RBSE Class 12 Hindi Chapter 7: Badal Rag (Nirala) Explanation & Social Pyramid

📅 Saturday, 10 January 2026 📖 3-5 min read

पाठ-7: बादल राग (Badal Rag) - निराला (संपूर्ण विमर्श)

अनामिका (संग्रह) | प्रगतिवादी चेतना | क्रांति का आह्वान

सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला'

जन्म: 1899 (महिषादल, बंगाल)

मृत्यु: 1961 (इलाहाबाद)

उपनाम: महाप्राण, मुक्त छंद के प्रवर्तक

पाठ का सार: बादल क्रांति का प्रतीक है। वह शोषक वर्ग (Capitalist) के महलों को हिला देता है और शोषित वर्ग (Farmers) को नया जीवन देता है।

बादल राग कविता निराला जी के संग्रह 'अनामिका' के छठे खंड से ली गई है। यह कविता प्रगतिवादी (Progressive) विचारधारा का उत्कृष्ट उदाहरण है। इसमें कवि ने बादलों को केवल सौंदर्य का प्रतीक नहीं, बल्कि "विप्लव के वीर" (Hero of Revolution) के रूप में चित्रित किया है।

सामाजिक क्रांति का पिरामिड (Marxist View)

(नीचे दिए गए चित्र से समझें कि क्रांति का असर किस पर कैसा होता है)

धनी / शोषक वर्ग (Capitalist)
(महलों में डर कर छिपे हैं)
⚡ बादल (Revolution) ⚡
(गर्जना और विनाश)
किसान / मजदूर (Proletariat)
(मुस्कुराते हैं और स्वागत करते हैं)

1. समीर-सागर पर अस्थिर सुख (Floating Joys)

"तीरती है समीर-सागर पर
अस्थिर सुख पर दुख की छाया-
जग के दग्ध हृदय पर
निर्दय विप्लव की प्लावित माया"

व्याख्या: कवि कहते हैं कि बादल हवा रूपी समुद्र (समीर-सागर) पर वैसे ही तैर रहे हैं, जैसे अस्थिर सुखों पर दुख की छाया तैरती है।

गहरा अर्थ: पूंजीपतियों का सुख 'अस्थिर' (Temporary) है। बादल रूपी क्रांति उनके सिर पर 'दुख की छाया' बनकर मंडरा रही है। यह संसार जल रहा है (दग्ध हृदय), और बादल उस पर अपनी 'माया' (विनाश और सृजन) लेकर आ रहे हैं।

2. अट्टालिका नहीं है रे! (Not Palaces, But Terror)

"अट्टालिका नहीं है रे
आतंक भवन
सदा पंक पर ही होता
जल-विप्लव-प्लावन"

क्रान्तिकारी विचार: कवि महलों (Attalika) को महल नहीं, बल्कि 'आतंक भवन' (House of Terror) कहते हैं। क्योंकि यहीं से गरीबों के शोषण की योजनाएं बनती हैं।

कीचड़ और कमल (Pank & Jalaj):
"क्षुद्र प्रफुल्ल जलज से..."
बाढ़ (क्रांति) हमेशा कीचड़ (पंक) में ही आती है। लेकिन उस कीचड़ में खिला हुआ छोटा कमल (आम आदमी) पानी छलकने पर प्रसन्न होता है, जबकि बड़े बांध टूट जाते हैं। यानी क्रांति से अमीरों को नुकसान होता है, गरीबों को फायदा।

3. कृषक का आह्वान (The Farmer's Call)

"जीर्ण बाहु, है शीर्ण शरीर
तुझे बुलाता कृषक अधीर,
ऐ विप्लव के वीर!
चूस लिया है उसका सार
हाड़-मात्र ही है आधार"

शोषण का चित्रण: किसान की भुजाएं कमजोर (जीर्ण) हो गई हैं। शोषकों ने उसका सारा 'सार' (Blood/Wealth) चूस लिया है। वह केवल हड्डियों का ढांचा (हाड़-मात्र) रह गया है।

वह किसान अधीर होकर बादलों (क्रांति) को बुला रहा है, क्योंकि उसे पता है कि यह विनाश ही उसे न्याय दिला सकता है।

🔥 बोर्ड परीक्षा के प्रश्न (Question Bank)

Q1. "अस्थिर सुख पर दुख की छाया" किसे कहा गया है?
Ans: धनी वर्ग (पूंजीपतियों) के सुख को 'अस्थिर' कहा गया है। क्रांति की आहट उनके लिए 'दुख की छाया' है क्योंकि क्रांति उनके साम्राज्य को नष्ट कर देगी।

Q2. 'विप्लव-रव' (Revolutionary Sound) से छोटे ही शोभा पाते हैं - इसका क्या आशय है?
Ans: जब क्रांति (तूफान) आती है, तो बड़े पेड़ उखड़ जाते हैं लेकिन छोटी घास और पौधे सुरक्षित रहते हैं और लहलहाते हैं। अर्थात क्रांति से गरीब वर्ग को लाभ होता है, नुकसान नहीं।

Q3. 'अट्टालिका नहीं है रे, आतंक भवन' - स्पष्ट करें।
Ans: कवि का मानना है कि अमीरों के ऊंचे महल सिर्फ रहने की जगह नहीं हैं, बल्कि वे गरीबों के शोषण और भय (आतंक) के केंद्र हैं।

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