Marwari Mission 100
RBSE 12th Hindi: कुंवर नारायण (संपूर्ण अध्याय विश्लेषण)
Source: www.ncertclasses.com | Marwari Mission 100
पाठ-3: कुंवर नारायण (Kunwar Narayan) - महाकोश
कविता 1: कविता के बहाने | कविता 2: बात सीधी थी पर
"नयी कविता के प्रमुख हस्ताक्षर"
| जन्म | 19 सितंबर 1927 (फैजाबाद, यूपी) |
| काव्य संग्रह | चक्रव्यूह, इन दिनों, कोई दूसरा नहीं |
| पुरस्कार | ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी |
| विशेषता | बौद्धिक संवेदना, संयमित भाषा |
कविता 1: कविता के बहाने (The Excuse of Poetry)
स्रोत: 'इन दिनों' काव्य संग्रह
इस कविता में कवि ने यांत्रिकता (Technology) के दौर में कविता के अस्तित्व पर उठते सवालों का जवाब दिया है। कवि ने कविता की तुलना चिड़िया, फूल और बच्चे से की है।
1.1 तुलनात्मक विश्लेषण (The Master Matrix)
| चिड़िया (Bird) 🐦 | फूल (Flower) 🌺 | बच्चा (Child) 👶 |
|---|---|---|
| उड़ान: चिड़िया की उड़ान पंखों तक सीमित है। | खिलना: फूल का खिलना परिणति (मुरझाना) तक सीमित है। | खेल: बच्चे के खेल की कोई सीमा नहीं होती। |
| सीमा: यह एक घर से दूसरे घर तक ही उड़ सकती है। | अस्तित्व: इसकी सुगंध और जीवनकाल निश्चित (Limited) है। | असीमितता: बच्चे के सपने और कल्पना असीमित हैं। |
| कविता से संबंध: कविता की उड़ान चिड़िया से बड़ी है (अनंत)। | कविता से संबंध: कविता फूल की तरह मुरझाती नहीं, अनंत काल तक महकती है। | कविता से संबंध: कविता और बच्चे समान (Equal) हैं। दोनों बंधन मुक्त हैं। |
कविता की उड़ान भला चिड़िया क्या जाने...
कविता एक खिलना है फूलों के बहाने
कविता का खिलना भला फूल क्या जाने...
बिना मुरझाए महकने के माने
फूल क्या जाने?"
कवि कहते हैं कि चिड़िया आकाश में उड़ती जरूर है, लेकिन उसकी एक शारीरिक सीमा है। जबकि कविता कल्पना के पंख लगाकर देश, काल और समय की सीमाओं से परे उड़ सकती है। इसी प्रकार, फूल खिलता है और अंततः मुरझा जाता है, लेकिन कविता एक बार रची जाने के बाद सदियों तक पाठकों के दिलों में महकती रहती है (अमरता)।
निष्कर्ष: अंत में कवि स्वीकारते हैं कि "कविता एक खेल है बच्चों के बहाने"। जिस प्रकार बच्चे खेलते समय धर्म, जाति, अपने-पराये का भेद नहीं करते और सभी घरों को एक कर देते हैं, उसी प्रकार कविता भी शब्दों का खेल है जो पूरी मानवता को जोड़ती है।
कविता 2: बात सीधी थी पर (Complexity of Language)
स्रोत: 'कोई दूसरा नहीं' काव्य संग्रह
यह कविता आज के समय की सबसे बड़ी विडंबना पर चोट करती है—भाषा का दिखावा। अक्सर हम साधारण सी बात को प्रभावशाली बनाने के चक्कर में क्लिष्ट (Difficult) शब्दों का प्रयोग करते हैं और अर्थ का अनर्थ कर बैठते हैं।
2.1 'पेंच' का रूपक (The Screw Metaphor) - Engineering of Language
कवि ने भाषा को एक 'पेंच' (Screw) की तरह समझाया है। इसे तकनीकी रूप से समझें:
| 1. पेंच फँसना | जब हम जबरदस्ती कठिन शब्द ठूँसते हैं, तो बात उलझ जाती है (जैसे पेंच टेढ़ा हो गया हो)। |
| 2. बेतरह कसना | बात को सुधारने के लिए हम और अधिक कठिन शब्दों का प्रयोग करते हैं (जैसे पेंच को जबरदस्ती घुमाना)। |
| 3. चूड़ी मरना | (Most Imp): ज्यादा जोर लगाने से पेंच की चूड़ियाँ (Threads) घिस जाती हैं। इसी तरह, शब्दों के जाल में बात का 'मूल अर्थ' (Main Meaning) नष्ट हो जाता है। |
| 4. कील की तरह ठोकना | अंत में, थक्कर हम बात को वैसे ही छोड़ देते हैं। वह ऊपर से ठीक लगती है, पर अंदर से उसमें कसाव (Depth/Grip) नहीं होता। |
बात की चूड़ी मर गई
और वह भाषा में बेकार घूमने लगी...
कीलों की तरह उसी जगह ठोंक दिया।"
🎯 बोर्ड टॉपर्स कॉर्नर (Important Questions)
Ans: फूल खिलता है और कुछ समय बाद मुरझा जाता है, उसकी सुगंध समाप्त हो जाती है। लेकिन कविता शब्दों के रूप में अमर होती है। वह कालजयी होती है और बिना मुरझाए युगो-युगों तक पाठकों को आनंदित (महकती) करती रहती है।
Ans: कवि कहना चाहते हैं कि उन्होंने अपनी बात को प्रभावशाली बनाने के लिए क्लिष्ट (कठिन) और अलंकारिक भाषा का प्रयोग किया। इससे श्रोता मूल बात को समझने के बजाय शब्दों के जाल में उलझ गए और सरल बात भी जटिल (टेढ़ी) हो गई।
Ans: क्योंकि दोनों की रचनात्मक ऊर्जा असीम है। दोनों किसी भी बंधन (सीमा, घर, देश) को नहीं मानते। दोनों का उद्देश्य आनंद और सृजन है।
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