार द्वारा अनुमोदित आधिकारिक पाठ्यपुस्तक।
- Department of Science & Technology (DST), Government of India — विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी से संबंधित नीतियाँ और शोध दिशा।
- ISRO एवं DRDO प्रकाशन: अर्धचालक एवं इलेक्ट्रॉनिक प्रणालियों के व्यावहारिक अनुप्रयोगों से संबंधित सामग्री।
- UGC एवं NPTEL शैक्षणिक संसाधन: उच्च शिक्षा स्तर पर अर्धचालक भौतिकी की प्रमाणिक व्याख्याएँ।
इन स्रोतों के माध्यम से अध्याय की अवधारणाओं को और अधिक गहराई से समझा जा सकता है।
इस अध्याय से संबंधित अन्य महत्वपूर्ण अध्याय
- भौतिक राशियाँ एवं मापन
- धारा विद्युत
- विद्युत धारा के चुम्बकीय प्रभाव
- विद्युतचुंबकीय तरंगें
- विकिरण एवं पदार्थ की द्वैत प्रकृति
इन अध्यायों को क्रम से पढ़ने पर कक्षा 12 भौतिकी का वैचारिक ढाँचा पूर्ण रूप से स्पष्ट हो जाता है।
🔗 संबंधित भौतिकी अध्याय
- 📘 RBSE Class 12 Physics – सम्पूर्ण पाठ्यक्रम
- 📗 पिछला अध्याय: विद्युत धारा के चुम्बकीय प्रभाव
- 📕 अगला अध्याय: परमाणु (Atoms)
- 📙 संबंधित अध्याय: विकिरण एवं पदार्थ की द्वैत प्रकृति


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