भारतीय सभ्यता का प्रारंभ
NCERT पाठ्यपुस्तक | पुनर्मुद्रण 2026-27
| विषय | सामाजिक विज्ञान |
| कक्षा | 6 |
| अध्याय | 6 |
| शीर्षक | भारतीय सभ्यता का प्रारंभ |
| पुस्तक | समाज का अध्ययन: भारत और उसके आगे |
| NCERT PDF | fhes106.pdf ↗ |
| पुनर्मुद्रण | 2026-27 |
| सभ्यता काल | 2600–1900 सा.सं.पू. |
| महत्त्वपूर्ण नगर | हड़प्पा, मोहनजो-दड़ो, धौलावीरा, लोथल, राखीगढ़ी |
1. अध्याय का उद्धरण व परिचय
भारतीय सभ्यता का प्रारंभ NCERT कक्षा 6 सामाजिक विज्ञान का अत्यंत महत्त्वपूर्ण अध्याय है। इस अध्याय में हम भारत की सबसे प्राचीन शहरी सभ्यता — हड़प्पा / सिंधु / सिंधु-सरस्वती सभ्यता — का अध्ययन करते हैं। यह सभ्यता केवल प्राचीनता के कारण महत्त्वपूर्ण नहीं है, बल्कि अपनी नगर-योजना, स्वच्छता व्यवस्था, जल प्रबंधन, व्यापारिक सक्रियता, शिल्प कौशल और सामाजिक संतुलन के कारण भी विशेष है।
इस अध्याय से यह समझ में आता है कि भारतीय उपमहाद्वीप में सभ्यता का विकास बहुत व्यवस्थित ढंग से हुआ। यहाँ नगर बने, व्यापार चला, मोहरें बनीं, विशाल स्नानागार बने, जलाशय बनाए गए और लोगों ने ऐसी जीवन-पद्धति विकसित की जो आज भी आश्चर्य पैदा करती है।
2. सभ्यता क्या है?
सामान्यतः सभ्यता शब्द का प्रयोग मानव समाज के उन्नत चरण के लिए किया जाता है। कोई भी समाज तभी सभ्यता कहलाता है जब उसमें केवल गाँव या कृषि ही न हो, बल्कि प्रशासन, शिल्प, व्यापार, लेखन और संगठित सामाजिक जीवन जैसे अनेक गुण विकसित हो चुके हों।
चित्र: सभ्यता की सात मुख्य विशेषताएँ
3. विश्व की सभ्यताएँ – समयरेखा
हड़प्पा सभ्यता को समझने के लिए यह देखना उपयोगी है कि विश्व की अन्य प्राचीन सभ्यताएँ कब विकसित हुईं। इससे स्पष्ट होता है कि भारतीय सभ्यता भी विश्व की आरंभिक महान सभ्यताओं में से एक थी।
चित्र: विश्व की प्रमुख सभ्यताओं की समयरेखा
- मेसोपोटामिया — आधुनिक इराक और सीरिया क्षेत्र की प्राचीन सभ्यता।
- मिस्र सभ्यता — नील नदी के किनारे विकसित महान सभ्यता।
- सिंधु-सरस्वती सभ्यता — भारतीय उपमहाद्वीप की प्रारंभिक शहरी सभ्यता, जो लगभग 2600 से 1900 सा.सं.पू. तक विकसित रही।
4. गाँव से नगर
सिंधु नदी और उसकी सहायक नदियों ने उत्तर-पश्चिमी भारतीय उपमहाद्वीप के मैदानों को उपजाऊ बनाया। यही उपजाऊ भूमि कृषि के विकास का आधार बनी। कृषि उत्पादन बढ़ने से गाँवों का विस्तार हुआ और धीरे-धीरे नगरीकरण प्रारंभ हुआ।
- 3500 सा.सं.पू. के आसपास — गाँव विकसित होकर नगर बनने लगे।
- 2600 सा.सं.पू. तक — बढ़ते व्यापार, शिल्प और प्रशासनिक व्यवस्था के कारण अनेक नगर महानगरों में बदल गए।
- इस पूरी प्रक्रिया को भारत का प्रथम नगरीकरण कहा जाता है।
5. सभ्यता के नाम
पुरातत्ववेत्ताओं और इतिहासकारों ने इस सभ्यता को अलग-अलग नाम दिए हैं। प्रत्येक नाम इसके किसी विशेष भौगोलिक या पुरातात्विक पक्ष को उजागर करता है।
| नाम | कारण |
|---|---|
| सिंधु सभ्यता | सिंधु नदी तंत्र के क्षेत्र में विकसित होने के कारण। |
| हड़प्पा सभ्यता | हड़प्पा इस सभ्यता से संबंधित पहला प्रमुख उत्खनित नगर था। |
| सिंधु-सरस्वती सभ्यता | इसके अनेक पुरास्थल सिंधु और सरस्वती (घग्गर-हाकरा) क्षेत्र में पाए गए। |
| सिंध घाटी सभ्यता | यह पुराना नाम है, पर अब सीमित माना जाता है क्योंकि सभ्यता सिंधु क्षेत्र से बहुत आगे तक फैली थी। |
6. सरस्वती नदी
हड़प्पा सभ्यता को समझने में सरस्वती नदी का विशेष महत्त्व है। प्राचीन साहित्य और पुरातात्विक अध्ययनों में इस नदी के उल्लेख से सभ्यता के फैलाव का एक बड़ा आयाम स्पष्ट होता है।
- यह नदी हिमालय की तलहटी से निकलकर हरियाणा, पंजाब, राजस्थान और गुजरात के कुछ क्षेत्रों से होकर बहती थी।
- आज इसे भारत में घग्गर और पाकिस्तान में हाकरा कहा जाता है।
- आज यह एक मौसमी नदी है जो मुख्यतः वर्षा ऋतु में बहती है।
- इसका उल्लेख सबसे पहले ऋग्वेद में मिलता है।
- बाद के ग्रंथों में इसके सूखने और लुप्त हो जाने का भी वर्णन मिलता है।
7. नगर-योजना
हड़प्पा सभ्यता की सबसे बड़ी विशेषता उसकी सुनियोजित नगर-योजना थी। यह स्पष्ट दिखाती है कि यहाँ केवल बस्तियाँ नहीं थीं, बल्कि सुव्यवस्थित नगर थे जिनका निर्माण पूर्व योजना के आधार पर हुआ था।
हड़प्पा और मोहनजो-दड़ो इस सभ्यता के सबसे पहले पहचाने गए नगरों में हैं। इनके बाद धौलावीरा, राखीगढ़ी, लोथल, कालीबंगा आदि अनेक स्थलों की खोज हुई।
| हड़प्पाई नगर | आधुनिक क्षेत्र | विशेषता |
|---|---|---|
| हड़प्पा | पंजाब, पाकिस्तान | पहले पहचाने गए प्रमुख नगरों में एक। |
| मोहनजो-दड़ो | सिंध, पाकिस्तान | महास्नानागार, सैकड़ों कुएँ और उत्कृष्ट योजना। |
| धौलावीरा | गुजरात | विशाल जलाशय, तीन खंडों वाला नगर। |
| राखीगढ़ी | हरियाणा | महान पुरास्थल, सरस्वती क्षेत्र से जुड़ा। |
| कालीबंगा | राजस्थान | योजनाबद्ध सड़कें और कृषि के संकेत। |
| लोथल | गुजरात | बंदरगाह जैसी संरचना, समुद्री व्यापार का महत्त्वपूर्ण केंद्र। |
चित्र: हड़प्पाई नगर की सामान्य योजना – ऊपरी नगर, निचला नगर, किलेबंदी और जल निकास
- चौड़ी और प्रायः सीधी सड़कें।
- चारों ओर किलेबंदी या सुरक्षात्मक दीवारें।
- ऊपरी नगर और निचला नगर का विभाजन।
- सड़कों के नीचे व्यवस्थित जल निकास प्रणाली।
- ईंटों से बने घर और सार्वजनिक भवन।
- बड़े-छोटे घरों की गुणवत्ता में उल्लेखनीय समानता।
8. महास्नानागार (मोहनजो-दड़ो)
मोहनजो-दड़ो का महास्नानागार इस सभ्यता की सर्वाधिक चर्चित सार्वजनिक संरचनाओं में से एक है। यह केवल एक भवन नहीं, बल्कि हड़प्पावासियों की वास्तु-कुशलता और स्वच्छता-चेतना का शानदार उदाहरण है।
- स्थान — मोहनजो-दड़ो
- आकार — 12 × 7 मीटर
- ईंटों पर जल-रोधक पदार्थ की परत
- चारों ओर छोटे-छोटे कमरे
- एक कमरे में कुआँ
- पानी निकालने के लिए विशेष नाली
विद्वानों ने इसके उपयोग के संबंध में अनेक मत दिए हैं। संभव है कि यह किसी विशेष धार्मिक अनुष्ठान, विशिष्ट वर्ग या राजसी प्रयोजनों के लिए प्रयुक्त होता हो। यह विचार इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है क्योंकि अधिकांश घरों में निजी स्नान की व्यवस्था पहले से मौजूद थी।
9. जल प्रबंधन
यदि हड़प्पा सभ्यता की किसी एक विशेषता को आधुनिक दृष्टि से सबसे अधिक प्रशंसनीय कहा जाए, तो वह है जल प्रबंधन और स्वच्छता व्यवस्था।
- अनेक घरों में अलग स्नानागार बने हुए थे।
- नगर की नालियाँ सड़कों के नीचे जाती थीं।
- मोहनजो-दड़ो में लगभग 700 कुओं के प्रमाण मिले हैं।
- धौलावीरा में विशाल जलाशय मिले हैं, जिनमें एक लगभग 73 मीटर लंबा था।
- पत्थरों और चट्टानों को काटकर जलाशय बनाए गए थे।
- भूमिगत नालियाँ जल को संग्रहण स्थलों तक पहुँचाती थीं।
10. हड़प्पावासी क्या खाते थे?
पुरातात्विक प्रमाणों से पता चलता है कि हड़प्पावासी कृषि, पशुपालन और जल संसाधनों पर आधारित विविध आहार लेते थे। उनका भोजन संतुलित और क्षेत्रीय संसाधनों पर आधारित था।
| खाद्य पदार्थ | विवरण |
|---|---|
| अनाज | जौ, गेहूँ, कुछ मोटे अनाज, बाजरा और कभी-कभी धान। |
| दलहन | मटर, दालें, सेम आदि। |
| सब्जियाँ | विभिन्न प्रकार की सब्जियों के संकेत मिले हैं। |
| दुग्ध उत्पाद | मिट्टी के पात्रों की वैज्ञानिक जाँच से इसके संकेत मिले हैं। |
| मछलियाँ | नदियों और समुद्री क्षेत्र से प्राप्त। |
| मसाले | हल्दी, अदरक आदि के अवशेष मिलने के संकेत। |
11. सक्रिय व्यापार
हड़प्पा सभ्यता केवल आत्मनिर्भर स्थानीय समाज नहीं थी, बल्कि वह व्यापक व्यापारिक संपर्कों से भी जुड़ी हुई थी। इस व्यापार ने इसकी समृद्धि, शिल्प-विकास और नगर-जीवन को गहराई से प्रभावित किया।
- आंतरिक और बाह्य दोनों प्रकार का व्यापार होता था।
- आभूषण, लकड़ी, दैनिक उपयोग की वस्तुएँ, संभवतः कपास और खाद्य सामग्री का विनिमय होता था।
- ताँबे जैसी कुछ धातुएँ बाहर से लाई जाती थीं।
- व्यापार के लिए स्थल मार्ग, नदी मार्ग और समुद्री मार्ग तीनों का उपयोग होता था।
- लोथल में बंदरगाह जैसी संरचना मिली है।
- व्यापारिक पहचान हेतु मोहरों का प्रयोग होता था।
12. प्राचीन जीवन
हड़प्पा सभ्यता केवल भवनों और सड़कों तक सीमित नहीं थी। वहाँ का दैनिक जीवन भी अत्यंत समृद्ध और सुसंस्कृत था। पुरातत्व से प्राप्त वस्तुओं के आधार पर उनके जीवन की विविध झलकियाँ सामने आती हैं।
| वस्तु का प्रकार | उदाहरण एवं अर्थ |
|---|---|
| दैनिक उपयोग | दर्पण, मिट्टी के पात्र, भार तौलने के पत्थर, छैनी, उपयोगी औजार। |
| मनोरंजन | खेल-पट्ट, मिट्टी की सीटी, खिलौने। |
| कला | मूर्तियाँ, मोहरें, चित्रित पात्र, सजावटी वस्तुएँ। |
| प्रतिमाएँ | 'नर्तकी' जैसी प्रसिद्ध कांस्य प्रतिमा, अन्य टेराकोटा मूर्तियाँ। |
| प्रतीक | स्वास्तिक, पशु आकृतियाँ, देवतुल्य चित्र और लेखन संकेत। |
इन वस्तुओं से स्पष्ट होता है कि हड़प्पावासी केवल जीविका में व्यस्त लोग नहीं थे, बल्कि वे सौंदर्यबोध, शिल्पकला, मनोरंजन और सामाजिक-सांस्कृतिक प्रतीकों को भी महत्त्व देते थे।
13. अंत अथवा नई शुरुआत?
1900 सा.सं.पू. के आसपास इस महान सभ्यता का शहरी स्वरूप क्षीण होने लगा। नगर धीरे-धीरे खाली होते गए और महानगरों का महत्व घटता गया।
- जलवायु परिवर्तन — वर्षा में कमी और बढ़ती शुष्कता ने कृषि को प्रभावित किया।
- सरस्वती नदी का सूखना — कई नगरों का आधार कमजोर हो गया।
महत्त्वपूर्ण: युद्ध या बड़े आक्रमण के स्पष्ट प्रमाण नहीं मिलते। इसीलिए हड़प्पा सभ्यता को अपेक्षाकृत शांतिपूर्ण सभ्यता माना जाता है।
14. अध्याय सारांश
- सभ्यता के लिए शासन, नगरीकरण, शिल्प, व्यापार, लेखन, संस्कृति और कृषि उत्पादकता आवश्यक हैं।
- हड़प्पा / सिंधु / सिंधु-सरस्वती सभ्यता भारत की सबसे प्राचीन शहरी सभ्यताओं में से एक है।
- इसका उत्कर्ष काल लगभग 2600–1900 सा.सं.पू. माना जाता है।
- यह भारत के प्रथम नगरीकरण का उदाहरण है।
- हड़प्पाई नगर सुनियोजित थे — चौड़ी सड़कें, किलेबंदी, ऊपरी-निचला नगर, नालियाँ।
- मोहनजो-दड़ो का महास्नानागार और धौलावीरा के जलाशय विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।
- हड़प्पावासी कृषि, पशुपालन, शिल्प और व्यापार में उन्नत थे।
- लोथल समुद्री व्यापार का महत्वपूर्ण केंद्र रहा।
- सभ्यता का पतन मुख्यतः जलवायु परिवर्तन और नदी-तंत्र में बदलाव से जुड़ा माना जाता है।
- हड़प्पा सभ्यता की सांस्कृतिक विरासत आगे की भारतीय सभ्यता में जीवित रही।
15. परीक्षा उपयोगी प्रश्नोत्तर
16. अभ्यास प्रश्न उत्तर
प्रश्न 1: इस सभ्यता के अनेक नाम क्यों हैं?
उत्तर: इस सभ्यता के अनेक नाम इसलिए हैं क्योंकि इसे अलग-अलग आधारों पर पहचाना गया। सिंधु नदी क्षेत्र के कारण इसे सिंधु सभ्यता, पहले उत्खनित नगर हड़प्पा के कारण हड़प्पा सभ्यता, और सरस्वती क्षेत्र में अनेक पुरास्थल मिलने के कारण सिंधु-सरस्वती सभ्यता कहा गया। प्रत्येक नाम सभ्यता के किसी एक पक्ष को स्पष्ट करता है।
प्रश्न 2: सिंधु-सरस्वती सभ्यता की प्रमुख उपलब्धियाँ लिखिए।
उत्तर: इस सभ्यता की प्रमुख उपलब्धियों में सुनियोजित नगर-योजना, चौड़ी सड़कें, किलेबंदी, ऊपरी और निचले नगर का विभाजन, उत्कृष्ट जल-निकास व्यवस्था, मोहनजो-दड़ो का महास्नानागार, धौलावीरा के विशाल जलाशय, कृषि की उन्नत अवस्था, कपास की खेती, कांस्य और मनकों का शिल्प, मोहरों का उपयोग, आंतरिक और बाह्य व्यापार, तथा सामाजिक संतुलन शामिल हैं। यह वास्तव में अत्यंत विकसित और व्यवस्थित सभ्यता थी।
प्रश्न 3: हड़प्पाई नगर आधुनिक महानगरों से किस प्रकार अलग थे?
उत्तर: हड़प्पाई नगरों की सबसे बड़ी विशेषता उनकी योजनाबद्ध संरचना और स्वच्छता पर जोर था। सड़कों के नीचे नालियाँ, घरों में स्नानागार, कुओं की व्यवस्था और नगर का संगठित विभाजन आधुनिक नगरों को भी प्रेरित करने योग्य है। कई बार आज के महानगरों में जो अव्यवस्था दिखती है, वह हड़प्पा नगरों में नहीं मिलती।
प्रश्न 4: हड़प्पावासियों में नागरिकता का उच्च भाव स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: सार्वजनिक जल-निकास व्यवस्था, कुओं का रख-रखाव, जलाशयों की सफाई, योजनाबद्ध सड़कें, सामूहिक भवन और घरों की गुणवत्ता में समानता — ये सभी इस बात के प्रमाण हैं कि हड़प्पावासी संगठित नागरिक जीवन जीते थे। उनमें केवल व्यक्तिगत जीवन नहीं, बल्कि पूरे नगर की व्यवस्था के प्रति जिम्मेदारी थी।


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