भूमंडलीकृत विश्व का बनना Class 10 | The Making of a Global World Complete Online Class
इतिहास अध्याय 3 के संपूर्ण हिंदी नोट्स, चित्रों सहित सरल व्याख्या, वीडियो क्लास, महत्वपूर्ण तिथियाँ, बोर्ड परीक्षा प्रश्नोत्तर, पुनरावर्तन और ऑनलाइन MCQ टेस्ट।
क्या वैश्वीकरण केवल इंटरनेट, बहुराष्ट्रीय कंपनियों और आधुनिक बाजारों की कहानी है? वास्तव में दुनिया के विभिन्न क्षेत्रों के बीच संपर्क का इतिहास हजारों वर्ष पुराना है। व्यापारी, यात्री, तीर्थयात्री, श्रमिक और विजेता अपने साथ केवल वस्तुएँ ही नहीं लाए; वे विचार, तकनीक, खान-पान, संस्कृतियाँ और कई बार बीमारियाँ भी एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले गए।
कक्षा 10 इतिहास का अध्याय “भूमंडलीकृत विश्व का बनना” हमें समझाता है कि आधुनिक विश्व अर्थव्यवस्था अचानक पैदा नहीं हुई। इसका निर्माण व्यापार, प्रवासन, पूँजी, तकनीक, उपनिवेशवाद, युद्धों और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के लंबे ऐतिहासिक विकास से हुआ।
इस ऑनलाइन क्लास में अध्याय को केवल याद नहीं किया जाएगा, बल्कि घटनाओं के बीच संबंध समझे जाएँगे—जैसे रेशम मार्ग से शुरू हुई वैश्विक यात्रा किस प्रकार औपनिवेशिक व्यापार, महामंदी, ब्रेटन वुड्स और आधुनिक वैश्वीकरण तक पहुँची।
इस ऑनलाइन क्लास में आप क्या सीखेंगे?
- प्राक्-आधुनिक विश्व में व्यापार और सांस्कृतिक संपर्क
- रेशम मार्ग और खाद्य पदार्थों की वैश्विक यात्राएँ
- उन्नीसवीं शताब्दी की विश्व अर्थव्यवस्था के तीन प्रमुख प्रवाह
- कॉर्न लॉ, तकनीक, रेलमार्ग और शीतक जहाज
- अफ्रीका में उपनिवेशवाद और रिंडरपेस्ट का प्रभाव
- भारत से गिरमिटिया मजदूरों का प्रवास
- प्रथम विश्वयुद्ध, महामंदी और भारत की अर्थव्यवस्था
- ब्रेटन वुड्स, IMF, विश्व बैंक और G-77
- बोर्ड परीक्षा के महत्वपूर्ण प्रश्न और उत्तर
भूमंडलीकृत विश्व का बनना—अध्याय का मूल अर्थ
भूमंडलीकरण अथवा वैश्वीकरण वह ऐतिहासिक प्रक्रिया है जिसके माध्यम से दुनिया के अलग-अलग क्षेत्र व्यापार, निवेश, श्रम, तकनीक, विचार और संस्कृति के आदान-प्रदान द्वारा एक-दूसरे से अधिक गहराई से जुड़ते गए।
इस प्रक्रिया को समझने के लिए केवल आधुनिक कंपनियों का अध्ययन पर्याप्त नहीं है। हमें वस्तुओं के व्यापार, काम की तलाश में लोगों के प्रवास और लंबी दूरी तक पूँजी के प्रवाह के इतिहास को भी समझना होगा।
संपूर्ण वीडियो क्लास
इस विस्तृत वीडियो में पूरे अध्याय को ऐतिहासिक चित्रों और सरल हिंदी व्याख्या के साथ क्रमबद्ध तरीके से समझाया गया है। पहले वीडियो देखें और उसके बाद नीचे दिए गए चित्रात्मक नोट्स पढ़ें।
वीडियो: The Making of a Global World—Complete Hindi Explanation
1. प्राक्-आधुनिक विश्व
प्राचीन और मध्यकालीन विश्व को अलग-अलग बंद क्षेत्रों का समूह समझना सही नहीं होगा। बहुत पहले से यात्री, व्यापारी, पुजारी और तीर्थयात्री ज्ञान, अवसर तथा आध्यात्मिक संतोष की तलाश में लंबी यात्राएँ करते थे।
इन यात्राओं के माध्यम से धन, वस्तुएँ, कौशल, विचार, आविष्कार और धार्मिक मान्यताएँ एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र तक पहुँचीं। इसी संपर्क ने बाद में अधिक संगठित विश्व अर्थव्यवस्था के निर्माण की नींव रखी।
दुनिया कब से जुड़ने लगी?
लगभग 3000 ईसा पूर्व सिंधु घाटी सभ्यता का वर्तमान पश्चिमी एशिया के क्षेत्रों से समुद्री व्यापार होता था। बाद के समय में विभिन्न व्यापारिक मार्गों ने एशिया, यूरोप और अफ्रीका को जोड़ने का काम किया।
इसलिए वैश्विक संपर्क को केवल आधुनिक घटना नहीं माना जा सकता। आधुनिक काल में इसकी गति, विस्तार और आर्थिक प्रभाव अवश्य बहुत अधिक बढ़ गए।
2. रेशम मार्गों से जुड़ती दुनिया
रेशम मार्ग किसी एक सड़क का नाम नहीं था। यह जमीन और समुद्र से गुजरने वाले अनेक मार्गों का विशाल नेटवर्क था। ये मार्ग एशिया के बड़े क्षेत्रों को यूरोप और उत्तरी अफ्रीका से जोड़ते थे।
इसे रेशम मार्ग क्यों कहा गया?
चीन का रेशम इन मार्गों से पश्चिमी देशों तक पहुँचता था, इसलिए इन्हें रेशम मार्ग कहा गया। इतिहासकारों ने कई रेशम मार्गों की पहचान की है। इनका अस्तित्व ईसा पूर्व के समय से था और लगभग पंद्रहवीं शताब्दी तक ये अत्यंत महत्वपूर्ण बने रहे।
रेशम के अलावा किन वस्तुओं का व्यापार होता था?
- चीन से रेशम और मिट्टी के बर्तन पश्चिम की ओर जाते थे।
- भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया से कपड़े तथा मसाले दूसरे क्षेत्रों में पहुँचते थे।
- यूरोप से सोना और चाँदी एशिया की ओर आती थी।
- स्थानीय बाजार इन लंबे व्यापारिक मार्गों से जुड़ते गए।
धर्म और संस्कृति का प्रसार
रेशम मार्ग केवल व्यापारिक मार्ग नहीं थे। इन्हीं रास्तों से ईसाई प्रचारक एशिया की ओर गए। बाद में मुस्लिम धर्म-प्रचारक भी इन्हीं मार्गों से यात्रा करते रहे। बौद्ध धर्म का प्रसार भी पूर्वी भारत से मध्य एशिया, चीन और दक्षिण-पूर्व एशिया की ओर इन्हीं संपर्क मार्गों से हुआ।
3. भोजन की वैश्विक यात्राएँ
आज हम जिन खाद्य पदार्थों को अपने भोजन का स्वाभाविक हिस्सा मानते हैं, उनमें से अनेक प्राचीन समय में हमारे क्षेत्र में उपलब्ध नहीं थे। व्यापारी, यात्री और समुद्री खोजकर्ता खाद्य पदार्थों तथा फसलों को एक महाद्वीप से दूसरे महाद्वीप तक ले गए।
नूडल्स और पास्ता के इतिहास को इसका रोचक उदाहरण माना जाता है। कुछ इतिहासकारों के अनुसार नूडल्स चीन से पश्चिम की ओर गए और बाद में स्पेगेटी के रूप में विकसित हुए। एक अन्य विचार के अनुसार अरब यात्री पाँचवीं शताब्दी में पास्ता को सिसिली तक ले गए।
अमेरिका से दुनिया को मिली नई फसलें
आलू, मक्का, टमाटर, मिर्च, शकरकंद, सोयाबीन और मूँगफली जैसी अनेक फसलें अमेरिका के मूल निवासियों द्वारा उपयोग की जाती थीं। क्रिस्टोफर कोलंबस की यात्राओं के बाद इन खाद्य पदार्थों का प्रसार यूरोप और एशिया सहित दुनिया के दूसरे भागों में हुआ।
| फसल/खाद्य पदार्थ | मूल क्षेत्र | ऐतिहासिक प्रभाव |
|---|---|---|
| आलू | अमेरिका | यूरोप के गरीब लोगों का प्रमुख भोजन बना |
| मक्का | अमेरिका | दुनिया के अनेक क्षेत्रों में मुख्य फसल बनी |
| टमाटर और मिर्च | अमेरिका | एशिया और यूरोप की भोजन परंपराओं का हिस्सा बने |
| सोयाबीन और मूँगफली | अमेरिका | पोषण और कृषि उत्पादन में महत्वपूर्ण बने |
आलू ने यूरोप के जीवन को कैसे बदला?
आलू एक सस्ता और पोषक खाद्य पदार्थ था। इसके व्यापक उपयोग से यूरोप के निर्धन लोगों को बेहतर भोजन मिलने लगा। उनकी जीवन-प्रत्याशा बढ़ी और जनसंख्या में भी वृद्धि हुई।
लेकिन किसी एक फसल पर अत्यधिक निर्भरता खतरनाक सिद्ध हो सकती है। आयरलैंड के गरीब किसान आलू पर बहुत अधिक निर्भर हो गए थे। जब 1840 के दशक के मध्य में बीमारी से आलू की फसल नष्ट हुई तो भयानक अकाल पड़ा। बड़ी संख्या में लोग भूख से मारे गए और अनेक लोग दूसरे देशों में चले गए।
4. विजय, बीमारी और व्यापार
सोलहवीं शताब्दी में यूरोपीय समुद्री यात्राओं ने दुनिया के विभिन्न क्षेत्रों के संपर्क को नया रूप दिया। पुर्तगाली और स्पेनी विजेताओं ने अमेरिका में उपनिवेश स्थापित किए और वहाँ के संसाधनों पर नियंत्रण प्राप्त किया।
अमेरिका से प्राप्त सोना और विशेष रूप से चाँदी ने यूरोप की संपदा बढ़ाई। पेरू और मैक्सिको की खानों से निकली चाँदी ने यूरोप को एशियाई वस्तुओं के व्यापार में भुगतान करने की क्षमता प्रदान की।
बीमारी बनी सबसे घातक हथियार
अमेरिका पर विजय केवल सैनिक शक्ति के कारण नहीं हुई। यूरोपीय विजेताओं के साथ चेचक जैसी बीमारियों के कीटाणु भी वहाँ पहुँचे। लंबे समय तक अलग रहने के कारण अमेरिका के मूल निवासियों में इन रोगों के विरुद्ध प्रतिरोधक क्षमता नहीं थी।
चेचक पूरे महाद्वीप में फैल गया और बड़ी संख्या में मूल निवासियों की मृत्यु हुई। इस प्रकार बीमारी यूरोपीय विजेताओं के लिए बंदूकों से भी अधिक प्रभावी और घातक हथियार सिद्ध हुई।
अठारहवीं शताब्दी से पहले एशिया की स्थिति
अठारहवीं शताब्दी तक चीन और भारत को दुनिया के सबसे समृद्ध देशों में गिना जाता था। एशिया विश्व व्यापार का महत्वपूर्ण केंद्र था। चीन द्वारा विदेशी संपर्क सीमित करने और अमेरिका के बढ़ते महत्व के बाद विश्व व्यापार का केंद्र धीरे-धीरे पश्चिम की ओर स्थानांतरित होने लगा।
5. उन्नीसवीं शताब्दी की विश्व अर्थव्यवस्था
उन्नीसवीं शताब्दी, विशेषकर 1815 से 1914 के बीच, दुनिया की अर्थव्यवस्था में बहुत बड़े परिवर्तन हुए। इस समय आर्थिक संबंधों को समझने के लिए तीन प्रमुख प्रकार के प्रवाहों का अध्ययन किया जाता है।
ये तीनों प्रवाह एक-दूसरे से जुड़े हुए थे। खाद्यान्न की बढ़ती माँग ने नई भूमि पर खेती को प्रोत्साहित किया। नई भूमि को खेती योग्य बनाने के लिए श्रमिकों की आवश्यकता हुई और रेलमार्ग, बंदरगाह तथा बस्तियाँ बनाने के लिए बड़ी मात्रा में पूँजी लगाई गई।
6. कॉर्न लॉ और खाद्यान्न का वैश्विक व्यापार
ब्रिटेन में जनसंख्या बढ़ने और औद्योगिक विकास के कारण खाद्यान्न की माँग तेजी से बढ़ी। शहरों के विस्तार से कृषि उत्पादों की कीमतें बढ़ने लगीं। बड़े भू-स्वामियों के दबाव में सरकार ने अनाज के आयात पर प्रतिबंध लगाए। इन कानूनों को कॉर्न लॉ कहा गया।
उद्योगपति और शहरी नागरिक इन कानूनों से संतुष्ट नहीं थे, क्योंकि महँगा भोजन मजदूरी और उत्पादन लागत को बढ़ाता था। विरोध के बाद कॉर्न लॉ समाप्त कर दिए गए और ब्रिटेन में दूसरे देशों से सस्ता खाद्यान्न आने लगा।
कॉर्न लॉ समाप्त होने के परिणाम
- ब्रिटेन में आयातित खाद्यान्न स्थानीय उत्पादन से सस्ता हो गया।
- अनेक ब्रिटिश किसान विदेशी प्रतिस्पर्धा का सामना नहीं कर सके।
- कृषि भूमि खाली होने लगी और किसान रोजगार के लिए शहरों की ओर गए।
- कुछ लोग काम की तलाश में विदेशों की ओर प्रवास करने लगे।
- अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और पूर्वी यूरोप में खेती का विस्तार हुआ।
- नई कृषि भूमि को बंदरगाहों से जोड़ने के लिए रेलमार्ग बनाए गए।
- श्रमिकों के लिए नई बस्तियाँ और आवास विकसित किए गए।
| घटना | तत्काल प्रभाव | वैश्विक परिणाम |
|---|---|---|
| कॉर्न लॉ की समाप्ति | ब्रिटेन में सस्ता अनाज आने लगा | दूसरे देशों में खेती का विस्तार |
| ब्रिटिश कृषि में प्रतिस्पर्धा | किसानों का विस्थापन | शहरों और विदेशों की ओर प्रवास |
| नई भूमि पर खेती | श्रम और पूँजी की आवश्यकता | रेलमार्ग, बंदरगाह और बस्तियों का निर्माण |
7. तकनीक ने विश्व अर्थव्यवस्था को कैसे बदला?
वैश्विक संपर्क के विस्तार में तकनीक ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। रेलमार्गों, भाप के जहाजों और टेलीग्राफ ने परिवहन तथा संचार को तेज, सस्ता और अधिक विश्वसनीय बनाया।
शीतक जहाजों का महत्व
पहले जीवित पशुओं को जहाजों द्वारा यूरोप ले जाया जाता था। लंबी समुद्री यात्रा में पशु अधिक स्थान घेरते थे, उनका वजन घट जाता था और कई पशु मर भी जाते थे। इससे मांस महँगा हो जाता था और गरीब लोग नियमित रूप से उसे नहीं खरीद पाते थे।
शीतक जहाजों के विकास के बाद पशुओं को जीवित ले जाने के बजाय उन्हें स्रोत क्षेत्र में ही काटकर मांस को ठंडा करके भेजना संभव हुआ। परिवहन लागत घटी, मांस सस्ता हुआ और यूरोप के सामान्य लोगों के भोजन में विविधता आई।
8. उन्नीसवीं शताब्दी के अंत में उपनिवेशवाद
विश्व अर्थव्यवस्था के विस्तार से सभी लोगों को समान लाभ नहीं मिला। व्यापार और बाजारों के विस्तार के साथ स्वतंत्रता की हानि, आजीविका का विनाश, गरीबी और औपनिवेशिक नियंत्रण भी बढ़ा।
उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम दशकों में यूरोपीय शक्तियों ने अफ्रीका के विशाल भूभाग पर अपना नियंत्रण स्थापित करना शुरू किया। अफ्रीका की सीमाएँ वहाँ रहने वाले समुदायों की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक स्थिति के अनुसार नहीं, बल्कि यूरोपीय शक्तियों के हितों के अनुसार निर्धारित की गईं।
1885 का बर्लिन सम्मेलन
1885 में यूरोप की प्रमुख शक्तियाँ बर्लिन में एकत्र हुईं। इस बैठक में अफ्रीका पर उनके नियंत्रण और भूभाग के बँटवारे से संबंधित व्यवस्थाओं को औपचारिक रूप दिया गया। ब्रिटेन और फ्रांस ने विशाल क्षेत्रों पर कब्जा किया, जबकि बेल्जियम और जर्मनी भी औपनिवेशिक शक्तियों के रूप में सामने आए।
उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम वर्षों में अमेरिका ने भी उपनिवेशवादी शक्ति के रूप में विस्तार किया और स्पेन के कुछ पुराने उपनिवेशों पर नियंत्रण प्राप्त किया।
9. रिंडरपेस्ट—अफ्रीका में मवेशी प्लेग
अफ्रीका में भूमि की कमी नहीं थी और जनसंख्या अपेक्षाकृत कम थी। लंबे समय तक वहाँ के लोगों की आजीविका भूमि और पशुधन पर आधारित रही। इसलिए वे मजदूरी के लिए काम करने को सामान्यतः तैयार नहीं होते थे।
यूरोपीय औपनिवेशिक शासकों को खानों और बागानों में काम करने के लिए श्रमिक चाहिए थे। उन्होंने कर लगाए, उत्तराधिकार संबंधी नियम बदले और अफ्रीकी लोगों को मजदूरी के श्रम बाजार में लाने के अनेक उपाय किए। इसी समय मवेशियों की महामारी ने अफ्रीकी समाज को गंभीर रूप से कमजोर कर दिया।
रिंडरपेस्ट अफ्रीका कैसे पहुँचा?
1880 के दशक के अंतिम वर्षों में पूर्वी अफ्रीका में रिंडरपेस्ट नामक मवेशी रोग फैल गया। संक्रमित मवेशियों को ब्रिटिश आधिपत्य वाले एशियाई क्षेत्रों से लाया गया था। इन्हें पूर्वी अफ्रीका में अभियान चला रहे इतालवी सैनिकों के भोजन के लिए लाया गया था।
यह बीमारी पूर्वी अफ्रीका से पश्चिम की ओर तेजी से फैली और अटलांटिक तट तक पहुँच गई। बाद में यह दक्षिणी अफ्रीका तक भी फैल गई। इस महामारी ने अफ्रीका के लगभग 90 प्रतिशत मवेशियों को नष्ट कर दिया।
मवेशियों की मृत्यु से औपनिवेशिक नियंत्रण कैसे बढ़ा?
- पशुधन पर निर्भर अफ्रीकी लोगों की आजीविका नष्ट हो गई।
- बचे हुए मवेशियों पर औपनिवेशिक सरकारों, खदान मालिकों और बागान मालिकों ने नियंत्रण स्थापित किया।
- भोजन और जीवन-निर्वाह के साधन समाप्त होने से लोगों को मजदूरी करनी पड़ी।
- औपनिवेशिक शासकों को खानों और बागानों के लिए श्रमिक मिलने लगे।
- बीमारी ने अफ्रीका पर यूरोपीय नियंत्रण को मजबूत करने में सहायता की।
10. भारत से अनुबंधित श्रमिकों का जाना
उन्नीसवीं शताब्दी में बड़ी संख्या में भारतीय और चीनी श्रमिकों को बागानों, खानों, सड़क तथा रेल निर्माण परियोजनाओं में काम करने के लिए दुनिया के विभिन्न क्षेत्रों में ले जाया गया।
इन श्रमिकों को एक अनुबंध के अंतर्गत निश्चित अवधि तक काम करना होता था। अनुबंध पूरा होने के बाद उन्हें भारत लौटने या उस नए देश में रहने का अधिकार होने की बात कही जाती थी। व्यवहार में उनकी परिस्थितियाँ अनुबंध में किए गए वादों से बहुत अलग और कठिन थीं।
‘गिरमिट’ और ‘गिरमिटिया’ का अर्थ
अंग्रेजी शब्द Agreement को श्रमिकों की बोलचाल में गिरमिट कहा जाने लगा। इस अनुबंध पर विदेश जाने वाले मजदूरों को बाद में गिरमिटिया मजदूर कहा गया।
| विषय | मुख्य जानकारी |
|---|---|
| प्रमुख भारतीय क्षेत्र | पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य भारत के कुछ भाग और तमिल क्षेत्र |
| प्रमुख गंतव्य | कैरेबियाई द्वीप, मॉरीशस, फिजी, सीलोन और मलाया |
| मुख्य कार्य | बागान, खदानें, सड़क और रेल निर्माण |
| व्यवस्था की समाप्ति | भारतीय राष्ट्रवादियों के विरोध के बाद 1921 में |
लोग अनुबंधित मजदूरी क्यों स्वीकार करते थे?
- ग्रामीण क्षेत्रों में कुटीर उद्योगों का पतन हो रहा था।
- लगान और अन्य करों का बोझ बढ़ रहा था।
- खानों और बागानों के विस्तार से लोगों की जमीन छीनी जा रही थी।
- रोजगार के स्थानीय अवसर कम थे।
- एजेंट बेहतर मजदूरी और अच्छे जीवन के झूठे या अधूरे वादे करते थे।
विदेश में श्रमिकों का जीवन
बागानों में काम और रहने की परिस्थितियाँ कठोर थीं। श्रमिकों के कानूनी अधिकार सीमित थे और अनुबंध का उल्लंघन करने पर दंड दिया जा सकता था। फिर भी श्रमिकों ने नई परिस्थितियों में अपने जीवन को पुनर्गठित किया और नई सांस्कृतिक परंपराएँ विकसित कीं।
त्रिनिदाद में वार्षिक मुहर्रम जुलूस ने एक विशाल उत्सवी रूप लिया, जिसे होसे कहा गया। इसमें विभिन्न धर्मों और समुदायों के लोग भाग लेते थे। इसी प्रकार त्रिनिदाद और गुयाना में चटनी संगीत तथा जमैका में भारतीय मूल के लोगों की सांस्कृतिक परंपराएँ विकसित हुईं।
भारतीय राष्ट्रवादियों ने इस व्यवस्था को अपमानजनक और शोषणकारी बताया। लंबे विरोध के बाद भारत से अनुबंधित श्रमिक भेजने की व्यवस्था 1921 में समाप्त कर दी गई। इसके बाद भी कई दशकों तक गिरमिटिया श्रमिकों के वंशजों को सामाजिक दूरी और पहचान संबंधी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा।
11. विदेशों में भारतीय उद्यमी
विश्व बाजार के विकास में केवल यूरोपीय व्यापारी ही सक्रिय नहीं थे। भारतीय बैंकर और व्यापारी भी मध्य तथा दक्षिण-पूर्व एशिया में व्यापार और कृषि उत्पादन के लिए वित्त उपलब्ध कराते थे।
मध्य एशिया में शिकारीपुरी श्रॉफ और नट्टुकोट्टई चेट्टियार जैसे भारतीय बैंकरों तथा व्यापारियों ने स्थानीय और निर्यात आधारित कृषि के लिए धन दिया। वे अपने धन को स्थानांतरित करने के लिए देशी वित्तीय व्यवस्था तथा हुंडी जैसे विनिमय-पत्रों का उपयोग करते थे।
भारतीय व्यापारी अफ्रीका में भी सक्रिय थे। हैदराबादी सिंधी व्यापारी दुनिया के अनेक बंदरगाहों पर पहुँच गए और पर्यटकों के लिए स्थानीय तथा आयातित वस्तुओं की दुकानें स्थापित कीं।
उत्तर: नट्टुकोट्टई चेट्टियार।
12. भारतीय व्यापार, उपनिवेशवाद और विश्व अर्थव्यवस्था
भारत प्राचीन समय से महीन सूती कपड़े का प्रमुख निर्यातक था। लेकिन ब्रिटेन में औद्योगीकरण के बाद वहाँ के कपास उत्पादकों ने भारतीय वस्त्रों से प्रतिस्पर्धा को अपने लिए चुनौती माना।
ब्रिटिश सरकार ने स्थानीय उद्योगों की रक्षा के लिए भारत से आयातित कपड़े पर शुल्क लगाया। दूसरी ओर भारत में ब्रिटिश कारखानों में बने कपड़ों का प्रवेश बढ़ता गया। परिणामस्वरूप भारतीय वस्त्र उत्पादकों के सामने गंभीर संकट उत्पन्न हुआ।
भारत के निर्यात का बदलता स्वरूप
भारतीय तैयार वस्त्रों का निर्यात घटने लगा, जबकि कच्चे माल का निर्यात बढ़ा। भारत से ब्रिटेन को कच्चा कपास भेजा गया। चीन को अफीम का निर्यात भी ब्रिटिश व्यापार व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया।
ब्रिटिश कारखानों में बने कपड़े भारत में बेचे जाते थे। इस प्रकार भारत तैयार औद्योगिक वस्तुओं का आयातक और कच्चे माल तथा खाद्यान्न का निर्यातक बनता गया।
| औपनिवेशिक व्यापार | भारत से बाहर | भारत में आयात |
|---|---|---|
| मुख्य वस्तुएँ | कच्चा कपास, अफीम और खाद्यान्न | ब्रिटेन में निर्मित कपड़ा तथा औद्योगिक वस्तुएँ |
| मुख्य प्रभाव | भारत कच्चे माल का आपूर्तिकर्ता बना | ब्रिटिश उद्योगों के लिए बड़ा बाजार बना |
भारत का व्यापार-अधिशेष
ब्रिटेन के साथ भारत के व्यापार में ब्रिटिश वस्तुओं का मूल्य कई बार भारत से ब्रिटेन भेजी जाने वाली वस्तुओं के मूल्य से कम रहता था। इस अंतर को भारत का व्यापार-अधिशेष कहा गया।
लेकिन इस अधिशेष का लाभ सामान्य भारतीयों को नहीं मिला। इसका उपयोग ब्रिटेन के तथाकथित होम चार्जेज, अधिकारियों की पेंशन, ऋण पर ब्याज और अन्य विदेशी खर्चों के भुगतान में किया गया।
13. महायुद्धों के बीच विश्व अर्थव्यवस्था
प्रथम विश्वयुद्ध से पहले विश्व अर्थव्यवस्था व्यापार, श्रम और पूँजी के प्रवाह के माध्यम से तेजी से जुड़ रही थी। लेकिन 1914 में शुरू हुए युद्ध ने इस व्यवस्था को गहराई से प्रभावित किया। युद्ध के बाद अर्थव्यवस्था को पुरानी स्थिरता प्राप्त करने में लंबा समय लगा।
प्रथम विश्वयुद्ध मुख्य रूप से यूरोप में लड़ा गया, लेकिन इसका आर्थिक और राजनीतिक प्रभाव पूरी दुनिया पर पड़ा। इसमें एक ओर मित्र राष्ट्र—ब्रिटेन, फ्रांस और रूस—थे तथा दूसरी ओर केंद्रीय शक्तियाँ—जर्मनी, ऑस्ट्रिया-हंगरी और ऑटोमन साम्राज्य—थे।
पहला आधुनिक औद्योगिक युद्ध
प्रथम विश्वयुद्ध को पहला आधुनिक औद्योगिक युद्ध कहा जाता है, क्योंकि इसमें मशीनगन, टैंक, विमान और रासायनिक हथियारों जैसे आधुनिक औद्योगिक साधनों का बड़े पैमाने पर प्रयोग किया गया। इन हथियारों के उत्पादन के लिए विशाल उद्योगों और राष्ट्रीय अर्थव्यवस्थाओं को युद्ध की आवश्यकताओं के अनुसार संगठित किया गया।
- लाखों सैनिकों की भर्ती की गई और उन्हें दूरस्थ युद्ध क्षेत्रों तक पहुँचाया गया।
- कामकाजी आयु के बहुत से पुरुषों की मृत्यु हुई या वे घायल हुए।
- युद्ध के कारण यूरोप की कार्यशील जनसंख्या कम हुई।
- परिवारों की आय घटी और महिलाओं को नए आर्थिक कार्यों में प्रवेश करना पड़ा।
- कारखानों का उत्पादन सामान्य वस्तुओं से हटकर युद्ध सामग्री पर केंद्रित हो गया।
ब्रिटेन कर्जदार और अमेरिका ऋणदाता कैसे बना?
युद्ध से पहले ब्रिटेन विश्व का प्रमुख ऋणदाता था। युद्ध के खर्चों को पूरा करने के लिए उसने अमेरिका से भारी उधार लिया। युद्ध समाप्त होने तक अमेरिका और उसके नागरिकों के पास विदेशों में बड़ी संपत्तियाँ थीं। इस प्रकार अमेरिका अंतरराष्ट्रीय ऋणदाता और ब्रिटेन कर्जदार देश बन गया।
14. युद्धोत्तर सुधार की कठिनाइयाँ
युद्ध के बाद ब्रिटेन के लिए अपनी पुरानी आर्थिक स्थिति प्राप्त करना कठिन था। युद्ध के दौरान भारत और जापान जैसे देशों में उद्योगों का विकास हुआ था। ये देश अब उन बाजारों में ब्रिटेन से प्रतिस्पर्धा करने लगे जहाँ पहले ब्रिटिश वस्तुओं का प्रभुत्व था।
युद्धकालीन माँग समाप्त होने से उत्पादन घटा और बेरोजगारी बढ़ी। ब्रिटेन में युद्ध के बाद बड़ी संख्या में लोग बेरोजगार हुए। उसी समय कृषि अर्थव्यवस्थाएँ भी गंभीर संकट का सामना कर रही थीं।
कृषि क्षेत्र का संकट
युद्ध के समय यूरोपीय देशों में खाद्यान्न उत्पादन कम हो गया था। इस कमी को पूरा करने के लिए कनाडा, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों ने कृषि उत्पादन बढ़ाया। युद्ध समाप्त होने के बाद यूरोपीय उत्पादन फिर शुरू हुआ, लेकिन दूसरे देशों में भी पहले से अधिक उत्पादन जारी रहा।
इससे विश्व बाजार में कृषि उत्पादों की आपूर्ति माँग से अधिक हो गई। कीमतें गिरीं, किसानों की आय कम हुई और उनके लिए ऋण चुकाना कठिन हो गया।
15. बड़े पैमाने पर उत्पादन और उपभोग
1920 के दशक में अमेरिकी अर्थव्यवस्था की एक प्रमुख विशेषता बड़े पैमाने पर उत्पादन था। इसका प्रसिद्ध उदाहरण कार निर्माता हेनरी फोर्ड की असेंबली लाइन उत्पादन प्रणाली है।
असेंबली लाइन कैसे काम करती थी?
असेंबली लाइन में अधूरी कार एक कन्वेयर बेल्ट पर आगे बढ़ती थी। प्रत्येक श्रमिक एक निश्चित स्थान पर खड़ा रहकर उत्पादन का छोटा-सा कार्य बार-बार करता था। इससे श्रमिक को एक स्थान से दूसरे स्थान तक जाने में लगने वाला समय बचा और उत्पादन की गति बहुत बढ़ गई।
काम की गति बहुत तेज और थकाने वाली थी। अनेक श्रमिक नौकरी छोड़ देते थे। श्रमिकों को इस कठिन कार्य प्रणाली को स्वीकार कराने के लिए फोर्ड ने जनवरी 1914 में दैनिक मजदूरी बढ़ाकर पाँच डॉलर कर दी। इसके साथ ही श्रमिकों पर अनुशासन और निगरानी भी बढ़ाई गई।
| विशेषता | परिणाम |
|---|---|
| एक श्रमिक द्वारा निश्चित काम | उत्पादन तेज और मानकीकृत हुआ |
| कन्वेयर बेल्ट का उपयोग | कार्य के बीच लगने वाला समय कम हुआ |
| बड़े पैमाने पर उत्पादन | प्रति इकाई लागत और वस्तु की कीमत कम हुई |
| अधिक मजदूरी | श्रमिक भी उपभोक्ता वस्तुएँ खरीदने लगे |
किस्तों पर खरीद और उपभोक्ता माँग
बड़े पैमाने पर उत्पादन से कारों और घरेलू वस्तुओं की कीमतें कम हुईं। साथ ही किस्तों पर वस्तुएँ खरीदने की सुविधा मिलने लगी। खरीदार भविष्य की आय के आधार पर वस्तु खरीदकर उसका भुगतान साप्ताहिक या मासिक किस्तों में कर सकते थे।
कार, रेफ्रिजरेटर, वॉशिंग मशीन, रेडियो और अन्य उपभोक्ता वस्तुओं की माँग बढ़ी। बढ़ती माँग ने कारखानों, निर्माण उद्योग और रोजगार को गति दी। अमेरिका की आर्थिक समृद्धि दुनिया के दूसरे देशों से पूँजी और व्यापार के माध्यम से जुड़ गई।
16. 1929 की महामंदी
1929 के आसपास शुरू हुई महामंदी ने दुनिया के अधिकांश क्षेत्रों को प्रभावित किया। उत्पादन, रोजगार, आय और व्यापार में भारी गिरावट आई। कृषि उत्पादों की कीमतें तेजी से गिरीं और अनेक देशों में बैंक तथा व्यवसाय बंद हो गए।
महामंदी के प्रमुख कारण
- कृषि का अत्यधिक उत्पादन: आवश्यकता से अधिक फसल उत्पादन के कारण कीमतें गिर गईं।
- किसानों का ऋण संकट: आय घटने पर किसानों ने उत्पादन बढ़ाया, जिससे कीमतें और नीचे चली गईं।
- अमेरिकी ऋण पर निर्भरता: अनेक देश अमेरिकी बैंकों और निवेशकों के ऋण पर निर्भर थे।
- ऋणों की वापसी: संकट शुरू होने पर अमेरिकी पूँजी विदेशों से वापस आने लगी।
- बैंकों का पतन: ऋण वसूली न होने और जमाकर्ताओं की माँग बढ़ने से अनेक बैंक बंद हो गए।
- उपभोग में कमी: आय और रोजगार घटने से लोगों ने वस्तुएँ खरीदना कम कर दिया।
विश्व अर्थव्यवस्था पर प्रभाव
- कारखानों का उत्पादन घटा और लाखों लोग बेरोजगार हुए।
- कृषि उत्पादों की कीमतों और किसानों की आय में भारी गिरावट आई।
- अंतरराष्ट्रीय व्यापार बहुत कम हो गया।
- अनेक बैंक और व्यापारिक संस्थान बंद हुए।
- अमेरिका से संकट यूरोप और विश्व के अन्य हिस्सों में फैल गया।
17. भारत और महामंदी
औपनिवेशिक भारत कृषि उत्पादों और कच्चे माल के निर्यात से विश्व अर्थव्यवस्था से जुड़ा था। इसलिए अंतरराष्ट्रीय कीमतों और व्यापार में गिरावट का सीधा प्रभाव भारतीय किसानों, व्यापारियों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर पड़ा।
व्यापार और कीमतों में गिरावट
1928 से 1934 के बीच भारत के आयात और निर्यात दोनों लगभग आधे रह गए। अंतरराष्ट्रीय बाजार में गेहूँ, पटसन और अन्य कृषि उत्पादों की कीमतें तेजी से गिरीं।
कृषि उत्पादों की कीमतें कम होने के बावजूद औपनिवेशिक सरकार ने किसानों से लगान की माँग में उसी अनुपात में कमी नहीं की। किसानों को लगान और ऋण चुकाने के लिए अपनी उपज अधिक मात्रा में बेचनी पड़ी।
किसानों और शहरी लोगों पर अलग प्रभाव
ग्रामीण भारत में किसानों और उत्पादकों को सबसे गंभीर कठिनाई हुई। अनेक किसानों ने अपनी बचत समाप्त कर दी, जमीन गिरवी रखी और महिलाओं के आभूषण तक बेच दिए।
इसके विपरीत निश्चित आय पाने वाले कुछ शहरी लोगों की स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर रही। वस्तुओं की कीमतें कम होने से वे अपनी आय में पहले की तुलना में अधिक सामान खरीद सकते थे। इसी अवधि में शहरी क्षेत्रों में कुछ निवेश और आवास निर्माण बढ़े।
| वर्ग | महामंदी का प्रभाव |
|---|---|
| किसान | फसल की कीमत घटी, लगान का दबाव बना रहा और ऋण बढ़ा |
| पटसन उत्पादक | निर्यात और कीमत में गिरावट से गंभीर नुकसान |
| निश्चित आय वाले शहरी वर्ग | कम कीमतों के कारण क्रय-शक्ति में तुलनात्मक सुधार |
| ग्रामीण महिलाएँ | परिवार का खर्च चलाने के लिए आभूषण और बचत का नुकसान |
18. द्वितीय विश्वयुद्ध और विश्व अर्थव्यवस्था का पुनर्निर्माण
द्वितीय विश्वयुद्ध 1939 से 1945 तक लड़ा गया। इस युद्ध में मुख्य रूप से धुरी राष्ट्र—जर्मनी, इटली और जापान—एक ओर थे तथा मित्र राष्ट्र—ब्रिटेन, फ्रांस, सोवियत संघ और संयुक्त राज्य अमेरिका—दूसरी ओर थे।
यह युद्ध पहले से भी अधिक विनाशकारी था। करोड़ों लोग मारे गए या घायल हुए। बड़ी संख्या में सामान्य नागरिक भी युद्ध का शिकार बने। यूरोप और एशिया के अनेक शहर, उद्योग, परिवहन साधन और कृषि क्षेत्र नष्ट हो गए।
युद्ध के बाद नीति-निर्माताओं ने क्या सीखा?
युद्धोत्तर नीति-निर्माताओं ने महामंदी और महायुद्धों के अनुभव से दो प्रमुख निष्कर्ष निकाले। पहला, बड़े पैमाने पर उत्पादन तभी लंबे समय तक चल सकता है जब लोगों की आय और उपभोग की क्षमता स्थिर हो। दूसरा, पूर्ण रोजगार और आर्थिक स्थिरता के लिए सरकार का हस्तक्षेप आवश्यक है।
यह भी समझा गया कि कोई देश अकेले आर्थिक स्थिरता बनाए नहीं रख सकता। यदि अंतरराष्ट्रीय व्यापार, भुगतान और मुद्रा विनिमय की व्यवस्था अस्थिर होगी तो उसका प्रभाव सभी देशों पर पड़ेगा। इसलिए वैश्विक आर्थिक सहयोग के लिए नई संस्थाओं की आवश्यकता थी।
19. ब्रेटन वुड्स व्यवस्था
जुलाई 1944 में मित्र राष्ट्रों के प्रतिनिधि अमेरिका के न्यू हैम्पशायर स्थित ब्रेटन वुड्स में एकत्र हुए। इस सम्मेलन का उद्देश्य युद्ध के बाद अधिक स्थिर और सहयोगपूर्ण अंतरराष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था तैयार करना था।
सम्मेलन के परिणामस्वरूप दो प्रमुख अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाएँ स्थापित की गईं—अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) और अंतरराष्ट्रीय पुनर्निर्माण एवं विकास बैंक, जिसे सामान्यतः विश्व बैंक कहा जाता है।
| संस्था | पूरा नाम | प्रारंभिक उद्देश्य |
|---|---|---|
| IMF | अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष | देशों की बाहरी भुगतान-असंतुलन संबंधी समस्याओं से निपटना |
| विश्व बैंक | अंतरराष्ट्रीय पुनर्निर्माण एवं विकास बैंक | युद्धोत्तर पुनर्निर्माण के लिए वित्त उपलब्ध कराना |
स्थिर विनिमय दर की व्यवस्था
ब्रेटन वुड्स व्यवस्था में राष्ट्रीय मुद्राओं को स्थिर विनिमय दरों के माध्यम से अमेरिकी डॉलर से जोड़ा गया। अमेरिकी डॉलर को सोने से एक निश्चित दर पर परिवर्तित किया जा सकता था। इससे अंतरराष्ट्रीय व्यापार में मुद्रा विनिमय की अनिश्चितता को कम करने का प्रयास किया गया।
IMF और विश्व बैंक को ब्रेटन वुड्स संस्थान कहा गया। आरंभिक समय में इन संस्थाओं के निर्णयों पर पश्चिमी औद्योगिक देशों और विशेष रूप से अमेरिका का प्रभाव अधिक था।
20. प्रारंभिक युद्धोत्तर वर्ष
ब्रेटन वुड्स व्यवस्था ने पश्चिमी औद्योगिक देशों के लिए व्यापार और आय में वृद्धि के एक नए युग की शुरुआत की। 1950 से 1970 के शुरुआती वर्षों तक विश्व व्यापार की वार्षिक वृद्धि तेज रही और अनेक देशों में बेरोजगारी अपेक्षाकृत कम रही।
इस अवधि में तकनीक और उत्पादन क्षमता का प्रसार भी हुआ। विकासशील देशों ने आधुनिक उद्योगों में निवेश करना शुरू किया। हालांकि आर्थिक विकास का लाभ सभी देशों और समाजों को समान रूप से नहीं मिला।
21. अनौपनिवेशीकरण और स्वतंत्रता
द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद एशिया और अफ्रीका के अनेक उपनिवेश स्वतंत्र राष्ट्र बने। लेकिन राजनीतिक स्वतंत्रता मिलने के समय उनकी अर्थव्यवस्थाएँ लंबे औपनिवेशिक शासन के कारण कमजोर थीं।
इन देशों को गरीबी, कम आय, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी तथा अविकसित उद्योगों जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ा। IMF और विश्व बैंक प्रारंभ में यूरोपीय पुनर्निर्माण पर केंद्रित थे। बाद में उन्होंने विकासशील देशों से संबंधित कार्यों पर अधिक ध्यान देना शुरू किया।
अनेक नवस्वतंत्र देशों को पश्चिमी वित्तीय संस्थाओं और निजी ऋणदाताओं से सहायता लेनी पड़ी। इस व्यवस्था में पुराने औपनिवेशिक देशों की आर्थिक शक्ति और प्रभाव कई रूपों में बने रहे।
22. G-77 और नई अंतरराष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था
विकासशील देशों ने महसूस किया कि केवल राजनीतिक स्वतंत्रता उनके आर्थिक विकास के लिए पर्याप्त नहीं है। उन्हें अपने प्राकृतिक संसाधनों पर वास्तविक नियंत्रण, विकसित देशों के बाजारों तक उचित पहुँच और विकास के लिए बेहतर आर्थिक अवसर चाहिए थे।
इन देशों ने एक समूह बनाया जिसे G-77 कहा गया। उन्होंने नई अंतरराष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था यानी New International Economic Order की माँग की।
G-77 की प्रमुख माँगें
- विकासशील देशों का अपने प्राकृतिक संसाधनों पर वास्तविक नियंत्रण हो।
- उन्हें विकास के लिए अधिक आर्थिक सहायता मिले।
- कच्चे माल और कृषि उत्पादों के उचित मूल्य प्राप्त हों।
- विकसित देशों के बाजारों में उनके उत्पादों को उचित प्रवेश मिले।
- अंतरराष्ट्रीय आर्थिक संस्थाओं के निर्णय अधिक न्यायपूर्ण हों।
23. ब्रेटन वुड्स का अंत और आधुनिक वैश्वीकरण
1960 के दशक के अंत से अमेरिका की आर्थिक और वित्तीय शक्ति पर दबाव बढ़ने लगा। विदेशों में खर्च और डॉलर की बढ़ती आपूर्ति के कारण डॉलर पर विश्वास कमजोर हुआ। निश्चित विनिमय दर की व्यवस्था को बनाए रखना कठिन हो गया।
1970 के दशक की शुरुआत में स्थिर विनिमय दरों वाली ब्रेटन वुड्स व्यवस्था समाप्त हुई और अनेक प्रमुख मुद्राएँ अस्थिर अथवा तैरती विनिमय दरों पर चलने लगीं।
विकासशील देशों को पहले की तुलना में पश्चिमी वाणिज्यिक बैंकों से अधिक उधार लेना पड़ा। इससे कई देशों में ऋण संकट, गरीबी और आर्थिक अस्थिरता बढ़ी।
उत्पादन एशिया की ओर क्यों स्थानांतरित हुआ?
1970 के दशक के बाद बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने उत्पादन को कम लागत वाले एशियाई देशों की ओर स्थानांतरित करना शुरू किया। चीन में अपेक्षाकृत कम मजदूरी और विशाल श्रमबल ने विदेशी कंपनियों को आकर्षित किया।
चीन की विश्व अर्थव्यवस्था में वापसी और दूसरे एशियाई देशों में उत्पादन के विस्तार ने वैश्विक व्यापार तथा निवेश का भूगोल बदल दिया। इससे एशिया फिर विश्व उत्पादन और व्यापार का महत्वपूर्ण केंद्र बना।
24. महत्वपूर्ण तिथियाँ और घटनाक्रम
परीक्षा से पहले इस कालक्रम को अवश्य दोहराएँ। इससे अलग-अलग घटनाओं के बीच ऐतिहासिक संबंध समझने में सहायता मिलेगी।
| वर्ष/अवधि | प्रमुख घटना |
|---|---|
| लगभग 3000 ईसा पूर्व | सिंधु घाटी सभ्यता के पश्चिमी एशिया से समुद्री व्यापार के प्रमाण |
| पंद्रहवीं शताब्दी तक | रेशम मार्ग एशिया, यूरोप और उत्तरी अफ्रीका को जोड़ते रहे |
| सोलहवीं शताब्दी | अमेरिका से सोना, चाँदी और नई खाद्य फसलों का प्रसार |
| 1840 का दशक | आयरलैंड में आलू की फसल नष्ट होने से गंभीर अकाल |
| 1815–1914 | व्यापार, श्रम और पूँजी के वैश्विक प्रवाह का तीव्र विस्तार |
| 1885 | यूरोपीय शक्तियों की बर्लिन बैठक और अफ्रीका का औपनिवेशिक बँटवारा |
| 1880 के दशक का अंत | अफ्रीका में रिंडरपेस्ट का प्रसार |
| 1914–1918 | प्रथम विश्वयुद्ध |
| 1914 | हेनरी फोर्ड द्वारा दैनिक मजदूरी पाँच डॉलर किया जाना |
| 1921 | भारत से अनुबंधित मजदूर भेजने की व्यवस्था समाप्त |
| 1929 | विश्वव्यापी महामंदी की शुरुआत |
| 1928–1934 | भारत के आयात और निर्यात लगभग आधे रह गए |
| 1939–1945 | द्वितीय विश्वयुद्ध |
| जुलाई 1944 | ब्रेटन वुड्स सम्मेलन और युद्धोत्तर आर्थिक व्यवस्था की नींव |
| 1950–1970 के शुरुआती वर्ष | विश्व व्यापार, आय और रोजगार में तेज वृद्धि |
| 1970 के दशक की शुरुआत | स्थिर विनिमय दर वाली ब्रेटन वुड्स व्यवस्था का अंत |
| 1970 के दशक के बाद | बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा उत्पादन का एशियाई देशों की ओर स्थानांतरण |
25. महत्वपूर्ण शब्दावली
26. बोर्ड परीक्षा के महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर
एक अंक के प्रश्न
उत्तर: रिंडरपेस्ट मवेशियों में फैलने वाली एक संक्रामक महामारी थी।
उत्तर: अनुबंधित श्रमिकों के Agreement को बोलचाल में गिरमिट कहा जाता था।
उत्तर: कॉर्न लॉ ब्रिटेन में अनाज के आयात पर लगाए गए प्रतिबंधों से संबंधित थे।
उत्तर: यह सम्मेलन अमेरिका के न्यू हैम्पशायर स्थित ब्रेटन वुड्स में हुआ था।
उत्तर: G-77 विकासशील देशों का समूह था, जिसने नई अंतरराष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था की माँग की।
तीन अंकों के प्रश्न
- इन मार्गों से चीन का रेशम, भारत के कपड़े और दक्षिण-पूर्व एशिया के मसाले दूरस्थ बाजारों तक पहुँचे।
- सोना और चाँदी यूरोप से एशिया की ओर आती थी।
- बौद्ध धर्म, ईसाई धर्म, इस्लाम, विचार और सांस्कृतिक परंपराएँ भी इन मार्गों से फैलीं।
- ब्रिटेन में सस्ता खाद्यान्न आयात होने लगा।
- ब्रिटिश किसानों को विदेशी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ा।
- लोग शहरों और विदेशों की ओर गए तथा दूसरे देशों में खेती का विस्तार हुआ।
- आधुनिक मशीनगन, टैंक, विमान और रासायनिक हथियारों का प्रयोग हुआ।
- युद्ध सामग्री का उत्पादन विशाल आधुनिक उद्योगों में किया गया।
- राष्ट्रीय अर्थव्यवस्थाओं और परिवहन व्यवस्थाओं को युद्ध के लिए संगठित किया गया।
- कृषि का अत्यधिक उत्पादन और कृषि कीमतों में गिरावट।
- किसानों तथा व्यवसायों का बढ़ता ऋण संकट।
- अमेरिका द्वारा विदेशी ऋण वापस माँगना और बैंकों का बंद होना।
- IMF को बाहरी भुगतान-असंतुलन संबंधी समस्याओं से निपटने के लिए बनाया गया।
- विश्व बैंक को युद्धोत्तर पुनर्निर्माण के लिए वित्त उपलब्ध कराने हेतु बनाया गया।
- इन संस्थाओं का व्यापक उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय आर्थिक स्थिरता और सहयोग बढ़ाना था।
पाँच अंकों के प्रश्न
उत्तर:
- व्यापार: खाद्यान्न, कपड़ा, मसाले और कच्चे माल जैसी वस्तुओं का देशों के बीच आदान-प्रदान।
- श्रम: रोजगार की तलाश में लोगों का एक देश अथवा महाद्वीप से दूसरे स्थान पर जाना।
- पूँजी: व्यापार, कृषि, रेलवे और अन्य परियोजनाओं में निवेश के लिए धन का अंतरराष्ट्रीय प्रवाह।
- तीनों प्रवाह एक-दूसरे से जुड़े थे और आधुनिक विश्व अर्थव्यवस्था का आधार बने।
- इनसे उत्पादन तथा व्यापार बढ़ा, लेकिन असमानता और औपनिवेशिक नियंत्रण भी बढ़े।
उत्तर:
- रिंडरपेस्ट संक्रमित एशियाई मवेशियों द्वारा पूर्वी अफ्रीका पहुँचा।
- बीमारी तेजी से पूरे अफ्रीका में फैल गई।
- इसने लगभग 90 प्रतिशत मवेशियों को नष्ट कर दिया।
- पशुधन पर निर्भर अफ्रीकी लोगों की आजीविका समाप्त होने लगी।
- औपनिवेशिक शासकों के लिए अफ्रीकी लोगों को खानों और बागानों में मजदूरी के लिए बाध्य करना आसान हुआ।
उत्तर:
- कुटीर उद्योगों का पतन, बढ़ता लगान और भूमि की कमी प्रमुख कारण थे।
- रोजगार की कमी और एजेंटों के अच्छे जीवन के वादों ने लोगों को आकर्षित किया।
- उन्हें बागानों, खानों और निर्माण कार्यों के लिए विदेश भेजा गया।
- काम और रहने की परिस्थितियाँ कठोर थीं तथा कानूनी अधिकार सीमित थे।
- उन्होंने विदेशों में नई मिश्रित सांस्कृतिक परंपराएँ और सामाजिक पहचान विकसित की।
उत्तर:
- 1928 से 1934 के बीच भारत के आयात और निर्यात लगभग आधे रह गए।
- कृषि उत्पादों की कीमतों में भारी गिरावट आई।
- औपनिवेशिक सरकार की लगान माँग में समान अनुपात में कमी नहीं हुई।
- किसान ऋणग्रस्त हुए और उन्हें बचत, जमीन तथा आभूषण बेचने पड़े।
- निश्चित आय वाले कुछ शहरी लोगों को कम कीमतों से तुलनात्मक लाभ मिला।
27. एक मिनट में पूरा अध्याय
- प्राचीन रेशम मार्गों ने एशिया, यूरोप और उत्तरी अफ्रीका को जोड़ा।
- व्यापार के साथ भोजन, धर्म, विचार और बीमारियाँ भी एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र तक पहुँचीं।
- उन्नीसवीं शताब्दी की विश्व अर्थव्यवस्था व्यापार, श्रम और पूँजी के प्रवाह पर आधारित थी।
- कॉर्न लॉ समाप्त होने से सस्ते खाद्यान्न का वैश्विक व्यापार बढ़ा।
- रेलमार्ग, भाप के जहाज, टेलीग्राफ और शीतक जहाजों ने बाजारों को जोड़ा।
- औपनिवेशिक शक्तियों ने अफ्रीका की भूमि, पशुधन और श्रम पर नियंत्रण किया।
- भारतीय गिरमिटिया मजदूरों को कठिन परिस्थितियों में विदेश भेजा गया।
- प्रथम विश्वयुद्ध ने अमेरिका को अंतरराष्ट्रीय ऋणदाता बनाया।
- 1929 की महामंदी ने उत्पादन, रोजगार, कृषि और व्यापार को गंभीर रूप से प्रभावित किया।
- 1944 के ब्रेटन वुड्स सम्मेलन से IMF और विश्व बैंक अस्तित्व में आए।
- G-77 ने अधिक न्यायपूर्ण नई अंतरराष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था की माँग की।
- कम लागत के कारण बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने उत्पादन एशियाई देशों की ओर स्थानांतरित किया।
भूमंडलीकृत विश्व का बनना—40 प्रश्नों का ऑनलाइन टेस्ट
अध्याय पढ़ने के बाद 40 प्रश्नों का अभ्यास टेस्ट दें और अपना प्राप्तांक तथा प्रतिशत तुरंत जानें।
ऑनलाइन MCQ टेस्ट शुरू करें →29. अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भूमंडलीकृत विश्व का बनना किस कक्षा का अध्याय है?
यह कक्षा 10 सामाजिक विज्ञान की इतिहास पुस्तक भारत और समकालीन विश्व–II का अध्याय है।
अध्याय में विश्व अर्थव्यवस्था के तीन प्रमुख प्रवाह कौन-से हैं?
वस्तुओं का व्यापार, काम की तलाश में श्रम का प्रवास और देशों के बीच पूँजी का प्रवाह।
रिंडरपेस्ट ने अफ्रीका को कैसे प्रभावित किया?
इस महामारी ने अफ्रीका के लगभग 90 प्रतिशत मवेशियों को नष्ट कर दिया। इससे लोगों की आजीविका कमजोर हुई और उन्हें मजदूरी के लिए काम करना पड़ा।
ब्रेटन वुड्स सम्मेलन का क्या महत्व था?
जुलाई 1944 के इस सम्मेलन ने युद्धोत्तर अंतरराष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था की नींव रखी और IMF तथा विश्व बैंक की स्थापना का मार्ग तैयार किया।
इस अध्याय की तैयारी का सबसे अच्छा तरीका क्या है?
पहले वीडियो से घटनाक्रम समझें, फिर चित्रात्मक नोट्स और समयरेखा पढ़ें। अंत में महत्वपूर्ण प्रश्न हल करके 40 प्रश्नों का ऑनलाइन टेस्ट दें।
निष्कर्ष
भूमंडलीकृत विश्व का निर्माण किसी एक घटना से नहीं हुआ। प्राचीन व्यापारिक मार्गों से शुरू हुई संपर्क की प्रक्रिया भोजन, धर्म और संस्कृतियों के आदान-प्रदान से आगे बढ़ी। उन्नीसवीं शताब्दी में व्यापार, श्रम तथा पूँजी ने विश्व अर्थव्यवस्था को अधिक गहराई से जोड़ा।
उपनिवेशवाद, रिंडरपेस्ट, गिरमिटिया श्रम, विश्वयुद्ध और महामंदी ने इस प्रक्रिया की असमानताओं को उजागर किया। ब्रेटन वुड्स संस्थाओं और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के उदय ने आधुनिक वैश्वीकरण को उसका वर्तमान स्वरूप प्रदान किया।
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