NCERT Class 6 Social Science Chapter 14 Notes in Hindi: हमारे आस-पास की आर्थिक गतिविधियाँ | Primary, Secondary and Tertiary Activities

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हमारे आस-पास की आर्थिक गतिविधियाँ – NCERT कक्षा 6 सामाजिक विज्ञान अध्याय 14 नोट्स | ncertclasses.com
📘 कक्षा 6 · सामाजिक विज्ञान · अध्याय 14

हमारे आस-पास की आर्थिक गतिविधियाँ

समाज का अध्ययन: भारत और उसके आगे – हमारे आस-पास का आर्थिक जीवन
NCERT पाठ्यपुस्तक | पुनर्मुद्रण 2026-27
📖 सम्पूर्ण नोट्स 🎯 परीक्षा उपयोगी 📊 SVG आरेख 🥛 अमूल केस स्टडी ❓ प्रश्नोत्तर
📘 अध्याय परिचय
विषयसामाजिक विज्ञान
कक्षा6
अध्याय14
शीर्षकहमारे आस-पास की आर्थिक गतिविधियाँ
पुस्तकसमाज का अध्ययन: भारत और उसके आगे
NCERT PDFfhes114.pdf ↗
पुनर्मुद्रण2026-27
उद्धरणकौटिल्य
मुख्य प्रश्नआर्थिक क्षेत्रक, परस्पर निर्भरता, अमूल

1. परिचय

“आर्थिक गतिविधि से ही समृद्धि आती है; इसका अभाव भौतिक तनाव देता है। सार्थक आर्थिक गतिविधि का अभाव वर्तमान समृद्धि और भावी प्रगति में बाधक होता है।”
— कौटिल्य, अर्थशास्त्र

अध्याय 13 में हमने देखा कि कुछ गतिविधियाँ आर्थिक होती हैं और कुछ गैर-आर्थिक। आर्थिक गतिविधियाँ वे हैं जिनमें मौद्रिक मूल्य का अर्जन होता है या जिनमें धन, मजदूरी, वेतन, शुल्क अथवा वस्तु के बदले वस्तु का लेन-देन शामिल होता है।

📌 मौद्रिक मूल्य
किसी वस्तु या सेवा का वह मूल्य जिसे मुद्रा के रूप में मापा जा सकता है, मौद्रिक मूल्य कहलाता है।

अब प्रश्न यह है कि आर्थिक गतिविधियों की संख्या इतनी अधिक होने पर उन्हें समझा कैसे जाए। इसके लिए उन्हें समान प्रकृति के आधार पर अलग-अलग आर्थिक क्षेत्रकों में विभाजित किया जाता है। यही इस अध्याय का मुख्य विषय है।

🎯 इस अध्याय में क्या सीखेंगे?
  • आर्थिक गतिविधियों का वर्गीकरण किन आधारों पर किया जाता है।
  • प्राथमिक, द्वितीयक और तृतीयक क्षेत्रक क्या हैं।
  • ये तीनों क्षेत्रक एक-दूसरे पर कैसे निर्भर रहते हैं।
  • अमूल जैसी सहकारी संस्था के माध्यम से तीनों क्षेत्रकों की भूमिका।

2. आर्थिक गतिविधियों का वर्गीकरण

कुछ आर्थिक गतिविधियों की विशेषताएँ एक-दूसरे से मिलती-जुलती हैं। इसलिए उन्हें व्यापक समूहों में रखा जाता है, जिन्हें आर्थिक क्षेत्रक कहते हैं।

📘 आर्थिक क्षेत्रक
समान प्रकृति वाली आर्थिक गतिविधियों के व्यापक समूह को आर्थिक क्षेत्रक कहते हैं। ये किसी राष्ट्र की आर्थिक समृद्धि में योगदान करते हैं।

आर्थिक गतिविधियों को सामान्यतः तीन प्रमुख क्षेत्रकों में बाँटा जाता है —

🌾 1. प्राथमिक क्षेत्रक
प्रकृति से सीधे कच्चा माल प्राप्त करने वाली गतिविधियाँ। जैसे — कृषि, खनन, मत्स्य पालन, वानिकी, पशुपालन।
🏭 2. द्वितीयक क्षेत्रक
प्राथमिक क्षेत्रक से प्राप्त कच्चे माल को उपयोगी उत्पादों में बदलने वाली गतिविधियाँ। जैसे — उद्योग, विनिर्माण, प्रसंस्करण।
🚚 3. तृतीयक क्षेत्रक
अन्य क्षेत्रकों को सहायता देने वाली सेवाएँ। जैसे — परिवहन, व्यापार, बैंकिंग, शिक्षा, स्वास्थ्य, संचार।
आर्थिक क्षेत्रकों का वर्गीकरण प्राथमिक क्षेत्रक प्रकृति से सीधे कृषि, खनन, मत्स्य पालन, वानिकी, पशुपालन द्वितीयक क्षेत्रक कच्चे माल का प्रसंस्करण निर्माण, विनिर्माण, कारखाने, ऊर्जा, जल-आपूर्ति तृतीयक क्षेत्रक सेवाएँ परिवहन, बैंकिंग, व्यापार, स्वास्थ्य, शिक्षा, संचार

चित्र: आर्थिक क्षेत्रकों का वर्गीकरण

3. प्राथमिक क्षेत्रक

🌾 प्राथमिक क्षेत्रक
ऐसी आर्थिक गतिविधियाँ जिनमें लोग सीधे प्रकृति पर निर्भर रहकर कच्चा माल प्राप्त करते हैं, प्राथमिक क्षेत्रक कहलाती हैं।

इस क्षेत्रक में मनुष्य का संबंध प्रकृति से सबसे प्रत्यक्ष होता है। भूमि, जल, वन, खनिज, सूर्यप्रकाश, पशु और नदियाँ आदि इसके मुख्य आधार हैं।

प्राथमिक गतिविधिप्रकृति से क्या मिलता हैउदाहरण
कृषिभूमि, जल, सूर्यप्रकाशगेहूँ, चावल, दालें, सब्जियाँ उगाना
खननखनिज, अयस्क, कोयलाकोयला, लोहा, बॉक्साइट निकालना
मत्स्य पालननदी, झील, समुद्रमछलियाँ पकड़ना
पशुपालनगाय, भैंस, बकरी, मुर्गीदूध, अंडे, ऊन प्राप्त करना
वानिकीवन, वृक्षलकड़ी, गोंद, औषधीय पदार्थ प्राप्त करना
📌 याद रखें
प्राथमिक क्षेत्रक अन्य सभी क्षेत्रकों का आधार है, क्योंकि बिना कच्चे माल के आगे कोई उत्पादन संभव नहीं है।

4. द्वितीयक क्षेत्रक

🏭 द्वितीयक क्षेत्रक
प्राथमिक क्षेत्रक से प्राप्त कच्चे माल को प्रसंस्करण, निर्माण या विनिर्माण के माध्यम से उपयोगी वस्तुओं में बदलने वाली गतिविधियाँ द्वितीयक क्षेत्रक कहलाती हैं।

इस क्षेत्रक में मनुष्य अपनी कौशल, तकनीक, मशीनों और श्रम का उपयोग करके प्राकृतिक कच्चे माल को नई उपयोगी वस्तुओं में बदलता है।

कच्चा मालद्वितीयक प्रक्रियातैयार वस्तु
गेहूँमिल में पिसाईआटा, मैदा
दूधडेयरी प्रसंस्करणघी, मक्खन, पनीर, दूध पाउडर
कपाससूत्र और बुनाईकपड़ा
लकड़ीबढ़ईगीरी / कारखानाफर्नीचर, कागज
लौह अयस्कइस्पात संयंत्रइस्पात, मशीनें, वाहन
📌 द्वितीयक क्षेत्रक में क्या-क्या आता है?
  • कारखानों में वस्तुओं का निर्माण
  • प्रसंस्करण उद्योग
  • सड़क, पुल, भवन निर्माण
  • जल-आपूर्ति, विद्युत उत्पादन, गैस आपूर्ति जैसी गतिविधियाँ

5. तृतीयक क्षेत्रक

🚚 तृतीयक क्षेत्रक
वे सभी गतिविधियाँ जो प्राथमिक और द्वितीयक क्षेत्रकों की सहायता करती हैं तथा सेवाएँ प्रदान करती हैं, तृतीयक क्षेत्रक कहलाती हैं। इसे सेवा क्षेत्रक भी कहते हैं।

यदि किसान अनाज उगाता है और कारखाना उससे आटा बनाता है, तो उसे बाजार तक कौन पहुँचाएगा, ग्राहक से पैसा कौन दिलाएगा, और लोगों को इसकी जानकारी कौन देगा? इसका उत्तर तृतीयक क्षेत्रक है।

सेवाभूमिका
परिवहनकच्चा माल और तैयार वस्तु को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँचाना
व्यापारवस्तुओं को बाजार और उपभोक्ता तक पहुँचाना
बैंकिंगऋण, जमा, भुगतान, वित्तीय सहायता देना
स्वास्थ्यलोगों को स्वस्थ रखना ताकि वे काम कर सकें
शिक्षामानव संसाधन को ज्ञान और कौशल देना
संचारसूचना, संपर्क, विपणन और समन्वय
मरम्मत सेवाएँमशीन, वाहन, मोबाइल, उपकरण आदि ठीक करना
गोदामवस्तुओं का सुरक्षित भंडारण
📌 गोदाम
ऐसी बड़ी इमारतें या स्थान जहाँ वस्तुओं को बेचने या उपयोग से पहले रखा जाता है, गोदाम कहलाते हैं।

6. तीनों क्षेत्रकों की परस्पर निर्भरता

प्राथमिक, द्वितीयक और तृतीयक क्षेत्रक अलग-अलग अवश्य हैं, लेकिन वास्तव में ये एक-दूसरे पर निर्भर रहते हैं। एक क्षेत्रक के बिना दूसरा क्षेत्रक ठीक प्रकार से काम नहीं कर सकता।

तीनों क्षेत्रकों की परस्पर निर्भरता 🌾 प्राथमिक प्रकृति से कच्चा माल • किसान दूध दुहता है • किसान गेहूँ उगाता है • जंगल से लकड़ी • खदान से अयस्क 🏭 द्वितीयक कच्चे माल को उत्पाद बनाना • दूध → मक्खन, घी • गेहूँ → आटा • लकड़ी → फर्नीचर • लौह अयस्क → इस्पात 🚚 तृतीयक सेवाएँ और वितरण • ट्रक, रेल, जहाज • खुदरा दुकानें • बैंक, बीमा • विपणन, संचार तीनों क्षेत्रक मिलकर ही आर्थिक विकास को संभव बनाते हैं

चित्र: प्राथमिक, द्वितीयक और तृतीयक क्षेत्रकों की परस्पर निर्भरता

✅ निष्कर्ष
प्राथमिक क्षेत्रक बिना तृतीयक क्षेत्रक की सेवाओं के अपना उत्पाद बाजार तक नहीं पहुँचा सकता। द्वितीयक क्षेत्रक बिना प्राथमिक क्षेत्रक के कच्चे माल के काम नहीं कर सकता। और तृतीयक क्षेत्रक की सेवाएँ तभी उपयोगी हैं जब प्राथमिक और द्वितीयक क्षेत्रक उत्पादन करें।

7. अमूल – डेयरी सहकारिता की केस स्टडी

गुजरात के आणंद में स्थापित आणंद मिल्क यूनियन लिमिटेड (AMUL) तीनों क्षेत्रकों की परस्पर निर्भरता का अत्यंत प्रसिद्ध उदाहरण है।

📜 अमूल से पहले की समस्या
पहले किसान दूध को गाँव-गाँव या शहर तक बहुत कठिनाई से पहुँचाते थे। गर्म मौसम में दूध जल्दी खराब हो जाता था। बिचौलिए किसान से बहुत कम कीमत पर दूध खरीदते और ऊँची कीमत पर बेचते थे। इससे किसानों को उचित लाभ नहीं मिलता था।
📌 बिचौलिया
वह व्यक्ति जो उत्पादक से वस्तु खरीदकर उपभोक्ता को बेचता है और इस प्रक्रिया से लाभ कमाता है, बिचौलिया कहलाता है।

किसानों ने इस समस्या के समाधान के लिए एक सहकारी संगठन बनाया। सरदार वल्लभभाई पटेल के परामर्श से 1946 में अमूल की स्थापना हुई। इसमें त्रिभुवनदास पटेल और बाद में डॉ. वर्गीज कुरियन ने प्रमुख भूमिका निभाई।

🤝 सहकारी संगठन
जब लोग स्वेच्छा से एक समूह बनाकर अपनी आर्थिक और सामाजिक आवश्यकताओं को मिलकर पूरा करते हैं, तो उसे सहकारी संगठन कहते हैं। इसके सदस्य ही इसके स्वामी होते हैं।
अमूल में क्षेत्रकक्या होता है?
प्राथमिक क्षेत्रककिसान गाय-भैंस पालते हैं और दूध प्राप्त करते हैं।
द्वितीयक क्षेत्रकडेयरी कारखानों में दूध का पाश्चुरीकरण और प्रसंस्करण करके घी, मक्खन, पनीर, दूध पाउडर बनाया जाता है।
तृतीयक क्षेत्रकदूध और दुग्ध उत्पादों का परिवहन, भंडारण, विपणन और खुदरा बिक्री की जाती है।
📌 पाश्चुरीकरण
दूध को एक निश्चित तापमान तक गर्म करके हानिकारक जीवाणुओं को नष्ट करने और उसे अधिक समय तक सुरक्षित रखने की प्रक्रिया पाश्चुरीकरण कहलाती है।
अमूल – तीनों क्षेत्रकों का उदाहरण 🌾 प्राथमिक किसान पशुपालन करते हैं और दूध प्राप्त करते हैं कच्चा माल = दूध 🏭 द्वितीयक दूध का प्रसंस्करण घी, मक्खन, पनीर, दूध पाउडर 🚚 तृतीयक परिवहन, गोदाम, विपणन और खुदरा बिक्री उपभोक्ता तक पहुँच

चित्र: अमूल में तीनों क्षेत्रकों की भूमिका

🥛 अमूल जैसी अन्य सहकारी संस्थाएँ

भारत के अन्य राज्यों में भी इसी प्रकार की डेयरी सहकारी संस्थाएँ हैं, जैसे — नंदिनी (कर्नाटक), सुधा (बिहार), आविन (तमिलनाडु), वरका (पंजाब), मदर डेयरी (दिल्ली-NCR) आदि।

8. पाठ्यपुस्तक निर्माण – तीनों क्षेत्रकों का एक और उदाहरण

एक पाठ्यपुस्तक हमारे हाथ तक कैसे पहुँचती है, यह समझने से भी तीनों क्षेत्रकों की भूमिका स्पष्ट होती है।

कार्यक्षेत्रक
वन से पेड़ काटना और लकड़ी प्राप्त करनाप्राथमिक
लकड़ी से लुगदी बनाकर कागज तैयार करनाद्वितीयक
कागज पर पाठ्यपुस्तक की छपाईद्वितीयक
ट्रक द्वारा कारखाने और गोदाम तक पहुँचानातृतीयक
गोदाम में भंडारणतृतीयक
खुदरा पुस्तक दुकान पर बिक्रीतृतीयक
♻️ पुनर्चक्रण का महत्त्व
  • कागज का पुनर्चक्रण पेड़ों की कटाई कम करता है।
  • ऊर्जा और पानी की बचत होती है।
  • पर्यावरण संरक्षण में सहायता मिलती है।

9. अध्याय सारांश

  • आर्थिक गतिविधियों को प्राथमिक, द्वितीयक और तृतीयक क्षेत्रकों में बाँटा जाता है।
  • प्राथमिक क्षेत्रक में प्रकृति से सीधे कच्चा माल प्राप्त किया जाता है।
  • द्वितीयक क्षेत्रक में कच्चे माल को उपयोगी वस्तुओं में बदला जाता है।
  • तृतीयक क्षेत्रक अन्य दोनों क्षेत्रकों को सेवाएँ प्रदान करता है।
  • तीनों क्षेत्रक परस्पर निर्भर हैं।
  • अमूल तीनों क्षेत्रकों की संयुक्त कार्यप्रणाली का उत्कृष्ट उदाहरण है।
  • सहकारी संगठन किसानों और उत्पादकों को बिचौलियों से मुक्त कर सकते हैं।
  • पाठ्यपुस्तक निर्माण जैसे सामान्य कार्यों में भी तीनों क्षेत्रकों की भूमिका होती है।

10. परीक्षा उपयोगी प्रश्नोत्तर

समान विशेषताओं वाली आर्थिक गतिविधियों के व्यापक समूह को आर्थिक क्षेत्रक कहते हैं। इन्हें सामान्यतः प्राथमिक, द्वितीयक और तृतीयक क्षेत्रकों में बाँटा जाता है।
क्योंकि इसमें मनुष्य सीधे प्रकृति से कच्चा माल प्राप्त करता है। यही अन्य क्षेत्रकों का आधार है, इसलिए इसे प्राथमिक कहा जाता है।
वह क्षेत्रक जिसमें प्राथमिक क्षेत्रक से प्राप्त कच्चे माल को प्रसंस्करण या विनिर्माण के द्वारा नई उपयोगी वस्तुओं में बदला जाता है, द्वितीयक क्षेत्रक कहलाता है।
क्योंकि इसमें परिवहन, बैंकिंग, व्यापार, स्वास्थ्य, शिक्षा, संचार जैसी सेवाएँ आती हैं। ये अन्य क्षेत्रकों को सहायता प्रदान करती हैं।
किसान दूध प्राप्त करते हैं — यह प्राथमिक क्षेत्रक है। डेयरी कारखानों में दूध से घी, मक्खन, पनीर बनते हैं — यह द्वितीयक क्षेत्रक है। फिर उत्पादों का परिवहन, विपणन और बिक्री होती है — यह तृतीयक क्षेत्रक है।
पाठ्यपुस्तक निर्माण इसका अच्छा उदाहरण है — पेड़ काटना (प्राथमिक), कागज और पुस्तक बनाना (द्वितीयक), परिवहन और बिक्री (तृतीयक)। तीनों में से किसी एक के बिना पुस्तक विद्यार्थी तक नहीं पहुँच सकती।

11. अभ्यास प्रश्नों के उत्तर

प्रश्न 1: प्राथमिक क्षेत्रक क्या है? यह द्वितीयक क्षेत्रक से किस प्रकार भिन्न है?

प्राथमिक क्षेत्रक वह है जिसमें लोग सीधे प्रकृति से कच्चा माल प्राप्त करते हैं, जैसे — कृषि, खनन, मत्स्य पालन। इसके विपरीत द्वितीयक क्षेत्रक में इसी कच्चे माल को प्रसंस्करण करके उपयोगी वस्तुओं में बदला जाता है, जैसे — कपास से वस्त्र, दूध से पनीर, गेहूँ से आटा।

प्रश्न 2: द्वितीयक क्षेत्रक तृतीयक क्षेत्रक पर किस प्रकार निर्भर है?

द्वितीयक क्षेत्रक का उत्पादन तभी सफल होता है जब तृतीयक क्षेत्रक की सेवाएँ उपलब्ध हों। उदाहरण के लिए — कारखानों को कच्चा माल पहुँचाने के लिए परिवहन चाहिए, धन के लिए बैंक चाहिए, वस्तु बेचने के लिए व्यापार और विपणन चाहिए। इस प्रकार द्वितीयक क्षेत्रक तृतीयक क्षेत्रक पर निर्भर है।

प्रश्न 3: तीनों क्षेत्रकों की परस्पर निर्भरता को उदाहरण सहित समझाइए।

अमूल उदाहरण — किसान दूध उत्पादन करते हैं (प्राथमिक), डेयरी में उससे मक्खन, घी, पनीर बनता है (द्वितीयक), फिर ट्रकों, दुकानों और विपणन द्वारा वह उपभोक्ता तक पहुँचता है (तृतीयक)। इससे स्पष्ट है कि तीनों क्षेत्रक एक-दूसरे पर निर्भर हैं।


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⚠️ अस्वीकरण (Disclaimer): यह लेख NCERT की पाठ्यपुस्तक 'समाज का अध्ययन: भारत और उसके आगे – हमारे आस-पास का आर्थिक जीवन', कक्षा 6 (पुनर्मुद्रण 2026-27) के अध्याय 14 पर आधारित विद्यार्थियों की सहायतार्थ तैयार किया गया है। यह NCERT की अधिकृत सामग्री नहीं है। मूल पाठ्यपुस्तक के लिए NCERT की आधिकारिक PDF देखें। सभी सामग्री केवल शैक्षिक उद्देश्य के लिए है। © ncertclasses.com

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