भारत की सांस्कृतिक जड़ें
NCERT पाठ्यपुस्तक | पुनर्मुद्रण 2026-27
| विषय | सामाजिक विज्ञान |
| कक्षा | 6 |
| अध्याय | 7 |
| शीर्षक | भारत की सांस्कृतिक जड़ें |
| पुस्तक | समाज का अध्ययन: भारत और उसके आगे |
| NCERT PDF | fhes107.pdf ↗ |
| पुनर्मुद्रण | 2026-27 |
| उद्धरण | सुभाषित (नीतिशतक) |
| महत्वपूर्ण प्रश्न | वेद क्या हैं? बौद्ध/जैन मत के सिद्धांत? जनजातीय योगदान? |
1. अध्याय परिचय – भारतीय संस्कृति का वृक्ष
भारतीय संस्कृति अनेक सहस्त्राब्दियों वर्ष पुरानी है। किसी प्राचीन वृक्ष के समान इसमें अनेक जड़ें और अनेक शाखाएँ हैं। जड़ें एक सामान्य तने को पोषण देती हैं। इस तने से अनेक शाखाएँ निकलती हैं, जो भारतीय संस्कृति के विभिन्न पहलुओं को दर्शाती हैं।
दर्शन से तात्पर्य उन विचारकों के समूह या आध्यात्मिक साधकों से है जो मानव जीवन, विश्व आदि के बारे में समान विचार रखते हैं।
त्वरित पुनरावृत्ति
- भारतीय संस्कृति एक एकरंगी परंपरा नहीं, बल्कि अनेक धाराओं का संगम है।
- इस अध्याय में मुख्यतः वैदिक, उपनिषदिक, बौद्ध, जैन और जनजातीय परंपराओं पर ध्यान है।
- परीक्षा में अक्सर पूछा जाता है — वेद, उपनिषद, बुद्ध, महावीर, अनेकांतवाद, अपरिग्रह, जनजातीय योगदान।
2. वेद और वैदिक संस्कृति
(क) वेद क्या हैं?
- 'वेद' शब्द 'विद्' से आया है जिसका अर्थ है 'ज्ञान' (उदाहरण: विद्या)।
- वेद भारत के सबसे प्राचीन ग्रंथ हैं और वस्तुतः विश्व के सबसे प्राचीन ग्रंथों में से एक हैं।
- वेदों में हजारों ऋचाएँ (कविताओं और गीतों के रूप में प्रार्थनाएँ) हैं।
- ये लिखित रूप में नहीं थीं, इनका मौखिक पाठ किया जाता था।
- ये ऋचाएँ सप्तसिंधु क्षेत्र (अध्याय 5) में रची गईं।
- ऋग्वेद की रचना पाँचवीं से दूसरी सहस्त्राब्दी सा.सं.पू. के बीच मानी जाती है।
- यह ग्रंथ 100 से 200 पीढ़ियों तक गहन प्रशिक्षण के माध्यम से मौखिक रूप से आगे संप्रेषित किए गए।
चार वेद:
| वेद | विशेषता |
|---|---|
| ऋग्वेद | सर्वप्रथम व प्राचीनतम वेद; सप्तसिंधु क्षेत्र का वर्णन; देवी-देवताओं की स्तुति |
| यजुर्वेद | यज्ञ विधि-विधान से संबंधित मंत्र |
| सामवेद | गाए जाने वाले मंत्रों का संग्रह |
| अथर्ववेद | चिकित्सा, लोकजीवन, प्रार्थना और दार्शनिक संकेतों से संबंधित मंत्र |
UNESCO का पूरा नाम – संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संगठन।
अर्थात – परम सत्य एक ही है, किंतु मनीषी इसे अनेक नाम देते हैं।
यह ऋग्वेद की एक प्रसिद्ध ऋचा है जो ब्रह्मांड की शक्तियों की एकता की मान्यता प्रकट करती है।
यह संदेश केवल धार्मिक नहीं, बल्कि सामाजिक एकता, संवाद और सामूहिक जीवन का भी संदेश है।
(ख) वैदिक समाज
- प्रारंभिक वैदिक समाज विभिन्न जनों (लोगों का बड़ा समूह) में संगठित था।
- ऋग्वेद में ही ऐसे 30 से अधिक जनों की सूची है – जैसे भरत, पुरु, कुरु, यदु, तुर्वश आदि।
- शासन में राजा, सभा और समिति का उल्लेख। सभा व समिति सामूहिकता को इंगित करते हैं।
- वैदिक ग्रंथों में व्यवसायों का उल्लेख – किसान, बुनकर, कुम्हार, शिल्पकार, बढ़ई, आरोग्यकर्ता, नर्तक-नर्तकी, नाई, पुजारी आदि।
(ग) वैदिक दर्शन और उपनिषद
वैदिक संस्कृति में अनेक अनुष्ठान (यज्ञ आदि) विकसित हुए। दैनिक अनुष्ठान अग्नि देव को आहुति और प्रार्थना के रूप में होते थे।
- उपनिषद् – वैदिक संकल्पनाओं के आधार पर रचित हैं। इनमें पुनर्जन्म (बार-बार जन्म लेना) और कर्म (हमारे कर्म और कर्म-फल) जैसी नई संकल्पनाएँ प्राप्त होती हैं।
- वेदांत दर्शन के अनुसार – सब कुछ (मानव जीवन, प्रकृति और ब्रह्मांड) एक दैवी तत्त्व है जिसे 'ब्रह्म' कहते हैं।
- दो प्रसिद्ध मंत्र –
अहम् ब्रह्मास्मि = "मैं ब्रह्म हूँ" (मैं दिव्य हूँ)
तत् त्वम् असि = "वह ब्रह्म आप ही हैं" - आत्मन् (आत्मा) – उपनिषदों में इसे प्रत्येक जीव में निवास करने वाला बताया है जो ब्रह्म का ही स्वरूप है।
- महत्वपूर्ण प्रार्थना – "सर्वे भवन्तु सुखिनः" = "सभी जीव सुखी रहें" – सबके लिए रोग व दुःख से मुक्ति की कामना।
- योग – वेदों से विकसित दर्शन जिसने ब्रह्म का आत्म-बोध प्राप्त करने के लिए अनेक विधियाँ विकसित कीं।
- इन सभी दर्शनों को मिलाकर आज हम 'हिंदू दर्शन' या 'भारतीय दार्शनिक परंपरा' के व्यापक संदर्भ में समझते हैं।
3. उपनिषद की प्रमुख कथाएँ
ऋषि उद्दालक आरुणि ने अपने पुत्र श्वेतकेतु को वेदों के अध्ययन के लिए गुरुकुल भेजा। 12 वर्ष बाद श्वेतकेतु वापस आया तो वह अहंकारी हो गया था। पिता ने ब्रह्म के स्वरूप पर प्रश्न पूछे जिनका उत्तर श्वेतकेतु नहीं दे सका।
उद्दालक ने समझाया – "जैसे बरगद के फल का बीज खोलने पर रिक्त दिखाई देता है, किंतु इसमें बरगद का भावी रूप निहित होता है... उसी प्रकार हमारे चारों ओर जो कुछ है, एक ही तत्त्व — ब्रह्म से उसका उद्भव हुआ है।" और कहा – "सभी में यही सूक्ष्म तत्त्व व्याप्त है... तुम वही हो, श्वेतकेतु।"
एक बार एक व्यक्ति यज्ञ के समय सारी संपत्ति दान दे रहे थे। उनके पुत्र नचिकेता ने बार-बार पूछा – "आप मुझे किस देवता को अर्पित करेंगे?" क्रोधित पिता ने कहा – "मैं तुम्हें यम (मृत्यु के देवता) को अर्पित करता हूँ।"
नचिकेता यमलोक पहुँचे। यम ने पहले उत्तर टालने का प्रयास किया किंतु नचिकेता के निरंतर आग्रह पर यम देव ने उन्हें आत्मा के बारे में समझाया – "इसका न तो जन्म होता है और न ही मृत्यु; यह अमर है।" इस ज्ञान के बाद नचिकेता अपने पिता के पास वापस आए।
विद्वान राजा जनक ने दार्शनिक शास्त्रार्थ के विजेता को पुरस्कार देने की घोषणा की। सुप्रसिद्ध ऋषि याज्ञवल्क्य अनेक विद्वानों को पराजित करते रहे। तब गार्गी (एक ऋषिका) ने उनसे विश्व के स्वरूप पर अनेक प्रश्न पूछे और अंत में ब्रह्म के स्वरूप पर भी प्रश्न पूछे। याज्ञवल्क्य ने समझाया कि कैसे ब्रह्म ही संसार, ऋतुओं, नदियों तथा अन्य सभी चीजों का निर्माण करता है।
4. बौद्ध मत – सिद्धार्थ गौतम
चित्र: सिद्धार्थ गौतम से बुद्ध बनने की यात्रा
- जन्म – लुंबिनी (वर्तमान नेपाल में), लगभग 560 सा.सं.पू.
- 29 वर्ष की आयु में राजमहल छोड़कर नगर में पहली बार वृद्ध, रोगी, शव और प्रसन्न सन्यासी देखे।
- इसके बाद सिद्धार्थ ने पत्नी, पुत्र और राजसी जीवन त्याग दिया।
- बोधगया (बिहार) में एक पीपल वृक्ष के नीचे कई दिनों तक ध्यानरत रहने के बाद ज्ञान प्राप्त हुआ।
- बुद्ध = 'ज्ञानी' या 'जागृत' व्यक्ति।
- मानवीय कष्ट के कारण – अविद्या (अज्ञान) और मोह।
- बुद्ध के उपदेश – अहिंसा (चोट न पहुँचाना) और आंतरिक अनुशासन।
- संघ की स्थापना – भिक्षुओं (आगे चलकर भिक्षुणियों) का समुदाय।
- जातक कथाएँ – बुद्ध के पूर्व जन्मों की कहानियाँ जो बौद्ध आदर्शों को व्यक्त करती हैं।
"युद्ध के मैदान में हजारों व्यक्तियों पर हजारों बार विजय पाने की तुलना में स्वयं पर विजय पाना अधिक बड़ी उपलब्धि है।"
एक बार बुद्ध वानरों के राजा थे। एक फल नदी में गिरा जो बहकर राजा के महल में पहुँचा। राजा ने सैनिकों को उस फल का वृक्ष खोजने को कहा। सैनिकों ने वानरों पर हमला किया। वानर-राज ने अपने वानरों को बचाने के लिए स्वयं के शरीर को पुल बना दिया और उन्हें नदी पार करवाया। इस प्रक्रिया में वानर-राज घायल होकर मर गए।
राजा ने यह दृश्य देखा और इस नि:स्वार्थ बलिदान से बहुत प्रभावित हुआ।
5. जैन मत – महावीर वर्धमान
- जैन मत को बौद्ध मत से भी अधिक प्राचीन माना जाता है।
- राजकुमार वर्धमान का जन्म – छठी शताब्दी सा.सं.पू. के आरंभ में वैशाली (वर्तमान बिहार) नगर के समीप।
- 30 वर्ष की आयु में घर त्यागा और आध्यात्मिक ज्ञान की खोज का निर्णय लिया।
- 12 वर्ष के संन्यासी जीवन के बाद उन्हें 'अनंत' ज्ञान या सर्वोपरि विवेक प्राप्त हुआ।
- वे 'महावीर' या 'महानायक' के नाम से जाने गए।
जैन मत के तीन प्रमुख उपदेश
| उपदेश | अर्थ एवं व्याख्या |
|---|---|
| 1. अहिंसा | सभी सांस लेने वाले, उपस्थित, जीवित, संवेदनशील जीवों को मारा न जाए, न उनके साथ हिंसा की जाए, न दुर्व्यवहार किया जाए, न सताया जाए। |
| 2. अनेकांतवाद | 'केवल एक' पक्ष या दृष्टिकोण नहीं। सत्य के अनेक पक्ष हैं और इसे केवल एक कथन द्वारा पूरी तरह समझा नहीं जा सकता। |
| 3. अपरिग्रह | 'असंग्रह'। पार्थिव वस्तुओं से दूर रहना और जीवन में केवल अनिवार्य वस्तुओं तक सीमित रहने की सलाह। |
रोहिनेय एक बहुत कुशल चोर था। एक बार नगर जाते हुए उसने अकस्मात महावीर के उपदेश के कुछ वाक्य सुने। नगर में पहचाने जाने पर उसने स्वयं को साधारण कृषक बताया। एक मंत्री की चतुर योजना को महावीर के शब्द याद करते हुए वह समझ गया और बच निकला।
बाद में रोहिनेय को पश्चाताप हुआ। वह महावीर के पास गया, अपराध स्वीकार किया, चुराया हुआ धन वापस किया और क्षमा माँगी। वह भिक्षु बन गया।
6. वैदिक, बौद्ध और जैन – तुलनात्मक अध्ययन
- वेदों को प्राधिकार
- ब्रह्म – सर्वव्यापी दैवी तत्त्व
- आत्मन् – प्रत्येक जीव में
- पुनर्जन्म और कर्म
- अनुष्ठान (यज्ञ)
- योग – आत्म-बोध का मार्ग
- वेदों की प्रभुता स्वीकार नहीं
- अहिंसा – सबसे महत्वपूर्ण
- अविद्या और मोह – कष्ट के कारण
- संघ – भिक्षु समुदाय
- आंतरिक अनुशासन
- स्वयं पर विजय
- वेदों की प्रभुता स्वीकार नहीं
- अहिंसा – सर्वोपरि
- अनेकांतवाद – सत्य के अनेक पक्ष
- अपरिग्रह – असंग्रह
- जीवों की आपसी निर्भरता
- 'जिन' – विजेता (अविद्या पर)
7. लोक और जनजातीय जड़ें
जनजाति क्या है?
- एक सामान्य उत्पत्ति, संस्कृति और भाषा साझा करते हैं
- आपस में निकट संबंध बनाए रखते हुए समुदाय में रहते हैं
- जिसके एक मुखिया होते हैं
- उनके पास अपनी कोई निजी संपत्ति नहीं होती
- वर्ष 2011 के आँकड़ों के अनुसार भारत में 705 जनजातियाँ
- कुल जनसंख्या लगभग 104 मिलियन – यह ऑस्ट्रेलिया और यूनाइटेड किंगडम की कुल जनसंख्या से अधिक है।
- प्राचीन भारत में 'जनजाति' के लिए कोई अलग शब्द नहीं था – ये केवल अलग-अलग जन थीं जो वन या पहाड़ में रहती थीं।
लोक एवं जनजातीय परंपराओं का योगदान
- लोक और जनजातीय परंपराओं तथा प्रमुख विचारधाराओं के बीच निरंतर संपर्क होता रहा – दोनों दिशाओं में देवताओं, संकल्पनाओं, दंतकथाओं और रीतियों का आदान-प्रदान।
- पुरी (ओडिशा) के भगवान जगन्नाथ मूल रूप से जनजाति देवता थे।
- कुछ जनजातियों में हिंदू देवों को काफी समय पहले ही अपना लिया गया था और महाभारत व रामायण के उनके अपने रूप हैं।
- तीनों (लोक, जनजाति, हिंदू दर्शन) में प्राकृतिक तत्त्वों (पर्वत, नदियाँ, पेड़, पौधे, जंतु और पत्थर) को पवित्र माना गया क्योंकि इनमें चेतना है।
- तमिलनाडु की टोडा जनजाति – नीलगिरि पर्वत के 30 से अधिक शिखर देवी-देवताओं के निवास स्थान माने जाते हैं।
- अरुणाचल प्रदेश की जनजातियाँ – डोनीपोलो (सूर्य और चंद्रमा के मिले-जुले रूप) की पूजा, जिन्हें आगे परमात्मा माना गया।
- मुंडा और संथाल जनजातियाँ – सिंगबोंगा की पूजा (परमेश्वर जिन्होंने संपूर्ण विश्व बनाया)।
8. भारत की सांस्कृतिक समयरेखा
चित्र: भारत की सांस्कृतिक समयरेखा – NCERT अध्याय 7 पर आधारित
9. अध्याय सारांश
- भारतीय संस्कृति प्राचीन वृक्ष के समान है – अनेक जड़ें, एक तना, अनेक शाखाएँ।
- चार वेद – ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद; ये विश्व के प्राचीनतम ग्रंथों में से एक हैं।
- वेद मौखिक परंपरा से आगे बढ़े; UNESCO 2008 ने इसे विरासत माना।
- ऋग्वेद की प्रसिद्ध ऋचा – "एकं सत् विप्रा बहुधा वदन्ति" – परम सत्य एक है।
- उपनिषद् – पुनर्जन्म, कर्म, ब्रह्म, आत्मन् की संकल्पना; कथाएँ – श्वेतकेतु, नचिकेता, गार्गी।
- वेदांत – सब ब्रह्म है; "अहम् ब्रह्मास्मि" और "तत् त्वम् असि"।
- बौद्ध मत – सिद्धार्थ गौतम, जन्म ~560 सा.सं.पू., बोधगया में ज्ञान, अहिंसा, संघ की स्थापना।
- जैन मत – महावीर वर्धमान, छठी शताब्दी सा.सं.पू., अहिंसा + अनेकांतवाद + अपरिग्रह।
- 2011 में भारत में 705 जनजातियाँ – 104 मिलियन जनसंख्या।
- जगन्नाथ (पुरी) मूलतः जनजाति देवता; लोक, जनजाति व भारतीय दार्शनिक परंपराओं का परस्पर आदान-प्रदान।
10. सही या गलत – उत्तर
| कथन | सही/गलत | कारण |
|---|---|---|
| 1. वैदिक ऋचाओं को ताड़-पत्र की पांडुलिपियों पर लिखा गया है। | ❌ गलत | वेद लिखित रूप में नहीं थे; इनका मौखिक पाठ किया जाता था और पीढ़ी-दर-पीढ़ी स्मृतिबद्ध किए गए। |
| 2. वेद भारत के सबसे प्राचीन ग्रंथ हैं। | ✅ सही | वेद भारत के सबसे प्राचीन ग्रंथ हैं और विश्व के सबसे प्राचीन ग्रंथों में से एक हैं। |
| 3. वैदिक कथन "एकम् सत् विप्रा बहुधा वदन्ति" में ब्रह्मांड की शक्तियों की एकता की मान्यता प्रकट होती है। | ✅ सही | इस ऋचा का अर्थ है – परम सत्य एक है, मनीषी इसे अनेक नाम देते हैं। यह ब्रह्मांड की शक्तियों की एकता दर्शाता है। |
| 4. बौद्ध मत वेदों से अधिक पुराना है। | ❌ गलत | वेद अत्यंत प्राचीन हैं जबकि बौद्ध मत का आरंभ लगभग 6ठी शताब्दी सा.सं.पू. में माना जाता है। |
| 5. जैन मत का उद्भव बौद्ध मत की एक शाखा के रूप में हुआ। | ❌ गलत | जैन मत स्वतंत्र परंपरा है और इसे बौद्ध मत की शाखा नहीं माना जाता। |
| 6. बौद्ध और जैन मत दोनों ही शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व तथा सभी जीवों को नुकसान न पहुँचाने का समर्थन करते हैं। | ✅ सही | दोनों मतों में अहिंसा सर्वोच्च मूल्य है – किसी भी जीव को शारीरिक या मानसिक चोट न पहुँचाना। |
| 7. जनजातीय विश्वास परंपराएँ आत्मा और छोटे देवों तक सीमित हैं। | ❌ गलत | जनजातियों में भी उच्चतर देवत्व या परमात्मा की संकल्पना है (जैसे डोनीपोलो, सिंगबोंगा)। |
11. परीक्षा उपयोगी प्रश्नोत्तर
वेदों का संदेश – "एकं सत् विप्रा बहुधा वदन्ति" – परम सत्य एक है, मनीषी इसे अनेक नाम देते हैं। ऋग्वेद के अंतिम मंत्रों में लोगों के बीच एकता का आह्वान है।
(1) अविद्या और मोह – मानवीय कष्ट के मूल कारण।
(2) अहिंसा – किसी को चोट नहीं पहुँचाना।
(3) आंतरिक अनुशासन – स्वयं पर विजय।
(4) संघ – भिक्षुओं का समुदाय जो बुद्ध के उपदेशों का पालन व प्रसार करते हैं।
(5) जातक कथाएँ – बौद्ध आदर्शों को सरल तरीके से व्यक्त करती हैं।
(1) अहिंसा – सभी जीवों को हानि न पहुँचाना।
(2) अनेकांतवाद – सत्य के अनेक पक्ष होते हैं, किसी एक दृष्टिकोण से सत्य पूरा नहीं होता।
(3) अपरिग्रह – असंग्रह, केवल अनिवार्य वस्तुओं तक सीमित रहना।
'जैन' = 'जिन' (विजेता) – अविद्या और मोह पर विजेता।
• पुनर्जन्म (बार-बार जन्म लेना)
• कर्म (हमारे कर्म और उनका फल)
• ब्रह्म – सर्वव्यापी दैवी तत्त्व
• आत्मन् – प्रत्येक जीव में निवास करने वाली आत्मा
• सर्वे भवन्तु सुखिनः – सभी जीव सुखी रहें।
इनमें प्रसिद्ध कथाएँ हैं – श्वेतकेतु (छांदोग्य), नचिकेता (कठोपनिषद्), गार्गी (बृहदारण्यक)।
• देवताओं, संकल्पनाओं, दंतकथाओं का आपसी आदान-प्रदान।
• पुरी के जगन्नाथ मूलतः जनजाति देवता थे।
• प्राकृतिक तत्त्वों (पर्वत, नदी, पेड़) को पवित्र मानना – तीनों (लोक, जनजाति, हिंदू) में समान।
• डोनीपोलो, सिंगबोंगा जैसी उच्च देवत्व की संकल्पनाएँ।
आंद्रे बेते के अनुसार – जनजातीय और हिंदू दर्शन ने परस्पर एक-दूसरे को प्रभावित किया।
अहम् ब्रह्मास्मि = "मैं ब्रह्म हूँ"
तत् त्वम् असि = "वह ब्रह्म आप ही हैं"
इसमें यह भी बताया गया है कि इस दुनिया में सब कुछ आपस में जुड़ा हुआ और परस्पर निर्भर है।
अर्थ – बाह्य अनुष्ठान से अधिक महत्त्व आंतरिक शुद्धता, सत्यनिष्ठा और धर्माचरण का है।
12. अभ्यास प्रश्नों के उत्तर
प्रश्न 2: बौद्ध मत के कुछ केंद्रीय विचारों पर संक्षिप्त टिप्पणी
बौद्ध मत के केंद्रीय विचार – (1) अहिंसा – किसी को शारीरिक या मानसिक चोट न पहुँचाना। (2) मानवीय कष्ट के कारण अविद्या और मोह हैं। (3) आंतरिक अनुशासन – स्वयं पर विजय पाना। (4) बुद्ध ने संघ की स्थापना की जिसमें भिक्षु-भिक्षुणियाँ शामिल थीं। (5) जातक कथाएँ – बौद्ध आदर्शों को सरल तरीके से व्यक्त करती हैं।
प्रश्न 4: जैन मत के मुख्य विचारों पर संक्षिप्त टिप्पणी
जैन मत के मुख्य विचार – (1) अहिंसा – सभी संवेदनशील जीवों के प्रति। (2) अनेकांतवाद – सत्य के अनेक पक्ष होते हैं, एक दृष्टिकोण से सत्य पूरा नहीं होता। (3) अपरिग्रह – केवल अनिवार्य वस्तुओं तक सीमित रहना। (4) सभी जीवों की आपसी संबद्धता और निर्भरता पर बल। 'जैन' शब्द 'जिन' (विजेता) से – अविद्या व मोह पर विजय।
प्रश्न 1: यदि आप नचिकेता होते तो यम से कौन-से प्रश्न पूछते?
(विद्यार्थी अपने विचार लिखें। नीचे कुछ सुझाव –)
मैं यम से पूछता/पूछती – (1) आत्मा की मृत्यु के बाद की यात्रा कैसी होती है? (2) क्या हर जीव में एक ही आत्मा है या अलग-अलग? (3) कर्म और पुनर्जन्म के चक्र से मुक्ति कैसे मिलती है? (4) क्या ज्ञान प्राप्त करने के बाद पुनर्जन्म नहीं होता?


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