Marwari Mission 100
RBSE 12th Hindi: आत्म-परिचय (हरिवंश राय बच्चन) - संपूर्ण व्याख्या
Source: www.ncertclasses.com | Marwari Mission 100
पाठ-1: आत्म-परिचय (Aatma Parichay) - सप्रसंग व्याख्या और प्रश्नोत्तर
कवि: हरिवंश राय बच्चन | आरोह भाग-2 | हालावाद का दर्शन
| जन्म | 1907 (इलाहाबाद) |
| मृत्यु | 2003 (मुंबई) |
| वाद | हालावाद (Halavad) |
| प्रमुख रचना | मधुशाला (1935) |
| पाठ का स्रोत | 'निशा निमंत्रण' गीत संग्रह |
पाठ का प्रतिपाद्य (Central Theme):
कविता 'आत्म-परिचय' में कवि बच्चन जी बताना चाहते हैं कि दुनिया को जानना आसान है, लेकिन स्वयं को जानना (Self-Introduction) सबसे कठिन है। कवि का समाज से संबंध "प्रीति-कलह" (Love-Hate) का है। वे दुनिया के कष्टों को सहते हुए भी प्यार बांटते फिरते हैं। यह कविता 'हालावाद' (मस्ती और प्रेम का दर्शन) का सुंदर उदाहरण है।
1. सप्रसंग व्याख्या: पद्यांश 1
फिर भी जीवन में प्यार लिए फिरता हूँ;
कर दिया किसी ने झंकृत जिनको छूकर,
मैं साँसों के दो तार लिए फिरता हूँ!"
- जग-जीवन: सांसारिक गतिविधियां/कष्ट।
- झंकृत: तारों को बजाने से निकलने वाला स्वर (Vibration)।
कवि कहते हैं कि मैं इस संसार में रहता हूँ, इसलिए मुझ पर सांसारिक जिम्मेदारियों और संघर्षों का बोझ (भार) है। लेकिन, इस बोझ के बावजूद मेरा जीवन नीरस नहीं है; मैं अपने दिल में सभी के लिए प्रेम (प्यार) लेकर घूमता हूँ।
कवि अपने जीवन की तुलना एक 'वीणा' (वाद्य यंत्र) से करते हैं। वे कहते हैं कि किसी प्रिय (संभवतः उनकी दिवंगत पत्नी या प्रेमिका) ने प्रेम से मेरे हृदय रूपी वीणा के तारों को छू लिया था, जिससे आज भी मेरे जीवन में संगीत (सांसें) चल रहा है। मैं उन्हीं यादों के सहारे जी रहा हूँ।
विशेष (Poetic Beauty):- विरोधाभास अलंकार: 'जग-जीवन का भार' और 'प्यार' एक साथ। (कष्ट में भी प्रेम)।
- रूपक अलंकार: 'साँसों के दो तार' (साँसों को वीणा के तार बताया है)।
- भाषा: खड़ी बोली हिंदी (सरल और प्रवाहमयी)।
- शैली: आत्मकथात्मक (Autobiographical Style)।
2. सप्रसंग व्याख्या: पद्यांश 2 (Most Important)
मैं कभी न जग का ध्यान किया करता हूँ,
जग पूछ रहा उनको, जो जग की गाते,
मैं अपने मन का गान किया करता हूँ!"
कवि कहते हैं कि मैं प्रेम रूपी शराब (स्नेह-सुरा) को पीकर मस्त रहता हूँ। अर्थात, मैं प्रेम के नशे में डूबा रहता हूँ। दुनिया वाले क्या कहते हैं, इसकी मैं परवाह नहीं करता (जग का ध्यान नहीं करता)।
संसार का तो नियम है कि वह उन्हीं लोगों की प्रशंसा करता है जो उसकी हाँ में हाँ मिलाते हैं (जो जग की गाते)। मैं चापलूस नहीं हूँ। मैं तो अपनी मौज में, अपने मन के गीतों (मौलिक विचारों) को गाता हूँ।
यहाँ 'स्नेह-सुरा' (Love-Wine) में रूपक अलंकार है। यह बच्चन जी के 'हालावाद' का प्रतीक है। (विस्तृत जानकारी के लिए हमारा अलंकार लेख देखें)।
3. सप्रसंग व्याख्या: पद्यांश 3
मैं निज उर के उपहार लिए फिरता हूँ;
है यह अपूर्ण संसार न मुझको भाता,
मैं स्वप्नों का संसार लिए फिरता हूँ!"
कवि कहते हैं कि मैं अपने हृदय (उर) के भावों (उद्गार) को व्यक्त करता हूँ। मेरे पास प्रेम का जो खजाना है, उसे मैं उपहार की तरह बांटता फिरता हूँ।
यह दुनिया मुझे पसंद नहीं है क्योंकि यह 'अपूर्ण' (Incomplete) है - इसमें प्रेम की कमी है। इसलिए, मैं इस दुनिया से दूर अपनी कल्पनाओं में एक 'सपनों का संसार' बनाता हूँ जहाँ सिर्फ प्रेम है।
🎯 बोर्ड परीक्षा प्रश्न बैंक (Board Exam Questions)
प्र.1: "मैं जग-जीवन का भार लिए फिरता हूँ" - आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: कवि का आशय है कि समाज में रहते हुए उन्हें कई दायित्व निभाने पड़ते हैं और कष्ट सहने पड़ते हैं। वे समाज से पूरी तरह कट नहीं सकते, इसलिए वे इन कष्टों को 'बोझ' की तरह ढो रहे हैं, फिर भी उनके मन में प्रेम है।
प्र.2: "स्नेह-सुरा" से क्या तात्पर्य है?
उत्तर: स्नेह-सुरा का अर्थ है 'प्रेम रूपी मदिरा'। कवि प्रेम के नशे में डूबे रहकर संसार की चिंताओं को भूल जाते हैं।
प्र.3: कवि को संसार 'अपूर्ण' क्यों लगता है?
उत्तर: क्योंकि संसार में प्रेम का अभाव है। यहाँ लोग स्वार्थ और बनावटीपन में जी रहे हैं।
प्र.4: कविता में 'मैं' और 'और' शब्द के माध्यम से किस विरोधाभास को उभारा गया है?
उत्तर: कवि कहते हैं "मैं और, और जग और" (यमक अलंकार)। कवि भावुक हैं, जबकि दुनिया भौतिकवादी है। दोनों की प्रकृति अलग-अलग है।
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