भारत में राष्ट्रवाद Class 10
Nationalism in India • Complete Visual Study Hub • Notes, Video & 40 MCQयह डिजिटल अध्ययन-सामग्री भारत में राष्ट्रवाद के अध्याय-नोट्स एवं आधिकारिक NCERT पाठ्यवस्तु पर आधारित है। इसमें पूरा अध्याय, चित्रात्मक व्याख्या, वीडियो, समयरेखा, परीक्षा-बिंदु और उत्तर-व्याख्या सहित ऑनलाइन टेस्ट एक ही पेज पर दिए गए हैं।
अध्याय का केंद्रीय विचार
भारत में आधुनिक राष्ट्रवाद का विकास औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध संघर्ष से गहराई से जुड़ा था। दमन और आर्थिक कठिनाइयों ने अलग-अलग वर्गों को एक साझा संघर्ष में जोड़ा, किंतु किसान, आदिवासी, मजदूर, व्यापारी और उद्योगपति स्वराज को अपनी परिस्थितियों के अनुसार अलग-अलग अर्थ देते थे। महात्मा गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस ने इन विविध आकांक्षाओं को एक राष्ट्रीय आंदोलन में जोड़ने का प्रयास किया। इसलिए इस अध्याय की मुख्य कहानी केवल घटनाओं की नहीं, बल्कि विविधता के बीच बनी संघर्षपूर्ण एकता की है।
1. प्रथम विश्व युद्ध और सत्याग्रह का विचार
प्रथम विश्व युद्ध के दौरान रक्षा-व्यय बढ़ा, युद्ध-ऋण और करों का बोझ बढ़ा तथा 1913 से 1918 के बीच कीमतें लगभग दोगुनी हो गईं। ग्रामीण क्षेत्रों में जबरन सैनिक भर्ती से रोष फैला। 1918–19 और 1920–21 की फसल-विफलता तथा इन्फ्लुएंजा महामारी ने संकट को और गंभीर बनाया। इसी पृष्ठभूमि में जनवरी 1915 में दक्षिण अफ्रीका से लौटे महात्मा गांधी ने सत्य और अहिंसा पर आधारित सत्याग्रह को जनसंघर्ष का नया माध्यम बनाया।
| वर्ष | स्थान | मुख्य मुद्दा |
|---|---|---|
| 1917 | चंपारण | दमनकारी नील बागान व्यवस्था के विरुद्ध किसान |
| 1918 | अहमदाबाद | कपड़ा-मिल मजदूरों का वेतन विवाद |
| 1918 | खेड़ा | फसल-विफलता के बाद लगान में राहत |
2. रॉलेट एक्ट और जलियाँवाला बाग
1919 का रॉलेट एक्ट सरकार को राजनीतिक गतिविधियों के दमन और राजनीतिक बंदियों को बिना मुकदमे दो वर्ष तक हिरासत में रखने की शक्ति देता था। गांधीजी ने 6 अप्रैल 1919 से अहिंसक सविनय अवज्ञा और हड़ताल का आह्वान किया। 13 अप्रैल 1919 को अमृतसर के जलियाँवाला बाग में बैसाखी के दिन एकत्र भीड़ पर जनरल डायर ने निकास बंद कराकर गोलियाँ चलवा दीं। इस घटना और उसके बाद के दमन ने औपनिवेशिक शासन के वास्तविक स्वरूप को व्यापक जनता के सामने उजागर किया।
3. खिलाफत और असहयोग आंदोलन
प्रथम विश्व युद्ध के बाद उस्मानी खलीफा की स्थिति को लेकर भारतीय मुसलमानों में चिंता थी। मार्च 1919 में बंबई में खिलाफत समिति बनी और अली बंधुओं ने नेतृत्व किया। गांधीजी ने इसे हिंदू–मुस्लिम एकता तथा व्यापक राष्ट्रीय आंदोलन का अवसर माना। सितंबर 1920 के कलकत्ता अधिवेशन में असहयोग का प्रस्ताव स्वीकार हुआ और दिसंबर 1920 के नागपुर अधिवेशन में कार्यक्रम को अंतिम स्वीकृति मिली। आंदोलन जनवरी 1921 में आरंभ हुआ।
- सरकारी उपाधियों का त्याग तथा सेवाओं, परिषदों, अदालतों और शिक्षण संस्थाओं का बहिष्कार।
- विदेशी वस्त्रों का बहिष्कार, शराब की दुकानों पर धरना तथा स्वदेशी–खादी का प्रयोग।
- 1921–22 में विदेशी कपड़े का आयात लगभग ₹102 करोड़ से घटकर ₹57 करोड़ रह गया।
- खादी महँगी होने और वैकल्पिक भारतीय संस्थाएँ धीमी गति से बनने के कारण नगरों में आंदोलन की गति कम हुई।
4. अलग-अलग समूहों के लिए स्वराज का अर्थ
| समूह/क्षेत्र | नेतृत्व | स्वराज की अपेक्षा |
|---|---|---|
| अवध के किसान | बाबा रामचंद्र | लगान में कमी, बेगार समाप्ति और दमनकारी जमींदारों का सामाजिक बहिष्कार |
| गुडेम के आदिवासी | अल्लूरी सीताराम राजू | वनाधिकार, आजीविका और बेगार से मुक्ति |
| असम के बागान मजदूर | स्थानीय सामूहिक कार्रवाई | बागान से स्वतंत्र आवाजाही और अपने गाँव से संबंध |
इन आंदोलनों की माँगें कांग्रेस के कार्यक्रम से पूरी तरह समान नहीं थीं, फिर भी गांधीजी का नाम, स्वराज के नारे और औपनिवेशिक विरोध ने स्थानीय संघर्षों को अखिल भारतीय आंदोलन से भावनात्मक रूप से जोड़ा। फरवरी 1922 में चौरी-चौरा की हिंसक घटना के बाद गांधीजी ने असहयोग आंदोलन वापस ले लिया।
5. सविनय अवज्ञा आंदोलन और दांडी यात्रा
1928 में साइमन कमीशन के सभी सदस्य ब्रिटिश होने के कारण उसका व्यापक विरोध हुआ। दिसंबर 1929 के लाहौर अधिवेशन में जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में पूर्ण स्वराज को कांग्रेस का लक्ष्य घोषित किया गया और 26 जनवरी 1930 को स्वतंत्रता दिवस मनाया गया। गांधीजी ने इरविन के सामने ग्यारह माँगें रखीं। नमक को अमीर–गरीब सभी की आवश्यकता और ब्रिटिश एकाधिकार का प्रतीक मानकर उन्होंने इसे आंदोलन का केंद्रीय मुद्दा बनाया।
- 12 मार्च 1930: गांधीजी ने 78 स्वयंसेवकों के साथ साबरमती से दांडी की लगभग 240 मील यात्रा आरंभ की।
- 6 अप्रैल 1930: दांडी में नमक बनाकर नमक कानून का उल्लंघन किया।
- देशभर में नमक कानून तोड़ा गया, विदेशी वस्त्रों का बहिष्कार हुआ तथा वन कानूनों का उल्लंघन किया गया।
- 5 मार्च 1931: गांधी–इरविन समझौता; गांधीजी द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में गए।
- सम्मेलन विफल होने के बाद आंदोलन पुनः आरंभ हुआ, किंतु 1934 तक उसकी गति कम हो गई।
सविनय अवज्ञा में सामाजिक समूहों की भागीदारी
- समृद्ध किसान: गुजरात के पाटीदार और उत्तर प्रदेश के जाट कृषि-मूल्यों में गिरावट तथा लगान के बोझ से प्रभावित थे।
- गरीब किसान: वे लगान के साथ किराया माफी चाहते थे, किंतु कांग्रेस जमींदारों को नाराज करने से बचती रही।
- व्यापारी–उद्योगपति: औपनिवेशिक नियंत्रण से सुरक्षा, आयात पर संरक्षण और अनुकूल व्यापारिक परिस्थितियाँ चाहते थे।
- औद्योगिक मजदूर: उनकी भागीदारी कुछ क्षेत्रों तक सीमित रही; कांग्रेस वर्ग-संघर्ष को आंदोलन में समाहित करने में सावधान थी।
- महिलाएँ: नमक बनाया, जुलूसों में भाग लिया और विदेशी कपड़े व शराब की दुकानों पर धरना दिया; फिर भी औपचारिक नेतृत्व में स्थान सीमित रहा।
- दलित वर्ग: डॉ. बी. आर. आंबेडकर राजनीतिक प्रतिनिधित्व चाहते थे। सितंबर 1932 के पूना समझौते ने संयुक्त निर्वाचन के भीतर आरक्षित सीटों की व्यवस्था स्वीकार की।
6. सामूहिक अपनत्व की भावना कैसे बनी?
राष्ट्रवाद केवल राजनीतिक कार्यक्रम से नहीं बना। इतिहास, लोककथाओं, गीतों, प्रतीकों और चित्रों ने लोगों को साझा अतीत और सामूहिक पहचान का अनुभव कराया। बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय का वंदे मातरम्, अबनींद्रनाथ टैगोर की भारत माता, स्वदेशी ध्वज, गांधीजी का चरखा और भारतीय अतीत की गौरवशाली पुनर्व्याख्या राष्ट्र की दृश्य एवं भावनात्मक भाषा बने। किंतु जब अतीत को केवल एक समुदाय की दृष्टि से प्रस्तुत किया गया, तो समावेशी एकता के सामने सीमाएँ भी उत्पन्न हुईं।
महत्वपूर्ण समयरेखा
| वर्ष/तिथि | घटना |
|---|---|
| जनवरी 1915 | गांधीजी दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटे |
| 1917–18 | चंपारण, अहमदाबाद और खेड़ा सत्याग्रह |
| 6 अप्रैल 1919 | रॉलेट एक्ट के विरुद्ध हड़ताल |
| 13 अप्रैल 1919 | जलियाँवाला बाग हत्याकांड |
| 1920–22 | खिलाफत–असहयोग आंदोलन |
| फरवरी 1922 | चौरी-चौरा के बाद असहयोग आंदोलन वापस लिया गया |
| दिसंबर 1929 | लाहौर अधिवेशन में पूर्ण स्वराज का प्रस्ताव |
| 12 मार्च–6 अप्रैल 1930 | दांडी यात्रा और नमक कानून का उल्लंघन |
| 5 मार्च 1931 | गांधी–इरविन समझौता |
| सितंबर 1932 | पूना समझौता |
बोर्ड परीक्षा में आने योग्य निर्णायक बिंदु
- सत्याग्रह का अर्थ सत्य और अहिंसा की शक्ति से अन्याय का प्रतिरोध है।
- असहयोग में ब्रिटिश संस्थाओं से सहयोग वापस लिया गया; सविनय अवज्ञा में अन्यायपूर्ण कानून भी तोड़े गए।
- अलग-अलग सामाजिक समूहों के लिए स्वराज का अर्थ अलग था—उत्तर में उदाहरण अवश्य दें।
- नमक को आंदोलन का प्रतीक बनाने के आर्थिक और भावनात्मक दोनों कारण लिखें।
- सामूहिक अपनत्व वाले उत्तर में भारत माता, वंदे मातरम्, लोककथाएँ, ध्वज और इतिहास का उल्लेख करें।
- आंदोलनों की सीमाएँ भी लिखें—वर्गीय हितों का अंतर, दलित प्रतिनिधित्व, सांप्रदायिक तनाव और महिलाओं का सीमित औपचारिक नेतृत्व।
टेस्ट निर्देश
- कुल प्रश्न: 40; प्रत्येक सही उत्तर: 1 अंक।
- सभी प्रश्नों के बाद टेस्ट जमा करें दबाएँ।
- कोई नकारात्मक अंकन नहीं है।
सभी प्रश्न हल करें और अंत में अपना स्कोर, सही उत्तर तथा व्याख्या देखें।
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भारत में राष्ट्रवाद का विकास किससे जुड़ा था?
भारत में आधुनिक राष्ट्रवाद औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध जनसंघर्ष से जुड़ा था। अलग-अलग समूहों ने दमन के साझा अनुभव के आधार पर एकता विकसित की।
असहयोग और सविनय अवज्ञा में मुख्य अंतर क्या था?
असहयोग में ब्रिटिश शासन से सहयोग वापस लिया गया, जबकि सविनय अवज्ञा में सहयोग वापस लेने के साथ अन्यायपूर्ण औपनिवेशिक कानूनों का शांतिपूर्ण उल्लंघन भी किया गया।
नमक को आंदोलन का प्रतीक क्यों बनाया गया?
नमक अमीर और गरीब सभी की दैनिक आवश्यकता था। नमक पर सरकारी एकाधिकार और कर औपनिवेशिक अन्याय का सरल तथा व्यापक प्रतीक बना।
सामूहिक अपनत्व की भावना कैसे बनी?
भारत माता की छवि, वंदे मातरम्, लोकगीत, लोककथाएँ, स्वदेशी ध्वज, चरखा और भारतीय इतिहास की पुनर्व्याख्या ने साझा राष्ट्रीय पहचान को बल दिया।
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