RBSE Class 12 Hindi Chapter 5: Saharsa Swikara Hai (Muktibodh) Explanation & Notes

📅 Saturday, 10 January 2026 📖 3-5 min read
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पाठ-5: सहर्ष स्वीकारा है (Saharsa Swikara Hai) - मनोवैज्ञानिक विश्लेषण

कवि: गजानन माधव मुक्तिबोध | 'भूरी-भूरी खाक धूल' से संकलित

गजानन माधव मुक्तिबोध (1917-1964)
🌋
"फैंटेसी और विद्रोह के कवि"
जन्मश्योपुर (ग्वालियर), म.प्र.
सप्तक'तार सप्तक' के पहले कवि
प्रमुख रचनाचांद का मुंह टेढ़ा है
विशेषतालंबी कविताएं, आत्म-संघर्ष

पाठ परिचय: 'सहर्ष स्वीकारा है' एक प्रेम कविता होते हुए भी उससे कहीं आगे की चीज़ है। इसमें कवि अपने जीवन के सुख-दुख, संघर्ष और अवसाद (Depression) सभी को खुशी-खुशी स्वीकार करता है क्योंकि ये सब उसके 'प्रिय' (माँ/प्रेमिका/ईश्वर) से जुड़े हैं। लेकिन अंत में कवि इस 'निर्भरता' से मुक्त होकर आत्मनिर्भर (Self-reliant) बनना चाहता है।


1. गर्बीली गरीबी और विचार वैभव (Proud Poverty)

"जिंदगी में जो कुछ है, जो भी है...
सहर्ष स्वीकारा है;
इसलिए कि जो कुछ भी मेरा है
वह तुम्हें प्यारा है।
गर्बीली गरीबी यह, यह गंभीर अनुभव सब..."

गहन विश्लेषण (Deep Analysis):

आमतौर पर गरीबी शर्म का कारण होती है, लेकिन कवि ने इसे 'गर्बीली' (Proud) कहा है। क्यों? क्योंकि कवि का मानना है कि उसकी गरीबी, उसके गहरे अनुभव (गंभीर अनुभव) और उसके विचारों की संपत्ति (विचार-वैभव) सब उसके प्रिय को पसंद है। जब प्रिय को पसंद है, तो उसे भी यह स्वीकार है।

महत्वपूर्ण रूपक: 'भीतर की सरिता' (Inner River) = भावनाओं का प्रवाह।

2. ममता के बादल (Clouds of Affection)

प्रेम जब हद से ज्यादा हो जाता है, तो वह 'ताकत' के बजाय 'कमजोरी' बन जाता है।

"ममता के बादल की मँडराती कोमलता—
भीतर पिराती है,
कमजोर और अक्षम अब हो गई है आत्मा यह..."
प्रेम का सकारात्मक पक्ष प्रेम का नकारात्मक पक्ष (कवि की दृष्टि)
सुरक्षा और सुकून देता है। आत्मनिर्भरता (Self-dependency) छीन लेता है।
'ममता के बादल' छाया देते हैं। यही कोमलता 'भीतर पिराती' (दर्द देती) है क्योंकि कवि को लगता है कि वह अकेले भविष्य का सामना नहीं कर पाएगा।

3. अमावस्या की चाह (Craving for Darkness)

यहाँ कविता एक यू-टर्न (U-Turn) लेती है। जो कवि पहले सब कुछ स्वीकार रहा था, अब वह अपने प्रिय को भूल जाना चाहता है।

🌑 दक्षिणी ध्रुवी अंधकार-अमावस्या

काव्य पंक्तियाँ:
"सचमुच मुझे दंड दो कि भूलूँ मैं...
दक्षिणी ध्रुवी अंधकार-अमावस्या
शरीर पर, चेहरे पर, अंतर में पा लूँ मैं
झेलूँ मैं, उसी में नहा लूँ मैं।"

मनोवैज्ञानिक अर्थ (Psychological Meaning):
कवि उजाले (प्रिय के सहारे) से तंग आ चुका है। वह 'दण्ड' (Punishment) मांगता है। वह घोर अंधकार (संघर्ष/अकेलापन) में नहाना चाहता है ताकि उसे पता चले कि वह अकेले कितना मजबूत है। 'दक्षिणी ध्रुव' (South Pole) का अंधेरा सबसे गहरा और लंबा होता है, इसलिए यह उपमा दी गई है।

4. परम विरोधाभास (The Grand Paradox)

कविता का अंत सबसे चौंकाने वाला है। कवि अंधेरे में जाना चाहता है, लेकिन वहां भी उसे प्रिय का ही सहारा दिखता है।

"क्योंकि यहाँ भी तो...
परिवेष्टित, आच्छादित रहने का रमणीय यह उजेला अब...
सहा नहीं जाता है।"
💡 निष्कर्ष: कवि कहना चाहता है कि मेरे व्यक्तित्व का निर्माण, मेरे सुख-दुख, यहाँ तक कि मेरा 'अंधकार' भी तुमसे ही जुड़ा है। मैं तुमसे भागकर जहाँ भी जाऊँगा, तुम्हारी यादें (स्मृतियाँ) मेरे साथ रहेंगी। "मुक्तिबोध की मुक्ति भी एक बंधन है।"

🎯 बोर्ड टॉपर्स कॉर्नर (Imp Questions)

Q1. 'गर्बीली गरीबी' में कौन सा अलंकार है और इसका क्या अर्थ है?
Ans: इसमें अनुप्रास (ग वर्ण) और विरोधाभास अलंकार है। आमतौर पर गरीबी दुखद होती है, पर कवि को इस पर गर्व है क्योंकि यह उसे जीवन के गहरे अनुभव देती है।

Q2. कवि 'अमावस्या' के अंधेरे में क्यों नहाना चाहता है?
Ans: ताकि वह अपनी 'आत्मनिर्भरता' को परख सके। प्रिय के लगातार स्नेह ने उसे अंदर से कमजोर कर दिया है। वह संघर्षों (अंधेरे) का सामना अकेले करके अपनी खोई हुई शक्ति पाना चाहता है।

Q3. 'सहर्ष स्वीकारा है' कविता का मूल संदेश क्या है?
Ans: जीवन की हर परिस्थिति (राग-विराग, सुख-दुख, संघर्ष-अवसाद) को प्रसन्नता से स्वीकार करना चाहिए क्योंकि यह सब हमें उस परम सत्ता (ईश्वर या प्रिय) से जोड़ता है।

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यह लेख मुक्तिबोध की जटिल कविता का सबसे सरल और गहरा विश्लेषण है।

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