📚 NCERT Classes - Class 10 Civics Chapter 4
📚 Class 10 Political Science (Civics)
📖 अध्याय का परिचय (Chapter Introduction)
लोकतंत्र में सामाजिक विभाजन एक महत्वपूर्ण मुद्दा है। यह अध्याय तीन प्रमुख सामाजिक विभाजनों - लिंग (Gender), धर्म (Religion) और जाति (Caste) - का विस्तृत अध्ययन प्रस्तुत करता है। भारतीय समाज में ये तीनों कारक राजनीति को गहराई से प्रभावित करते हैं।
🎯 अध्याय के मुख्य उद्देश्य:
- लैंगिक असमानता और महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी को समझना
- धर्म और राजनीति के बीच संबंध एवं साम्प्रदायिकता की समस्या को जानना
- जाति व्यवस्था और राजनीति में इसकी भूमिका का विश्लेषण करना
- भारतीय धर्मनिरपेक्षता की विशेषताओं को समझना
- सामाजिक न्याय और समानता की अवधारणा को जानना
👫 भाग 1: लैंगिक विभाजन (Gender Division)
1.1 लैंगिक विभाजन क्या है?
लैंगिक विभाजन (Gender Division) का अर्थ है समाज में स्त्री और पुरुष के बीच जैविक अंतर के आधार पर सामाजिक भूमिकाओं का विभाजन। यह विभाजन प्राकृतिक नहीं बल्कि सामाजिक रूप से निर्मित है।
📌 Sex और Gender में अंतर:
- Sex (लिंग): जैविक अंतर (Biological difference) - जन्म से प्राप्त शारीरिक विशेषताएं
- Gender (जेंडर): सामाजिक अंतर (Social difference) - समाज द्वारा निर्धारित भूमिकाएं और अपेक्षाएं
1.2 भारत में लैंगिक असमानता के रूप (Forms of Gender Inequality in India)
A. शिक्षा में असमानता (Educational Inequality)
भारत में महिला साक्षरता दर पुरुषों की तुलना में काफी कम है। 2011 की जनगणना के अनुसार:
| श्रेणी | साक्षरता दर | अंतर |
|---|---|---|
| पुरुष साक्षरता | 82.14% | 16.68% |
| महिला साक्षरता | 65.46% | |
| कुल साक्षरता | 74.04% | - |
B. रोजगार में असमानता (Employment Inequality)
- महिलाओं की कार्यबल में भागीदारी केवल 20-25% है
- समान काम के लिए महिलाओं को कम वेतन मिलता है (Gender Pay Gap)
- अधिकांश महिलाएं असंगठित क्षेत्र में काम करती हैं
- उच्च पदों पर महिलाओं का प्रतिनिधित्व बहुत कम है
C. राजनीतिक प्रतिनिधित्व में असमानता (Political Representation Inequality)
📊 भारतीय संसद में महिला प्रतिनिधित्व:
| लोकसभा | वर्ष | कुल सदस्य | महिला सदस्य | प्रतिशत |
|---|---|---|---|---|
| 15वीं लोकसभा | 2009 | 543 | 59 | 10.9% |
| 16वीं लोकसभा | 2014 | 543 | 62 | 11.4% |
| 17वीं लोकसभा | 2019 | 543 | 78 | 14.4% |
विश्व औसत: 25% (भारत विश्व औसत से बहुत पीछे है)
D. सामाजिक असमानता (Social Inequality)
- लिंग अनुपात: प्रति 1000 पुरुषों पर केवल 943 महिलाएं (2011 जनगणना)
- कन्या भ्रूण हत्या: तकनीक का दुरुपयोग
- बाल विवाह: अभी भी कुछ क्षेत्रों में प्रचलित
- घरेलू हिंसा: महिलाओं के खिलाफ हिंसा की समस्या
- दहेज प्रथा: सामाजिक कुरीति
1.3 पितृसत्ता (Patriarchy)
पितृसत्ता (Patriarchy) एक ऐसी सामाजिक व्यवस्था है जिसमें पुरुषों का प्रभुत्व होता है और महिलाओं को गौण स्थान दिया जाता है। यह व्यवस्था:
- परिवार में पुरुष को मुखिया मानती है
- संपत्ति के अधिकार मुख्यतः पुरुषों को देती है
- महिलाओं को घरेलू कार्यों तक सीमित रखती है
- निर्णय लेने में पुरुषों को प्राथमिकता देती है
1.4 नारीवादी आंदोलन (Feminist Movement)
नारीवाद (Feminism) एक विचारधारा और आंदोलन है जो महिलाओं के समान अधिकारों और अवसरों की मांग करता है।
A. नारीवादी आंदोलन के चरण:
| चरण | समय | मुख्य मांगें |
|---|---|---|
| प्रथम चरण | 19वीं सदी | मताधिकार, शिक्षा का अधिकार, संपत्ति का अधिकार |
| द्वितीय चरण | 1960-1980 | कार्यस्थल पर समानता, प्रजनन अधिकार |
| तृतीय चरण | 1990 के बाद | विविधता की स्वीकृति, सशक्तिकरण |
B. भारत में नारीवादी आंदोलन की उपलब्धियां:
- राजनीतिक: पंचायती राज में 33% आरक्षण (कई राज्यों में 50%)
- कानूनी: समान नागरिक संहिता, घरेलू हिंसा अधिनियम 2005
- सामाजिक: बाल विवाह निषेध, दहेज विरोधी कानून
- आर्थिक: मातृत्व अवकाश, समान वेतन के प्रयास
🌟 महिला सशक्तिकरण के प्रमुख कदम:
- 73वां और 74वां संविधान संशोधन: पंचायती राज और नगरपालिकाओं में महिलाओं के लिए 33% सीटें आरक्षित
- बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ: कन्या भ्रूण हत्या रोकने और लड़कियों की शिक्षा के लिए अभियान
- महिला आरक्षण विधेयक: संसद और विधानसभाओं में 33% आरक्षण (अभी लंबित)
- सुकन्या समृद्धि योजना: बालिकाओं के भविष्य के लिए बचत योजना
🕉️ भाग 2: धर्म, साम्प्रदायिकता और राजनीति (Religion, Communalism and Politics)
2.1 धर्म और राजनीति का संबंध
धर्म और राजनीति के बीच जटिल संबंध है। इस संबंध को समझने के लिए हमें दो पहलुओं को देखना होगा:
A. धर्म की सकारात्मक भूमिका:
- नैतिक मूल्यों का आधार
- सामाजिक एकता और समरसता
- मानवीय गरिमा की रक्षा
- सामाजिक सुधार आंदोलनों में योगदान
B. धर्म की नकारात्मक भूमिका:
- साम्प्रदायिक विभाजन
- कट्टरवाद और असहिष्णुता
- राजनीतिक दुरुपयोग
- सामाजिक भेदभाव
2.2 साम्प्रदायिकता (Communalism)
साम्प्रदायिकता एक विचारधारा है जो एक धार्मिक समुदाय को राजनीतिक समुदाय मानती है और अन्य धर्मों के प्रति शत्रुता रखती है।
A. साम्प्रदायिकता की विशेषताएं:
- धार्मिक समुदाय को राजनीतिक समुदाय मानना: धर्म के आधार पर राजनीतिक पहचान
- अपने धर्म को श्रेष्ठ मानना: दूसरे धर्मों को हीन समझना
- धार्मिक आधार पर राजनीतिक गठबंधन: वोट बैंक की राजनीति
- धार्मिक भावनाओं का राजनीतिक दुरुपयोग: चुनावों में धर्म का इस्तेमाल
B. साम्प्रदायिकता के विभिन्न रूप:
| स्तर | विवरण | उदाहरण |
|---|---|---|
| दैनिक जीवन में | धार्मिक पूर्वाग्रह और रूढ़िवादिता | दूसरे धर्म के लोगों को संदेह की दृष्टि से देखना |
| संगठित स्तर पर | धार्मिक संगठनों द्वारा राजनीतिक गतिविधियां | धार्मिक दलों का गठन, धार्मिक आधार पर संगठन |
| राजनीतिक स्तर पर | धर्म के आधार पर वोट मांगना | चुनावों में धार्मिक नारे, धार्मिक ध्रुवीकरण |
| हिंसक स्तर पर | साम्प्रदायिक दंगे और हिंसा | धार्मिक झगड़े, सांप्रदायिक दंगे |
C. साम्प्रदायिकता के कारण:
- ऐतिहासिक कारण: विभाजन की विरासत, पुरानी शिकायतें
- राजनीतिक कारण: वोट बैंक की राजनीति, राजनीतिक दलों द्वारा दुरुपयोग
- आर्थिक कारण: संसाधनों के लिए प्रतिस्पर्धा, रोजगार में भेदभाव
- सामाजिक कारण: अशिक्षा, गरीबी, सामाजिक तनाव
- मनोवैज्ञानिक कारण: असुरक्षा की भावना, पहचान का संकट
2.3 धर्मनिरपेक्षता (Secularism)
धर्मनिरपेक्षता का अर्थ है राज्य का किसी भी धर्म के साथ कोई आधिकारिक संबंध न होना और सभी धर्मों को समान सम्मान देना।
A. धर्मनिरपेक्षता के मॉडल:
| मॉडल | विशेषता | देश |
|---|---|---|
| पश्चिमी मॉडल | धर्म और राज्य का पूर्ण अलगाव (Separation) | फ्रांस, अमेरिका |
| भारतीय मॉडल | सभी धर्मों का समान आदर और संरक्षण (Equal Respect) | भारत |
B. भारतीय धर्मनिरपेक्षता की विशेषताएं:
- राज्य का कोई धर्म नहीं: भारत का कोई राजधर्म (Official Religion) नहीं है
- धार्मिक स्वतंत्रता: संविधान के अनुच्छेद 25-28 सभी नागरिकों को धार्मिक स्वतंत्रता का मौलिक अधिकार देते हैं
- समान व्यवहार: राज्य सभी धर्मों के साथ समान व्यवहार करता है
- धर्म के आधार पर भेदभाव नहीं: अनुच्छेद 15 धर्म के आधार पर भेदभाव को प्रतिबंधित करता है
- धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप: सामाजिक सुधार के लिए राज्य धार्मिक प्रथाओं में हस्तक्षेप कर सकता है
- अल्पसंख्यकों के अधिकार: अनुच्छेद 29-30 अल्पसंख्यकों को विशेष अधिकार देते हैं
C. भारत में धर्मनिरपेक्षता की चुनौतियां:
- साम्प्रदायिक हिंसा और दंगे
- धार्मिक कट्टरवाद का बढ़ना
- राजनीतिक दलों द्वारा धर्म का दुरुपयोग
- समान नागरिक संहिता का न होना
- अल्पसंख्यकों में असुरक्षा की भावना
📌 42वां संविधान संशोधन (1976):
इस संशोधन द्वारा प्रस्तावना में "धर्मनिरपेक्ष" (Secular) शब्द जोड़ा गया। इससे पहले भारत व्यवहार में धर्मनिरपेक्ष था लेकिन औपचारिक रूप से नहीं।
🏛️ भाग 3: जाति और राजनीति (Caste and Politics)
3.1 जाति व्यवस्था का परिचय
जाति व्यवस्था भारतीय समाज की एक प्राचीन सामाजिक संरचना है जो जन्म के आधार पर लोगों को विभिन्न समूहों में विभाजित करती है।
A. पारंपरिक जाति व्यवस्था की विशेषताएं:
- जन्म आधारित: जाति का निर्धारण जन्म से होता है, बदला नहीं जा सकता
- पेशागत विभाजन: हर जाति का एक निश्चित पेशा
- अंतर्विवाह: अपनी ही जाति में विवाह (Endogamy)
- सामाजिक स्तरीकरण: ऊंच-नीच का भेद
- पवित्रता-अपवित्रता: धार्मिक आधार पर वर्गीकरण
B. वर्ण व्यवस्था:
| वर्ण | पारंपरिक कार्य | सामाजिक स्थिति |
|---|---|---|
| ब्राह्मण | पुजारी, शिक्षक, विद्वान | सर्वोच्च |
| क्षत्रिय | योद्धा, शासक | उच्च |
| वैश्य | व्यापारी, किसान | मध्यम |
| शूद्र | सेवा कार्य | निम्न |
| दलित/अछूत | अस्वच्छ कार्य | सबसे निम्न (वर्ण व्यवस्था से बाहर) |
3.2 आधुनिक भारत में जाति व्यवस्था में परिवर्तन
A. जाति व्यवस्था में आए बदलाव:
- शहरीकरण का प्रभाव: शहरों में जाति की कठोरता कम हुई
- शिक्षा का प्रसार: शिक्षित वर्ग में जाति का महत्व घटा
- औद्योगीकरण: पेशागत गतिशीलता बढ़ी
- आधुनिक व्यवसाय: जाति और पेशे के बीच संबंध टूटा
- अंतर-जातीय विवाह: धीरे-धीरे बढ़ रहे हैं (विशेषकर शहरों में)
- सामाजिक सुधार आंदोलन: जाति व्यवस्था के विरुद्ध आंदोलन
B. जाति व्यवस्था की निरंतरता:
- ग्रामीण क्षेत्रों में अभी भी मजबूत
- विवाह में जाति का महत्व
- सामाजिक भेदभाव
- जातिगत हिंसा की घटनाएं
3.3 जातिवाद (Casteism)
जातिवाद का अर्थ है जाति के आधार पर भेदभाव, पक्षपात और राजनीतिक गतिविधियां।
⚠️ जातिवाद की विशेषताएं:
- जाति को राजनीति का आधार बनाना
- अपनी जाति को सर्वोपरि मानना
- जातिगत एकता पर बल
- दूसरी जातियों के प्रति भेदभाव
- जाति के आधार पर वोट देना
3.4 राजनीति में जाति की भूमिका
A. जाति राजनीति को कैसे प्रभावित करती है:
| पहलू | प्रभाव | उदाहरण |
|---|---|---|
| मतदान व्यवहार | लोग अपनी जाति के उम्मीदवार को वोट देते हैं | जातिगत वोट बैंक |
| उम्मीदवार चयन | राजनीतिक दल जातिगत समीकरण देखकर उम्मीदवार चुनते हैं | टिकट वितरण में जाति का महत्व |
| गठबंधन | जातिगत आधार पर राजनीतिक गठबंधन | विभिन्न जातियों का समर्थन पाने के लिए गठजोड़ |
| नीति निर्माण | जातिगत हितों को ध्यान में रखकर नीतियां | आरक्षण नीति, कल्याणकारी योजनाएं |
B. राजनीति जाति को कैसे प्रभावित करती है:
- राजनीतिक जागरूकता: राजनीति में भागीदारी से जाति समूहों में चेतना का विकास
- नई जाति पहचान: राजनीतिक हितों के लिए नई जाति पहचान का निर्माण
- जाति गठबंधन: विभिन्न जातियों का राजनीतिक एकीकरण
- सामाजिक न्याय: पिछड़ी जातियों के लिए आरक्षण और कल्याण
3.5 जाति और राजनीति: सकारात्मक और नकारात्मक पहलू
A. सकारात्मक पहलू:
- पिछड़े वर्गों का राजनीतिक सशक्तिकरण: दलित और OBC समुदायों को राजनीतिक आवाज मिली
- सामाजिक न्याय: आरक्षण के माध्यम से समानता की दिशा में प्रयास
- राजनीतिक भागीदारी: सभी जातियों की राजनीति में भागीदारी
- जाति भेदभाव के विरुद्ध आवाज: राजनीतिक मंच पर जातिगत भेदभाव का विरोध
B. नकारात्मक पहलू:
- जातिगत हिंसा: जाति के आधार पर झगड़े और हिंसा
- योग्यता की उपेक्षा: जाति को योग्यता से अधिक महत्व
- राजनीतिक विभाजन: समाज का जातिगत आधार पर विभाजन
- भ्रष्टाचार: जाति के नाम पर भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद
- राष्ट्रीय एकता में बाधा: जाति आधारित राजनीति राष्ट्रीय एकता को कमजोर करती है
3.6 आरक्षण व्यवस्था (Reservation System)
आरक्षण भारतीय संविधान द्वारा प्रदत्त एक विशेष प्रावधान है जो ऐतिहासिक रूप से वंचित समुदायों को शिक्षा, रोजगार और राजनीति में प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करता है।
A. आरक्षण के प्रकार:
| श्रेणी | आरक्षण प्रतिशत | आधार |
|---|---|---|
| अनुसूचित जाति (SC) | 15% | संविधान की अनुसूची में सूचीबद्ध जातियां |
| अनुसूचित जनजाति (ST) | 7.5% | संविधान की अनुसूची में सूचीबद्ध जनजातियां |
| अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) | 27% | मंडल आयोग की सिफारिशें |
| आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) | 10% | 103वां संविधान संशोधन (2019) |
B. आरक्षण के क्षेत्र:
- शिक्षा: सरकारी शैक्षणिक संस्थानों में सीटों का आरक्षण
- रोजगार: सरकारी नौकरियों में पदों का आरक्षण
- राजनीति: लोकसभा, विधानसभाओं और स्थानीय निकायों में सीटों का आरक्षण
C. आरक्षण पर बहस:
| पक्ष में तर्क | विपक्ष में तर्क |
|---|---|
| ऐतिहासिक अन्याय की भरपाई | योग्यता की उपेक्षा |
| सामाजिक न्याय और समानता | रिवर्स डिस्क्रिमिनेशन |
| विविधता और प्रतिनिधित्व | जाति व्यवस्था को मजबूत करना |
| आर्थिक सशक्तिकरण | क्रीमी लेयर का लाभ |
📖 महत्वपूर्ण शब्दावली (Important Terms)
| शब्द (English) | हिंदी | परिभाषा |
|---|---|---|
| Gender Division | लैंगिक विभाजन | समाज में स्त्री-पुरुष के बीच सामाजिक भूमिकाओं का विभाजन |
| Patriarchy | पितृसत्ता | पुरुष प्रधान समाज व्यवस्था जिसमें पुरुषों का वर्चस्व होता है |
| Feminism | नारीवाद | महिलाओं के समान अधिकारों की मांग करने वाला आंदोलन |
| Communalism | साम्प्रदायिकता | धार्मिक समुदाय के आधार पर राजनीति और भेदभाव |
| Secularism | धर्मनिरपेक्षता | राज्य का किसी धर्म के साथ आधिकारिक संबंध न होना |
| Casteism | जातिवाद | जाति के आधार पर भेदभाव और राजनीति |
| Reservation | आरक्षण | पिछड़े वर्गों के लिए शिक्षा और रोजगार में विशेष प्रावधान |
| Affirmative Action | सकारात्मक कार्रवाई | वंचित समूहों के उत्थान के लिए विशेष उपाय |
❓ NCERT प्रश्नोत्तर (NCERT Questions and Answers)
अभ्यास के प्रश्न (Exercise Questions)
उत्तर: लैंगिक विभाजन की राजनीति का अर्थ है राजनीति में स्त्री-पुरुष के बीच असमान प्रतिनिधित्व और भूमिका का होना।
भारत में महिलाओं का राजनीतिक प्रतिनिधित्व:
- संसद में: लोकसभा में केवल 14-15% महिला सांसद (विश्व औसत 25% से कम)
- राज्य विधानसभाओं में: लगभग 9-10% महिला विधायक
- मंत्रिमंडल में: बहुत कम महिला मंत्री
- स्थानीय स्तर पर: पंचायती राज में 33-50% आरक्षण के कारण बेहतर स्थिति
कारण:
- पितृसत्तात्मक सोच
- शिक्षा की कमी
- राजनीतिक दलों द्वारा कम टिकट
- पारिवारिक और सामाजिक दबाव
उत्तर: साम्प्रदायिकता के विभिन्न रूप:
- दैनिक जीवन में:
- धार्मिक पूर्वाग्रह और रूढ़िवादिता
- अपने धर्म को श्रेष्ठ मानना
- दूसरे धर्म के प्रति संदेह
- संगठित स्तर पर:
- धार्मिक संगठनों का गठन
- धार्मिक आधार पर राजनीतिक गतिविधियां
- अपने धर्म के हितों की रक्षा के नाम पर संगठन
- राजनीतिक स्तर पर:
- धर्म के आधार पर वोट मांगना
- एक धर्म का राजनीतिक गठबंधन
- धार्मिक ध्रुवीकरण
- हिंसक रूप:
- साम्प्रदायिक दंगे
- धार्मिक हिंसा
- आतंकवाद
साम्प्रदायिक राजनीति के खतरे:
- राष्ट्रीय एकता और अखंडता को खतरा
- सामाजिक तनाव और हिंसा
- लोकतंत्र की मूल भावना के विरुद्ध
- विकास में बाधा
- अल्पसंख्यकों में असुरक्षा
उत्तर: भारतीय धर्मनिरपेक्षता की विशेषताएं:
- राज्य का कोई आधिकारिक धर्म नहीं: भारत का कोई राजधर्म नहीं है
- धार्मिक स्वतंत्रता: सभी नागरिकों को अपनी पसंद का धर्म मानने, आचरण करने और प्रचार करने का अधिकार
- समान व्यवहार: राज्य सभी धर्मों के साथ समान व्यवहार करता है
- धर्म के आधार पर भेदभाव नहीं: कानून के समक्ष सभी धर्मों के लोग समान हैं
- धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप: सामाजिक सुधार के लिए राज्य धार्मिक प्रथाओं में हस्तक्षेप कर सकता है
पश्चिमी धर्मनिरपेक्षता से अंतर:
| भारतीय धर्मनिरपेक्षता | पश्चिमी धर्मनिरपेक्षता |
|---|---|
| राज्य सभी धर्मों का समान आदर करता है | धर्म और राज्य का पूर्ण अलगाव |
| राज्य सामाजिक सुधार के लिए धर्म में हस्तक्षेप कर सकता है | राज्य धार्मिक मामलों में कोई हस्तक्षेप नहीं करता |
| अल्पसंख्यकों को विशेष अधिकार | सभी को समान अधिकार, कोई विशेष प्रावधान नहीं |
| धार्मिक शिक्षण संस्थानों को मान्यता | धर्म को निजी मामला मानता है |
उत्तर:
A. जाति राजनीति को कैसे प्रभावित करती है:
- मतदान व्यवहार:
- मतदाता अक्सर अपनी जाति के उम्मीदवार को वोट देते हैं
- जातिगत वोट बैंक की राजनीति
- उदाहरण: यादव बहुल क्षेत्र में यादव उम्मीदवार को अधिक वोट
- उम्मीदवार चयन:
- राजनीतिक दल जातिगत समीकरण देखकर टिकट देते हैं
- प्रत्येक क्षेत्र की प्रमुख जातियों का ध्यान रखा जाता है
- उदाहरण: जिस क्षेत्र में जाट बहुसंख्यक हैं, वहां जाट उम्मीदवार
- राजनीतिक गठबंधन:
- विभिन्न जातियों के समर्थन के लिए गठजोड़
- जाति आधारित दलों का गठन
- उदाहरण: बसपा (BSP) - दलितों का दल
- सरकार में प्रतिनिधित्व:
- मंत्रिमंडल में विभिन्न जातियों का संतुलन
- जाति के आधार पर पद वितरण
B. राजनीति जाति को कैसे प्रभावित करती है:
- राजनीतिक जागरूकता:
- राजनीतिक भागीदारी से जाति समूहों में चेतना बढ़ी
- अपने अधिकारों के प्रति जागरूकता
- उदाहरण: दलित आंदोलन, OBC आंदोलन
- नई जाति पहचान:
- छोटी-छोटी जातियां मिलकर बड़े समूह बनाती हैं
- राजनीतिक हितों के लिए नए संगठन
- उदाहरण: विभिन्न पिछड़ी जातियों का OBC के रूप में एकीकरण
- सामाजिक न्याय:
- आरक्षण नीति से पिछड़ी जातियों को अवसर
- सामाजिक और आर्थिक उत्थान
- उदाहरण: SC/ST/OBC के लिए आरक्षण
- जाति व्यवस्था में परिवर्तन:
- पारंपरिक जाति पदानुक्रम में बदलाव
- राजनीतिक शक्ति से सामाजिक स्थिति में सुधार
उत्तर: जाति व्यवस्था में आए परिवर्तन:
- शहरीकरण का प्रभाव:
- शहरों में जाति की कठोरता कम हुई
- विभिन्न जातियों के लोग साथ काम करते हैं
- सार्वजनिक स्थानों पर जाति का कम महत्व
- व्यावसायिक गतिशीलता:
- जाति और पेशे के बीच पारंपरिक संबंध टूटा
- लोग किसी भी व्यवसाय को अपना सकते हैं
- उदाहरण: ब्राह्मण व्यापार कर रहे हैं, वैश्य डॉक्टर/इंजीनियर बन रहे हैं
- शिक्षा का प्रसार:
- शिक्षा सभी जातियों के लिए सुलभ
- शिक्षित वर्ग में जाति भेदभाव कम
- सामाजिक जागरूकता में वृद्धि
- कानूनी सुधार:
- संविधान में जाति भेदभाव पर रोक
- अस्पृश्यता का उन्मूलन (अनुच्छेद 17)
- SC/ST अत्याचार निवारण अधिनियम
- अंतर-जातीय विवाह:
- धीरे-धीरे बढ़ रहे हैं (विशेषकर शहरों में)
- सरकार द्वारा प्रोत्साहन
आधुनिक भारत में जाति की भूमिका:
- राजनीति में: अभी भी महत्वपूर्ण भूमिका
- विवाह में: अधिकांश विवाह जाति के भीतर
- सामाजिक संबंधों में: ग्रामीण क्षेत्रों में अभी भी मजबूत
- आर्थिक क्षेत्र में: कुछ व्यवसायों में जातिगत प्रभुत्व
📝 परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण प्रश्न (Important Exam Questions)
1 अंक के प्रश्न (1 Mark Questions)
- नारीवाद से क्या अभिप्राय है?
- साम्प्रदायिकता किसे कहते हैं?
- धर्मनिरपेक्षता का क्या अर्थ है?
- जातिवाद क्या है?
- पितृसत्ता से क्या तात्पर्य है?
- भारतीय संसद में महिलाओं का प्रतिशत कितना है?
- 42वां संविधान संशोधन कब हुआ?
- लिंग और जेंडर में क्या अंतर है?
3 अंक के प्रश्न (3 Marks Questions)
- भारत में महिलाओं की राजनीतिक स्थिति का संक्षेप में वर्णन करें।
- साम्प्रदायिकता के किन्हीं तीन रूपों का वर्णन करें।
- भारतीय धर्मनिरपेक्षता की तीन विशेषताएं बताइए।
- राजनीति में जाति की भूमिका समझाइए।
- लैंगिक असमानता के तीन रूप बताइए।
- नारीवादी आंदोलन की उपलब्धियां बताइए।
- आरक्षण व्यवस्था पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
- जाति व्यवस्था में आए परिवर्तनों का वर्णन करें।
5 अंक के प्रश्न (5 Marks Questions)
- लैंगिक असमानता के विभिन्न रूपों की विस्तार से व्याख्या करें।
- साम्प्रदायिकता के कारण, रूप और परिणामों का विस्तृत विवरण दें।
- भारतीय धर्मनिरपेक्षता की विशेषताओं का वर्णन करते हुए इसे पश्चिमी धर्मनिरपेक्षता से तुलना करें।
- जाति और राजनीति के पारस्परिक संबंधों की व्याख्या करें।
- जाति व्यवस्था में आए बदलावों का विस्तृत वर्णन करें।
- भारत में महिला सशक्तिकरण के लिए किए गए प्रयासों का वर्णन करें।
- आरक्षण व्यवस्था के पक्ष और विपक्ष में तर्क दीजिए।
🎯 बहुविकल्पीय प्रश्न (Multiple Choice Questions)
- भारतीय संसद में महिलाओं का प्रतिशत लगभग कितना है?
- (a) 5%
- (b) 10%
- (c) 15% ✓
- (d) 25%
- प्रस्तावना में 'धर्मनिरपेक्ष' शब्द किस संविधान संशोधन द्वारा जोड़ा गया?
- (a) 40वां
- (b) 42वां ✓
- (c) 44वां
- (d) 52वां
- पंचायती राज संस्थाओं में महिलाओं के लिए कितने प्रतिशत सीटें आरक्षित हैं?
- (a) 25%
- (b) 33% ✓
- (c) 40%
- (d) 50%
- भारत में अनुसूचित जातियों के लिए कितने प्रतिशत आरक्षण है?
- (a) 7.5%
- (b) 15% ✓
- (c) 27%
- (d) 10%
- निम्नलिखित में से कौन सा साम्प्रदायिकता का रूप नहीं है?
- (a) धार्मिक पूर्वाग्रह
- (b) धार्मिक हिंसा
- (c) धार्मिक स्वतंत्रता ✓
- (d) धार्मिक राजनीति
- OBC के लिए कितने प्रतिशत आरक्षण है?
- (a) 15%
- (b) 22.5%
- (c) 27% ✓
- (d) 10%
- निम्नलिखित में से कौन सा लैंगिक असमानता का रूप है?
- (a) साक्षरता दर में अंतर
- (b) राजनीतिक प्रतिनिधित्व में कमी
- (c) वेतन असमानता
- (d) उपर्युक्त सभी ✓
- पितृसत्ता का क्या अर्थ है?
- (a) महिला प्रधान समाज
- (b) पुरुष प्रधान समाज ✓
- (c) बाल प्रधान समाज
- (d) वृद्ध प्रधान समाज
🔑 याद रखने योग्य महत्वपूर्ण तथ्य (Key Facts to Remember)
लैंगिक विभाजन (Gender Division)
- विश्व में संसदीय प्रतिनिधित्व का औसत: 25%
- भारत में: केवल 14-15% (विश्व में 148वें स्थान पर)
- रवांडा: 61% (विश्व में पहले स्थान पर)
- पंचायती राज में 33-50% आरक्षण
- महिला आरक्षण विधेयक (33%): अभी लंबित
धर्म और राजनीति (Religion and Politics)
- 42वां संविधान संशोधन (1976): प्रस्तावना में "धर्मनिरपेक्ष" शब्द जोड़ा
- अनुच्छेद 25-28: धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार
- अनुच्छेद 15: धर्म के आधार पर भेदभाव निषेध
- अनुच्छेद 29-30: अल्पसंख्यकों के अधिकार
जाति और राजनीति (Caste and Politics)
- SC आरक्षण: 15%
- ST आरक्षण: 7.5%
- OBC आरक्षण: 27%
- EWS आरक्षण: 10% (103वां संशोधन, 2019)
- अनुच्छेद 17: अस्पृश्यता का उन्मूलन
- अनुच्छेद 46: SC/ST के हितों का संरक्षण
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Political Science (नागरिक शास्त्र):
Chapter 1: Power Sharing - सत्ता की साझेदारी Chapter 2: Federalism - संघवाद Chapter 3: Democracy and Diversity - लोकतंत्र और विविधताEconomics (अर्थशास्त्र):
Chapter 1: Development - विकास Chapter 2: Sectors of Indian Economy - भारतीय अर्थव्यवस्था के क्षेत्र Chapter 3: Money and Credit - मुद्रा और साख Chapter 4: Globalisation and Indian Economy - वैश्वीकरण और भारतीय अर्थव्यवस्थाGeography (भूगोल):
Chapter 1: Resources and Development - संसाधन और विकास Chapter 2: Forest and Wildlife Resources - वन और वन्यजीव संसाधन Chapter 3: Water Resources - जल संसाधन🎓 निष्कर्ष (Conclusion)
लैंगिक विभाजन, धर्म और जाति भारतीय समाज और राजनीति के महत्वपूर्ण पहलू हैं। लोकतंत्र की सफलता के लिए आवश्यक है कि:
- महिलाओं को समान अधिकार और अवसर मिलें
- धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांतों का पालन हो
- जाति आधारित भेदभाव समाप्त हो
- सामाजिक न्याय और समानता की स्थापना हो
संविधान ने इन समस्याओं के समाधान के लिए कई प्रावधान किए हैं, लेकिन व्यवहार में इन्हें लागू करना एक बड़ी चुनौती है। सामाजिक जागरूकता, शिक्षा और कानून के प्रभावी क्रियान्वयन से ही एक समतामूलक समाज का निर्माण संभव है।


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