विविधता में एकता या ‘एक में अनेक’
NCERT पाठ्यपुस्तक | पुनर्मुद्रण 2026-27
| विषय | सामाजिक विज्ञान |
| कक्षा | 6 |
| अध्याय | 8 |
| शीर्षक | विविधता में एकता या ‘एक में अनेक’ |
| पुस्तक | समाज का अध्ययन: भारत और उसके आगे |
| NCERT PDF | fhes108.pdf ↗ |
| पुनर्मुद्रण | 2026-27 |
| उद्धरण | रवींद्रनाथ टैगोर, श्री अरविंद |
| मुख्य अवधारणा | विविधता में एकता |
- अध्याय परिचय – उद्धरण व भारत की विविधता
- समृद्ध विविधता – भारत के आँकड़े
- भोजन में विविधता और एकता
- वस्त्र एवं परिधान – साड़ी का उदाहरण
- त्योहारों की विविधता
- महाकाव्य का विस्तार – साहित्य
- पंचतंत्र
- रामायण और महाभारत
- SVG: मकर संक्रांति – भारत में विभिन्न नाम
- अध्याय सारांश
- परीक्षा प्रश्नोत्तर
- अभ्यास प्रश्नों के उत्तर
1. अध्याय परिचय – उद्धरण
भारत की सबसे बड़ी विशेषताओं में से एक है — विविधता के भीतर एक गहरी एकता। इस विशाल देश में भाषा, भोजन, वस्त्र, त्योहार, लोकपरंपराएँ, जीवनशैली, कला, संगीत और साहित्य में असाधारण विविधता मिलती है। फिर भी, इन सबको जोड़ने वाला एक सांस्कृतिक सूत्र मौजूद है। इसी कारण भारत को समझने के लिए केवल भिन्नताओं को देखना पर्याप्त नहीं है; उन भिन्नताओं के भीतर छिपी एकता को समझना अधिक महत्त्वपूर्ण है।
यह अध्याय हमें दिखाता है कि भारत में अनेक रूप होने पर भी एक मूल भाव है। एक ही त्योहार कई नामों से मनाया जा सकता है, एक ही परिधान अनेक रूपों में दिखाई दे सकता है, एक ही साहित्यिक परंपरा कई भाषाओं में अलग-अलग रूप लेकर फैल सकती है, और फिर भी उसका सांस्कृतिक हृदय एक ही रहता है। यही ‘एक में अनेक’ का अर्थ है।
2. समृद्ध विविधता
यदि कोई विद्यार्थी भारत के एक सिरे से दूसरे सिरे तक यात्रा करे, तो उसे कुछ ही दिनों में यह अनुभव हो जाएगा कि भारत केवल भौगोलिक रूप से विशाल नहीं है, बल्कि मानवीय अनुभवों की दृष्टि से भी अत्यंत व्यापक है। कहीं गेहूँ का भोजन प्रधान है तो कहीं चावल का, कहीं ऊनी वस्त्र अधिक उपयोग में आते हैं तो कहीं सूती, कहीं लोकगीतों की परंपरा प्रमुख है तो कहीं शास्त्रीय संगीत की।
- भारत की जनसंख्या 1.4 अरब से अधिक है।
- यह विश्व की कुल जनसंख्या का लगभग 18 प्रतिशत भाग है।
- भारतीय मानव विज्ञान सर्वेक्षण की ‘भारत के लोग’ परियोजना में 4,635 समुदायों का सर्वेक्षण किया गया।
- इस अध्ययन में 25 लिपियों का उपयोग करने वाली 325 भाषाओं का उल्लेख हुआ।
इतनी विशाल विविधता देखकर पहली दृष्टि में लग सकता है कि भारत को एक इकाई के रूप में समझना कठिन होगा। यही आश्चर्य ब्रिटिश इतिहासकार विंसेंट स्मिथ को भी हुआ। किंतु उन्होंने अंततः यही माना कि भारत की विशेषता उसकी ‘विविधता में एकता’ है।
भाषा • भोजन • वस्त्र • त्योहार • लोककथाएँ • साहित्य • संगीत • नृत्य • धार्मिक परंपराएँ • क्षेत्रीय रीति-रिवाज • शिल्प और हस्तकला
3. भोजन में विविधता और एकता
भारत के भोजन को देखें तो यह स्पष्ट हो जाता है कि एक ही देश के भीतर हजारों प्रकार के व्यंजन पाए जाते हैं। उत्तर भारत की रोटी-दाल परंपरा, दक्षिण भारत का चावल-आधारित भोजन, पश्चिम भारत के सूखे और तिक्त-मीठे स्वाद, पूर्व भारत के चावल और मछली प्रधान भोजन, तथा पूर्वोत्तर के विशिष्ट स्थानीय व्यंजन — सब मिलकर भारत की पाक-परंपरा को समृद्ध बनाते हैं।
- मुख्य अनाज – चावल, जौ, गेहूँ, बाजरा, ज्वार, रागी
- दालें – अरहर, मसूर, मूंग, चना, लोबिया, राजमा आदि
- मसाले – हल्दी, जीरा, इलायची, अदरक
- सामान्य तेल, सब्जियाँ और कुछ मुख्य स्वाद-तत्त्व पूरे देश में पाए जाते हैं।
यहाँ एकता सामग्री में है और विविधता उनके प्रयोग में। चावल पूरे भारत में मिलता है, लेकिन उससे इडली, डोसा, पोंगल, खिचड़ी, पुलाव, खीर, पोहा, फर्मेंटेड व्यंजन और अनेक स्थानीय पकवान बनाए जाते हैं। इसी प्रकार दालें हर क्षेत्र में उपयोग होती हैं, लेकिन उनका स्वाद, मसाला, पकाने की पद्धति और परोसने का तरीका बदल जाता है।
| क्षेत्र | चावल/अनाज | दालें/अन्य खाद्य आधार | विविधता का संकेत |
|---|---|---|---|
| उत्तर भारत | गेहूँ, बासमती, बाजरा | राजमा, मसूर, चना | रोटी, पराठा, खिचड़ी, दाल-चावल |
| दक्षिण भारत | पोन्नी, सोना मसूरी, रागी | अरहर, उड़द, नारियल आधारित संयोजन | इडली, डोसा, सांभर, पोंगल |
| पश्चिम भारत | ज्वार, बाजरा, गेहूँ | मूंग, चना, लोबिया | थाली, ढोकला, खिचू, दाल-आधारित व्यंजन |
| पूर्व भारत | चावल | अरहर, मटर, स्थानीय सब्जियाँ | भात, खिचड़ी, पात-आधारित भोजन |
| पूर्वोत्तर/मध्य क्षेत्र | चावल, मक्का | राजमा, चना, स्थानीय दालें | स्थानीय स्वाद, किण्वित भोजन, क्षेत्रीय विधियाँ |
4. वस्त्र एवं परिधान – साड़ी का उदाहरण
भारत के वस्त्रों में भी यही सिद्धांत दिखाई देता है। विभिन्न क्षेत्रों की अपनी विशिष्ट वेशभूषा है, फिर भी कुछ परिधान पूरे भारत में अलग-अलग रूपों में मिलते हैं। इनमें साड़ी सबसे प्रमुख उदाहरण है।
- साड़ी एक लंबा, बिना सिला परिधान है।
- यह मुख्यतः कपास या रेशम से बनाई जाती है; आजकल कृत्रिम रेशों का भी उपयोग होता है।
- साड़ी के सैकड़ों प्रकार हैं।
- भारत के विभिन्न क्षेत्रों में इसे पहनने की अलग-अलग शैलियाँ हैं।
- कुछ प्रसिद्ध रेशमी साड़ियाँ – बनारसी, कांजीवरम, पैठनी, पाटन पटोला, मूगा, मैसूर।
- कुछ शताब्दी सा.सं.पू. से साड़ी के प्रमाण मिलते हैं; वैशाली (बिहार) में पत्थर की एक आकृति में साड़ीधारी स्त्री दिखाई गई है।
यहाँ भी एकता साड़ी के मूल रूप में है, जबकि विविधता उसकी बुनाई, कपड़े, रंग, अलंकरण, क्षेत्रीय पहचान और पहनने की शैली में दिखाई देती है।
चित्र: साड़ी – विविधता में एकता का उत्कृष्ट उदाहरण
5. त्योहारों की विविधता
भारत के त्योहार केवल धार्मिक अवसर नहीं हैं; वे कृषि, ऋतु-परिवर्तन, सामाजिक एकता, लोकजीवन और सांस्कृतिक स्मृति से भी जुड़े होते हैं। कई बार एक ही समय पर पूरे भारत में मनाया जाने वाला पर्व, अलग-अलग क्षेत्रों में भिन्न नामों से जाना जाता है।
इस उदाहरण से स्पष्ट होता है कि भारत में त्योहारों की विविधता केवल नामों की विविधता नहीं है; यह क्षेत्रीय अभिव्यक्तियों की विविधता है। इसके भीतर जो एकता छिपी है, वह ऋतु, कृषि, सामूहिक उत्सव और सांस्कृतिक भाव की एकता है।
मकर संक्रांति – भारत में विभिन्न नाम
चित्र: मकर संक्रांति के विभिन्न नाम – एक ही पर्व के अनेक रूप
6. महाकाव्य का विस्तार – साहित्य
साहित्य विविधता में एकता का अत्यंत गहरा उदाहरण प्रस्तुत करता है। भारत के साहित्य में अनेक भाषाएँ, अनेक शैली-परंपराएँ और अनेक कथात्मक स्वरूप हैं; फिर भी उसमें एक साझा सांस्कृतिक आत्मा अनुभव की जा सकती है।
भारत का साहित्य केवल लिखित ग्रंथों तक सीमित नहीं है। इसमें लोककथाएँ, गाथाएँ, गीत, महाकाव्य, नीतिकथाएँ, धार्मिक आख्यान और मौखिक परंपराएँ भी शामिल हैं। यही कारण है कि किसी एक कथा का एक क्षेत्र में लिखा गया रूप दूसरे क्षेत्र में लोककथा बन सकता है, और तीसरे क्षेत्र में नृत्य-नाट्य के रूप में जीवित हो सकता है।
पंचतंत्र
- पंचतंत्र पशुओं को मुख्य पात्र बनाकर जीवन-कौशल और नीति सिखाने वाली मनोरंजक कथाओं का संग्रह है।
- इसका मूल संस्कृत पाठ लगभग 2,200 वर्ष पुराना है।
- इसका रूपांतरण लगभग हर भारतीय भाषा में हुआ है।
- यह भारत से बाहर दक्षिण-पूर्वी एशिया, अरब देशों और यूरोप तक पहुँचा।
- इसके 50 से अधिक भाषाओं में 200 से अधिक रूपांतरण मिलते हैं।
पंचतंत्र इस बात का अद्भुत उदाहरण है कि एक मूल कथा-संग्रह कैसे अलग-अलग भाषाओं, संस्कृतियों और युगों में नए रूप ग्रहण करता है। मूल एक है, रूप अनेक हैं। यही ‘एक में अनेक’ है।
रामायण और महाभारत
- भारत के दो सर्वाधिक प्रभावशाली महाकाव्य – रामायण और महाभारत।
- दोनों मूलतः संस्कृत के महाकाव्य हैं।
- इनका आकार बहुत विस्तृत है; संयुक्त रूप से इन्हें हजारों पृष्ठों में देखा जा सकता है।
- इनकी कथाएँ धर्म, नैतिक संघर्ष, कर्तव्य, युद्ध, परिवार और राज्य से जुड़ी हैं।
- दो सहस्त्राब्दियों से अधिक समय से इनके अनुवाद, रूपांतरण और लोकसंस्करण बनते रहे हैं।
- केवल तमिलनाडु में किए गए एक सर्वेक्षण में महाभारत के 100 से अधिक लोक-रूप पाए गए।
- भील, गोंड, मुंडा जैसे जनजातीय समुदायों के पास रामायण और महाभारत के अपने संस्करण हैं।
- पूर्वोत्तर भारत, हिमालय क्षेत्र और कश्मीर की अनेक जनजातियों में भी इनके स्थानीय रूप मिलते हैं।
- इन महाकाव्यों ने सदियों से भारत और एशिया के विभिन्न क्षेत्रों को एक सांस्कृतिक सूत्र में बाँधने का कार्य किया है।
यहाँ साहित्य में विविधता केवल भाषाई नहीं है; यह अभिव्यक्ति की विविधता भी है। एक कथा कहीं लिखित ग्रंथ के रूप में है, कहीं नाट्यरूप में, कहीं लोकगीत में, कहीं कथा-वाचन में, तो कहीं चित्रकला और नृत्य-नाटक में।
| विविधता में एकता का पहलू | विविधता (अनेक) | एकता (एक) |
|---|---|---|
| भोजन | हजारों व्यंजन, क्षेत्रीय पकवान | मूल सामग्री – चावल, गेहूँ, दालें, मसाले |
| वस्त्र (साड़ी) | सैकड़ों प्रकार, रंग, बुनाई, पहनने की शैली | एक मूल परिधान – साड़ी |
| त्योहार | अनेक नाम, अनेक क्षेत्रीय रूप | एक साझा समय/भाव/उद्देश्य |
| पंचतंत्र | 200+ रूपांतरण, 50+ भाषाएँ | एक मूल संस्कृत कथासंग्रह |
| रामायण-महाभारत | अनगिनत लोक, क्षेत्रीय, जनजातीय संस्करण | दो मूल महाकाव्य |
| भाषाएँ | 325 भाषाएँ, 25 लिपियाँ | एक व्यापक भारतीय सांस्कृतिक अनुभव |
7. अध्याय सारांश
- भारत की विशेषता उसकी विविधता में एकता है।
- भारत में 1.4 अरब से अधिक लोग, 4,635 समुदाय, 325 भाषाएँ और 25 लिपियाँ पाई गईं।
- भोजन में हजारों व्यंजन हैं, परंतु मूल सामग्री कई बार समान होती है।
- साड़ी एक ही परिधान होते हुए भी सैकड़ों रूपों में दिखाई देती है।
- मकर संक्रांति एक पर्व है, पर देशभर में अलग-अलग नामों से मनाई जाती है।
- पंचतंत्र 2,200 वर्ष पुराना कथासंग्रह है, जिसके 200 से अधिक रूपांतरण मिलते हैं।
- रामायण और महाभारत के अनेक लोक, क्षेत्रीय और जनजातीय संस्करण हैं।
- भारतीय संस्कृति विविधता को विभाजन नहीं, बल्कि समृद्धि के रूप में देखती है।
8. परीक्षा उपयोगी प्रश्नोत्तर
9. अभ्यास प्रश्नों के उत्तर
प्रश्न 1: दोनों उद्धरणों का अर्थ समझाइए।
रवींद्रनाथ टैगोर का उद्धरण इस बात की ओर संकेत करता है कि भारत की शक्ति उसकी अनेकता के भीतर उपस्थित एकता में है। वे प्रार्थना करते हैं कि यह अनुभव कभी समाप्त न हो।
श्री अरविंद का उद्धरण बताता है कि विविधता में एकता भारत की स्वाभाविक प्रकृति है। भारत में अनेक रूप, अनेक समुदाय, अनेक परंपराएँ होते हुए भी एक सांस्कृतिक आधार विद्यमान है। यही भारत की स्थिरता और उसकी पहचान का आधार है।
प्रश्न 2: पंचतंत्र आज भी प्रासंगिक क्यों है?
पंचतंत्र की कथाएँ आज भी प्रासंगिक हैं क्योंकि वे मानवीय व्यवहार, मित्रता, शत्रुता, चतुराई, धोखा, सहयोग, संयम और बुद्धिमत्ता जैसी बातों को सरल ढंग से सिखाती हैं। इनमें पशुओं को पात्र बनाकर ऐसी स्थितियाँ प्रस्तुत की गई हैं जो आज के जीवन में भी उपयोगी हैं। इसलिए पंचतंत्र केवल प्राचीन साहित्य नहीं, बल्कि आज भी जीवन-निर्देशक नीति-साहित्य है।
प्रश्न 3: भोजन में विविधता और एकता कैसे दिखाई देती है?
भारत में भोजन के हजारों प्रकार हैं। उत्तर भारत, दक्षिण भारत, पश्चिम भारत, पूर्व भारत और पूर्वोत्तर के व्यंजन अलग-अलग हैं। परंतु चावल, गेहूँ, दालें, हल्दी, जीरा, अदरक जैसी सामग्रियाँ पूरे देश में उपयोग होती हैं। इस प्रकार सामग्री में एकता और व्यंजनों में विविधता दिखाई देती है।
प्रश्न 4: साड़ी विविधता में एकता का उदाहरण क्यों है?
साड़ी भारत के अनेक क्षेत्रों में पहना जाने वाला परिधान है। इसके प्रकार, कपड़े, रंग, बुनाई और पहनने के तरीके बदलते हैं। बनारसी, कांजीवरम, पैठनी, पाटन पटोला, मूगा जैसी साड़ियाँ अपनी-अपनी क्षेत्रीय विशेषता रखती हैं। फिर भी इन सबका मूल रूप एक ही परिधान — साड़ी — है। इसलिए यह विविधता में एकता का सुंदर उदाहरण है।
प्रश्न 5: नेहरू जी के कथन का महत्त्व क्या है?
नेहरू जी ने माना कि भारत में जहाँ भी जाएँ, वहाँ एक साझा सांस्कृतिक पृष्ठभूमि दिखाई देती है। रामायण और महाभारत जैसी कथाएँ पूरे भारत के जनजीवन में गहराई से बसी हुई थीं। इससे स्पष्ट होता है कि भारत की अनेक भाषाओं और समुदायों के बावजूद सांस्कृतिक स्मृति और नैतिक आदर्शों का एक व्यापक आधार मौजूद रहा है।


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