ShalaSaral · शाला सरल
कक्षा 10 · सामाजिक विज्ञान—इतिहास · अध्याय 2
भारत में राष्ट्रवाद
Nationalism in India — NCERT Master Notes
इस लेख में NCERT के क्रम में भारत में राष्ट्रवाद के विचार, आंदोलन, अलग सामाजिक समूहों की आशाएँ, चित्र-स्रोत और अध्यायांत अभ्यास समझाए गए हैं। वीडियो देखकर नोट्स पढ़ें, फिर अपने शब्दों में उत्तर लिखकर पाठाधार से मिलाएँ।
हिंदी पुनर्मुद्रण 2026–27 · मुद्रित पृ. 29–50 · 3 हिंदी वीडियो · कुल 3 घंटे 1 मिनट 50 सेकंड
तीन भागों में पूरी हिंदी कक्षा
हर भाग में दिए प्रश्न-विराम पर वीडियो रोककर अपना उत्तर बनाएँ। समय-सूची के लिंक आधिकारिक YouTube विवरण में दिए समय से खुलते हैं।
हिंदी वीडियो 1/3 · अवधि 58:45
भारत में राष्ट्रवाद Class 10 | Nationalism in India Part 1 | NCERT History Chapter 2
पहला विश्वयुद्ध, सत्याग्रह, रॉलट एक्ट, जलियाँवाला बाग, ख़िलाफ़त और असहयोग में अलग समूहों की भागीदारी। पाठ का भाग: मुद्रित पृ. 29–37।
YouTube पर वीडियो खोलें · प्रस्तुति: शाला सरल
सीधे विषय पर जाएँ
- 00:00 — शाला सरल™ की प्रस्तुति
- 06:13 — दक्षिण अफ्रीका से भारत तक सत्याग्रह
- 13:19 — रॉलेट एक्ट का विरोध क्यों हुआ?
- 16:06 — 13 अप्रैल 1919: जलियाँवाला बाग
- 20:22 — असहयोग ही क्यों?
- 31:43 — अवध के किसान: समस्याएँ और माँगें
- 38:19 — गूडेम: जंगल, आजीविका और अधिकार
- 43:31 — असम के बागान: आने-जाने की आजादी
इस वीडियो की पूरी समय-सूची (22 विषय)
- 00:00 — शाला सरल™ की प्रस्तुति
- 01:45 — चित्र 1 से राष्ट्रीय आंदोलन को पढ़ें
- 03:19 — विश्वयुद्ध ने आर्थिक दबाव कैसे बढ़ाया?
- 06:13 — दक्षिण अफ्रीका से भारत तक सत्याग्रह
- 08:48 — स्रोत-क: सक्रिय प्रतिरोध का अर्थ
- 10:29 — भारत में सत्याग्रह के तीन शुरुआती प्रयोग
- 13:19 — रॉलेट एक्ट का विरोध क्यों हुआ?
- 16:06 — 13 अप्रैल 1919: जलियाँवाला बाग
- 18:56 — ख़िलाफ़त का मुद्दा और व्यापक जनाधार
- 20:22 — असहयोग ही क्यों?
- 24:45 — शहरों में भागीदारी और मद्रास का अपवाद
- 27:21 — चित्र 4 को इतिहास के स्रोत की तरह पढ़ें
- 29:59 — NCERT गतिविधि: 1920 का विद्यार्थी-पोस्टर
- 31:43 — अवध के किसान: समस्याएँ और माँगें
- 35:01 — स्रोत-ख और किसान के दृष्टिकोण से स्वराज
- 37:02 — बारदोली: पुस्तक का अलग 1928 वाला उदाहरण
- 38:19 — गूडेम: जंगल, आजीविका और अधिकार
- 43:31 — असम के बागान: आने-जाने की आजादी
- 50:29 — चित्र 5: चौरी-चौरा, 1922
- 51:39 — कारण और परिणाम का पुनर्स्मरण
- 55:18 — कारण बताते हुए उत्तर लिखना
- 57:16 — भाग 1 का समापन
हिंदी वीडियो 2/3 · अवधि 1:03:37
भारत में राष्ट्रवाद भाग 2 | नमक सत्याग्रह व सविनय अवज्ञा | Class 10 History | NCERT
पूर्ण स्वराज, नमक यात्रा, सविनय अवज्ञा, सामाजिक समूहों की अपेक्षाएँ और आंदोलन की सीमाएँ। पाठ का भाग: मुद्रित पृ. 38–45।
YouTube पर वीडियो खोलें · प्रस्तुति: शाला सरल
सीधे विषय पर जाएँ
- 01:30 — परिषदों में प्रवेश पर कांग्रेस की बहस
- 06:20 — डोमीनियन स्टेटस का अस्पष्ट प्रस्ताव
- 11:18 — नमक एक साझा राजनीतिक मुद्दा क्यों बना
- 14:27 — दांडी में कानून तोड़ने की कार्रवाई
- 20:19 — गांधीजी की गिरफ्तारी और बढ़ता दमन
- 26:15 — संपन्न किसानों का समर्थन और निराशा
- 38:03 — महिलाएँ सार्वजनिक आंदोलन में
- 45:54 — पूना पैक्ट: क्या व्यवस्था बनी?
- 51:42 — चित्र 10: तारीख भी पढ़िए
इस वीडियो की पूरी समय-सूची (40 विषय)
- 00:00 — शाला सरल की प्रस्तुति
- 01:30 — परिषदों में प्रवेश पर कांग्रेस की बहस
- 03:13 — आर्थिक मंदी ने गाँवों को कैसे प्रभावित किया
- 04:37 — साइमन कमीशन का विरोध
- 06:20 — डोमीनियन स्टेटस का अस्पष्ट प्रस्ताव
- 07:50 — लाहौर अधिवेशन और पूर्ण स्वराज
- 09:32 — स्रोत ग: स्वतंत्रता की शपथ का तर्क
- 11:18 — नमक एक साझा राजनीतिक मुद्दा क्यों बना
- 13:03 — चेतावनी से नमक यात्रा तक
- 14:27 — दांडी में कानून तोड़ने की कार्रवाई
- 15:51 — असहयोग और सविनय अवज्ञा में अंतर
- 17:29 — आंदोलन के फैलने के अलग रूप
- 18:55 — गिरफ्तारियाँ और पेशावर का टकराव
- 20:19 — गांधीजी की गिरफ्तारी और बढ़ता दमन
- 21:48 — गांधी इरविन समझौता
- 23:11 — सम्मेलन से वापसी और आंदोलन की पुनः शुरुआत
- 24:53 — अलग समूहों के लिए स्वराज का अर्थ
- 26:15 — संपन्न किसानों का समर्थन और निराशा
- 27:42 — गरीब किसानों की माँग क्यों अलग थी
- 29:10 — किसानों और कांग्रेस के संबंधों की जटिलता
- 30:58 — भगत सिंह: क्रांति का अर्थ
- 33:02 — व्यापारिक वर्ग की माँगें
- 34:49 — उद्योगपतियों का समर्थन क्यों घटा?
- 36:18 — औद्योगिक मजदूरों की भागीदारी
- 38:03 — महिलाएँ सार्वजनिक आंदोलन में
- 39:32 — चित्र 9: भागीदारी और उसकी सीमा
- 41:16 — सविनय अवज्ञा की सीमाएँ
- 42:42 — गांधीजी और अस्पृश्यता का विरोध
- 44:08 — दलित नेतृत्व की राजनीतिक माँगें
- 45:54 — पूना पैक्ट: क्या व्यवस्था बनी?
- 47:21 — समझौता होने पर भी दूरी क्यों?
- 48:42 — कुछ मुस्लिम संगठनों की दूरी
- 50:11 — प्रतिनिधित्व पर समझौता क्यों रुका?
- 51:42 — चित्र 10: तारीख भी पढ़िए
- 52:59 — स्रोत-घ: इकबाल की चिंता
- 54:41 — स्रोत में सांप्रदायिकता का अर्थ
- 56:33 — NCERT चर्चा: स्रोत से अपना तर्क
- 58:19 — तारीखों में आंदोलन का क्रम
- 59:57 — विभिन्न वर्गों के लिए स्वराज
- 1:01:48 — भाग 2 का निष्कर्ष और अगला कदम
हिंदी वीडियो 3/3 · अवधि 59:28
भारत में राष्ट्रवाद Part 3 | राष्ट्रीय प्रतीक व NCERT प्रश्नोत्तर | Class 10 History
राष्ट्रीय प्रतीक, सामूहिक अपनापन, भारत छोड़ो आंदोलन और NCERT प्रश्नों पर उत्तर लेखन। नया पाठ पृ. 46–49; अभ्यास पृ. 50।
YouTube पर वीडियो खोलें · प्रस्तुति: शाला सरल
सीधे विषय पर जाएँ
- 01:11 — सामूहिक अपनेपन का अर्थ
- 05:53 — अबनीन्द्रनाथ की भारत माता
- 15:02 — स्वराज के झंडे में चरखे का अर्थ
- 19:39 — भारत माता की दूसरी छवि
- 24:25 — भारत छोड़ो: प्रस्ताव और समर्थन का क्रम
- 36:59 — अखबारी रिपोर्ट: जलियाँवाला बाग
- 41:09 — चित्रों की तुलना कैसे पूरी करें?
- 48:08 — नमक यात्रा: असरदार प्रतीक क्यों?
- 51:35 — पृथक निर्वाचिका: आंबेडकर और गांधीजी
इस वीडियो की पूरी समय-सूची (40 विषय)
- 00:00 — अलग लोगों में एक राष्ट्र का भाव कैसे बना?
- 01:11 — सामूहिक अपनेपन का अर्थ
- 02:41 — तिलक के चित्र में एकता के संकेत
- 04:18 — वन्दे मातरम् से भारत माता की कल्पना
- 05:53 — अबनीन्द्रनाथ की भारत माता
- 07:18 — चित्र के विवरण से उत्तर कैसे बने?
- 09:01 — नेहरू के लोकप्रिय चित्र में मातृभूमि
- 10:27 — लोककथाओं को एकत्र करने का उद्देश्य
- 11:55 — रवीन्द्रनाथ और नटेसा शास्त्री
- 13:41 — स्वदेशी आंदोलन का झंडा
- 15:02 — स्वराज के झंडे में चरखे का अर्थ
- 16:39 — इतिहास को नए ढंग से क्यों लिखा गया?
- 18:04 — पृष्ठ अड़तालीस के स्रोत को पढ़ना
- 19:39 — भारत माता की दूसरी छवि
- 20:56 — क्या हर प्रतीक सभी को समान रूप से जोड़ता है?
- 22:46 — निष्कर्ष: साझा संघर्ष, अलग अपेक्षाएँ
- 23:41 — एकता के साथ मतभेद क्यों लौटते थे?
- 24:25 — भारत छोड़ो: प्रस्ताव और समर्थन का क्रम
- 25:55 — भारत छोड़ो एक जन आंदोलन कैसे बना?
- 27:29 — महिलाओं के जुलूस का चित्र और आगे का अभ्यास
- 28:58 — औपनिवेशिक शासन और राष्ट्रीय एकता
- 30:35 — विश्वयुद्ध ने आंदोलन को कैसे प्रभावित किया?
- 32:09 — रॉलट एक्ट का विरोध क्यों हुआ?
- 33:48 — असहयोग आंदोलन वापस लेने का कारण
- 35:21 — सत्याग्रह: सक्रिय अहिंसक संघर्ष
- 36:59 — अखबारी रिपोर्ट: जलियाँवाला बाग
- 38:27 — अखबारी रिपोर्ट: साइमन कमीशन
- 39:48 — तुलना का पहला पक्ष: भारत माता
- 41:09 — चित्रों की तुलना कैसे पूरी करें?
- 42:28 — असहयोग: समूहों की सूची पहले बनाएँ
- 44:05 — अवध के किसान: समस्या, आशा, संघर्ष
- 45:28 — गूडेम के आदिवासी: वन अधिकार और स्वराज
- 46:47 — असम के बागान मजदूर: बाहर जाने की आजादी
- 48:08 — नमक यात्रा: असरदार प्रतीक क्यों?
- 49:50 — महिला सहभागी की आवाज में उत्तर
- 51:35 — पृथक निर्वाचिका: आंबेडकर और गांधीजी
- 53:33 — पृथक निर्वाचिका: अल्पसंख्यक प्रतिनिधित्व
- 55:01 — इंडो-चाइना परियोजना: स्रोत के साथ काम
- 56:18 — तीन वास्तविक प्रश्न अब स्वयं लिखें
- 57:35 — अध्याय की सीख और आगे का अभ्यास
भूमिका: भारत में राष्ट्रवाद का विकास
भारत में आधुनिक राष्ट्रवाद का विकास औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध संघर्ष से गहराई से जुड़ा था। विदेशी शासन के उत्पीड़न का साझा अनुभव लोगों को एक-दूसरे के निकट लाया। फिर भी सभी वर्गों पर उसका असर समान नहीं था; इसलिए स्वतंत्रता से उनकी अपेक्षाएँ भी अलग थीं। महात्मा गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस ने इन समूहों को एक बड़े आंदोलन में जोड़ने की कोशिश की। इस एकता में मतभेद और टकराव भी थे। अध्याय इसी संबंध को असहयोग और सविनय अवज्ञा आंदोलनों के माध्यम से समझाता है।
चित्र 1 का अवलोकन: 6 अप्रैल 1919 की तस्वीर में सड़कों पर बड़ा जनसमूह दिखाई देता है। उसका विवरण बताता है कि राष्ट्रीय आंदोलन में ऐसे जुलूस आम हो गए थे। इससे आंदोलन में सार्वजनिक जन-भागीदारी को समझने में मदद मिलती है।
(NCERT, मुद्रित पृ. 29)
1. पहला विश्वयुद्ध, ख़िलाफ़त और असहयोग
युद्ध से बदली आर्थिक और राजनीतिक परिस्थितियाँ
1919 के बाद राष्ट्रीय आंदोलन नए इलाकों और सामाजिक समूहों तक पहुँचा। इसकी पृष्ठभूमि में युद्ध से पैदा हुई कठिनाइयाँ थीं:
- रक्षा-व्यय और कर बढ़े: युद्ध का खर्च पूरा करने के लिए कर्ज लिए गए, कर बढ़ाए गए, सीमा शुल्क बढ़ाया गया और आयकर शुरू किया गया।
- महँगाई बढ़ी: 1913 से 1918 के बीच कीमतें दोगुनी हो गईं, जिससे साधारण लोगों का जीवन कठिन हुआ।
- जबरन भर्ती हुई: ग्रामीण लोगों को उनकी इच्छा के विरुद्ध सेना में भर्ती करने से व्यापक नाराज़गी फैली।
- भोजन और स्वास्थ्य का संकट आया: 1918–19 तथा 1920–21 में अनेक क्षेत्रों में फसलें खराब हुईं और खाद्य पदार्थों की भारी कमी हुई। साथ ही फ्लू की महामारी फैली। पुस्तक के अनुसार, 1921 की जनगणना में दुर्भिक्ष और महामारी के कारण 120–130 लाख लोगों की मृत्यु का उल्लेख है।
लोगों को युद्ध समाप्त होने पर राहत मिलने की उम्मीद थी, लेकिन उनकी कठिनाइयाँ बनी रहीं। इसी परिस्थिति में गांधीजी संघर्ष की नई पद्धति लेकर सामने आए।
(NCERT, मुद्रित पृ. 30)
1.1 सत्याग्रह का विचार
महात्मा गांधी जनवरी 1915 में दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटे। वहाँ उन्होंने नस्लभेदी शासन के विरुद्ध सत्याग्रह का प्रयोग किया था। सत्याग्रह का आधार सत्य की शक्ति, सत्य की खोज और अहिंसा है। यदि उद्देश्य सच्चा और संघर्ष अन्याय के विरुद्ध हो, तो उत्पीड़क का सामना करने के लिए शारीरिक बल आवश्यक नहीं है। सत्याग्रही बदला लेने या शत्रु को नष्ट करने का प्रयास नहीं करता; वह उसकी चेतना को जगाकर सच्चाई स्वीकार करने के लिए प्रेरित करता है। गांधीजी मानते थे कि अहिंसा सभी भारतीयों को एकता में बाँध सकती है।
स्रोत-क: गांधीजी के विचार का भावार्थ। पुस्तक में दिए कथन के अनुसार सत्याग्रह आत्मबल है, जिसका आधार सत्य और प्रेम हैं। इसमें द्वेष और प्रतिशोध के लिए जगह नहीं है। इसे अपनाने के लिए साहस और सक्रिय प्रयास चाहिए; यह अन्याय के सामने चुपचाप झुक जाना नहीं है। गांधीजी के अनुसार भारत हथियारों की शक्ति में ब्रिटेन या यूरोप का मुकाबला नहीं कर सकता था; करोड़ों भारतीयों ने अहिंसा को अपनाया था।
पुस्तक की गतिविधि का संभावित उत्तर: सत्याग्रह को सक्रिय प्रतिरोध इसलिए कहा गया है क्योंकि सत्याग्रही अन्याय का विरोध करता है, लोगों को संगठित करता है और विरोधी को सत्य का बोध कराने का प्रयास करता है। उसकी सक्रियता अहिंसक होती है।
चित्र 2 का संदर्भ: 6 नवंबर 1913 को दक्षिण अफ्रीका में भारतीय मजदूरों का जुलूस न्यूकैसल से ट्रांसवाल की ओर बढ़ रहा था। जुलूस रोके जाने और गांधीजी की गिरफ्तारी के बाद हजारों मजदूर नस्लभेदी कानूनों के विरोध में सत्याग्रह से जुड़े।
(NCERT, मुद्रित पृ. 30–31; स्रोत-क और उसकी गतिविधि, पृ. 31)
भारत में सत्याग्रह के शुरुआती प्रयोग
| स्थान | संबंधित समूह और संघर्ष |
|---|---|
| चंपारण, बिहार; 1917 | गांधीजी ने दमनकारी बागान व्यवस्था के विरुद्ध किसानों को संघर्ष के लिए प्रेरित किया। |
| खेड़ा, गुजरात | फसल खराब होने और प्लेग के कारण किसान लगान चुकाने की स्थिति में नहीं थे। उन्होंने लगान-वसूली में ढील माँगी; गांधीजी ने उनके समर्थन में सत्याग्रह आयोजित किया। |
| अहमदाबाद; 1918 | गांधीजी ने सूती कपड़ा कारखानों के मजदूरों के बीच सत्याग्रह आंदोलन चलाया। |
(NCERT हिंदी, मुद्रित पृ. 31; वर्ष-भिन्नता की तुलना: NCERT अंग्रेज़ी, पृ. 31)
1.2 रॉलट एक्ट और राष्ट्रव्यापी सत्याग्रह
1919 में गांधीजी ने रॉलट एक्ट के विरुद्ध राष्ट्रव्यापी सत्याग्रह का निर्णय लिया। भारतीय सदस्यों के विरोध के बावजूद इम्पीरियल लेजिस्लेटिव काउंसिल ने कानून जल्दी पारित किया। इससे सरकार को राजनीतिक गतिविधियाँ दबाने और राजनीतिक कैदियों को बिना मुकदमा चलाए दो वर्ष तक बंद रखने का अधिकार मिला। गांधीजी इसका अहिंसक नागरिक अवज्ञा से विरोध चाहते थे; शुरुआत 6 अप्रैल की हड़ताल से होनी थी।
विभिन्न शहरों में रैलियाँ हुईं, रेलवे वर्कशॉप के मजदूर हड़ताल पर गए और दुकानें बंद हुईं। सरकार जन-उभार तथा रेलवे और टेलीग्राफ जैसी संचार सुविधाओं के बाधित होने की आशंका से घबरा गई। अमृतसर के स्थानीय नेता हिरासत में लिए गए और गांधीजी के दिल्ली-प्रवेश पर रोक लगी। 10 अप्रैल को अमृतसर में पुलिस ने शांतिपूर्ण जुलूस पर गोली चलाई। इसके बाद बैंकों, डाकघरों और रेलवे स्टेशनों पर हमले हुए। मार्शल लॉ लागू हुआ और जनरल डायर ने कमान सँभाली।
(NCERT, मुद्रित पृ. 31)
जलियाँवाला बाग: घटना, प्रतिक्रिया और दमन
13 अप्रैल 1919 को अमृतसर के जलियाँवाला बाग में बड़ी भीड़ एकत्र हुई। कुछ लोग दमनकारी कदमों के विरोध में आए थे और कुछ वार्षिक बैसाखी मेले के लिए। बाहर से आए अनेक ग्रामीणों को मार्शल लॉ लागू होने की जानकारी नहीं थी। डायर ने मैदान से बाहर निकलने के रास्ते बंद कराकर भीड़ पर गोलियाँ चलवाईं। सैकड़ों लोग मारे गए। पुस्तक के अनुसार उसका उद्देश्य सत्याग्रहियों के मन में आतंक पैदा करना था।
खबर फैलने पर उत्तर भारत के अनेक शहरों में हड़तालें, पुलिस से टकराव और सरकारी इमारतों पर हमले हुए। सरकार ने कठोर दमन किया: लोगों को जमीन पर नाक रगड़ने, सड़कों पर घिसटने और अंग्रेज़ अधिकारियों को सलाम करने के लिए मजबूर किया गया। लोगों को कोड़े मारे गए और गुजराँवाला के आसपास गाँवों पर बम बरसाए गए। हिंसा फैलती देखकर गांधीजी ने आंदोलन वापस ले लिया।
चित्र 3 का अवलोकन: सैनिकों द्वारा लोगों को घिसटकर चलने के लिए मजबूर करने का दृश्य सरकारी दमन के अपमानजनक रूप को दिखाता है।
(NCERT, मुद्रित पृ. 32)
ख़िलाफ़त का मुद्दा और राष्ट्रीय आंदोलन
रॉलट सत्याग्रह व्यापक था, लेकिन मुख्यतः शहरों और कस्बों तक सीमित रहा। गांधीजी अधिक बड़े जनाधार वाला आंदोलन चाहते थे और इसके लिए हिंदू-मुस्लिम एकता आवश्यक मानते थे। उन्हें ख़िलाफ़त का मुद्दा दोनों समुदायों को निकट लाने का अवसर लगा।
प्रथम विश्वयुद्ध में ऑटोमन तुर्की पराजित हुआ था। आशंका थी कि ऑटोमन सम्राट और इस्लामिक विश्व के आध्यात्मिक नेता, ख़लीफ़ा, पर कठोर शांति संधि थोपी जाएगी। उसकी शक्तियों की रक्षा के लिए मार्च 1919 में बंबई में ख़िलाफ़त समिति बनी। मोहम्मद अली और शौकत अली जैसे युवा मुस्लिम नेताओं ने गांधीजी से संयुक्त जनकार्रवाई पर चर्चा की। गांधीजी ने इसे मुसलमानों को एक संयुक्त राष्ट्रीय आंदोलन से जोड़ने का अवसर माना। सितंबर 1920 के कलकत्ता कांग्रेस अधिवेशन में उन्होंने ख़िलाफ़त के समर्थन और स्वराज के लिए असहयोग आंदोलन शुरू करने पर नेताओं को सहमत किया।
(NCERT, मुद्रित पृ. 32)
1.3 असहयोग ही क्यों?
गांधीजी ने हिंद स्वराज (1909) में समझाया था कि भारत में ब्रिटिश शासन भारतीयों के सहयोग से स्थापित हुआ और उसी सहयोग से चल रहा था। उनका तर्क था कि भारतीय सहयोग वापस ले लें तो साल भर में ब्रिटिश शासन समाप्त होकर स्वराज आ सकता है। यह गांधीजी का उस समय का आकलन था।
उन्होंने चरणबद्ध कार्यक्रम सुझाया: पहले सरकारी उपाधियाँ लौटाई जाएँ तथा सरकारी नौकरियों, सेना, पुलिस, अदालतों, विधायी परिषदों, स्कूलों और विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार हो। सरकार दमन करे तो व्यापक सविनय अवज्ञा शुरू की जाए। बहिष्कार का अर्थ विरोध के लिए किसी संस्था या गतिविधि में भाग लेने, किसी से संबंध रखने अथवा वस्तु खरीदने और इस्तेमाल करने से इनकार करना है।
1920 की गर्मियों में गांधीजी और शौकत अली ने समर्थन जुटाने के लिए देश में यात्राएँ कीं। कांग्रेस के कुछ सदस्य नवंबर के परिषद चुनावों का बहिष्कार नहीं चाहते थे और हिंसा फैलने से चिंतित थे। सितंबर से दिसंबर तक बहस चली। अंततः दिसंबर 1920 के नागपुर अधिवेशन में समझौते के बाद असहयोग कार्यक्रम स्वीकार हुआ।
चित्र 4 का संदर्भ: जुलाई 1922 के विदेशी कपड़े के बहिष्कार का दृश्य बताता है कि कपड़ा आर्थिक प्रश्न के साथ पश्चिमी सांस्कृतिक प्रभुत्व का प्रतीक भी माना जाता था।
(NCERT, मुद्रित पृ. 32–33)
2. आंदोलन के भीतर अलग-अलग धाराएँ
असहयोग-ख़िलाफ़त आंदोलन जनवरी 1921 में शुरू हुआ। अनेक सामाजिक समूह इसमें आए। सबने स्वराज का आह्वान स्वीकार किया, लेकिन अपनी परिस्थितियों के अनुसार उसके अलग अर्थ निकाले।
(NCERT, मुद्रित पृ. 34)
2.1 शहरों में आंदोलन
शहरों में मध्यवर्ग की भागीदारी प्रमुख थी। हजारों विद्यार्थियों ने स्कूल-कॉलेज छोड़े, शिक्षकों और हेडमास्टरों ने इस्तीफे दिए तथा वकीलों ने मुकदमे लड़ना बंद किया। अधिकांश प्रांतों में परिषद चुनावों का बहिष्कार हुआ। मद्रास अपवाद था: गैर-ब्राह्मणों की जस्टिस पार्टी परिषदों में प्रवेश करके उन अधिकारों और सत्ता तक पहुँच बनाना चाहती थी जो प्रायः ब्राह्मणों को मिलते थे।
विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार हुआ, विदेशी कपड़ों की होली जली और शराब की दुकानों पर पिकेटिंग हुई। पिकेटिंग विरोध का वह तरीका है जिसमें लोग दुकान, कारखाने या कार्यालय में प्रवेश का रास्ता रोकते हैं। 1921 से 1922 के बीच विदेशी कपड़े का आयात आधा रह गया; उसका मूल्य 102 करोड़ रुपये से घटकर 57 करोड़ रुपये हुआ। अनेक व्यापारियों ने विदेशी व्यापार में हिस्सा लेना या पैसा लगाना बंद किया। भारतीय कपड़ों का उपयोग बढ़ने से भारतीय मिलों और हथकरघों का उत्पादन बढ़ा।
शहरी आंदोलन बाद में धीमा पड़ा। खादी प्रायः मिल के कपड़े से महँगी थी, इसलिए गरीब उसे लगातार नहीं खरीद सकते थे। ब्रिटिश संस्थाओं के विकल्प के रूप में भारतीय संस्थाएँ भी धीरे बन रही थीं। विद्यार्थी और शिक्षक सरकारी स्कूलों में तथा वकील सरकारी अदालतों में लौटने लगे।
पुस्तक की पोस्टर-गतिविधि का संभावित नमूना: हिंदी पाठ में 1920 के सरकारी स्कूल के विद्यार्थी की कल्पना करनी है। पोस्टर का संदेश हो सकता है: “विद्यार्थियो, स्वराज के लिए असहयोग में भाग लें। सरकारी शिक्षण संस्थाओं और विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार करें। अहिंसक आंदोलन से जुड़ें।” यह अभ्यास के लिए तैयार पाठ है, ऐतिहासिक पोस्टर का उद्धरण नहीं।
(NCERT, मुद्रित पृ. 34; पोस्टर-गतिविधि भी पृ. 34)
2.2 ग्रामीण इलाकों में विद्रोह: अवध के किसान
अवध में किसानों का नेतृत्व बाबा रामचंद्र कर रहे थे, जो पहले फ़िजी में गिरमिटिया मजदूर रहे थे। गिरमिटिया मजदूर वे थे जिन्हें औपनिवेशिक शासन में एक अनुबंध के अंतर्गत दूसरे स्थानों पर काम करने ले जाया गया; ‘गिरमिट’ शब्द ‘एग्रीमेंट’ से बना था।
तालुकदार और जमींदार भारी लगान तथा दूसरे कर वसूलते थे। किसानों से बेगार, अर्थात बिना पारिश्रमिक का काम, कराया जाता था। पट्टेदारों को बार-बार जमीन से हटाने से उनकी स्थिति असुरक्षित थी। किसानों की माँगें थीं: लगान घटे, बेगार समाप्त हो और दमनकारी जमींदारों का सामाजिक बहिष्कार हो। पंचायतों के ‘नाई-धोबी बंद’ से जमींदारों की ये सेवाएँ रोक दी गईं।
जून 1920 में जवाहरलाल नेहरू ने अवध के गाँवों में जाकर शिकायतें समझीं। अक्टूबर तक नेहरू, बाबा रामचंद्र और अन्य नेताओं के नेतृत्व में अवध किसान सभा बनी। महीने भर में इसकी 300 से अधिक शाखाएँ बन गईं। कांग्रेस ने किसान संघर्ष को असहयोग से जोड़ने का प्रयास किया।
लेकिन 1921 में तालुकदारों और व्यापारियों के घरों पर हमले, बाजारों में लूट तथा अनाज के गोदामों पर कब्जे भी हुए। कुछ स्थानीय नेता कहते थे कि गांधीजी ने लगान न देने और गरीबों में जमीन बाँटने की घोषणा की है। पुस्तक इन्हें स्थानीय नेताओं के दावों के रूप में प्रस्तुत करती है; इन्हें गांधीजी की वास्तविक घोषणा नहीं मानना चाहिए। इन कार्रवाइयों से कांग्रेस नेतृत्व असहमत था।
(NCERT, मुद्रित पृ. 34–35)
स्रोत-ख, किसान-गतिविधि और बारदोली का प्रसंग
स्रोत-ख का भावार्थ: 6 जनवरी 1921 को रायबरेली के पास पुलिस ने किसानों पर गोली चलाई। घटनास्थल जाने से रोके गए नेहरू ने आसपास के किसानों को संबोधित किया। उनके संस्मरण में किसान खतरे के सामने भी शांत दिखाई देते हैं। नेहरू स्वयं क्रोधित हुए, लेकिन गांधीजी और किसानों के संयम को याद कर उन्होंने अहिंसा पर बात की। किसान शांतिपूर्वक चले गए। यह विवरण सर्वपल्ली गोपाल की नेहरू-जीवनी में उद्धृत है। इससे किसानों की अहिंसक भागीदारी भी सामने आती है।
पुस्तक की किसान-गतिविधि का संभावित उत्तर: 1920 का अवध का किसान स्वराज का समर्थन कर सकता था क्योंकि उसे भारी लगान, बेगार और जमीन से बेदखली से राहत की आशा थी। यह उसकी परिस्थितियों से निकला संभावित दृष्टिकोण है।
पुस्तक का अतिरिक्त प्रसंग: 1928 में वल्लभभाई पटेल ने गुजरात के बारदोली तालुका में बढ़े भू-राजस्व के विरुद्ध किसान आंदोलन का नेतृत्व किया। बारदोली सत्याग्रह सफल रहा और उसे देश के कई क्षेत्रों में सहानुभूति मिली। यह अवध के आंदोलन से अलग प्रसंग है।
(NCERT, मुद्रित पृ. 35; स्रोत-ख, गतिविधि और बारदोली बॉक्स)
गुडेम के आदिवासी और स्वराज
आंध्र प्रदेश की गुडेम पहाड़ियों में 1920 के दशक की शुरुआत में उग्र गुरिल्ला आंदोलन फैला। सरकार ने बड़े जंगलों में प्रवेश रोक दिया था। लोग मवेशी नहीं चरा सकते थे और जलावन की लकड़ी तथा फल नहीं जुटा सकते थे। इससे आजीविका और परंपरागत अधिकार प्रभावित हुए। सड़कें बनाने के लिए बेगार कराने पर विद्रोह भड़का।
नेता अल्लूरी सीताराम राजू विशेष शक्तियों का दावा करते थे और अनुयायी उन्हें ईश्वर का अवतार मानते थे। उनके दावों में सटीक अनुमान लगाना, लोगों को स्वस्थ करना और गोलियों से न मरना शामिल था। पुस्तक इसे दावे और विश्वास के रूप में बताती है। राजू गांधीजी और असहयोग से प्रेरित थे; उन्होंने खादी पहनने तथा शराब छोड़ने को कहा। लेकिन उनका मानना था कि स्वतंत्रता बलप्रयोग से मिलेगी। विद्रोहियों ने पुलिस थानों पर हमले किए, ब्रिटिश अधिकारियों को मारने के प्रयास किए और गुरिल्ला युद्ध चलाया। कांग्रेस इस प्रकार के संघर्ष को स्वीकार नहीं कर सकती थी। हिंदी पाठ के अनुसार 1924 में राजू को फाँसी दी गई; वे लोकनायक बन गए।
पुस्तक की खोज-गतिविधि: राजू के अतिरिक्त भारतीय उदाहरण के लिए इसी अध्याय का बॉक्स 1, पृ. 41 पढ़ें। उसमें भगत सिंह पर मुकदमा चलाए जाने और 23 वर्ष की आयु में फाँसी दिए जाने का उल्लेख है। यह भारतीय पक्ष का एक पाठ्यपुस्तक-आधारित उदाहरण देता है। अन्य उदाहरणों की खोज और इंडो-चाइना से तुलना के लिए संबंधित अतिरिक्त NCERT पाठ पढ़ना आवश्यक है।
(NCERT, मुद्रित पृ. 35–36; खोज-गतिविधि, पृ. 36)
2.3 बागानों में स्वराज
असम के बागानी मजदूरों के लिए स्वतंत्रता का अर्थ था बागानों में अपनी इच्छा से आना-जाना और गाँव से संबंध बनाए रखना। 1859 के इनलैंड इमिग्रेशन एक्ट के अंतर्गत वे बिना अनुमति बागान नहीं छोड़ सकते थे; अनुमति बहुत कम मिलती थी।
असहयोग की खबर सुनकर हजारों मजदूर अधिकारियों की अवहेलना करते हुए घरों की ओर चल दिए। उनका विश्वास था कि गांधी राज आने पर अपने गाँव में जमीन मिलेगी। लेकिन रेलवे और स्टीमरों की हड़ताल से वे रास्ते में फँस गए। पुलिस ने उन्हें पकड़कर बुरी तरह पीटा।
इन स्थानीय अपेक्षाओं को कांग्रेस के कार्यक्रम ने निर्धारित नहीं किया था। लोगों ने स्वराज को अपने कष्टों की समाप्ति के रूप में समझा। फिर भी गांधीजी का नाम लेने और ‘स्वतंत्र भारत’ की माँग करने से वे अपने इलाके से आगे एक अखिल भारतीय आंदोलन के साथ भावनात्मक रूप से जुड़ते थे।
(NCERT, मुद्रित पृ. 36–37)
चौरी-चौरा का संकेत और असहयोग का रुकना
चित्र 5 के विवरण के अनुसार, 1922 में गोरखपुर के चौरी-चौरा में बाजार से गुजरता शांतिपूर्ण जुलूस पुलिस के साथ हिंसक टकराव में बदल गया। इसकी खबर सुनकर गांधीजी ने असहयोग आंदोलन रोकने का आह्वान किया। यह प्रसंग दिखाता है कि आंदोलन के साधनों में अहिंसा गांधीजी के लिए केंद्रीय थी। आंदोलन वापस लेने का आगे का विवरण अगले खंड में आता है।
(NCERT, मुद्रित पृ. 37, चित्र 5 और उसका विवरण)
3. सविनय अवज्ञा की ओर
असहयोग के बाद नई दिशा की तलाश — पृ. 38–39
फरवरी 1922 में गांधीजी ने बढ़ती हिंसा और सत्याग्रहियों के प्रशिक्षण की आवश्यकता के कारण असहयोग वापस लिया। कांग्रेस के कुछ नेता जनसंघर्षों से थककर 1919 के गवर्नमेंट ऑफ़ इंडिया एक्ट के अंतर्गत बनी प्रांतीय परिषदों के चुनाव लड़ना चाहते थे। उनका उद्देश्य परिषदों के भीतर ब्रिटिश नीतियों का विरोध, सुधारों की वकालत और उनका अलोकतांत्रिक स्वरूप उजागर करना था। सी.आर. दास और मोतीलाल नेहरू ने इसके लिए कांग्रेस के भीतर स्वराज पार्टी बनाई। जवाहरलाल नेहरू और सुभाषचंद्र बोस जैसे युवा नेता अधिक उग्र जनांदोलन तथा पूर्ण स्वतंत्रता चाहते थे।
दो घटनाक्रमों ने राजनीति की दिशा बदली। विश्वव्यापी आर्थिक मंदी के कारण 1926 से कृषि उत्पादों की कीमतें गिरने लगीं और 1930 के बाद बहुत नीचे चली गईं। माँग और निर्यात घटने से उपज बेचना तथा लगान चुकाना कठिन हुआ। ब्रिटेन की टोरी सरकार ने सर जॉन साइमन के नेतृत्व में संवैधानिक व्यवस्था की समीक्षा और सुधार सुझाने के लिए आयोग बनाया। इसमें कोई भारतीय नहीं था। 1928 में कांग्रेस, मुस्लिम लीग और अन्य दलों ने ‘साइमन कमीशन वापस जाओ’ के नारों से उसका विरोध किया। शांतिपूर्ण प्रदर्शन में पुलिस के हमले से लगी चोटों के कारण लाला लाजपत राय की मृत्यु हुई।
अक्तूबर 1929 में इरविन ने समयसीमा के बिना डोमिनियन स्टेटस और भावी संविधान पर गोलमेज सम्मेलन का प्रस्ताव रखा। कांग्रेस असंतुष्ट रही; ब्रिटिश डोमिनियन में संवैधानिक व्यवस्था चाहने वाले नेताओं का प्रभाव घटा। दिसंबर 1929 के लाहौर अधिवेशन में जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में पूर्ण स्वराज स्वीकार हुआ। 26 जनवरी 1930 को स्वतंत्रता दिवस मनाकर संघर्ष की शपथ लेने का निर्णय हुआ। उत्सव ने बहुत कम ध्यान खींचा; स्वतंत्रता के विचार को दैनिक जीवन से जोड़ना आवश्यक था।
चित्र 6: इलाहाबाद में कांग्रेस नेताओं की 1931 की बैठक में गांधीजी, वल्लभभाई पटेल, जवाहरलाल नेहरू और सुभाषचंद्र बोस दिखते हैं। यह राष्ट्रीय नेतृत्व की सामूहिक बैठक का चित्र है।
स्रोत-ग (C): स्वतंत्रता दिवस की शपथ — पृ. 39
26 जनवरी 1930 की शपथ स्वतंत्रता, मेहनत के फल, जीवन की आवश्यकताओं और विकास के अवसरों को जनता का ऐसा अधिकार बताती है जिसे छीना नहीं जा सकता। जनता को अधिकार छीनने वाली दमनकारी सरकार बदलने या समाप्त करने का अधिकार है। ब्रिटिश शासन पर आर्थिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक क्षति पहुँचाने का आरोप लगाकर पूर्ण स्वराज की आवश्यकता समझाई गई है। आशय: स्वतंत्रता जनता के जीवन और अधिकारों से जुड़ी थी।
3.1 नमक यात्रा और सविनय अवज्ञा आंदोलन — पृ. 39–40
31 जनवरी 1930 को गांधीजी ने इरविन को 11 माँगों वाला पत्र भेजा। कुछ सामान्य हित की और कुछ उद्योगपतियों से किसानों तक विभिन्न वर्गों की माँगें थीं। उद्देश्य व्यापक संयुक्त अभियान बनाना था। सबसे महत्वपूर्ण माँग नमक कर समाप्त करना थी। नमक अमीर-गरीब के भोजन की आवश्यक वस्तु था। गांधीजी के अनुसार इस पर कर और उत्पादन पर सरकारी इज़ारेदारी ब्रिटिश शासन का दमनकारी स्वरूप दिखाते थे। अध्याय में सभी 11 माँगों की सूची नहीं है।
पत्र में 11 मार्च तक माँगें स्वीकार न होने पर सविनय अवज्ञा की चेतावनी थी। इरविन तैयार नहीं हुए। गांधीजी 78 विश्वस्त स्वयंसेवकों के साथ साबरमती आश्रम से गुजरात के तटीय दांडी चले। टोली 24 दिन तक प्रतिदिन लगभग 10 मील चली। पड़ावों पर हजारों को गांधीजी स्वराज समझाते और शांतिपूर्ण अवज्ञा का आह्वान करते। 6 अप्रैल 1930 को दांडी में समुद्र का पानी उबालकर नमक बनाने से कानून टूटा और सविनय अवज्ञा आरंभ हुई। चित्र 7 के अनुसार रास्ते में हजारों लोग जुड़ते गए।
असहयोग में सहयोग वापस लेना मुख्य था; सविनय अवज्ञा में औपनिवेशिक कानून तोड़ने का आह्वान भी जुड़ गया। लोगों ने नमक कानून तोड़ा, सरकारी नमक कारखानों के सामने प्रदर्शन किए, विदेशी कपड़ों का बहिष्कार और शराब की दुकानों की पिकेटिंग की। किसानों ने लगान तथा चौकीदारी कर देने से मना किया; गाँवों के कर्मचारियों ने इस्तीफ़े दिए। अनेक स्थानों पर वनवासियों ने लकड़ी लेने और पशु चराने के लिए आरक्षित वनों में प्रवेश करके वन कानून तोड़े।
दमन, गांधी–इरविन समझौता और पुनः आंदोलन — पृ. 40–41
सरकार ने कांग्रेस नेताओं की गिरफ्तारियाँ शुरू कीं। अप्रैल 1930 में अब्दुल गफ़्फ़ार ख़ान की गिरफ्तारी के बाद पेशावर में भीड़ ने बख्तरबंद गाड़ियों और पुलिस की गोलियों का सामना किया; बहुत से लोग मारे गए। लगभग महीने भर बाद गांधीजी की गिरफ्तारी पर शोलापुर के औद्योगिक मजदूरों ने पुलिस चौकियों, नगरपालिका भवनों, अदालतों और रेलवे स्टेशनों जैसे ब्रिटिश सत्ता के प्रतीकों पर हमले किए। सरकार ने शांतिपूर्ण सत्याग्रहियों, महिलाओं और बच्चों पर भी हिंसा की तथा लगभग एक लाख लोगों को गिरफ्तार किया। चित्र 8 सत्याग्रहियों पर पुलिस के हमले को दिखाता है।
गांधीजी ने आंदोलन वापस लेकर 5 मार्च 1931 को गांधी–इरविन समझौता किया। वे दूसरे गोलमेज सम्मेलन में भाग लेने और सरकार राजनीतिक कैदियों को छोड़ने पर सहमत हुई। कांग्रेस पहले सम्मेलन का बहिष्कार कर चुकी थी। पाठ के अनुसार दिसंबर 1931 में गांधीजी सम्मेलन के लिए लंदन गए; वार्ता विफल हुई। लौटने पर गफ़्फ़ार ख़ान तथा नेहरू जेल में थे, कांग्रेस गैरकानूनी थी और सभाओं, प्रदर्शनों तथा बहिष्कार पर रोक लग रही थी। 1932 में आंदोलन फिर शुरू हुआ, लेकिन 1934 तक मंद पड़ गया।
बॉक्स 1: क्रांतिकारियों का दृष्टिकोण — पृ. 41
कुछ राष्ट्रवादी मानते थे कि अंग्रेज़ों के विरुद्ध संघर्ष अहिंसा से नहीं जीता जा सकता। 1928 में दिल्ली के फ़िरोजशाह कोटला मैदान की बैठक में हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी (एच.एस.आर.ए.) बनी। भगत सिंह, जतिन दास और अजय घोष इसके नेताओं में थे। संगठन ने ब्रिटिश सत्ता के प्रतीकों को निशाना बनाया। अप्रैल 1929 में भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने लेजिस्लेटिव असेंबली में बम फेंका; उसी वर्ष इरविन की ट्रेन को उड़ाने का प्रयास हुआ। भगत सिंह पर मुकदमे और फाँसी के समय उनकी आयु 23 वर्ष थी।
बॉक्स में दिए बयान का केंद्रीय विचार समाज में क्रांति है। भगत सिंह ने बम-पिस्तौल की उपासना से अपने उद्देश्य को अलग बताया। स्वतंत्रता को जन्मसिद्ध अधिकार, श्रमिकों को समाज का वास्तविक पोषक और जनता की सर्वोपरि सत्ता को लक्ष्य माना। उन्होंने महान आदर्श के लिए युवावस्था तथा बलिदान अर्पित करने की बात कही। ‘इंक़लाब ज़िंदाबाद’ इसी क्रांतिकारी आकांक्षा की अभिव्यक्ति है।
3.2 लोगों ने आंदोलन को कैसे लिया? — पृ. 41–43
संपन्न किसान: गुजरात के पाटीदार और उत्तर प्रदेश के जाट जैसे व्यावसायिक फसलों के उत्पादक मंदी तथा गिरती कीमतों से प्रभावित थे। नकद आय घटने पर सरकारी लगान चुकाना कठिन हुआ। सरकार द्वारा लगान न घटाने से वे आंदोलन के उत्साही समर्थक बने। उन्होंने समुदायों को संगठित किया और कभी अनिच्छुक सदस्यों पर भी बहिष्कार में भाग लेने का दबाव डाला। उनके लिए स्वराज भारी लगान से राहत था। 1931 में लगान घटे बिना आंदोलन समाप्त होने से निराश होकर उनमें से बहुतों ने 1932 में दोबारा भाग नहीं लिया।
गरीब किसान: जमींदारों की जमीन पर खेती करने वाले छोटे पट्टेदार गिरती आय के कारण बकाया भाड़े की माफी चाहते थे। उन्होंने प्रायः समाजवादियों और कम्युनिस्टों के नेतृत्व वाले रेडिकल आंदोलनों में भाग लिया। संपन्न किसानों और जमींदारों की नाराज़गी के भय से कांग्रेस भाड़ा-विरोधी अभियानों का समर्थन करने से हिचकती थी। इसलिए उसका गरीब किसानों से संबंध अनिश्चित रहा। सरकारी लगान और जमींदार को दिया जाने वाला भाड़ा अलग माँगों के आधार थे।
व्यापारी और उद्योगपति: प्रथम विश्वयुद्ध में लाभ कमाकर मजबूत हुए व्यवसायी कारोबार पर औपनिवेशिक रोक हटाना चाहते थे। वे विदेशी आयात से सुरक्षा और आयात घटाने वाला रुपया–स्टर्लिंग विनिमय अनुपात चाहते थे। उन्होंने 1920 में भारतीय औद्योगिक एवं व्यावसायिक कांग्रेस और 1927 में भारतीय वाणिज्य एवं उद्योग परिसंघ (फिक्की) बनाया। पुरुषोत्तमदास ठाकुरदास और जी.डी. बिड़ला जैसे उद्योगपतियों ने आंदोलन को आर्थिक सहायता दी तथा आयातित वस्तुओं की खरीद-बिक्री से इनकार किया। उनके लिए स्वराज में व्यापार और उद्योग बिना औपनिवेशिक बाधाओं के बढ़ते। गोलमेज सम्मेलन की विफलता के बाद उग्र गतिविधियों, कारोबार में लंबी बाधा और कांग्रेस के युवाओं में समाजवाद के प्रभाव की आशंका से उनका उत्साह घटा।
औद्योगिक मजदूर: नागपुर क्षेत्र के अपवाद को छोड़कर उनकी भागीदारी बहुत बड़ी नहीं थी। उद्योगपति कांग्रेस के निकट आए तो मजदूर उससे दूर होने लगे। फिर भी कुछ ने विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार को कम वेतन और खराब कार्यस्थितियों के विरुद्ध अपनी लड़ाई से जोड़ा। 1930 में रेलवे तथा 1932 में गोदी मजदूरों की हड़तालें हुईं। 1930 में छोटा नागपुर की टिन खानों के हजारों मजदूर गांधी टोपी पहनकर रैलियों और बहिष्कार में शामिल हुए। उद्योगपतियों के दूर होने तथा साम्राज्यवाद-विरोधी एकता टूटने की आशंका से कांग्रेस उनकी माँगें अपने कार्यक्रम में शामिल करने से हिचकती थी।
महिलाएँ: उन्होंने गांधीजी के भाषण सुने, जुलूस निकाले, नमक बनाया, दुकानों की पिकेटिंग की और जेल गईं। शहरों में अधिकतर ऊँची जातियों तथा गाँवों में संपन्न किसान परिवारों की महिलाएँ सक्रिय थीं। राष्ट्रसेवा उन्हें पवित्र दायित्व लगने लगी। लेकिन सार्वजनिक भागीदारी बढ़ने से स्त्रियों की स्थिति के बारे में धारणाएँ स्वतः नहीं बदलीं। गांधीजी घर सँभालने, अच्छी माँ और पत्नी बनने को उनका कर्तव्य मानते थे। कांग्रेस लंबे समय तक उन्हें महत्वपूर्ण संगठनात्मक पद देने में हिचकती रही और उनकी प्रतीकात्मक उपस्थिति में रुचि रखती थी। चित्र 9 में बुजुर्ग महिलाएँ और बच्चों को गोद में लिए माताएँ सार्वजनिक जुलूस में दिखती हैं।
पृ. 43 की चर्चा का आधार: साझा असंतोष के बावजूद समूहों की माँगें, भागीदारी और समर्थन की सीमाएँ अलग थीं। इन्हें साथ लिखकर स्वराज के अलग अर्थ स्पष्ट करें।
3.3 सविनय अवज्ञा की सीमाएँ: दलित राजनीति — पृ. 43–44
1930 के आसपास सामाजिक उत्पीड़न झेल रहे समुदाय स्वयं को दलित कहने लगे। रूढ़िवादी सवर्ण सनातनियों को नाराज़ करने के भय से कांग्रेस ने लंबे समय तक उनकी उपेक्षा की थी। गांधीजी ने अस्पृश्यता समाप्त किए बिना स्वराज असंभव बताया। उन्होंने तत्कालीन संबोधन ‘हरिजन’ का प्रयोग किया, मंदिरों, तालाबों, सड़कों और कुओं पर समान अधिकार के लिए सत्याग्रह किया तथा सफाई के काम की प्रतिष्ठा के लिए स्वयं शौचालय साफ किए। उन्होंने ऊँची जातियों से हृदय-परिवर्तन का आग्रह किया।
कई दलित नेता राजनीतिक सशक्तीकरण चाहते थे। शिक्षा में आरक्षण और विधायी प्रतिनिधित्व के लिए पृथक निर्वाचन उनकी माँगें थीं। महाराष्ट्र तथा नागपुर में मजबूत दलित संगठनों के बावजूद सविनय अवज्ञा में उनकी भागीदारी सीमित रही। डॉ. अंबेडकर ने 1930 में दमित वर्ग एसोसिएशन बनाई और दूसरे गोलमेज सम्मेलन में दलितों के लिए पृथक निर्वाचिका माँगी। ब्रिटिश सरकार के इसे स्वीकार करने पर गांधीजी आमरण अनशन पर बैठे; उन्हें समाज में दलितों के एकीकरण की प्रक्रिया धीमी पड़ने की आशंका थी।
सितंबर 1932 के पूना पैक्ट में प्रांतीय और केंद्रीय विधायी परिषदों में दमित वर्गों के लिए आरक्षित सीटें स्वीकार हुईं, लेकिन चुनाव सामान्य निर्वाचन व्यवस्था से होना था। पृथक निर्वाचिका की माँग और सामान्य निर्वाचन में आरक्षित सीटें अलग व्यवस्थाएँ थीं। समझौते के बाद भी दलित आंदोलन कांग्रेस के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय आंदोलन को संदेह से देखता रहा।
मुस्लिम संगठनों की चिंताएँ और प्रतिनिधित्व का प्रश्न — पृ. 44–45
कुछ मुस्लिम राजनीतिक संगठनों ने सविनय अवज्ञा के प्रति विशेष उत्साह नहीं दिखाया। असहयोग–खिलाफ़त आंदोलन के कमजोर पड़ने के बाद मुसलमानों का बड़ा हिस्सा कांग्रेस से अलगाव महसूस करने लगा। 1920 के दशक के मध्य से कांग्रेस हिंदू महासभा जैसे धार्मिक राष्ट्रवादी संगठनों के निकट दिखने लगी। उग्र धार्मिक जुलूसों, सांप्रदायिक टकरावों और दंगों से समुदायों के बीच दूरी बढ़ी।
1927 में कांग्रेस–मुस्लिम लीग गठबंधन की संभावना बनी, लेकिन भावी विधानसभाओं में प्रतिनिधित्व पर मतभेद थे। मोहम्मद अली जिन्ना पृथक निर्वाचिका की माँग छोड़ने को तैयार थे, यदि केंद्रीय सभा में मुसलमानों के लिए सीटें आरक्षित हों तथा बंगाल और पंजाब में आबादी के अनुपात में प्रतिनिधित्व मिले। 1928 के सर्वदलीय सम्मेलन में हिंदू महासभा के एम.आर. जयकर ने समझौते के प्रयासों का विरोध किया। समस्या अनसुलझी रही। कई मुस्लिम नेताओं और बुद्धिजीवियों को आशंका थी कि हिंदू बहुसंख्यक वर्चस्व में अल्पसंख्यकों की संस्कृति तथा पहचान दब जाएगी। इसलिए एकजुट संघर्ष के आह्वान को व्यापक मुस्लिम समर्थन नहीं मिला। चित्र 10 में गांधीजी, जवाहरलाल नेहरू और मौलाना आज़ाद 1935 में वर्धा के सेवाग्राम आश्रम में साथ दिखाई देते हैं; व्यक्तियों का यह चित्र सभी संगठनों की समान स्थिति सिद्ध नहीं करता।
स्रोत-घ (D): इकबाल का तर्क और चर्चा — पृ. 45
1930 में मुस्लिम लीग अध्यक्ष सर मोहम्मद इकबाल ने अल्पसंख्यक राजनीतिक हितों के लिए पृथक निर्वाचिका का समर्थन किया। उन्होंने प्रत्येक समुदाय के सांस्कृतिक विकास, दूसरे समुदायों के धर्म तथा उपासना-स्थलों के सम्मान और सुरक्षा का पक्ष लिया तथा द्वेष की निंदा की। वे भारतीय सामुदायिक विविधता की मान्यता से सामंजस्य और ‘भारत के भीतर एक मुस्लिम भारत’ चाहते थे। उनके अनुसार सामुदायिक समूहों को मान्यता दिए बिना यूरोपीय लोकतंत्र भारत में लागू नहीं हो सकता था। वे राष्ट्र की ऐसी एकरूपता से असहमत थे जिसमें समुदायों की विशिष्टता मिट जाए। मुसलमानों की आर्थिक कमजोरी, विशेषकर पंजाब में ऋणग्रस्तता तथा कई प्रांतों में संख्यात्मक स्थिति को उन्होंने अलग निर्वाचन की चिंता से जोड़ा। स्रोत की भूमिका इस कथन को बाद की पाकिस्तान की माँग के बौद्धिक औचित्य से जोड़ती है।
चर्चा का संभावित उत्तर: सांस्कृतिक स्वतंत्रता और पारस्परिक सम्मान स्वीकार करते हुए धार्मिक पहचान को राजनीतिक अलगाव का आधार बनाने पर प्रश्न उठाया जा सकता है। वैकल्पिक परिभाषा में धार्मिक समुदायों के हितों को अलग तथा परस्पर विरोधी मानने और द्वेष बढ़ाने को सांप्रदायिकता कहा जा सकता है। यह तर्कपूर्ण उत्तर है; स्रोत का वक्तव्य इकबाल का दृष्टिकोण है।
4. सामूहिक अपनेपन का भाव
संयुक्त संघर्ष और सांस्कृतिक प्रक्रियाएँ — पृ. 46
राष्ट्रवाद तब बढ़ता है जब अलग समुदायों, क्षेत्रों और भाषाओं के लोग स्वयं को एक राष्ट्र का अंग महसूस करते हैं। साझा संघर्षों ने यह संबंध बनाया; इतिहास, साहित्य, लोककथाओं, गीतों, चित्रों और प्रतीकों ने राष्ट्र को लोगों की कल्पना तथा भावनाओं में रूप दिया। चित्र 11 में बालगंगाधर तिलक के चारों ओर मंदिर, चर्च और मस्जिद सहित विभिन्न धर्मों के पवित्र स्थल हैं। ये विविध धार्मिक परंपराओं के बीच एकता के संकेत हैं।
भारत माता की छवि और चित्र-पाठ — पृ. 47–48
भारत की पहचान भारत माता की छवि से जुड़ने लगी, जिसका आरंभ बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने किया। उन्होंने 1870 के दशक में मातृभूमि की स्तुति ‘वन्दे मातरम्’ लिखी और बाद में आनंदमठ उपन्यास में जोड़ी। बंगाल के स्वदेशी आंदोलन में यह खूब गाई गई। स्वदेशी से प्रेरित अबनीन्द्रनाथ टैगोर ने 1905 में भारत माता चित्रित की। बाद के कलाकारों और लोकप्रिय छापों में मातृछवि के विविध रूप बने; उसके प्रति श्रद्धा राष्ट्रवादी आस्था का प्रतीक बनी।
| चित्र | दिखाई देने वाले तत्व | पाठ के अनुसार अर्थ |
|---|---|---|
| चित्र 12, पृ. 47: अबनीन्द्रनाथ की भारत माता | शांत, गंभीर, संन्यासिनी जैसी आकृति; शिक्षा, भोजन, कपड़े और माला | पोषण, ज्ञान और आध्यात्मिकता; माला संन्यासी गुण दर्शाती है। रवि वर्मा की तरह कलाकार भारतीय मानी जाने वाली चित्रशैली विकसित करना चाहते थे। |
| चित्र 13, पृ. 47: जवाहरलाल नेहरू का लोकप्रिय चित्र | भारत माता और भारत के नक्शे को हृदय के निकट रखना | राष्ट्र से भावनात्मक लगाव। अन्य लोकप्रिय चित्रों में मातृभूमि के लिए सिर अर्पित करते नेताओं का रूप बलिदान की भावना व्यक्त करता था। |
| चित्र 14, पृ. 48: भारत माता का दूसरा रूप | हाथ में त्रिशूल; हाथी और शेर के बीच खड़ी आकृति | हाथी और शेर शक्ति तथा सत्ता के प्रतीक हैं; यह रूप चित्र 12 की शांत संन्यासिनी से भिन्न है। |
लोककथाएँ, लोकगीत और राष्ट्रीय पहचान — पृ. 47–48
उन्नीसवीं सदी के अंतिम वर्षों में राष्ट्रवादियों ने भाटों-चारणों की कथाएँ, गाँवों के लोकगीत और जनश्रुतियाँ जुटाईं। वे इन्हें बाहरी प्रभावों से क्षतिग्रस्त पारंपरिक संस्कृति की सही तस्वीर मानते थे। संरक्षण से राष्ट्रीय पहचान और अतीत पर गर्व जगाना उद्देश्य था। बंगाल में रवीन्द्रनाथ टैगोर ने लोकगाथाएँ, बालगीत और मिथक जुटाए। मद्रास में नटेसा शास्त्री ने तमिल लोककथाओं का चार खंडों का संग्रह द फ़ोकलोर्स ऑफ़ सदर्न इंडिया प्रकाशित किया। वे इन्हें राष्ट्रीय साहित्य और लोगों के विचारों तथा विशेषताओं की विश्वसनीय अभिव्यक्ति मानते थे।
झंडे: सामूहिक पहचान और अवज्ञा — पृ. 48
| ऐतिहासिक झंडा | हिंदी पाठ में वर्णन | प्रतीकों का अर्थ |
|---|---|---|
| बंगाल के स्वदेशी आंदोलन का तिरंगा | हरा, पीला और लाल; आठ कमल तथा अर्धचंद्र | आठ कमल ब्रिटिश भारत के आठ प्रांतों और अर्धचंद्र हिंदुओं तथा मुसलमानों का प्रतिनिधित्व करता था। |
| 1921 तक गांधीजी का स्वराज झंडा | सफेद, हरा और लाल; बीच में चरखा | चरखा स्वावलंबन का प्रतीक था। जुलूसों में झंडा थामकर चलना शासन की अवज्ञा का संकेत बना। |
ये ऐतिहासिक झंडे हैं; इन्हें आज के राष्ट्रीय ध्वज का विवरण न मानें।
इतिहास की पुनर्व्याख्या, स्रोत-ङ (E) और सीमाएँ — पृ. 48–49
अंग्रेज़ भारतीयों को पिछड़ा और स्वशासन में अक्षम बताते थे। जवाब में राष्ट्रवादी इतिहासकारों ने प्राचीन भारत की कला, वास्तुकला, विज्ञान, गणित, धर्म, संस्कृति, कानून, दर्शन, हस्तकला तथा व्यापार की उपलब्धियाँ खोजीं। गौरवशाली अतीत के बाद पतन और पराधीनता की व्याख्या अतीत पर गर्व तथा ब्रिटिश शासन से मुक्ति के संघर्ष की प्रेरणा देती थी।
स्रोत-ङ: तारिणीचरण चट्टोपाध्याय के भारतबर्षेर इतिहास, खंड 1, 1858 में विदेशी यात्रियों द्वारा आर्यवंश के प्राचीन साहस, सच्चाई तथा विनम्रता की प्रशंसा के सामने वर्तमान में इनके अभाव का दावा है। हिंदुओं की दूर देशों की विजय के सामने एक दूरस्थ द्वीप के थोड़े सैनिकों का भारत पर अधिकार रखा गया है। यह लेखक की गौरवशाली अतीत और पराधीन वर्तमान की तुलना है; इसे स्रोत का दृष्टिकोण समझें।
ऐसी सांस्कृतिक एकता की सीमाएँ भी थीं। जब गौरवगान का अतीत हिंदू अतीत और छवियाँ हिंदू प्रतीकों पर आधारित थीं, अन्य समुदाय स्वयं को अलग महसूस कर सकते थे। पृ. 48 की गतिविधि में चित्र 12 और 14 की तुलना करते समय उत्तर होगा कि सभी जातियों और समुदायों को इनका आकर्षण समान लगना आवश्यक नहीं था। शांत मातृभाव या शक्ति का रूप कुछ लोगों को जोड़ सकता था, लेकिन धार्मिक प्रतीकों से सभी का संबंध एक जैसा नहीं था। चित्रों का वर्णन और उनकी संभावित स्वीकार्यता का तर्क दोनों दें।
निष्कर्ष — पृ. 49
औपनिवेशिक शासन से असंतोष विभिन्न समूहों को साझा संघर्ष में लाया। गांधीजी के नेतृत्व में कांग्रेस ने उनकी शिकायतों को संगठित आंदोलनों से जोड़ा। अलग आकांक्षाओं से स्वराज के अर्थ भी अलग थे। एक समूह की माँग दूसरे को दूर न करे, कांग्रेस इसका प्रयास करती रही। राष्ट्रीय एकता के बाद बिखराव और आंतरिक टकराव भी आए। उभरता राष्ट्र औपनिवेशिक शासन से मुक्ति चाहने वाली अनेक आवाज़ों का समुच्चय था।
भारत छोड़ो आंदोलन: पाठ्यपुस्तक का बॉक्स — पृ. 49
क्रिप्स मिशन की असफलता और द्वितीय विश्वयुद्ध के प्रभावों ने व्यापक असंतोष पैदा किया। गांधीजी ने अंग्रेज़ों के पूरी तरह भारत छोड़ने पर बल दिया। 14 जुलाई 1942 को वर्धा में कांग्रेस कार्यसमिति ने भारत छोड़ो प्रस्ताव पारित करके सत्ता भारतीयों को तत्काल सौंपने की माँग की। 8 अगस्त 1942 को बंबई में अखिल भारतीय कांग्रेस समिति ने प्रस्ताव का समर्थन किया और पूरे देश में व्यापक अहिंसक जनसंघर्ष का आह्वान हुआ। इसी अवसर पर गांधीजी ने ‘करो या मरो’ का प्रसिद्ध भाषण दिया। प्रस्ताव पारित करने और उसके समर्थन की इन दो तारीखों को अलग याद रखें।
लोग स्वयं आंदोलन में कूद पड़े। हड़तालों, राष्ट्रीय गीतों, नारों, प्रदर्शनों और जुलूसों से देश के बड़े हिस्सों में राज्यव्यवस्था ठप पड़ गई। हजारों छात्रों, मजदूरों और किसानों की भागीदारी ने इसे जनांदोलन बनाया। जयप्रकाश नारायण, अरुणा आसफ़ अली और राम मनोहर लोहिया सक्रिय थे। महिलाओं में बंगाल की मातंगिनी हाजरा, असम की कनकलता बरुआ तथा उड़ीसा की रमा देवी का उल्लेख है। अंग्रेज़ों के अत्यधिक बल प्रयोग के बावजूद आंदोलन दबाने में एक वर्ष से अधिक लगा। चित्र 14(अ) बंबई में महिलाओं के जुलूस द्वारा उनकी सामूहिक सार्वजनिक भागीदारी दिखाता है।
NCERT के अध्यायांत अभ्यास: प्रश्नों के नमूना उत्तर
पुस्तक के सभी अध्यायांत प्रश्न हिंदी संस्करण के पृष्ठ 50 पर हैं। नीचे उनके लिए अपने शब्दों में नमूना उत्तर दिए गए हैं। प्रत्येक उत्तर के साथ उस उत्तर का पाठाधार अलग बताया गया है। जब तक अलग उल्लेख न हो, पृष्ठ संख्याएँ हिंदी पुनर्मुद्रण 2026–27 की मुद्रित पृष्ठ संख्याएँ हैं।
संक्षेप में लिखें
1(क). उपनिवेशों में राष्ट्रवाद का उदय उपनिवेशवाद विरोधी आंदोलन से क्यों जुड़ा था?
औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध संघर्ष करते हुए लोगों ने अपने उत्पीड़न के अनुभवों में समानता पहचानी। दमन के साझा अनुभव ने अलग समूहों को एक राष्ट्रीय संघर्ष में जोड़ा। भारत में गांधीजी के नेतृत्व में कांग्रेस ने लोगों के असंतोष को संगठित स्वतंत्रता आंदोलन का रूप देने का प्रयास किया। संयुक्त संघर्ष से एक राष्ट्र का अंग होने की चेतना बढ़ी। फिर भी औपनिवेशिक शासन का प्रभाव प्रत्येक वर्ग पर समान नहीं था; इसलिए स्वतंत्रता से उनकी आशाएँ भी अलग थीं और राष्ट्रीय एकता के भीतर मतभेद बने रहे। पाठाधार: पृ. 29 और 49।
1(ख). पहले विश्वयुद्ध ने भारत में राष्ट्रीय आंदोलन के विकास में कैसे योगदान दिया?
युद्ध ने नई आर्थिक और राजनीतिक परिस्थितियाँ पैदा कीं। बढ़े हुए रक्षा व्यय की पूर्ति के लिए सरकार ने ऋण लिए, कर बढ़ाए, सीमा शुल्क बढ़ाया और आयकर शुरू किया। 1913 से 1918 के बीच कीमतें दोगुनी होने से आम लोगों की कठिनाइयाँ बढ़ीं। गाँवों में सैनिकों की जबरन भर्ती ने गुस्सा पैदा किया। 1918–19 और 1920–21 में फसलें खराब हुईं; भोजन का अभाव और फ्लू की महामारी ने संकट बढ़ाया। युद्ध समाप्त होने पर राहत मिलने की आशा भी पूरी नहीं हुई। इन परिस्थितियों ने असंतोष बढ़ाया और राष्ट्रीय आंदोलन के विस्तार की पृष्ठभूमि बनाई। पाठाधार: पृ. 30।
1(ग). भारतीय रॉलट एक्ट के विरोध में क्यों थे?
1919 का रॉलट एक्ट सरकार को राजनीतिक गतिविधियाँ दबाने और राजनीतिक कैदियों को दो वर्ष तक बिना मुकदमा चलाए जेल में रखने का अधिकार देता था। भारतीय सदस्यों के भारी विरोध के बावजूद इसे इंपीरियल लेजिस्लेटिव काउंसिल ने जल्दबाजी में पारित किया। लोगों को ये शक्तियाँ अन्यायपूर्ण और दमनकारी लगीं। गांधीजी ने इसके विरुद्ध राष्ट्रव्यापी सत्याग्रह का आह्वान किया, जिसकी शुरुआत 6 अप्रैल की हड़ताल से होनी थी। पाठाधार: पृ. 31।
1(घ). गांधीजी ने असहयोग आंदोलन वापस क्यों लिया?
चौरी चौरा में 1922 का एक शांतिपूर्ण जुलूस पुलिस के साथ हिंसक टकराव में बदल गया। घटना की सूचना मिलने पर गांधीजी ने आंदोलन रोकने का आह्वान किया। फरवरी 1922 में उन्होंने असहयोग आंदोलन वापस लेने का निर्णय लिया, क्योंकि उन्हें लग रहा था कि आंदोलन हिंसक होता जा रहा है। अहिंसक संघर्ष को बनाए रखने के लिए सत्याग्रहियों को व्यापक प्रशिक्षण की आवश्यकता थी। पाठाधार: पृ. 37, चित्र 5; पृ. 38।
2. सत्याग्रह के विचार का क्या अर्थ है?
सत्याग्रह सत्य की शक्ति पर आग्रह और सत्य की खोज पर आधारित सक्रिय, अहिंसक प्रतिरोध है। यदि उद्देश्य सच्चा है और संघर्ष अन्याय के विरुद्ध है, तो सत्याग्रही शारीरिक बल, प्रतिशोध या विरोधी के विनाश का सहारा नहीं लेता। वह आत्मबल और अहिंसा से उत्पीड़क की चेतना को जगाकर उसे सच्चाई स्वीकार करने के लिए प्रेरित करता है। इसमें अन्याय के सामने निष्क्रिय रहने की जगह साहसपूर्वक संघर्ष करना आवश्यक है। गांधीजी को विश्वास था कि अहिंसा भारतीयों को एकता के सूत्र में बाँध सकती है। पाठाधार: पृ. 31, मुख्य पाठ और स्रोत-क।
3(क). जलियाँवाला बाग हत्याकांड पर अखबारी रिपोर्ट।
अभ्यास के लिए निर्मित समाचार रिपोर्ट; यह किसी ऐतिहासिक अखबार का उद्धरण या प्रत्यक्षदर्शी बयान नहीं है।
अमृतसर के जलियाँवाला बाग में भीड़ पर गोलीबारी
अमृतसर, अप्रैल 1919। 13 अप्रैल को जलियाँवाला बाग के बंद मैदान में जुटी भीड़ पर जनरल डायर के सैनिकों ने गोलियाँ चलाईं। कुछ लोग दमनकारी कानून का विरोध करने आए थे; अनेक ग्रामीण सालाना बैसाखी मेले में शामिल होने पहुँचे थे। बाहर से आए लोगों को लागू मार्शल लॉ की जानकारी नहीं थी। डायर हथियारबंद सैनिकों के साथ पहुँचा और बाहर निकलने के रास्ते बंद करा दिए। गोलीबारी में सैकड़ों लोग मारे गए। घटना की खबर फैलने पर उत्तर भारत के कई शहरों में हड़तालें और विरोध हुए। सरकार ने इसके बाद कठोर दमन किया। पाठाधार: पृ. 31–32; मृतकों के लिए पाठ का उल्लेख ‘सैकड़ों’ है।
3(ख). साइमन कमीशन पर अखबारी रिपोर्ट।
अभ्यास के लिए निर्मित समाचार रिपोर्ट; इसका शीर्षक और प्रस्तुति स्वनिर्मित हैं।
भारतीय सदस्य के बिना आए साइमन कमीशन का व्यापक विरोध
भारत, 1928। भारत पहुँचे साइमन कमीशन के विरुद्ध ‘साइमन कमीशन वापस जाओ’ के नारे लगाए गए। कांग्रेस और मुस्लिम लीग सहित विभिन्न दलों ने प्रदर्शनों में भाग लिया। ब्रिटेन की नई टोरी सरकार ने सर जॉन साइमन के नेतृत्व में यह वैधानिक आयोग बनाया था। इसे भारत की संवैधानिक व्यवस्था की कार्यशैली का अध्ययन करके सुझाव देने थे। विरोध का प्रमुख कारण था कि आयोग में एक भी भारतीय सदस्य नहीं था; सभी सदस्य अंग्रेज थे। भारतीयों के संवैधानिक भविष्य से जुड़े इस अध्ययन में भारतीय प्रतिनिधित्व का अभाव असंतोष का कारण बना। पाठाधार: पृ. 38।
4. भारत माता और जर्मेनिया की छवियों की तुलना।
दोनों छवियाँ स्त्री आकृति के माध्यम से राष्ट्र की अमूर्त कल्पना को पहचानने योग्य रूप देती हैं। तुलना में वस्तुओं के साथ उनके अर्थ भी लिखें और भारत माता की दोनों छवियों को अलग पहचानें।
| तुलना का आधार | भारत माता | जर्मेनिया |
|---|---|---|
| राष्ट्रीय पहचान | भारत को मातृछवि में प्रस्तुत किया गया। | जर्मन राष्ट्र का स्त्री रूपक। |
| प्रमुख रूप | अबनीन्द्रनाथ टैगोर की 1905 की छवि शांत, गंभीर, दैवी और आध्यात्मिक गुणों वाली संन्यासिनी है। | फ़िलिप वाइट की 1848 की छवि में बलूत की पत्तियों का मुकुट वीरता और गरुड़ वाला वक्षावरण जर्मन साम्राज्य की शक्ति दर्शाता है। |
| हाथों की वस्तुएँ | चित्र 12 में शिक्षा, भोजन और कपड़े दिए जा रहे हैं; माला संन्यासी गुण दर्शाती है। | तलवार संघर्ष की तत्परता और उसके आसपास जैतून की शाखा शांति का संकेत है। |
| शक्ति और स्वतंत्रता | चित्र 14 में त्रिशूल तथा हाथी और शेर दिखाई देते हैं; दोनों पशु शक्ति और सत्ता के प्रतीक हैं। | टूटी जंजीरें स्वतंत्रता और उगता सूरज नए युग का प्रतीक है। |
| राष्ट्रवादी संदर्भ | स्वदेशी आंदोलन ने अबनीन्द्रनाथ को प्रेरित किया; मातृछवि के प्रति श्रद्धा राष्ट्रवाद में आस्था का माध्यम बनी। | काला, लाल और सुनहरा झंडा 1848 के उदारवादी राष्ट्रवादियों से जुड़ा है। |
भारत माता की संन्यासिनी छवि का जोर पोषण और आध्यात्मिकता पर है, जबकि जर्मेनिया के प्रतीक स्वतंत्रता, वीरता और राजनीतिक आकांक्षा को सामने लाते हैं। भारत माता की दूसरी छवि भी शक्ति पर बल देती है; इसलिए सभी भारत माता चित्रों को केवल शांत रूप में समझना उचित नहीं होगा। पाठाधार: अध्याय 2, पृ. 47–48, चित्र 12 और 14; जर्मेनिया के लिए NCERT अंग्रेज़ी अध्याय 1, पुनर्मुद्रण 2024–25, पृ. 23–24, चित्र और प्रतीकों की सूची।
चर्चा करें
1. असहयोग आंदोलन के सामाजिक समूह और तीन समूहों की आशाएँ तथा संघर्ष।
अध्याय के असहयोग संबंधी वर्णन में शहरों का मध्यवर्ग—विद्यार्थी, शिक्षक, प्रधानाध्यापक और वकील; विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार से जुड़े व्यापारी; ग्रामीण किसान; आदिवासी किसान; और असम के बागान मजदूर शामिल हैं। खिलाफत के मुद्दे ने मुस्लिम समर्थकों को भी साझा आंदोलन से जोड़ने का अवसर दिया। यह धार्मिक पहचान व्यवसाय और वर्ग वाली पहचानों के साथ भी जुड़ सकती थी। सूची का पाठाधार: पृ. 32, 34–37।
- अवध के किसान: तालुकदारों और जमींदारों का भारी लगान, अन्य कर, बेगार और पट्टे की असुरक्षा उनकी समस्याएँ थीं। बाबा रामचंद्र के नेतृत्व में उन्होंने लगान घटाने, बेगार समाप्त करने और दमनकारी जमींदारों के सामाजिक बहिष्कार की माँग की। अवध किसान सभा और कांग्रेस ने किसान संघर्ष को व्यापक आंदोलन से जोड़ने का प्रयास किया। स्वराज से किसानों को अपनी कठिनाइयाँ दूर होने की आशा थी। आंदोलन के विस्तार पर कुछ स्थानों में मकानों पर हमले, लूट और अनाज पर कब्जे भी हुए, जिनसे कांग्रेस नेतृत्व असहमत था। गांधीजी के नाम पर भूमि बाँटने की बातें स्थानीय प्रचार थीं। पाठाधार: पृ. 35।
- गूडेम पहाड़ियों के आदिवासी: जंगलों में प्रवेश, चराई तथा लकड़ी और फल जुटाने पर रोक से उनकी आजीविका और परंपरागत अधिकार प्रभावित हुए। सड़क निर्माण के लिए बेगार ने असंतोष बढ़ाया। अल्लूरी सीताराम राजू के नेतृत्व में उन्होंने विद्रोह किया। राजू गांधीजी से प्रेरित थे और खादी पहनने तथा शराब छोड़ने को कहते थे; साथ ही वे स्वतंत्रता के लिए बल प्रयोग को आवश्यक मानते थे। विद्रोहियों ने पुलिस थानों पर हमले और गुरिल्ला संघर्ष किया। उनकी आशा अधिकारों और आजीविका की रक्षा थी, पर उनका तरीका कांग्रेस की अहिंसक नीति से अलग था। पाठाधार: पृ. 35–36।
- असम के बागान मजदूर: 1859 के इनलैंड इमिग्रेशन एक्ट के कारण मजदूर बिना अनुमति बागान नहीं छोड़ सकते थे। उनके लिए स्वराज का अर्थ बाहर आने-जाने की स्वतंत्रता और अपने गाँव से संपर्क था। असहयोग की खबर पाकर हजारों मजदूर बागान छोड़कर घर की ओर चल पड़े। उन्हें विश्वास था कि गांधी राज आएगा और गाँव में जमीन मिलेगी। यह मजदूरों की आशा थी। रेलवे और स्टीमर की हड़ताल से वे रास्ते में फँस गए; पुलिस ने उन्हें पकड़कर पीटा। पाठाधार: पृ. 36–37।
2. नमक यात्रा उपनिवेशवाद के विरुद्ध प्रतिरोध का प्रभावशाली प्रतीक क्यों बनी?
नमक अमीर और गरीब, सभी की रोजमर्रा की आवश्यकता था। इसलिए नमक कर और उत्पादन पर सरकारी एकाधिकार के विरोध में लोगों को जोड़ने की क्षमता थी। गांधीजी ने नमक कर समाप्त करने की माँग को औपनिवेशिक शासन के अन्याय से जोड़ा। उन्होंने साबरमती आश्रम से 78 साथियों के साथ यात्रा शुरू की और 24 दिनों की यात्रा के दौरान सभाओं में स्वराज तथा शांतिपूर्ण अवज्ञा समझाई। 6 अप्रैल 1930 को दांडी में नमक बनाकर कानून तोड़ा गया। इसके बाद विभिन्न भागों में लोगों ने नमक कानून तोड़ा और सरकारी नमक कारखानों के सामने प्रदर्शन किए। दैनिक जरूरत के एक सरल मुद्दे ने औपनिवेशिक सत्ता को चुनौती देने का व्यापक सार्वजनिक माध्यम दिया। पाठाधार: पृ. 39–40, मुख्य पाठ और चित्र 7।
3. सविनय अवज्ञा आंदोलन में भाग लेने वाली महिला का अनुभव।
कल्पना पर आधारित नमूना उत्तर: नीचे की ‘मैं’ किसी पहचानी गई ऐतिहासिक महिला की गवाही नहीं है। गतिविधियों और सामाजिक सीमाओं का आधार पाठ्यपुस्तक है।
आंदोलन में भाग लेकर मैं घर से बाहर सार्वजनिक जीवन में आई। मैंने जुलूस में हिस्सा लिया, नमक बनाया और विदेशी कपड़ों तथा शराब की दुकानों की पिकेटिंग की। मेरे लिए राष्ट्र की सेवा एक महत्त्वपूर्ण दायित्व बन गई। दूसरी महिलाओं के साथ काम करने से मुझे अपने योगदान का अर्थ समझ में आया। अनेक महिलाओं के जेल जाने ने भी दिखाया कि इस संघर्ष में जोखिम और साहस दोनों थे। फिर भी सार्वजनिक भागीदारी बढ़ने से हमारी सामाजिक स्थिति पूरी तरह नहीं बदली। घरेलू जिम्मेदारियों को हमारा मुख्य कर्तव्य समझा जाता था और कांग्रेस हमें महत्त्वपूर्ण संगठनात्मक पद देने में हिचकती थी। यह अनुभव मेरे लिए सार्वजनिक अवसर का विस्तार था, जिसके साथ पुरानी सीमाएँ भी बनी हुई थीं। पाठाधार: पृ. 42–43; अनुभव का निजी स्वर और भावार्थ स्वनिर्मित हैं।
4. राजनीतिक नेता पृथक निर्वाचिका के प्रश्न पर क्यों बँटे थे?
नेताओं में मतभेद था कि वंचित समूहों और अल्पसंख्यकों का प्रतिनिधित्व किस प्रकार सुरक्षित हो तथा सामाजिक एकता कैसे बने। दलित नेताओं के एक बड़े हिस्से को लगता था कि राजनीतिक सशक्तीकरण से सामाजिक भेदभाव दूर किया जा सकता है। डॉ. आंबेडकर दलितों के लिए पृथक निर्वाचन क्षेत्र चाहते थे। गांधीजी को आशंका थी कि ऐसी व्यवस्था समाज में उनके एकीकरण को धीमा करेगी। दूसरे गोलमेज सम्मेलन में इसी विषय पर दोनों में विवाद हुआ। ब्रिटिश सरकार द्वारा माँग मान लेने पर गांधीजी ने आमरण अनशन किया। सितंबर 1932 के पूना पैक्ट से दमित वर्गों को प्रांतीय और केंद्रीय विधायी परिषदों Preview truncated for large file
No comments:
Post a Comment