फ़िराक गोरखपुरी: रुबाइयाँ और गज़ल (विस्तृत अध्ययन)
| फ़िराक गोरखपुरी | |
|---|---|
✒️ | |
| मूल नाम | रघुपति सहाय |
| जन्म | 28 अगस्त 1896 (गोरखपुर) |
| मृत्यु | 3 मार्च 1982 (नई दिल्ली) |
| विधा | शायरी (गज़ल, रुबाई) |
| भाषा | उर्दू, हिंदी |
| प्रसिद्धि | ज्ञानपीठ पुरस्कार (गुले-नग़मा) |
| पाठ्यक्रम | आरोह भाग-2 (अध्याय 9) |
फ़िराक गोरखपुरी (मूल नाम: रघुपति सहाय) उर्दू शायरी के बड़े हस्ताक्षर माने जाते हैं। RBSE कक्षा 12 के पाठ्यक्रम में उनकी 'रुबाइयाँ' (Rubaiyan) और कुछ 'गज़लें' (Ghazals) शामिल हैं। यह पाठ भारतीय संस्कृति (विशेषकर वात्सल्य और त्योहार) और उर्दू अदब की गंगा-जमुनी तहज़ीब का बेहतरीन उदाहरण है।
1. रुबाइयाँ (Rubaiyan): घर-आंगन की झांकी
दृश्य 1: माँ और शिशु (Mother & Child)
शायर ने माँ के वात्सल्य का इतना सूक्ष्म चित्रण किया है कि वह आँखों के सामने एक चित्र (Visual Imagery) जैसा लगता है।
हाथों पे झुलाती है उसे गोद-भरी
रह-रह के हवा में जो लोका देती है
गूँज उठती है खिलखिलाते बच्चे की हँसी"
व्याख्या: माँ अपने बच्चे (चाँद के टुकड़े) को आंगन में खिला रही है। वह उसे हवा में उछालती है (लोका देना)। बच्चा हवा में जाकर खुश होता है और उसकी किलकारी गूंज उठती है। माँ बच्चे को नहलाकर उसके उलझे बाल भी संवारती है।
दृश्य 2: रक्षाबंधन और दिवाली (Festivals)
फ़िराक ने हिंदू त्योहारों को उर्दू शायरी में पिरोकर सांप्रदायिक सद्भाव की मिसाल पेश की है।
- दिवाली: "चीनी के खिलौने" जगमगा रहे हैं और घरों में दीये (रूपवती मुखड़े) जल रहे हैं।
- रक्षाबंधन: राखी के लच्छों को "बिजली की चमक" जैसा बताया है। भाई-बहन का पवित्र रिश्ता सावन की घटाओं जैसा गहरा है।
2. गज़ल (Ghazal): दर्द और दर्शन
फ़िराक की गज़लों में प्रेम का दर्द (विरह) भी है और जीवन का दर्शन भी।
या उड़ जाने को रंग-ओ-बू गुलशन में पर तोले हैं"
अर्थ: वसंत ऋतु में कलियाँ (गुंचे) अपनी पंखुड़ियाँ खोल रही हैं। ऐसा लगता है जैसे खुशबू (रंग-ओ-बू) उड़ने के लिए पंख फड़फड़ा रही हो।
इन गज़लों के पर्दों में तो मीर की गज़लें बोले हैं"
अर्थ (मक़्ता): फ़िराक अपनी ही शायरी की तारीफ करते हुए कहते हैं कि मेरी गज़लों में महान शायर 'मीर तक़ी मीर' की शैली की झलक मिलती है। यह उनकी काव्य-परंपरा के प्रति सम्मान है।
3. उर्दू-हिंदी शब्दकोश (Urdu-Hindi Dictionary)
पाठ को समझने के लिए इन कठिन शब्दों का अर्थ जानना अनिवार्य है:
| उर्दू शब्द | हिंदी अर्थ | संदर्भ (Context) |
|---|---|---|
| नौरस (Navras) | नया रस / आनंद | कलियों का खिलना |
| लोका देना (Loka Dena) | हवा में उछालना | माँ द्वारा बच्चे को खिलाना |
| फितरत (Fitrat) | स्वभाव / आदत | "फितरत का कायम है तवाज़ुन" |
| तवाज़ुन (Tawazun) | संतुलन (Balance) | प्रेम और दुख का संतुलन |
| रिंद (Rind) | शराबी / मस्तमौला | शराबखाने में जाने वाले |
| गर्दूं (Gardoon) | आकाश / आसमान | "ज़र्रा-ज़र्रा सोये हैं" |
| एजाज़े-सुखन | काव्य-सौंदर्य / बेहतरीन शायरी | फ़िराक की अपनी तारीफ |
4. परीक्षा उपयोगी प्रश्न (Question Bank)
प्र.1: "गोद भरी" और "लोका देना" शब्दों से कौन सा दृश्य उपस्थित होता है?
उत्तर: इससे एक वात्सल्यपूर्ण दृश्य बनता है जहाँ माँ अपने छोटे बच्चे को हवा में उछालकर (लोका देकर) खिला रही है और बच्चा खिलखिला रहा है।
प्र.2: शायर ने 'रक्षाबंधन' की तुलना किससे की है?
उत्तर: शायर ने राखी के लच्छों (धागों) की तुलना "बिजली की चमक" से की है। सावन के महीने में जैसे बिजली चमकती है, वैसे ही कलाई पर राखी चमकती है।
प्र.3: "फितरत का कायम है तवाज़ुन" - इसका क्या आशय है?
उत्तर: इसका अर्थ है कि प्रेम में सुख और दुख दोनों का संतुलन (Balance) जरूरी है। प्रेमी वही पा सकता है जो खुद को खोने (मिटाने) की हिम्मत रखता है।


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