RBSE Class 12 Hindi Chapter 4: Camere Mein Band Apahij (Raghuvir Sahay) | Media's Cruelty Exposed

📅 Saturday, 10 January 2026 📖 3-5 min read
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पाठ-4: कैमरे में बंद अपाहिज (Camere Mein Band Apahij) - मीडिया क्रूरता का विश्लेषण

कवि: रघुवीर सहाय | संग्रह: लोग भूल गए हैं | व्यंग्य विधा

रघुवीर सहाय (1929-1990)
🎙️
"सड़क चौराहा और मीडिया के कवि"
पेशापत्रकार (दिनमान, प्रतीक)
काव्य संग्रहसीढ़ियों पर धूप में, लोग भूल गए हैं
कविता की शैलीनाटकीय (Dramatic Monologue)
पुरस्कारसाहित्य अकादमी

विषय प्रवेश: यह कविता मीडिया (दूरदर्शन) की कार्यप्रणाली पर एक करारा तमाचा है। यह बताती है कि कैसे टीवी चैनल "सामाजिक उद्देश्य" (Social Purpose) के नाम पर किसी की पीड़ा (Pain) को बेचकर अपना व्यापार (Business) चमकाते हैं। कविता में "करुणा के मुखौटे में छिपी क्रूरता" को उजागर किया गया है।


SCENE 1: स्टूडियो का अहंकार (The Arrogance of Power)

कविता एक टीवी स्टूडियो के दृश्य से शुरू होती है। संचालनकर्ता (Anchor) स्वयं को शक्तिशाली और अपाहिज व्यक्ति को 'दुर्बल' मानता है।

ANCHOR: "हम दूरदर्शन पर बोलेंगे
हम समर्थ शक्तिवान
हम एक दुर्बल को लाएंगे
एक बंद कमरे में..."
ANCHOR (To Victim): "तो आप क्या अपाहिज हैं?
तो आप क्यों अपाहिज हैं?
आपका अपाहिजपन तो दुख देता होगा?
देता है?"
(कैमरा मैन को इशारा: इसको ज़ूम करके दिखाओ)
🕵️ मनोवैज्ञानिक विश्लेषण (Psycho-Analysis):
  • 'हम' vs 'दुर्बल': एंकर बार-बार "हम" (शक्तिशाली मीडिया) और "दुर्बल" (विकलांग व्यक्ति) शब्दों का प्रयोग कर सत्ता का प्रदर्शन करता है।
  • बेतुके सवाल: "क्या आप अपाहिज हैं?" - यह सवाल ही अपमानजनक है। एंकर जानता है कि वह अपाहिज है, फिर भी वह उसे कुरेदता है ताकि वह रो पड़े।
  • कोष्ठक (Brackets): कविता में कोष्ठक `( )` का प्रयोग एंकर के मन के विचारों और तकनीकी निर्देशों (Camera Instructions) को दिखाने के लिए किया गया है।

SCENE 2: पीड़ा का बाज़ारीकरण (Selling the Pain)

एंकर को अपाहिज के दर्द से कोई मतलब नहीं है। उसे सिर्फ़ अपनी TRP की चिंता है। वह चाहता है कि दर्शक भी रो पड़ें।

ANCHOR: "सोचिए... बताइए...
आपको अपाहिज होकर कैसा लगता है?
कैसा? यानी कैसा लगता है?"
(खुद इशारे करके बताता है कि क्या ऐसा लगता है?) ANCHOR: "सोचिए... थोड़ी कोशिश करिए...
(यह अवसर खो देंगे?)"
(कैमरा मैन, स्क्रीन पर इसकी सूजी हुई आँख की बड़ी तस्वीर दिखाओ... बहुत बड़ी तस्वीर)
🚨 व्यंग्य (Irony): "यह अवसर खो देंगे?" - एंकर विकलांगता को एक 'दुर्भाग्य' नहीं, बल्कि टीवी पर आने का एक 'सुनहरा अवसर' बता रहा है। यह संवेदनहीनता की पराकाष्ठा है।

SCENE 3: क्लाइमेक्स और विफलता (The Failed Show)

एंकर पूरी कोशिश करता है कि अपाहिज व्यक्ति रो दे, ताकि शो हिट हो जाए। वह दर्शकों और पीड़ित दोनों को एक साथ रुलाने का "इंतज़ार" करता है।

ANCHOR: "फिर हम पर्दे पर दिखलाएंगे
फूली हुई आँख की एक बड़ी तस्वीर...
और उसके होठों पर एक कसमसाहट भी।"
(आशा है आप उसे उसकी अपंगता की पीड़ा मानेंगे) ANCHOR (Looking at Clock): (टाइम अप हो रहा है...) "बस थोड़ी कसर रह गई...
धन्यवाद!"
🛑 'बस थोड़ी कसर रह गई' का अर्थ:

इसका अर्थ है कि एंकर का उद्देश्य पूरा नहीं हुआ। वह चाहता था कि अपाहिज व्यक्ति फूट-फूट कर रोए, लेकिन वह केवल "कसमसा" कर रह गया। एंकर के लिए यह एक 'असफल' शो था क्योंकि पूरी तरह ड्रामा क्रिएट नहीं हो पाया। "धन्यवाद" शब्द यहाँ शिष्टाचार नहीं, बल्कि शो खत्म करने की औपचारिकता है।

गहन समीक्षा (Critical Analysis Matrix)

तत्व (Element) विश्लेषण (Analysis)
भाषा खड़ी बोली (बातचीत की शैली)। अत्यंत सरल लेकिन चोट करने वाली।
शैली नाटकीय (Dramatic) और मुक्त छंद (Free Verse)।
अलंकार 'फूली हुई आँख' (बिम्ब), 'बहुत बड़ी तस्वीर' (अतिशयोक्ति)।
मुख्य उद्देश्य मीडिया के दोहरे चरित्र (Hypocrisy) को उजागर करना।

🎯 बोर्ड टॉपर्स कॉर्नर (Imp Questions)

Q1. "करुणा के मुखौटे में छिपी क्रूरता की कविता" - विचार कीजिए।
Ans: यह कार्यक्रम ऊपर से देखने में 'सामाजिक उद्देश्य' का लगता है (करुणा), लेकिन वास्तव में एंकर का उद्देश्य पीड़ित के दर्द को बेचकर पैसा कमाना है। वह उसे इतना कुरेदता है कि वह रो दे। यह संवेदनहीनता ही 'क्रूरता' है।
Q2. 'पर्दे पर वक्त की कीमत है' - यह पंक्ति क्या दर्शाती है?
Ans: यह पंक्ति मीडिया की व्यावसायिकता (Commercialism) को दिखाती है। एंकर को पीड़ित के दर्द या भावनाओं से हमदर्दी नहीं है; उसे सिर्फ़ अपने प्रसारण समय (Airtime) और विज्ञापन की चिंता है।
Q3. कविता में कोष्ठकों (Brackets) का प्रयोग क्यों किया गया है?
Ans: कोष्ठक तीन चीजें बताते हैं: (1) कैमरा पर्सन को निर्देश, (2) एंकर की शारीरिक चेष्टाएं (Body Language), और (3) एंकर की असल सोच जो वह दर्शकों से छुपाता है।

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यह लेख मीडिया की पोल खोलने वाला सबसे विस्तृत विश्लेषण है। इसे प्रिंट करें।



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