पाठ-6: उषा (Usha) - शमशेर बहादुर सिंह (संपूर्ण विश्लेषण)
बिम्बधर्मिता का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण | प्रकृति का पल-पल बदलता रूप
"कवियों के कवि" (Poet's Poet)
| जन्म | देहरादून (उत्तराखंड) |
| उपनाम | बिम्बधर्मी कवि, मूड्स के कवि |
| प्रमुख रचना | 'कुछ कविताएँ', 'चुका भी हूँ नहीं मैं' |
| शैली | प्रयोगवादी, नयी कविता |
| पुरस्कार | साहित्य अकादमी |
पाठ परिचय: 'उषा' कविता हिंदी साहित्य में 'प्रकृति चित्रण' का बेजोड़ नमूना है। शमशेर बहादुर सिंह ने सूर्योदय से ठीक पहले (भोर) के पल-पल बदलते रंगों को शब्दों में कैद किया है। उन्होंने प्रकृति की तुलना किसी राजा-महाराजा से न करके, गांव की एक साधारण गृहिणी और उसके रसोई-घर से की है। यह कविता 'गतिशीलता' (Dynamism) का उत्सव है।
1. गहरा नीला शंख (The Deep Blue Shell)
भोर का नभ..."
कवि ने सुबह के आकाश (भोर) की तुलना 'नीले शंख' से की है।
क्यों? शंख पवित्रता और मांगलिकता का प्रतीक है। सुबह का आकाश भी पवित्र, शांत और गहरा नीला होता है। यह उपमान आकाश की 'स्वच्छता' और 'गहराई' दोनों को दर्शाता है।
2. राख से लीपा हुआ चौका (Ash Grey Sky)
(अभी गीला पड़ा है)"
3. काली सिल और लाल केसर (Red Saffron Strike)
कि जैसे धुल गई हो...
स्लेट पर या लाल खड़िया चाक
मल दी हो किसी ने..."
अब अंधेरा छंट रहा है और सूरज की हल्की लालिमा (Redness) आ रही है। कवि ने दो अद्भुत उदाहरण दिए हैं:
- काली सिल: जिस पत्थर पर मसाला पीसा जाता है। अंधेरा 'काली सिल' जैसा है और सूर्य की किरणें 'लाल केसर' जैसी हैं, जिन्होंने सिल को धो दिया है।
- स्लेट और खड़िया: आकाश एक काली 'स्लेट' है जिस पर किसी अदृश्य बच्चे (प्रकृति) ने 'लाल खड़िया' (Red Chalk) मल दी है। यह बिम्ब बाल-सुलभ निश्छलता और नयेपन का प्रतीक है।
4. 'उषा' का टाइम-लैप्स (The Sunrise Palette)
पूरी कविता एक वीडियो की तरह चलती है। इसे इस टेबल से समझें:
| समय (Time) | रंग (Color) | उपमान (Metaphor) |
|---|---|---|
| 3:00 - 4:00 AM (ब्रह्म मुहूर्त) |
गहरा नीला (Deep Blue) |
नीला शंख (पवित्रता, शांति) |
| 4:00 - 5:00 AM (भोर) |
सलेटी/राख जैसा (Ash Grey) |
राख से लीपा चौका (पवित्रता, नमी, गीलापन) |
| 5:00 - 5:30 AM (सूर्योदय पूर्व) |
काला + लाल (Black + Red) |
काली सिल + केसर स्लेट + लाल खड़िया (अंधेरे और प्रकाश का संघर्ष) |
| 5:30 - 6:00 AM (उषा काल) |
नीला + सुनहरा (Blue + Gold) |
नीले जल में गौर झिलमिल देह (सूरज की चमकती किरणें) |
| 6:00 AM+ (सूर्योदय) |
श्वेत/स्पष्ट (White/Bright) |
जादू टूटता है (सूर्य का पूर्ण उदय, रहस्य समाप्ति) |
5. जादू का टूटना (The Spell Breaks)
गौर झिलमिल देह
जैसे हिल रही हो...
और...
जादू टूटता है इस उषा का अब
सूर्योदय हो रहा है।"
अंतिम बिम्ब: आकाश अब नीले जल जैसा साफ़ हो गया है। सूरज की सफेद-सुनहरी किरणें ऐसी लग रही हैं मानो किसी सुंदरी (Usha personified) का गोरा शरीर (गौर देह) पानी में झिलमिला रहा हो।
जादू टूटना: जैसे ही सूर्य पूरी तरह निकल आता है, भोर के रंगों का खेल (जादू) खत्म हो जाता है। रहस्य समाप्त हो जाता है और दुनिया अपने काम में लग जाती है। यह 'यथार्थ' (Reality) का आगमन है।
🎯 बोर्ड परीक्षा के लिए 'ब्रह्मास्त्र' प्रश्न
Ans: यह कोष्ठक वातावरण की 'नमी' और 'ताजगी' को उजागर करने के लिए है। जिस प्रकार गीला चौका साफ और पवित्र होता है, उसी प्रकार सुबह का आकाश भी ओस और ठंडक के कारण पवित्र और नया लगता है।
Ans: इस कविता के उपमान (शंख, राख, चौका, सिल, स्लेट) ग्रामीण परिवेश और घरेलू जीवन से लिए गए हैं। ये 'गतिशील' (Dynamic) हैं, जो स्थिर न होकर लगातार बदल रहे हैं।
Ans: उषा का जादू उसके 'पल-पल बदलते रंगों' और 'अद्भुत सौंदर्य' में है जो दर्शक को बांध लेता है। सूर्योदय होते ही तेज प्रकाश फैल जाता है और वह रहस्यमयी सुंदरता लुप्त हो जाती है, जिसे कवि ने 'जादू का टूटना' कहा है।


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